दक्षिण भारत के लोगों की भावुकता अस्वाभाविक नहीं-आलेख (bhakti bhav in south india-hindi lekh)


फिल्मी अभिनेताओं और नेताओं के प्रति दक्षिण भारतीय लोगों की भावुकता देखकर अनेक लोग हतप्रभ रह जाते हैं। दक्षिण भारतीय जहां अपने नेताओं और अभिनेताओं के जन्म दिन पर अत्यंत खुशी जाहिर करते हैं वहीं उनके साथ हादसा होने पर गमगीन हो जाते हैं। इतना ही नहीं उनके निधन पर कुछ लोगों को इतना धक्का पहुंचता है कि उनकी मौत हो जाती है या कुछ आत्महत्या कर लेते हैं। इस पर भारत के अन्य दिशाओं तथा शेष विश्व के लोगों को बहुत हैरानी होती है मगर बहुत कम लोग इस बात को जानेंगे और समझेंगे कि उनकी यह भावुकता एकदम स्वाभाविक है। जिन लोगों को भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की समझ है वह दक्षिण भारतीयों के इस तरह के भक्ति भाव पर बिल्कुल आश्चर्य नहीं करते।
कई बातें तर्क से परे होती हैं और जहां मनोविज्ञान हो तो तर्क ढूंढना कोई आसान नहीं होता। इससे पहले कि हम दक्षिण भारतीयों की स्वाभाविक भावुकता पर दृष्टिपात करें उससे पहले श्रीगीता का यह संदेश समझे लें कि यह पूरा विश्व त्रिगुणमयी माया के वशीभूत हो रहा है और गुण ही गुणों को बरतते हैं। स्पष्तः हमारी देह में तीन गुणों में से-सात्विक, राजस और तामस- कोई एक मौजूद रहता है और उनका निर्माण हमारे अंदर खानपान, जलवायु और संगत से ही होता है उसी के वशीभूत होकर काम करते है। । ऐसा लगता है कि दक्षिण की जलवायु में ही कुछ ऐसा है जो वहां के लोगों में भक्ति का भाव एकदम शुद्ध रूप से मौजूद होता है और सच कहें तो वह एकदम पवित्र होता है। वजह यह है कि भक्ति का जन्म ही द्रविण प्रदेश में होता है। वहां वह एकदम बाल्यकाल में होती है और हम सभी जानते हैं कि यह काल ही भगवत्स्वरूप होता है।
श्रीमद्भागवत में प्रारंभ में ही एक कथा आती है जिसमें वृंदावन में पहुंची भक्ति की मुलाकात श्री नारद जी से होती है। वह वहां सुंदर युवती के रूप में थी पर उसके साथ दो बूढ़े थे जो कि उसके पुत्र वैराग्य और ज्ञान थे। वह करूणावस्था में थी और नारद जी को अपनी कथा सुनाते हुए कहती है कि ‘मेरा जन्म द्रविण प्रदेश में हुआ। कर्नाटक प्रदेश में पली बढ़ी और महाराष्ट्र में कुछ जगह सम्मानित हुई पर गुजरात में मुझे बुढ़ापा आ गया। इधर वृंदावन में आई तो मुझे तो तरुणावस्था प्राप्त हो गयी।’
हम यहां कथा का संदर्भ केवल दक्षिण तक ही सीमित रखें तो समझ सकते हैं कि वहां की जलवायु, अन्न जल तथा मिट्टी में ही कुछ ऐसा होता है कि लोगों की भक्ति एकदम शिशु मन की तरह पवित्र तथा कोमल होती है। भक्ति तो वह अदृश्य देवी है जो हर मनुष्य के मन में विचरती है और चाहे इंसान जैसा भी हो उसको इसका सानिध्य मिलता है क्योंकि कोई भी इंसान ऐसा नहीं हो सकता हो जो किसी व्यक्ति से प्रेम न करता हो। बुरा से बुरा आदमी भी किसी न किसी से प्रेम करता है। भक्ति हमारे अंदर सारे भावों की स्वामिनी है। पंचतत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार तमाम तरह के भावों के साथ चलते हैं और कहीं न किसी से प्रेम या भक्ति अवश्य होती है-यह अलग बात है कि कहीं सजीव तो कहीं निर्जीव वस्तु से लगाव होता है पर देन इसी भक्ति भाव की है। कुछ लोग कह सकते हैं कि अगर यह बात है तो वहां के सभी लोगों में एक जैसी भक्ति नहीं है क्योंकि नेताओ के साथ हादसे में कुछ ही लोग आघात नहीं झेल पाते और उनकी इहलीला समाप्त हो जाती है पर बाकी तो बचे हुए रहते हैं। दरअसल भक्ति का मतलब यह नहीं है कि सभी भक्त अपने प्रिय के साथ हादसा होते ही एक जैसा कदम उठायें। जो लोग बचे रहते हैं वह भी मानसिक आघात कम नहीं झेल रहे होते हैं। याद रखिये भगवान ने पांचों उंगलियां एक जैसी नहीं! दूसरा यह भी कि भक्ति के दो पुत्र भी हैं जिन्होंने भगवत्काल में तरुणावस्था प्राप्त कर ली थी और उनका भी अब महत्व कम नहीं है और संचार साधनों के विस्तार के साथ उनकी पहुंच भी सब जगह है।
हमारे अध्यात्मिक में ज्ञान के साथ मनोविज्ञान और विज्ञान भी है और वह गुण विभाग का कर्म के साथ परिणाम भी बताता है पर उनमें दुनियावी चीजों पर शोध नहीं हुआ कि ऐसा क्यों होता है? या कौनसा जींस दक्षिण में अधिक सक्रिय है? यह काम तो पश्चिमी वैज्ञानिक करते हैं और हो सकता है कि किसी दिन वह इस तरह भी खोज करें कि आखिर दक्षिण में ऐसी भावुकता के पीछे कौनसा जींस या चीज काम कर रही है पर हमारे अध्यात्मिक दर्शन को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो यही निष्कर्ष निकलता है कि हमारे दक्षिणवासियों की यह भावुकता कोई अस्वाभाविक नहीं है।
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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