अपनी जरूरतें दायरों में ही रखें


अपने लिए कहीं आसरा
ढूढने से अच्छा है
हम ही लोगों के सहारा बन जाएं
किसी से प्यार मांगे
इससे अच्छा है कि
हम लोगों को अपना प्यार लुटाएं
किसी से कुछ पाने की ख्वाहिश
पालने से अच्छा है कि
हम लोगों के हमदर्द बन जाएं
जिन्दगी में सभी हसरतें पूरी नहीं होती
कुछ अपने ही हिस्से का सुख काम करते जाएं
आकाश की लंबाई से अधिक है
चाहतों के आकाश का पैमाना
सोचें दायरों से बाहर हमेशा
पर अपनी जरूरतें
दायरों में ही रखते जाएं
——————

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टिप्पणियाँ

  • रवीन्द्र प्रभात  On नवम्बर 20, 2007 at 21:55

    सही कहा है आपने ! आपके विचार बहुत सुंदर है , वैसे भी जब विचारों की चासनी में घुली हुई कविता सामने हो तो जुवान अपने -आप वाह-वाह ! कहने को विवश हो जाती है . एक कहावत है इस सन्दर्भ में की आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया ……!बहुत सुंदर .

  • मीनाक्षी  On नवम्बर 19, 2007 at 21:13

    सारगर्भित रचना…घुघुती जी आपने सही कहा बहुत कठिन है लेकिन मेरे विचार में असम्भव नहीं…

  • Mired Mirage  On नवम्बर 19, 2007 at 05:40

    सुन्दर कविता ! परन्तु इसका अनुकर करना बहुत कठिन है ।घुघूती बासूती

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