*** दीपक भारतदीप की जागरण-पत्रिका*** ***mastram Deepak Bharatdeep ki hindi Jagran Patrika***

भृतहरि शतकःकामदेव का शिकार हुए बिना युवावस्था निकल जाये तो धन्य समझें

Posted by: दीपक भारतदीप on: July 2, 2008


श्रृङगारद्रुमनीरदे प्रचुरतः क्रीडारसस्त्रोतसि
प्रद्युम्नप्रियन्धवे चतुरवाङ्मुक्ताफलोदन्वति।
तन्वीनेत्रयचकोरवनविधौ सौभाग्यलक्ष्मीनिधौ
धन्यः कोऽपि न विक्रियां कलयति प्राप्ते नवे यौवने

हिंदी में भावार्थ’- जैसे श्रृंगार रस के पौधे को मेघ सींचकर उसको वृक्ष का रूप प्रदान करते हैं वैसे ही युवावस्था में अपने कदम रख रहे युवकों के हृदय में कामदेव उत्तेजना और काम भावना उत्पन्न करते हैं। उनका इष्ट तो कामदेव ही होता हे। वह अपनी वाणी से ऐसी भाषा का उपयोग करते हैं जिससे कि नवयुवतियां का हृदय जीतकर उसमें अपना स्थान बनायें। नवयुवतियां भी पूनम के चंद्रमा की तरह दृष्टिगोचर होती हैं और वह उन युवकों को एकटक देखकर आनंद विभोर होती हैं। इस युवावस्था में जो नहीं बहके उस तो धन्य ही समझना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-प्राचीन काल में जब समाज इतना खुला नहीं था तब संभवतः भृतहरि के इस श्लोक को इतना महत्व नहीं मिला होगा जितना अब खुलेपन की राह पर चलते हुए समाज को देखते हुए लग रहा है। भारत के उष्ण जलवायु के चलते वैसे भी लोगों में काम भावना अधिक होती है। हम लोग अक्सर ऐसे समाचार सुंनते हैं जिसमें अनैतिक अथवा विवाहेत्तर संबंधों का दुष्परिणाम सामने आता है। कहा जाता है कि बुराई का अंत भी बुरा ही होता है। कामदेव के क्षणिक प्रभाव में आकर कई लोग अनेक गल्तियां कर जाते हैं और फिर उसका दुष्परिणाम उनको जीवन भर भोगना पड़ता है। आजकल जिनके पास पैसा, पद और प्रतिष्ठा है वह अनैतिक या विवाहेत्तर संबंध बनाने में कोई संकोच नहीं करते। एक नहीं ऐसे हजारांे उदाहरण है जब ऐसे गलत संबंधों के कारण लोग अपराध में लिप्त हो जाते हैं। जो युवक-युवतियां अपने परिवार से मिली छूट का लाभ उठाकर खुलेपन से यौन संबंध तो बना लेते हैं पर बाद में जब जीवन संजीदगी से गुजारने का विचार आता है तो स्वयं को उसके लिये तैयार नहीं कर पाते। कहीं युवतियां तो कहीं युवक इस कामदेव के शिकार होकर अपनी देहलीला तक समाप्त कर लेते हैं। कुछ युवतियां को युवकों की हिंसा का शिकार भी होना पड़ता है। हालांकि आजकल प्रचार माध्यमों में इसे कथित रूप से प्यार कहा जाता है पर यह एक भ्रम है। आजकल के नवयुवक नवयुवतियों को आकर्षित करने के लिए उनको शायरी और गीत सुनाने प्रभावित करने का प्रयास करते हैं जो उन्होंने कहीं से उठा ली होती हैं। वह इस तरह का प्रयास करते हैं कि उनको एक कवि या शायर समझकर नवयुवतियां प्रभावित हो जायें।

यह तो कामदेव की माया है। हमारे देश में प्यार या प्रेम के अर्थ बहुत व्यापक होते हैं पर पश्चिम की संस्कृति को अपनाने के कारण यह केवल युवक-युवतियों के संबंधों तक ही सीमित रह गया हैं। ऐसे में जो नवयुवक और नवयुवतियां इस अवस्था से सुरक्षित निकल जाते हैं वह स्वयं अपने को धन्य ही समझें कि उन्होंने कोई ऐसी गलती नहीं की जिससे उनको जीवन भर पछताना पड़े।

Leave a Reply

Blog Stats

  • 8,693 hits

Recent Posts