अनाम और छद्मनामः कहीं अनुकूल तो कहीं प्रतिकूल-आलेख


अभी एक लेख समाप्त करते वक्त मेरे दिमाग में अपने ब्लाग पर आई टिप्पणियों को लेकर कुछ विचार थे। उस लेख में उसका व्यापक उल्लेख करना व्यर्थ था इसलिये अलग से यह आलेख लिख रहा हूं।

मैंने लिखा था कि प्रेम, मित्रता, स्नेह, और सद्भावना का कोई स्वरूप नहीं होता। कई बार तो ऐसा लगता है कि मेरे एक-दो मित्र ही है जो नाम बदल बदल कर टिप्पणी देते हैं। सोचते हैं कि एक ही नाम देखकर यह बोर न हो जाता हो। मैं इस सोच में रहा था कि क्या कोई महिला ब्लाग लेखिका भी जिसके मन में मेरे प्रति सद्भावना है जो नाम बदलकर मुझे प्रेरित करती है।
असल में हिंदी ब्लाग जगत की शूरूआत ही छद्म और अनाम ब्लाग लेखकों ने की होगी-ऐसा लगता है। कभी-कभी तो लगता है कि असली नाम तो बहुत कम होंगे उससे अधिक छद्म नाम होंगे।
मेरी स्थिति अन्य ब्लाग लेखकों से थोड़ी अलग है। कुछ ब्लाग लेखक छद्म नाम के लोगों की प्रतिकूल टिप्पणियों से परेशान हैं तो मैं अनुकूल टिप्पणियों को देखकर हैरान हो जाता हूं। कई बार ऐसे ब्लाग लेखक हैं जो अपनी पोस्ट लेकर आते हैं और कहते हैं कि हम दो-तीन माह से ब्लाग जगत से दूर थे पर लगतार इसे देख रहे थे। अब लगातार लिखते रहेंगे। वगैरह..वगैरह। हिंदी ब्लाग सभी एक जगह दिखाये जाने वाले फोरमों पर मै निरंतर विचरण करता हूं। कई ब्लाग लेखक गायब हो जाते हैं। कई नये आते हैं।
कुछ ब्लाग लेखकों की शैली का अभ्यस्त हूं तो कई बार नये ब्लाग लेखकों से उनकी मिलती-जुलती शैली देखकर ऐसा लगता है कि कहीं वही पुराने वाले तो नहीं।

पिछले छह महीने में मेरा कुछ लोगों से संपर्क हुआ और उनसे आत्मीयता स्थापित हुई। उन्होंने कई नई जानकारियां दीं। कुछ उनसे सीखा। अचानक फिर कहां चले गये। कम से चार पांच ब्लाग लेखक तो मेरे ब्लाग पर इतनी प्रभावपूर्ण टिप्पणियां लिख गये कि मैंने अपने ब्लाग/पत्रिका पर पाठ ही लिख लिया। उनके ब्लाग फिर नहीं दिखे। कुछ आपत्तिजनक सामग्री वाले ब्लाग दिखे फिर वह गायब हो गये। ऐसे में यह संदेह/विश्वास होता है कि कुछ ऐसे ब्लाग लेखक हैं जिनके लिए लिखना एक तरह से व्यसन/आदत हो गयी है। अधिक लिखने से लेखक के ‘एक्सपोज‘ ( इसका हिंदी शब्द मुझे बासी ही समझ में आता है) होने का भय रहता है और लिखना भी जरूरी है शायद इसलिये कुछ नाम ब्लाग लेखक छद्म नाम से लिखते हैं। कुछ तो उस नाम से बकायदा निष्काम भाव से टिप्पणियां भी लिखते है। लड़ाई झगड़े और विवाद वाले पाठों पर ऐसे छद्म नाम वाले लेखकों का तो जमावड़ा ही हो जाता है। दो पक्ष में तो दो विपक्ष में दिखाई देते हैं।
मेरे मित्रों में ऐसे कितने ब्लाग लेखक हैं यह तो पता नहीं। हो सकता है यह मेरा भ्रम हो क्योंकि उनकी टिप्पणियों में जो स्नेह, प्रेम, और सद्भावना भरी होती है उसके अधिक स्वरूप नहीं होते। कई बार ऐसे अवसर आते हैं जब मैं कुछ कड़ा या व्यंग्यात्मक पाठ लिख देता हूं और मुझे लगता है शायद इस पर अकेला पड़ जाऊंगा तब ऐसे मित्र टिप्पणियां रखते है यह बताने के लिऐ कि हमारी सहमति तुम्हारी साथ है। उनकी टिप्पणियों से एक संतोष मिलता है कि उस विषय पर अकेला नहीं हूं। बहरहाल अंतर्जाल पर अनाम, छद्मनाम और और वास्तविक नाम के लोग रहेंगे। उनकी भूमिका अपने अनुसार रहेगी। एक बात तय है कि केवल आलोचना ही छद्म नाम या अनाम होकर नहीं की जाती बल्कि प्रेम और स्नेह के लिये भी यही तरीका अपनाया गया है।

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टिप्पणियाँ

  • बाल किशन  On जून 1, 2008 at 21:37

    मैं सहमत हूँ आपसे.और ये भी सच है किबालकिशन मेरा असल नाम है.पोस्ट और टिपण्णी इसी नाम से करता हूँ.अच्छा लिखना जारी रहे.शुभकामनाएं और बधाई.

  • Udan Tashtari  On जून 1, 2008 at 21:29

    हर तरह के लोग हमेशा रहेंगे. यह सब चिन्ता छोड़कर आप इत्मिनान से अपना लेखन जारी रखें. शुभकामनाऐं.

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