मतलब के रिश्ते


जब काम था वह रोज
हमारे गरीबखाने पर आये
अब उन्हें हमें याद करने की
फुरसत भी नहीं मिलती
गुजरे पलों की उन्हें कौन याद दिलाये
हम डरते हैं कि
कहीं याद दिलाने पर
उन्हें अपने कमजोर पल न सताने लगें
वह यह सोचकर मिलने से
बहुत घबडाते हैं कि
हम उन्हें अपनी पुरानी असलियत का
कहीं आइना न दिखाने लगें
दूरियां है कि बढती जाएँ
टूटे-बिखरे रिश्तों को फिर जोड़ना
इतना आसान नहीं जितना लगता है
बात पहले यहीं अटकती हैं कि
आगे पहले कब और क्यों आये
अच्छा है मतलब से बने
रिश्तों को भूल ही जाएँ
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टिप्पणियाँ

  • रवीन्द्र प्रभात  On अक्टूबर 14, 2007 at 19:16

    बहुत सुंदर संयोजन किया है भावनापूर्ण.पढ़कर अच्छा लगा,बहुत खूब!

  • durga  On अक्टूबर 14, 2007 at 01:27

    bahut badiya likha hai. shukriya

  • Udan Tashtari  On अक्टूबर 13, 2007 at 23:48

    सही है ऐसे रिश्तों को भूल ही जायें. बेहतरीन!!!

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