ओलम्पिक मशाल, शादी में गम जैसा हाल


भारत में ओलपिक मशाल को लेकर अजीब सा माहौल है। ऐसा लगता है कि जैसे गम के माहौल में शादी हो रही है। हमने कई बार देखा होगा कि कई बार एसा होता है कि किसी परिवार में शादी की तैयारी होती है और पता लगता कि वहां कोई निकटस्थ व्यक्ति का देहावसान हो गया तो फिर भी मूहूर्त की वजह से शादी तो होती है पर उस तरह खुशी की माहौल नहीं रहता जैसा कि सामान्य हालत में रहता है। वैसे तो हर ओलपिक के अवसर पर मशाल आती है पर इस बात चीन में होने वाले ओलंपिक खेलों को लेकर जिस तरह पूरे विश्व में विवाद उठ खड़ा हुआ है ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। इधर चीन भी अपने आपको चर्चा के केंद्र में बनाये रखने के लिये तिब्बत में कथित आंदोलन का दमन कर दुनिया को अपनी ताकत दिखा रहा है। भारत में चीन को लेकर अधिक कोई रुझान नहीं है और उल्टे 1962 के बाद उसके खिलाफ लोगों में नाराजगी का माहौल तो रहता ही है उस कभी-कभी चीनी नेता भी अरुणांचल के मामले में कुटिलतापूर्ण टिप्पणियां कर आग में घी छिड़कने का काम करते है।

चीन तिब्बत का हिस्सा है या नहीं यह विवादास्पद प्रश्न है पर जिस तरह तिब्बती लोग पूरी दुनियां में इस मशाल का विरोध कर रहे हैं उससे यह तो संदेश मिल ही जाता है कि वहां के लोग बहंुत नाराज है। एक बात तय है कि चीन के लिये भारत की आम जनता में कोई सौहार्द का भाव नहीं है और न चीनी लोगों की भारत में दिलचस्पी है-क्योंकि चीन ने सरकारी तौर पर ऐसा कोई प्रयास नहीं किया। इस समय जो आर्थिक और सामाजिक क्षे+त्रों में संबंध है उच्च वर्ग के लोगों तक ही सीमित है। चीन की तिब्बत नीति पर पश्चिमी देश कभी सहमत नहीे हए। भले ही वह औपचारिक रूप से सतत उसका विरोध नही करते। तिब्बत के विस्थापित लोग भारत में बड़े पेमाने पर हैं। कई शहरों में सर्दी के दौरान वह स्वेटर बेचने के लिए अस्थाई बाजार लगाते हैं। उसमें उनके द्वारा प्रदर्शित नक्शे में तिबबत का क्षेत्रफल देखा जाये तो उससे लगता है कि चीन इतना बड़ा देश नहीं है जितना उसे माना जाता है। वैसे भी तिब्बत के सांस्कृतिक और धार्मिक स्वरूप को देखा जाये तो चीन के अन्य समूदायों से उनकी कोई तुलना नहीं है। तिब्बत में बौद्ध मतावलंबियों की संख्या बहुत अधिक है और उनका झुकाव धर्म की तरफ है जबकि गरीबों और मजदूरों को शासन दिलवाने का सपना दिखाने वाले आज के चीनी शासक तो शुद्ध रूप से माया के भक्त हैं।।उनके लिये धर्म तो एक अफीम है। तिब्बत का इलाका हिमालय के लगता है और निश्चित रूप से वहां तमाम तरह की प्राकृतिक संपदा है जिसका दोहन चीन ने किया है वरना उसके पास था ही क्या? आज चीन विश्व की एक महाशक्ति है पर कई लोग उसे संदेह की दृष्टि से देखते हैं कई विशेषज्ञ तो कहते है कि चीन की समृद्धि के पीछे काला पैसा भी है।

भारत में रह रहे तिब्बती ओलंपिक मशाल का विरोध कर रहे है तो उनसे सहानुभूति रखने वाले लोगों की भी कोई कमी यहां नही है। इसका कारण चीन की विस्स्तारवादी नीतियां ही हैं। अमेरिका पर तो तमान लोग सम्राज्यवादी होने के कई लोग आरोप लगाते हैं पर उसने किसी की जमीन हड़प कर रखी हो उसका केाई प्रमाण नहीं मिलता जबकि चीन ने पूरा एक देश ही हड़प कर रखा है और भारत के बहुत बड़े इलाके पर दावा जताता रहा है। वैसे तो अनेक बार ओलंपिक मशालें भारत आ चुकी हैं पर बहुत कम लोग उस पर ध्यान देते हैं। इस बार विवाद उठा है तो शायद लोगों का उस पर ध्यान अधिक गया है। हालांकि इस विरोध को कोई बड़ा समर्थन मिलने की आशा तो नहीं है क्योंकि एक आज के पूंजीवाद के युग में तिब्बती कोई अधिक स्थान नहीं रखते दूसरे इन्हीं खेलों से कई पूंजीपति भी जुड़े होते हैं और उनका अस्तित्व प्रत्यक्ष भले न दिखे पर अप्रत्यक्ष उनका प्रभाव बहत रहता है और वह किसी ऐसे विरोध को प्रायोजित नहीं करेंगें। वैसे भी ओलंपिक में भारत के खेल प्रमियों की रुचि अधिक नहीं रहती क्योंकि वहां एकाध खेल को छोड़कर वहां भारत की स्थिति नाम नाममात्र की रहती है और अब वह भी हाकी में ओलंपिक के लिये भारतीय हाकी टीम के क्वालीफाई न करने के कारण समाप्त हो गयी है। इस बार शायद इस मशाल की चर्चा भी नहीं होती अगर तिब्बतियों ने इसका विरोध नहीं किया होता। देश की प्रशासनिक संस्थाओं के पास राजनीतिक मर्यादाओं की वजह से इस मशाल को सुरक्षा देने के अलावा कोई अन्य उपाय नहीं है पर यह देखना होगा कि निजी प्रचार माध्यम और संस्थाएं इसके बारे मे कैसा रवैया अख्तियार करतीं हैं।

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