पाकिस्तान कब तक करेगा चालाकियां-आलेख


पिछले कई वर्षों से अनेक हिंदी के विद्वानों के आलेख पाकिस्तान के विषय में पढ़ने के बाद तो यही निष्कर्ष निकलता है कि उनके अन्य विषयों के साथ इसमें भी वैचारिक दायरा अत्यंत संकीर्ण है। वह पाकिस्तान के बारे में लाहौर तक ही सोचते हैं। अनेक भारतीय विद्वान और लेखकों के दौरे लाहौर तक ही होते हैं। उनके मित्र आदि भी वहीं रहते हैं। फिर अपने देश के पंजाब से लगा हुआ उसका प्रांत भी पंजाब भी है जहां के लेखक और पत्रकार इस विषय पर अधिक मुखर होकर लिखते हैं। वैसे उनको क्या दोष? पाकिस्तान के बुद्धिजीवी वर्ग की भी स्थिति कुछ ऐसे ही लगती है। वहां पाकिस्तान का मतलब पंजाब है और वह सिकुड़ते हुए लाहौर तक ही आ जाता है। पंजाब के बुद्धिजीवी और प्रबुुद्ध वर्ग के लोग बाकी तीन प्रांतों के प्रति सौहार्द का भाव दिखाने की बजाय भारत के प्रति दुर्भावना फैलाने में अपना मनोरंजन करते हैं।

इस लेखक ने देश के अनेक बुद्धिजीवियों और लेखकों विचार पढ़े हैं और उनसे तो यही लगता है कि वह पाकिस्तान के विषय में न तो अधिक जानते हैं और न ही प्रयास करते है। वह पाकिस्तान के बुद्धिजीवियों और लेखकों द्वारा तय की गयी ‘लाहौर सीमा’ से अधिक नहीं सोचते। वहां भाषा और प्रांत के आधार पर जबरदस्त वैमनस्य है यह एक सच्चाई है और यह भारत में कभी कभी प्रकट होने वाले आंदोलनों से अधिक खतरनाक तथा स्थाई है-कम से कम इस विषय पर देशी और विदेशी प्रचार माध्यमों के समाचार तो यही कहते हैं यह अलग बात है कि वह उनका विश्लेषण करते समय ‘लाहौर सीमा’ तक ही सिमट जाते हैं।
पाकिस्तान पर पंजाब और पंजाब पर लाहौर-मुल्तान के लोगों का वर्चस्व एक जाना पहचाना तथ्य है। सिंध,बलूचिस्तान ओर सीमा प्रांत यह तीन अन्य प्रदेश भी है। सिंध के लोग आक्रामक नहीं है इसलिये पंजाब का वर्चस्व झेल रहे हैं पर बाकी दो अन्य प्रांत में आज भी पाकिस्तान का संविधान नहीं चलता क्योंकि विश्व की आक्रामक कौमों के लोग वहां रहते हैं और अपने नियम चलाते हैं-यह अलग बात है कि वहां ताकतवर हमेशा ही कमजोर पर अनाचार करते हैं। उनका महिलाओं के प्रति व्यवहार अत्यंत खतरनाक है।
बहुत समय तक यह भेद विदेशी लोगों को भी इसका आभास नहीं हुआ क्योंकि पूरे पाकिस्तान में पंजाब के लोगों का वर्चस्व है और वही अधिक मुखर होकर विदेश से संपर्क रखते हैं पर अब जैसे जैसे प्रचार माध्यमों में आधुनिकता आती जा रही है वैसे उसका आभास भी होता जा रहा है कि पाकिस्तान एक नाम का ही देश है। दिल्ली दूरदर्शन पर एक कार्यक्रम आता था ‘पाकिस्तान रिपोर्टर’। भारतीय दूरदर्शन का वह कार्यक्रम न केेवल दिलचस्प था बल्कि उससे तो यही लगता था कि जैसे पंजाब ने बाकी तीन प्रांतों को गुलाम बना रखा था-पता नहीं अब आता है कि नहीं। उन कार्यक्रमों को देखकर भारतीय बुद्धिजीवियों और लेखकों के विचारों में अंतर देखकर यह लगता था कि उस कार्यक्रम को बहुत कम लोग देखते हैं या अपनी कोई राय बना पाते है। वर्तमान राष्ट्रपति आसिफ जरदारी के साथ जेल में दुव्र्यवहार होने के समाचार उनके साथ सहानुभूति दिखाते हुए भी दिखाये गये थे। उसमें जरदारी के सिंध प्रांत होने के कारण ही ऐसा होने की बात भी कही गयी थी।

सिंध प्रांत के लोग पंजाबियो से कभी मिल बैठ सकते हैं यह बात अभी भी वहां कोई नहीं मानता। बल्कि वहाँ के सिंध के कुछ ब्लाग लेखकों ने तो जरदारी की इस बात के लिये आलोचना की थी कि वह ‘मुहाजिर कौमी मूवमेंट’ के साथ समझौता कर पंजाबियों के वर्चस्व को स्वीकार कर रहे हैं क्योंकि वह अंततः उनके साथ ही जायेगी।

आज एक टीवी चैनल में कसाब को अपने देश का मान लेने पर पाकिस्तान में मचे कोहराम की चर्चा थी। उसमें पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार दुर्रानी को हटाने पर जरदारी की नाराजगी की चर्चा की गयी थी। दरअसल इस समाचार का विश्लेषण करने पर ऐसा लग रहा था जैसे कि वहां सिंधी लाबी और पंजाबी लाबी के बीच शायद कोई द्वंद्व है जो हमें दिखाई नहीं दे रहा है। दुर्रानी ने सबसे पहले अधिकारिक रूप से यह स्वीकार किया था कि कसाब पाकिस्तानी है। इसका बाद में हर स्तर पर खंडन किया गया। ऐसा लगता है कि यहीं से दोनों लाबियों के बीच संघर्ष प्रारंभ हुआ है। कसाब पंजाब का है। इतना ही नहीं उसके नौ अन्य साथी भी पंजाब से हैं अजहर मसूद भी पंजाब का है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम सोच रहे हों कि कसाब को पाकिस्तानी मान लेने पर भारत या विश्व में सामने अपनी छबि खराब होने से वहां के नेता परेशान ह ैंपर वास्तव में तो वहां की पंजाबी लाबी बाकी तीन प्रांतों के सामने अपने आपको गिरा हुआ अनुभव कर रही हो। गिलानी पंजाब के हैंं और जरदारी से उनकी अधिक समय तब बनेगी यह संभावना शुरु से ही नहीं रही है पर दोनों के बीच यह संघर्ष इतनी जल्दी शुरु हो जायेगा यह अनुमान नहीं था। अगर आप ध्यान करें तो जरदारी के अब बयान अधिक नहीं आ रहे। क्या उन्होंने यह सारा जिम्मा पंजाबी होने के कारण गिलानी पर डाल दिया है? प्रारंभ में वह स्वयं आक्रामक थे पर अब गिलानी अधिक दिखाई दे रहे हैं।

भारत द्वारा दिये गये सबूतों पर पहले पाकिस्तान का यह बयान आया था कि उनको खारिज किया जा रहा है, पर बाद में आया कि उनकी जांच की जा रही है। फिर एक बयान आया कि पाकिस्तान ने मान लिया है कि कसाब पाकिस्तानी ही है। फिर इसका खंडन आया पर पाकिस्तान की सूचनामंत्री शेरी रहमान ने जब टीवी पर इसकी पुष्टि की तो फिर पाक प्रधानमंत्री के हवाले से सुरक्षा सलाहकार दुर्रानी को बर्खास्त करनें का समाचार भी आया। शेरी रहमान पीपुल्स पार्टी की हैं और स्वर्गीय बेनजीर की अत्यंत निकट रही हैं। इस समय पाकिस्तानी प्रधानमंत्री गिलानी सबसे अधिक आक्रामक हैं। कहते हैें कि एक समय तो भारत से विवाद के चलते उन्होंने इस्तीफे देने की धमकी दे डाली थी।
दरअसल जरदारी और गिलानी के बीच सत्ता का संघर्ष होना स्वाभाविक है क्योंकि दोनों के बीच भाषा और प्रांत के कारण जो पारंपरिक टकराव संभावित है उससे टालना कठिन है। नवाज शरीफ की पार्टी ने समर्थन वापस ले लिया फिर भी गिलानी की सरकार चल रही है तो केवल इसलिये कि वह पंजाब के हैं। जरदारी ने उनकी सरकारी बनते ही जल्दी जल्दी राष्ट्रपति इसलिये हथियाया क्योंकि वह जानते थे कि देरी उनके लिये संकट बन जायेगी-कहीं न कहीं गिलानी के ताकतवर हो जाने पर अपना आधार खिसक जाने का भय उनके अंदर था इसलिये गिलाने के पांव जमने से पहले ही राष्ट्रपति बन गये।

गिलानी के पास विकल्प बहुत कम हैं। वह अपने पद पर स्वर्गीय प्रधानमंत्री बेनजीर के बलिदान के कारण है और चाहें भी तो वह अपनी अलग से राजनीतिक जमीन नहीं बना सकते। जरदारी की बात मानते रहने पर ही उनका हित है पर जिस तरह पंजाब के आतंकवादियों की चर्चा विश्व भर में हो रही है उससे उनका परेशान होना स्वाभाविक है क्योेंकि इससे बाकी तीन प्रांतों के लोग भी विरोध करने के मामले अधिक मुखर हो जायेंगे। भारत में कसाब पाकिस्तानी आतंकवादी है तो पाकिस्तान में पजंाबी टेररिस्ट। शायद गिलानी को उससे अधिक सहानुभूति है बनस्बित जरदारी के । यह दोनों ही सेना के मोहरे हैं पर गिलानी शायद दिल से कसाब के साथ है और जरदारी दिखाने के लिये। फिर गिलानी पर वहां के ताकतवर पंजाबी लाबी का भी बहुत दबाव पड़ रहा हो जो जरदारी के राष्ट्रपति रहते हुए उनसे सीधे टकराव नहीं ले सकती पर सेना में सक्रिय उसके अधिकारी जरूर यह काम करते रहेंगे कि वह उनकी ही भाषा बोलें।

समय आगे क्या रुख लेगा कोई नहीं जानता पर इतना तय है कि आतंकवादी घटना में पाकिस्तानी संलिप्तता प्रमाणित होने के बाद उसका संकट बढ़ता ही रहेगा। भारतीय रणनीतिकारों ने अभी हमले का मन नहीं बनाया पर पाकिस्तानी के अंदरूनी हालत उसे गहरे संकट में धकेल रहे हैं। उसकी सेना ने राजनीतिक मुखौटे लगा रखे हैं जो यह कभी स्वीकार नहीं करते कि उनके देश के हालत उनसे नहीं संभलते। दो प्रातों में तो उनका संविधान ही नहीं चलता। वहां के प्रचार माध्यमों ने भारत का विरोध करने का अभियान छेड़ रखा है और जनता को सच नहीं बता रहे। वहां के ताकतवर प्रचार माध्यमों पर पंजाबी लाबी का ही वर्चस्व है और उनसे ही जानकारी मिल पाती है। अन्य भाषा के प्रचार माध्यमों में क्या है यह पता तो केवल दूरदर्शन के पाकिस्तानी रिपोर्टर से ही लगता था जो शायद अब बंद हो गया है। बहुत दिन से देखने का प्रयास भी नहीं किया। उससे ही यह जानकारी मिल पाती थी कि बाकी तीन प्रांतों में पंजाब का बहुत विरोध है इतना कि वह पाकिस्तान से ही अलग होना चाहते हैं। कुछ लोग तो यह कहते हैं कि सिंध प्रांत तो ऐसा रसगुल्ला है जिसे भारत चाहे जब हथिया ले। हालंाकि यह पाकिस्तान के राजनीतिक क्षेत्रों की यह चालाकी भी हो सकती है कि वह इस तरह जरदारी और गिलानी के बीच द्वंद्व दिखा रहे हों ताकि दुनियां के साथ भारत का भी ध्यान मुख्य मुद्दे से हटे पर यह भी सच है कि वह उनमें स्वाभाविक से है इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता। जिस तरह कसाब को लेकर पाकिस्तान झूठ पर झूठ बोलता चला गया है उससे तो यही लगता है कि उसके नेता हल्के स्तर के हैं चाहे वह जरदारी हों या गिलानी।
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यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
1.दीपक भारतदीप का चिंतन
2.दीपक भारतदीप की हिंदी-पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका

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टिप्पणियाँ

  • Amit  On जनवरी 8, 2009 at 20:58

    bahut accha aalekh laga…kaafi nayi jaankaariyaan mili.Thanks

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