आजादी की चाहत


एक तरफ आजादी से उड़ने की चाहत
दूसरी तरफ रीतिरिवाजों के काँटों में
फंसकर करते अपने को आहत
अपने क़दमों पर चलते हुए भी
अपनी अक्ल के मालिक होते हुए भी
तमाम तरह के बोझ उठाते हैं
समाज से जुड़ने बाबत

जमीन पर चलने वाले इंसान को
परिंदों की तरह पंख भी होते तो
कभी उड़ता नहीं
क्योंकि अपने मन में डाले बैठा है
सारे संसार को अपना बनाने की चाहत
हाथ में कुछ आने का नहीं
पर जूझ रहा है सब समेटने के लिए
नहीं माँगता कभी मन की तसल्ली या राहत

अगर चैन से चलना सीख लेता
अपने क़दमों को अपनी ही तय दिशा
पर चलने देता
तो ले पाता आजादी की सांस
पर जकड़ लिया झूठे रीतिरिवाज के
बन्धन अपने
और फिर भी पालता आजादी की चाहत
—————————-

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टिप्पणियाँ

  • rajivtaneja  On जनवरी 16, 2008 at 21:50

    सच्चाई से रुबरू करती आपकी कविता….मृग तृष्णा के पीछे भागता है हर इनसान…बहुत कुछ पाने के बाद भी और पाने की चाह खत्म नहीं होती….लालच ही ऐसा है कि सुरसा के मुँह की तरह बढता ही जाता है ….

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