तुम दृष्टा बन जाओ-कविता साहित्य
Posted on February 7, 2008 by दीपक भारतदीप
भीड़ में अपनों की तलाश
अपनों में आत्मीय की तलाश
कभी भी नहीं होती पूरी
दिल होता निराश
बाजार में खरीदने-बेचने निकले
क्यों करें सम्मान की आस
बिचोलियों से ही चलता बाजार
क्या अच्छा क्या बुरा
चीजों के होते अपने दाम
बेचो या खरीदों
धंधे हैं जिनके उनके लिए
सौदेबाजी के अलावा और क्या होता उनका काम
हाट में क्यों करें सम्मान की तलाश [...]
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