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तुम दृष्टा बन जाओ-कविता साहित्य

Posted by: दीपक भारतदीप on: February 7, 2008

भीड़ में अपनों की तलाश
अपनों में आत्मीय की तलाश
कभी भी नहीं होती पूरी
दिल होता निराश
बाजार में खरीदने-बेचने निकले
क्यों करें सम्मान की आस
बिचोलियों से ही चलता बाजार
क्या अच्छा क्या बुरा
चीजों के होते अपने दाम
बेचो या खरीदों
धंधे हैं जिनके उनके लिए
सौदेबाजी के अलावा और क्या होता उनका काम
हाट में क्यों करें सम्मान की तलाश

बिकता है सब यहाँ
गद्य-पद्य और गीत-संगीत
पल भर के लिए मिलते मीत
पैसे से चाहे जिसका दिल लो जीत
जानने की कोशिश मत करो
असली है कि नकली प्रीत
जांचने कि कोशिश करेगी चिंता पैदा
बढता हुआ तनाव कर देगा
सुंदर देह का विनाश

फ़िर भी रास्ते हैं
बचने के लिए
इसे जीवन पथ पर
सहजता से चलने के लिए
कहीं चीजों की तरह सजने से
अच्छा होगा दृष्टा बन जाओ
सौदे में खरीदो खुशी मन की
उसके सृष्टा ख़ुद बन जाओ
आते-जाते देखो
लोगों की खुशिया और गम
कहीं प्रकाश कहीं तम
सब चीजें तुम्हारे सामने
खडी हो जायेंगे
जिनकी करते तुम तलाश
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