सबका दुख दर्द है एक जैसा


जब लगे हम लोगों में उपेक्षित हो रहे हैं
भीड़ में घिरे होकर भी
अकेले हो रहे हैं
तब समझ लो मन में ही
कई जगह है अपने ही भारीपन
जिसका बोझ हम ढो रहे हैं
भला कौन यहाँ किसकी परवाह करता है
सामने करें कोई तारीफ
पीठ फेरते ही वह जहर भी उगलता है
इस दुनिया में सबके साथ होते हादसे
जिसके साथ हो वही अपने साथ ही हुआ
समझता है
इसलिए सब भीड़ में अकेले हो रहे हैं
कौन किसको सम्मान देता है
बिना मतलब कौन किसको दान देता है
सब अपने आप में खो रहे हैं
सबका दर्द और दुख एक जैसा होता है
यह भ्रम है कि हम ही उसे ढो रहे हैं

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टिप्पणियाँ

  • नीरज गोस्वामी  On दिसम्बर 12, 2007 at 13:40

    कडुआ सच कहती कविता है आप की. एक एक शब्द बिल्कुल सच्चा और धारधार. बधाईनीरज

  • mamta  On दिसम्बर 12, 2007 at 12:38

    सबका दर्द और दुख एक जैसा होता हैयह भ्रम है कि हम ही उसे ढो रहे हैंसजीव चित्रण।

  • Mired Mirage  On दिसम्बर 12, 2007 at 04:57

    बढ़िया दर्शन से भरी कविता । हाँ, जीवने में ऐसा ही होता है ।घुघूती बासूती

  • मीनाक्षी  On दिसम्बर 12, 2007 at 01:11

    बहुत सहज रूप में कितना जटिल रूप वाला सत्य कह दिया…. कड़वा सत्य

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