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संत कबीर वाणी:काटने पर भी लकडी जहाज बनकर पार लगाती है

Posted by: दीपक भारतदीप on: June 1, 2008

तरुवर जड़ से काटिया, जबै तम्हारो जहाज
तारे पर बोरे नहीं, बांह गाहे की लाज

संत कबीर दास जी कहते हैं कि लोग वृक्ष को जड़ से काट डालते हैं, परन्तु उस वृक्ष की लकडी का जब जहाज बन जाता है, तब भी वह काटने वाले को नदी-समुद्र से पार लगाता है शत्रु मानकर डुबाता नहीं है। सच है, बडे लोग बांह पकड़ने में लज्जा करते हैं।

आशय- संत कबीर दास जी कहते वृक्ष से बड़प्पन का गुण लेने की सलाह देते हैं। आदमी लकडी को बेरहमी से काट कर नाव बनाता है इसके बावजूद वह बदला लेने के लिए उसे सागर में नहीं डुबाती। इसी तरह सज्जन लोग किसी पर क्रोध प्रदर्शन न कर परहित के कार्य में लगे रहते हैं ।

कबीर विषधर बहु मिलै, मणिधर मिला न कोय
विषधर को मणिधर मिलै, विष तजि अमृत होय

संत कबीर दास जी कहते हैं कि विषधर सर्प तो बहुत मिलते हैं पर मणि वाल सर्प नहीं मिलता। यदि विषधर को मणिधर मिल जाय तो विष मिटकर अमृत हो जाता है।

भावार्थ-कहते हैं कि जहाँ सांप ने काट लिया हो वहाँ मणि लगाने से विष निकल जाता है। वही मणि दूध में डाल कर पीया जाये उसका कोड भी दूर हो जाता है (हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है)। आशय यह है कि यहाँ बुर लोगों की संगत के कारण बुरी आदतें तो बहुत जल्दी आ जाती हैं पर अच्छे की संगत बहुत जल्दी नहीं मिल पाती है और अगर मिल जाये तो अपने आप ही अच्छे संस्कार विचार मन में आ जाते हैं।

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