क्या टीवी और रेडियो के समाचार उदघोषकों को पत्रकार माना जा सकता है-आलेख


समाचार टीवी चैनलों पर काम करने वाले अनेक उद्षोषक स्वयं को टीवी पत्रकार कहकर प्रचारित करते हैं पर यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि वहां उनकी पत्रकार के रूप में क्या भूमिका होती है? जहां तक समाचार पत्र पत्रिकाओं का सवाल है तो वहां काम करने वाले सभी पत्रकार नहीं कहलाते। वहां कंपोजिंग करने वाले आपरेटर या प्रूफरीडर भले ही स्वयं को पत्रकार कहते हैं पर तकनीकी रूप से वहां काम करने वाले सदस्य उनको इस तरह का दर्जा नहीं देते। लगता है कि उद्घोषक शब्द में वजन कम होने से पत्रकार शब्द का लोग अधिक उपयोग कर रहे हैं।

पत्रकार से आशय यह है कि जो समाचार और संवाद का प्रेषण,संकलन और संपादन का कार्य करने के साथ उस पर अपना नजरिया रखने की विद्या से जुड़े होते हैंं। इनमें संवाद प्रेषण करने वाले को संवाददाता कहा जाता है कि न कि पत्रकार। पत्रकार सीधे रूप से समाचार के संकलन और संपादन के साथ ही उस पर अपना विचार लिखने का काम करता है। समाचार या संपादकीय लिखने के बाद उसकी भूमिका समाप्त हो जाती है और उसके बाद कंपोजीटर और प्रूफरीडर काम देखते हैं। यह अलग बात है कि आजकल कई जगह हाकर भी संवाददाता की भूमिका निभाते हैं और जो नहीं निभाते वह भी अपने को पत्रकार कहते हैं।

टीवी या रेडियो पर समाचार को सुनाना कोई सरल या सहज कम काम नहीं हैं। उसमें भी मेहनत और कौशल की आवश्कयता होती है। रेडियो पर जिन लोगों ने देवकीनंदन पाडे,इंदू वाही और अशोक वाजपेयी की आवाज में समाचार सुन चुका हो वह जानता है कि यह एक कला है जो हरेक को नहीं आती। इसके बावजूद वह कभी अपने को रेडियो पत्रकार नहीं कहते थे क्योंकि वह समाचार प्रेषण, संकलन और संपादन की विधा से जुड़े हुए नहीं थे। यह एक वास्तविक तथ्य है कि पत्रकार का काम केवल इन्हीं चार विधाओं तक ही सीमित है। उसके बाद पाठक या दर्शक तक समाचार तक पहुंचाने वाले लोग पत्रकार की श्रेणी में नहीं आते। हो सकता है कि कुछ लोग समाचारों के दौरान अपने स्वर या शब्दों से लोगों के जज्बातों को उभारने का काम करने पर यह दावा करें कि वह अपने विचार देकर वही काम करते हैं जो संपादक अपने समाचार पत्र-पत्रिका में संपादकीय लिखकर करता है तो वह भी जमता नहीं।
कहीं आग लगी है तो उसके डरावने का बयान या कहीं बाढ़ आयी तो उसके नुक्सान के दृश्य दिखाते हुए वीभत्सापूर्ण शब्द का उपयोग लोगों के मर्म छेदने को संपादकीय लेखन से नहीं जोड़ा जा सकता। संपादकीय लेखन में संपादक अपना दृष्टिकोण कई तरह के स्त्रोतों के आधार पर लिखा जाता है और उसमें किसी एक घटना विशेष के साथ अन्य घटनाओं को भी समावेश किया जाता है जबकि टीवी के समाचार उद्घोषकों के लिये यह संभव नहीं होता।

हो सकता है कि कुछ समाचार उद्घोषक समाचार और संपादन के विद्याओं से जुड़े हों पर अभी तक समाचार पत्र पत्रिकाओं में उनके बारे में जो जानकारी पढ़ने को मिलती है उसके आधार पर तो यह नहीं कहा जा सकता कि वह कहीं पत्रकारिता जैसा कुछ कर रहे हों। यह उनके साक्षात्कारों के आधार पर ही कहा जा सकता है जिसमें वह उनके नाम के आगे टीवी पत्रकार शब्द जुड़ा होता है पर पढ़ने पर यह पता ही नहीं लगता कि वह समाचार लेखन,प्रेषण,संकलन,और संपादन से किसी रूप में जुड़े हैं। उससे तो यही पता लगता है कि वह समाचार वाचन से जुड़े हैं। हां, उनके द्वारा लिये गये साक्षात्कारों को पत्रकारिता का हिस्सा माना जा सकता है बशर्ते वह प्रश्न आदि स्वयं तैयार करने के साथ ही मौलिक रूप कल्पना कर कार्यक्रम बनाते होंं और साथ में उस पर रख गया नजरिया उनका अपना हो। वैसे टीवी उद्घोषकों को देखकर लगता नहीं कि वह इतनी मेहनत करते होंगे क्योंकि क्योंकि कैमरे के समक्ष उनके जो चेहरे पर ताजगी दिखती है। समाचार संकलन और संपादन का काम करने के बाद इतनी ताजगी रहना संभव नहीं है। फिर उनको मेकअप रूप में तैयार होने का समय भी नहीं मिल सकता।

अनेक सम्मानीय लोग काम करने वाली महिलाओं की सुरक्षा की खातिर कहते हैं कि समाचार टीवी चैनलों सहित सभी प्रचार माध्यमों में देर रात तक महिलाओं की ड्यूटी नहीं लगाना चाहिये। देश में हुई कुछ घटनाओं को देखते हुए वह ऐसा कहते हैं। उनका यह तर्क भी है कि खबर सुनने वाले तो केवल खबर की विषय सामग्री सुनना ही पसंद करते हैं इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन सुना रहा है? उस दिन एक सज्जन कह रहे थे कि इतने मधुर स्वर वाले उद्घोषकों की आवाज में समाचार सुने और उनमें पुरुष भी थे। अब वह नहीं हैं तो क्या रेडियो पर समाचार नहीं सुन रहे?

एक वरिष्ठ पत्रकार ने तो लिखा था कि पहले भी समाचार पत्रों में महिलायें काम करतीं थीं पर उनको शाम के बाद की ड्यूटी नहीं दी जाती थी। तब भी समय बुरा था तो आज तो और भी बुरा हो गया है तब भला क्यों महिलाओं की रात्रिकालीन ड्यूटी लगायी जाती है। वैसे इस मामले में किसी नियम बनाने की मांग की बजाय प्रबंधकों को स्वयं ही कोई आचार संहिता बनाना चाहिये।

हरेक के अपने अपने तर्क हैं। क्या कहा जा सकता हैं। दरअसल बात वहीं अटकती है कि कमाते तो सभी हैं पर व्यवसायिक दृष्टिकोण किसी किसी में होता है। हिंदी भाषा के लेखक भले ही कुछ न कमाते हों पर हिंदी भाषियों के मनोरंजन के नाम पर खूब कमाई है। प्रचार माध्यमों ने तय कर रखा है कि समाचार भी मनोरंजन की तरह परोसे जायें क्योंकि उनको अपनी सामग्री पर भरोसा नहीं है। इसलिये उनको लगता है कि सुंदर चेहरे देखकर ही कोई उनके समाचार सुनेगा। इसलिये आकर्षक चेहरे वाले पुरुष और महिलाओं को उद्घोषक बना देते हैं क्योंकि बाकी काम तो वहां के पत्रकारों को करना है। ऐसा लगता है कि टीवी के पत्रकार भी अपने को दोयम दर्जे का अनुभव करते हैं और यही कारण है कि टीवी समाचार अब समाचार कम मनोरंजन अधिक लगते हैं और जो लोग खबरें एक तरह से चाटने के आदी हैं उन्हें बहुत निराशा लगती है। बहुत लोग ऐसे हैं कि किसी अखबार के कोने में दबी रूस के साइबेरिया में बिल्ली द्वारा चूहा खा लेने की खबर को भी पढ़ना नहीं छोड़ते (यह बात एक मजाक की तरह कही जा रही है)। समाचार टीवी चैनल एक घंटे के कार्यक्रम में दस मिनट भी समाचार नहीं देते। बाकी पचास मिनट तो उनकों हास्य,फिल्म और क्रिकेट के लिये चाहिये।

ऐसे पढ़ाकूओं को अगर यह पता लग जाये कि कहीं ब्लाग भी लिखा जा रहा है तो हो सकता है कि टीवी चैनलों को देखना छोड़ यहां अपनी भंडास निकालने लगें। न आता हो तो कहीं से टाइपिंग भी सीख आयेंगे। हिंदी टाईप नहीं चलती तो रोमन से अंग्रेजी लिखकर ही हिंदी लिख लेंगे। गुस्सा तो यहां भी निकलेगा कि यार कोई हमारे पढ़ने लायक कोई लिखता क्यों नहीं! भला किसमें बूता है कि इतनी खबरें लिख सके-यह समझाना उनको कठिन है। इस लेख का उद्देश्य किसी प्रकार की आलोचना करना नहीं है क्योंकि जो उद्घोषक यह काम कर रहे हैं वह तो प्रशंसनीय हैं पर जो नहीं कर रहे तो यह पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि उद्घोषणा के काम में भी परिश्रम और कौशल की आवश्यकता होती है। बात केवल इतनी है कि क्या उनको पत्रकार माना जा सकता है?
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यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
1.दीपक भारतदीप का चिंतन
2.दीपक भारतदीप की हिंदी-पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका

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टिप्पणियाँ

  • Suresh Chiplunkar  On अक्टूबर 25, 2008 at 21:03

    ये लोग पत्रकार नहीं हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे कि प्रायवेट स्कूलों में 800 रुपये महीने पर पढ़ाने वाला/वाली अध्यापक नहीं है, ये लोग सिर्फ़ भाड़े के मजदूर होते हैं, जिनका सामाजिक सरोकारों से कोई लेना-देना नहीं होता…

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