खालीपन


अब रिश्तों में लगता है
अजीब सा फीकापन
बडे बोझिल होते जाते हैं
उम्र के बढ़ते -बढते
जिनके साथ बीता था बचपन
जब लोग लगाते हैं
रीति-रिवाज निभाने की शर्तें
हो जाती हैं अनबन
इसलिये अपनों से ज्यादा
गैरों में ढूँढ रहा है आदमी अपनापन
वहाँ भी जब होती है
निभाने के लिए शर्तें
मुश्किल हो जाता है आगे बढना
तब आदमी सब से अलग
अकेले में ही बैठकर भरता है
कभी अच्छी तो कभी बुरी आदतों से
अपना खालीपन

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टिप्पणियाँ

  • मीत  On अक्टूबर 17, 2007 at 18:34

    अच्छा है हुज़ूर. पहली बार पढ़ा आप को. रचना अच्छी लगी. मीत

  • मीनाक्षी  On अक्टूबर 17, 2007 at 01:22

    गागर मे सागर. बड़ी कुशलता से आपने भावों को उभारा है जो सच है.

  • Udan Tashtari  On अक्टूबर 16, 2007 at 23:40

    बहुत बढ़िया. आनन्द आया.

  • Neeraj Goswamy  On अक्टूबर 16, 2007 at 23:25

    चंद शब्दों मैं गहरी बात.सुंदर रचना.नीरज

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