क्रिकेट में कमा कौन नहीं रहा है?


भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्द के भूतपूर्व अध्यक्ष श्री आई. एस. बिंद्रा ने कपिल देव पर आई. सी. एल. को पैसे के उद्देश्य से बनाने का आरोप लगाया। आजकल ऐक बात मजेदार बात यह है कि जिसे देखो वही पैसे कमाने में लगा हुआ है, पर बात नैतिकता की बात करता है। शायद यह हमारी मानसिकता है कि हम त्याग को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं पर चाह्ते हैं कि दूसरे ऐसा करे ताकि हम उसकी पूजा करें-ताकि हम स्वयं माया ऐकत्रित करते रहें और समाज में अपना लौकिक सम्मान बनाये रखें। मैं तो यह जानना चाहता हूं कि पैसे कौन नहीं चाह्ता है, यहां त्यागी कौन है।

अगर कपिल देव ने अपनी संस्था पैसे कमाने के लिये बनाई है तो उसमें बुराई क्या है? और क्या कपिल देव ही केवल पैसा कमाएंगे? उनके साथ क्या जो लोग होंगे वह पैसे नहीं कमाएंगे? शायद बिंद्रा साह्ब को पता नहीं कि कई प्रतिभाशाली क्रिकेट खिलाडी धनाभाव के कारण आत्महत्या कर चुके हैं। वह कह रहे हैं कि कपिल देव देश में क्रिकेट के विकास का बहाना कर रहे हैं। वैसे देखा जाये तो देश में क्रिकेट ने जो ऊंचाई प्राप्त की है उसका पूरा श्रेय कपिल देव को ही जाता है। अगर १९८३ में अगर वह विश्व कप जीतने में अपना योगदान नहीं देते तो शायद इस देश में यह खेल लोकप्रिय भी नहीं होता। उसके बाद ही भारत में ऐकदिवसीय लोकप्रिय हुआ और उससे साथ ही जो खिलाडी उसमे ज्यादा सफ़ल बने उनहें हीरो का दर्जा मिला और साथ में मिले ढेर सारे विज्ञापन और पैसा और समाज में फ़िल्मी हीरो जैसा सम्मान। यही कारण है कि उसके बाद जो भी नवयुवक इस खेल की तरफ़ आकर्षित हुए वह इसलिये कि उनहें इसमें अपना चमकदार भविष्य दिखा। ऐक मजेदार बात यह है कि क्रिकेट का आकर्षण जैसे ही बढता गया वैसे ही फ़िल्मों में काम करने के लिये घर से भागने वाले लोगों की संख्या कम होती गयी क्योंकि क्रिकेट में भी उतना गलैमर आ गया जितना फ़िल्मों में था।

ऐसा केवल इसमें खिलाडियों को मिलने वाले पैसे के कारण हुआ। अब यह पूरी तरह ऐक व्यवसाय बन चुका है। अगर कोई कहता है कि हम क्रिकेट के साथ नियमित रूप से सत्संग के कारण ही जुडे हैं तो सरासर झूठ बोल रहा है-चाहे वह खिलाडी हो या किसी संस्था का पदाधिकारी। फ़र्क केवल इतना होता है कि कुछ लोग अपने कमाने के साथ इस बात का भी ध्यान रखते हैं कि दूसरे को भी कमाने का अवसर दिया जाये और अपने व्यवसाय में नैतिक सिद्धांतों का भी पालन किया जाये और कुछ लोग ऐसे होते हैं कि उनका उद्देश्य केवल अपने लिये माया जुटाना होता है और किसी नैतिक नियम को मानने की बात तो वह सोचते भी नहीं। समाज में ऐसे ही लोगों के संख्या ज्यादा है।

जिस तरह पिछ्ले कई वर्षौं से भारतीय क्रिकेट टीम का चयन हुआ है उससे नवयुवक खिलाडियों में यह बात घर कर गयी है कि उसमें उनको आसानी से जगह नहीं मिल सकती। इंग्लैंड गयी टीम का खेल देखकर तो यह साफ़ लगता है कि कई खिलाडी उसमें अपनी जगह व्यवसायिक कारणौं से बनाये हुये है। मैं हमेशा कहता हूं कि अगर किसी क्रिकेट खिलाडी कि फ़िटनेस देखनी है तो उससे क्षेत्ररक्षण और विकेटों के बीच दौड में देखना चाहिये। जहां तक बोलिंग और बैटिंग का सवाल है तो आपने देखा होगा कि कई जगह बडी उमर के लोग भी शौक और दिखावे के लिये मैचों का आयोजन करते हैं और उसमें बोलिंग और बैटिंग आसानी से कर लेते हैं पर फ़ील्डिंग और रन लेते समय उनकी दौड पर लोग हंसते है। आप मेरी इस बात पर हंसेंगे पर मेरा कहना यह है कि हमारे इस विशाल देश में लाखों युवक क्रिकेट खेल रहे हैं और रणजी ट्राफ़ी तथा अन्य राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में खेल रहे हैं ऐसा संभव नहीं है कि उनमें कोई प्रतिभा नहीं है पर उनको मौका नहीं दिया जा रहा है। इंग्लैंड गयी टीम क्षेत्ररक्षण और रन लेने में बहुत कमजोर सबित हुई है जो कि विश्व कप में भारत की जीत के सबसे मजबूत पक्ष थे। देश में युवा बल्लेबाज और गेंदबाजों की कमी नहीं है और क्षेत्ररक्षण और रन लेने की शक्ति और हौंसला युवा खिलाडियों में ही संभव है। अगर साफ़ कहूं तो अच्छी गेंदबाजी और बल्लेबाजी तो कोयी भी युवा क्रिकेट खिलाडी कर लेगा पर तेजी से रन लेना और दूसरे के शाट मारने पर उस गेंद के पीछे दौडना हर किसी के बूते का नहीं है।

भारत में प्रतिभाशाली खिलाडियों की कमी नही है पर क्रिकेट के व्यवसाय से जुडे लोग केवल यही चाह्ते हैं कि वह सब उनके घर आकर प्रतिभा दिखायें तभी उन पर कृपा दृष्टि दिखायें।
कपिल देव कमायेंगे इसमें कोयी शक नही है पर मेरी जो इच्छा है कि वह देश के युवाओं में ही नये हीरो ढूंढें। शायद वह यही करने वाले भी हैं। अगर वह इन्हीं पुराने खिलाडियों में अपने लिये नयी टीम का सपना देख रहे हैं तो शायद उन्हें निराशा ही हाथ लगेगी-क्योंकि अत: यह क्रिकेट ऐक शो बिजिनेस बन चुका है उसमें अब नए चेहरे ही लोगों में अपनी छबि बना सकते हैं।। मेरा तो सीधा कहना है कि कपिल देव न केवल खुद कमायें बल्कि छोटे शहरों और आर्थिक दृष्टि से गरीब परिवारों के प्रतिभाशाली युवा खिलाडियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चमका दें तो वह स्वयं भी सुपर हीरो कहलायेंगे-हीरो तो वह अब भी हैं क्योंकि १९८३ के बाद से भारत ने क्रिकेट में कोई विश्व कप नही जीता है। मैं कोई कपिल देव से कोई धर्मादा खाता खोलने की अपेक्षा नहीं कर रहा हूं क्योंकि क्रिकेट कोई दान पर चलने वाला खेल अब रहा भी नहीं है। विशेष रूप से कंपनियों के विज्ञापनों से होने वाले आय पर चलने वाले खेल में कम से कम इतनी व्यवसायिक भावना तो दिखानी चाहिये के खेलो, जीतो और कमाओ, न कि क्योंकि कमा रहे हो इसलिये खेलते रहो, टीम में बने रहो। यह ऐक गैर व्यवसायिक रवैया है यही कारण है कि दुनियां की किसी भी टीम से ज्यादा कमाने खिलाडी मैदान में फ़िसड्डी साबित हो रहे हैं। दुनियां में किसी भी देश में कोई भी ऐसी टीम खिलाडी बता दीजिये जो ज्यादा कमाते हैं और हारते भी हैं। मतलब साफ है कि क्रिकेट में कहीं भी किसी ने धर्मादा खाता नहीं खोल रखा है और यह संभव भी नहीं है। अत: कपिल देव को ऐसे आरोपों की परवाह भी नहीं करना चाहिऐ।

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