ख्याल और जिंदगी-हिन्दी साहित्य कविता


बरसों साथ पलता है ख्याल मन में
पर जब सच होकर सामने आता
पर जो देखते थे तब भी नजर नहीं आता
घड़ी का काँटा चलता जाये
मौसम भी बदलता जाये
पर हम खडे रहते वहीं
जहाँ हमारा ख्याल हमें ठहराता

कई बरस तक रहता है कोई ख्याल
जब सामने आता है तो
खुद ही होते बेहाल
उसका रूप वैसा नहीं होता
कभी-कभी तो उजड़ा रूप सामने आता
यह जिन्दगी एक सफर है
जिसका पहिया घूमता जाये
हमारे पाँव कहीं नहीं ठहरते
फिर भी ख्याल नहीं बदलते
अपने ख्याल पह ही अड़ते
कभी जो सच नहीं बन पाता

क्यों अपनी ख्याली दुनिया बनाते हैं
क्यों अपना जिस्म जलाते हैं
ख्यालों से करते जो दोस्ती
उनका कहीं ठिकाना नहीं बनता
बदलते वक्त के साथ बहते हैं
यह जीवन भी उनको रास आता
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