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अपना अहंकार दिखाते-कविता साहित्य

Posted by: दीपक भारतदीप on: February 12, 2008

मेरा लिखा शब्द तेरे लिखे शब्द से भारी
मैंने जो पढा व्याकरण
तेरी भाषा भी उसमें सिमट जायेगी सारी
मेरी भाषा का तू भी हो जा आज्ञाकारी
ऐसी सोचे वाले कहते हैं कि
‘जैसा हम कहते हैं वैसा तू लिख
जैसा चाहें वैसा तू दिख’

अपने अहंकार की देखी
कई बार नाकामी
दो हजार सात तक झेली गुलामी
अभी तक छूटी नहीं वह बदनामी
फिर भी अपना नाम करने की खातिर
चाहे जब अकड़ दिखाते
अपने इलाके के शेर कहलाने वाले
हरिणों की तरह चहकते लोगों पर
अपने अस्तित्व का रुतवा जताते
पड़ जाये तगड़ा विदेशी शिकारी तो
उसके आगे नतमस्तक हो जाते
हाथ उठाकर मांगते उसकी मेहरबानी
और अपने असहाय आदमी पर गुर्राते
‘जैसा हम कहते हैं वैसा तू लिख
जैसा चाहें वैसा तू दिख’

अपनी संस्कृति, भाषा, और विचारधारा
के करते ढेर सारे दावे
कई वाद रचते
उनकी तरफ से कई नारे लगते
इससे आगे उनकी समझ नहीं जाती
कुछ आगे पूछों तो
इतिहास की किताबों में लिखे
खंडहर जैसे शब्द उठाकर दिखाते
‘हम ऐसे थे’ और वैसे थे”
अब का हाल पूछो तो लड़ जाते
बस एक ही बात दोहराते
‘जैसा हम कहते हैं वैसा तू लिख
जैसा चाहें वैसा तू दिख’

भाषा, संस्कृति और विचारधारा का
स्वरूप कभी स्पष्ट नहीं किया
किसी ने जो कुछ सुनाया
अपने रास्ते का नाम वही रख दिया
सदियों से चलता सिलसिला
जब थमने लगता है
वह उठा लेते हैं पत्थर की शिला
‘जैसा हम कहते हैं वैसा तू लिख-कविता साहित्य
जैसा चाहें वैसा तू दिख’
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