आखिर उनका लक्ष्य क्या है-चिंत्तन


अनेक लेखक और कवि हैं जिनके शब्दों में ओज है पर कोई नयी खोज नहीं है। वह दुनियां भर के भूखों, गरीबों, और पीड़ितों को संगठित होकर अभियान करने का संदेश देते हैं पर कितने भूखे, गरीब, और पीड़ित अपनी याचनायें लेकर उनके पास पहुंचे हैं यह नहीं बताते। वह रचनाकार अपनी रचनाओं में तलवार, बंदूक और बारूद की बात करते हैं। कहीं वह सीधे तो कहीं अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति को हिंसा के लिये प्रेरित करते नजर आते हैं। आश्चर्य की बात है कि वह अशांति में सुख की कल्पना कैसे कर लेते हैं। असंतोष में विकास का विचार कैसे उनके दिमाग में आता है?
आखिर उनका ध्येय क्या है? कहते हैं कि हमें विश्व से गरीबी, भूख, और पीड़ायें मिटानी हैं। कैसे? बस अभियान छेड़ना है। सर्वशक्तिमान को वह मानते नहीं क्यांेकि उनको लगता है कि वह अस्तित्वहीन है। वह भूख को कही भगवान तो कहीं शैतान मानते हैं। बस! इस दुनियां से गरीबी और भूख मिटानी है। जहां उनका दम चलता है वहां हथियार चलाने की बात करने से गुरेज नहीं और जहां नहीं है वहां अपने शब्दों को ही हथियार की तरह चलाते हैं। आखिर उनका लक्ष्य क्या है? वह किसे खुश देखना चाहते हैं।
उनसे सवाल करो कि ‘क्या तुम खुश हो?
जवाब होगा-‘नहीं! हम तो क्रांतिकारी हैं और वह कभी न तो सुखी होता है न चाहता है।’
बहस शुरु करो तो गरीबी, शोषण, और भेदभाव का इतिहास सुनायेंगे। आप उनसे पूछिये-‘यह कहां नहीं है?’
वह इधर उधर उंगली उठाकर बतायेंगे कि ‘वहां नहीं है। बस! यही है इसलिये हम अपने अभियान चला रहे हैं।’
आप सवाल करें कि ‘पर समाज तो शांति से चल रहा है। कोई कम पैसा कमा रहा है कोई अधिक! कोई मजदूर है तो कोई पूंजीपति। सभी लोग अपने स्तर पर संघर्ष कर रहे हैं। सच तो यह है कि गरीब फिर भी आराम की नींद सो लेता है पर अमीर को तो वह भी नसीब नहीं! गरीब पैदल चलकर अपना स्वास्थ्य बनाये रखता है पर अमीर तो वाहनों में चलते हुए जल्दी ही बीमारी को प्राप्त होता है।’
इस पर वह कहेंगे-‘तुम्हें नहीं मालुम गरीबी क्या होती है? हमने देखी नहीं है। तुम गांवों में नहीं गये। तुम उस प्रदेश में नहीं गये। सब जगह अन्याय है। इस अन्याय को मिटाना है। शोषितों और पीड़ितों को एकजुट करना है।’
मतलब यह कि समाज में सभी को एक करने का दावा। उनकी बातों पर तालियां बजाने वाले कौन लोग हैं? जिनको लगता है कि बस इस अभियान से वह स्वयं अमीर हो जायेंगे। कम से कम ऐसा नहीं होगा तो अमीर सड़क पर आ जायेंगे।
जंगों और अभियानों में अपने नारों और वाद को अस्त्र शस्त्र बनाकर वह भीड़ जुटाते हैं। तय बात है कि इस दुनियां में गरीब अधिक ही रहने है और जब उनको अपने काम से फुरसत होती है तब उनको ऐसे ख्वाब दिखाने वाले बहुत अच्छ लगते हैं। उनके लिखे और बोले शब्द उनको यह तसल्ली देते हैं कि बस वह अमीर हो जायेंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो अमीर उनकी पंक्ति में आ जायेंगेे।

वह श्रम न करने वाले पूंजीपति को गिराने का ख्वाब दिखाते हैं। पूंजीवादी व्यवस्था का जमकर विरोध करने वाले ऐसे लेखक और कवि जिस व्यवस्था का ख्वाब दिखाते हैं उसमें भी उच्च शिखर पर बैठा कोई व्यक्ति स्वयं काम नहीं करता। प्रबंधक, निरीक्षक तथा अन्य पद जिनमें व्यक्ति नेतृत्व करता है और नेतृत्व को स्वयं काम नहीं करना चाहिये-उनकी व्यवस्थाओं की व्याख्या और उसका प्रचलन तो यही बताता है।
वह नकारात्मक सोच रखते हैं। अध्यात्मिक ज्ञान से परे ऐसे कवि और लेखक लोगों मेें मौजूद अधिक धन और सम्मान पाने की लालच का लाभ उठाकर उन्हें प्रेरित करते हैं कि वह समाज में उथल पुथल पैदा करें। इस उथल पुथल में वह पहले अपना मनोरंजन करते हैं और अवसर आ जाये तो मार्गदर्शक की उपाधि भी पाकर अपने को धन्य समझते हैं। ऐसे अनेक कवि और लेखक हुए और होंगे पर वह समाजों को बदलने का उनका दावा हमेशा खोखला रहने वाला है। वह सर्वशक्तिमान को नहीं मानते पर यह समस्या नहीं है। समस्या यह है कि इस विश्व में परिवर्तन स्वाभाविक रूप से आते हैं। दूसरा यह है कि आदमी के संस्कार और आस्थायें बचपन में ही स्थापित हो जाती हैं और उनमें परिवर्तन नहीं आता पर आदमी परिवर्तनों के साथ आगे बढ़ता जाता है। जहां आज रेगिस्तान है वहां कभी हरियाली थी। जहां हरियाली है वहां कभी रेगिस्तान था। वह स्वतः बना। मनुष्य पर अपने क्षेत्र की जलवायु, खाद्याान्न तथा साथ रहने वाले लोगों का प्रभाव रहता ही है। इस प्रभाव को कोई रोक नहीं सकता। गुण ही गुणों बरतते हैं-श्रीगीता में बताये गये इस ज्ञान विज्ञान को को कोई बदल नहीं सकता। मनुष्य बदल सकता है जब उसकी हालत बदले। हालत तभी बदल सकते हैं जब मनुष्य बदल जायें। समाज में उथल पुथल होते देखने वाले कवि और लेखक उसका कौनसा सिरा पकड़ना चाहते हैं? यह वह स्वयं नहीं जानते।

उनको भ्रमित देखकर हैरानी होती है। धरती पर परिवर्तन आते रहेंगे। अमरत्व किसी को नहीं मिला पर वह इस तरह बात करते हैं कि जैसे किसी को अमरत्व देने वाले हैं। ऐसे लोग सर्वशक्तिमान को चुनौती देते लगते हैं पर यह उनकी नास्तिकता का नहीं खीज का परिणाम लगती है कि उसके किसी स्वरूप की आराधना लोग करते हैं। दरअसल वह चाहते हैं कि उनकी आराधना हो। वह स्वयं अपने से बड़े विचारकों की आराधना करते हैं और उनकी किताबों को साथ ऐसे रखते हए कहते हैं कि ‘यह पवित्र है’। दुनियां भर की धार्मिक पुस्तकों में अपनी अपने विचाराकों की पुस्तकों को शामिल करना चाहते हैं। कैसे? जिस तरह सभी धर्मों की पुस्तक के ज्ञानी समाज में सम्मान पाते हैं वैसे ही वह भी चाहते हैं। वह सभी धर्मों का विरोध करते हैं पर अपने वाद और नारों को ही धर्म कहते हुए भी नहीं थकते। लोगों के ‘कल्याण का धर्म’। आखिर वह अपने उस धर्म की स्थापना क्यों करना चाहते हैं। जब उनको अपना लोक और परलोक नहीं सुधारना तो फिर इस चक्कर में क्यों पड़ते हैं? जब पाप और पुण्य से परे हैं तो फिर क्यों अच्छे काम करते हैं? ऐसे ढेर सारे प्रश्न लोगों के मन में तब आते हैं जब ऐसे लेखकों और कवियों की समाज में उथल पुथल करने के लिये प्रेरित करने वाली रचनायें आती हैं? मगर यह केवल प्रश्न उन्हीं लोगों के मन में आते हैं जो न केवल उनसे सहमत होते हैं बल्कि वह उनके विचारों को अव्यवहारिक भी मानते हैं।
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यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
1.दीपक भारतदीप का चिंतन
2.दीपक भारतदीप की हिंदी-पत्रिका
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