Posted by: दीपक भारतदीप on: September 19, 2008
एक बच्चे के पैदा होने पर
घर में खुशी का माहौल छा जाता है
भागते हैं घर के सदस्य इधर-उधर
जैसी कोई आसमान से उतरा हो
ढूढे जाते हैं कई काम जश्ने मनाने के लिए
आदमी व्यस्त नजर आता है
एक देह से निकल गयी आत्मा
शव पडा हुआ है
इन्तजार है किसी का, आ जाये तो
ले जाएं और कर दें आग के सुपुर्द
तमाम तरह के तामझाम
रोने की चारों तरह आवाजें
कई दिन तक गम मनाना
दिल में न हो पर शोक जताना
आदमी व्यस्त नजर आता है
निभा रहे हैं परंपराएं
अपने अस्तित्व का अहसास कराएं
चलता है आदमी ठहरा हैं मन
बंद हैं जमाने के बंदिशों में
लगता है आदमी काम कर रहा है
पर सच यह है कि वह भाग रहा है
अपने आपसे बहुत दूर
जिंदा रहने के बहाने तलाशता
आदमी व्यस्त नजर आता है
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कवि और संपादक-दीपक भारतदीप
1 | mahi sendre
March 5, 2009 at 11:02 am
jab koi apna rooth jai to ahsas hota hai ,
ki jeevan kitna khas hota hai,
tab ahsas hota hai ki kya khoya hai hamne ,
pyar wo ahsas hota hai jise sirf mahsos kiya ja sakta hai ,
apki kavita bahut achi hai ,
per kuch such to kush jhooth bhi usme shamil hai ,
aur shayad jindgi ki suchhai hai