प्यार तो बस एक अनुभूति है-आलेख (hindi article on love)


प्यार एक अनुभूति जिसे व्यक्त करने से अधिक उसे हृदय में सृजित करने की आवश्यकता है। अपने मुख से शब्दों में व्यक्त करना या फिर चूमना प्यार के अभिव्यक्त रूप हैं पर करने वाला उससे लाभ कितना ले पाता है इस पर विचार करना चाहिये। कई बार तो उसे हानि भी होती है। मानव मन में विचरने वाले नफरत और घृणा दोनोें भाव बाहर आकर अभिव्यक्त होना चाहते हैं, मगर उससे लाभ और हानि दोनों ही हो सकते हैं।
एक मित्र ब्लाग लेखक ने एक ईमेल भेजा जिसमें उन्होंने अमेरिकी लोगों को सूअर और उनके के बच्चों को चूमते हुए अनेक फोटो थे। उन फोटो में सुअर और उनके बच्चों के मूंह से टपक रही लार साफ दिख रही थी। उस पर लिखा था कि ‘सूअर ज्वर का कारण’। यहां यह स्पष्ट कर देना चाहिये कि स्वाइन फ्लू के भारत में जो मरीज पाये गये हैं वह सभी विदेश से वापस आये हैं। चूंकि यह विदेश से आयातित बीमारी है इसलिये भारत में इसकी चर्चा खूब हो रही है और यहां गर्मी और बरसात में फैलने वाली बीमारियों के समाचार नेपथ्य में चले गये हैं। यहां बस विदेश से जुड़ी कोई बात होना चाहिये वह देशी बातों से अधिक चर्चित हो जाती है। इस देश में स्वाईन फ्लू के मरीज सौ से अधिक नहीं है पर देश के लोगों के सावधानी रखने की सलाह दी जा रही है। स्पष्टतः इसके पीछे बाजार की कोई योजना हो सकती है। मलेरिया, टीवी और पीलिया की दवाईयां तो यह आराम से बिक जाती हैं पर स्वाइल फ्लू की दवाईयों के लिये यहां कोई बाजार नहीं है।
बहरहाल मित्र ब्लाग लेखक द्वारा भेजे गये फोटो का अध्ययन करने पर यह लगा कि लोग भले ही बड़े प्यार से सूअर के मूंह को चूम रहे थे पर वह खतरनाक था। उनके प्यार की अभिव्यक्ति मन को प्रसन्न करने की बजाय हैरान कर रही थी।
इस तरह की बाह्य प्रेम अभिव्यक्ति पश्चिम की देन हैं। चूमना, लिपटना और नाचना प्यार के अभिव्यक्त किये जाने वाले रूप हैं और इसमें कोई बुराई भी नहीं है मगर यही पश्चिम के वैज्ञानिक ही अपने शोधों से इसके दोष गिनाते हैं। अब उनके कुछ शोधों से प्राप्त जानकारी पढ़िये जो समय समय पर उनके द्वारा दी जाती रही है।
1.जिसे चूमा जाता है उसकी उम्र पांच मिनट कम हो जाती है।
2.चूमने वाले के गंदे कीटाणु उसके ही प्रिय आदमी के शरीर में पहुंच जाते हैं।
3.अधिकतर पशुओं में रैबीज होता है। यह रैबीज उनके शरीर में नहीं बल्कि उनके मूंह से लार के रूप में बहने के साथ होठों पर हमेशा रहता है। उस लार पर हाथ या पांव रखना भी ठीक नहीं होता।
4.कुछ पशु तेज स्वांस लेते और छोड़ते हैं और उससे उनके गंदे कीटाणु सांस के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर उसे सांस की बीमारी प्रदान करते हैं।
मित्र द्वारा भेज गये फोटो बच्चे, बड़े, स्त्री पुरुष अपने होंठ बाकायदा शूकर के मूंह से लगा रहे थे। पालतू होने के कारण वह सूअर साफ सुथरे थे पर उनके मूंह की लार से मनुष्यों के होंठ लगते देख मित्र द्वारा लिखा गया यह संदेश दिमाग में बज रहा था ‘सूअर ज्वर का कारण’।
एक बात यहां स्पष्ट कर दें कि यहां पशुओं के प्रति कोई हिकारत का भाव हमारे मन में नहीं है। सभी जीव सर्वशक्तिमान के बनाये हुए हैं और सभी को यहां समान रूप से जीवन जीने का अधिकार है। पशु पशुओं की अनेक प्रजातियों का लुप्त होना मानव सभ्यता के लिये शर्म की बात है। किसी भी पशु को पालना पुण्य का काम है पर प्यार का वह रूप जो अंततः हमारी देह के लिये दुःख का कारण बने वह कोई बुद्धिमानी नहीं है।
हां, सच है कि पास में मनुष्य रहे या पशु उससे प्रेम हो जाता है। कई बार अपने पास खड़ा वह निरीह पशु जब हमारी तरफ प्रेम से देखता है तो कोई पत्थर दिल ही उसकी अनदेखी करेगा। प्रेम न केवल अपनी बल्कि अपने प्रिय जीव की भी आयु बढ़ाता है और इसलिये उसकी अभिव्यक्ति होना भी आवश्यक है।
प्यार की अभिव्यक्ति का स्पर्श सभी जीवों को प्रसन्नता देता है। इन पशुओं को प्यार करने का सबसे अच्छा तरीका यह बताया गया है कि अपने हाथ से उनकी गर्दन के नीचे हाथ फिराना चाहिये क्योंकि वहीं से वह अच्छी तरह प्यार की अनुभूति कर सकते हैं। अधिकतर पालतू पशुओं के शरीर पर घने बाल होते है इसलिये सिर या पीठ पर हाथ फेरने से उन्हें वह अभिव्यक्ति नहीं मिलती जो गर्दन के नीचे-जहां बाल नहीं होते-फेरने से मिलती है।
वैसे प्यार हृदय में बनने वाला वह भाव है जिसकी अनुभूति का लाभ स्वयं को भी कम नहीं होता पर इसके लिये यह जरूरी है कि अपने प्रिय जीव को देखकर जब प्यार अंदर पैदा होता है तो पहले अपनी देह में उठती तरंगों को ध्यान में रखें। अंदर खून की लहरों में उसकी अनुभूति करना चाहिये। एकदम उतावली में प्रेम की अभिव्यक्ति करने से उसका लाभ समाप्त भी हो जाता है। परिस्थितियों के अनुसार प्यार को व्यक्त करना और छिपाना ं पड़ता है। प्यार खाने या पीने की चीज नहीं है कि उसे मूंह से अंदर ले जायें। वह तो एक ऐसा अदृश्य भाव है जो मन को प्रफुल्लित करता है। यह अनुभूति बाहर के दृश्यों से भले आती है पर उसका उद्गम स्थल तो अंदर ही है। उसका कोई भौतिक स्वरूप नहीं है। स्वार्थ से बने संबंधों में अनेक बार प्यार आता है पर फिर स्वतः ही नष्ट भी हो जाता है।
भारत में सूअर पालने की परंपरा नहीं है पर कुत्ता पाला जाता है। अनेक बार देखा गया है कि घर के बच्चे उन पालतू कुतों के मूंह से मूंह लगा देते हैं। कुछ समय पहले एक रिपोर्ट देखी थी जिसमें बताया गया कि 90 प्रतिशत लोगों को रैबीज पालतू कुतों की वजह से होता है। बहरहाल यह तो सर्वशक्तिमान की बनाई दुनियां हैं। जिसमें रहने वाले हर जीव में घृणा और प्यार के भाव रहते हैं पर इंसान को थोड़ा सतर्कता बरतना चाहिये। सच बात तो यह है कि प्यार तो बस एक अनूभूति जिसे न हाथ से पकड़ा जा सकता है न मूंह से खाया जा सकता हैं।
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यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
1.दीपक भारतदीप का चिंतन
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3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका

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