इसलिये सोचना ही बंद-आलेख (mor thinking is not good-hindi lekh)


अखबार में खबर छपी है कि ‘ब्रिटेन ने माना है कि तेल के व्यापार की वजह से बम विस्फोट के एक आरोपी को छोड़ना पड़ा-यह आरोपी रिहा होकर मध्य एशियाई देश में पहुंच गया जहां उसका भव्य स्वागत हुआ।
इधर टीवी पर एक खबर देखी कि पड़ौसी देश हमारे देश में भीड़ में आधुनिक हथियार प्रयोग कर आम आदमी का कत्लेआम करने के लिये आतंकवादियों को प्रशिक्षण दे रहा है।
उधर नेपाल में माओवादियों द्वारा पशुपतिनाथ मंदिर में भारतीय पुजारियेां की पिटाई कर दी।
कुछ खबरें पहले भी इधर हम सुनते रहे हैं कि नक्सलवादियों ने सुरंग बिछाकर पुलिस कर्मियों को मार डाला।
कहने का तात्पर्य यह है कि आतकंवाद और हिंसक अभियान एक भूत की तरह हैं जो कभी पकड़ाई नहीं आयेगा क्योंकि उसने अपने ऊपर ढेर सारे मुखौटे-जाति, धर्म, भाषा, विचार तथा क्षेत्र के नाम पर-लगा रखे हैं। यह भूत सर्वशक्तिमान जितना ही ताकतवर दृष्टिगोचर होता है क्योंकि वह धनपतियों को कमाने तो विलासियों को धन गंवाने के अवसर मुहैया कराने के साथ ही बुद्धिजीवियों को विचार व्यक्त करने तथा समाज सेवकों को पीड़ितों की सहानुभूति जताकर प्रचार पाने के लिये भरपूर अवसर देता है।
किसी भी निरपराध की हत्या करना पाप है और इस जघन्य अपराध के लिये हर देश में कड़े कानून हैं पर आतंकवादी अपराधी नहीं बल्कि आतंकवादी का तमगा पाते हैं। उनको समाज विशिष्टता प्रदान कर रहा है। ऐसे में जाति, भाषाओं, समूहों और विचारों के आधार पर बने समूहों के अपराधिक तत्व अब विशिष्टता हासिल करने के लिये उनके नाम का उपयोग कर रहे हैं।
दुनियां भर के टीवी चैनल और अखबार आतंकवादियों के कृत्यों से भरी हुई हैं। हत्यायें और अपराध तो रोज होते हैं पर जिसके साथ जाति, भाषा, धर्म या क्षेत्र का नाम जुड़ा है उससे विशिष्टता प्राप्त हो जाती है। कुछ लोगों को यह भ्रम है कि उन समूहों के सामान्य लोग भी अपने अपराधी तत्वों की सहायता कर रहे हैं-इसे विचार को भूलना होगा क्योंकि उनके पास अपनी घर गृहस्थी का संघर्ष भी कम नहीं होता। संभव है कि कुछ सामान्य सज्जन लोग भी अपने समूहों के नाम पर अपराध कर रहे अपराधियों में अपनी रक्षा का अनुभव कर रहें तो उन्हें भी अपना विचार बदल लेना चाहिये।
आंतकवाद एक व्यवसाय जैसा हो गया लगता है। चूंकि सामान्य अपराधी होने पर समाज के किसी वर्ग का समर्थन या सहानुभूति नहीं मिलती इसलिये अपराधिक तत्व उनके नाम का सहारा लेकर एतिहासिक नायक बनने के लिये ऐसे प्रयास करते हैं। इस अपराध से उनको आर्थिक यकीनन लाभ होने के साथ प्रसिद्धि भी मिलती है क्योंकि उनके नाम टीवी और अखबार में छाये रहते हैं।
इस समय विश्व में अनेक ऐसे अनैतिक व्यवसाय हैं जिनको करने के लिये सभी देश की सरकारों और प्रशासन का ध्यान हटाना जरूरी लगता होगा तभी ऐसी वारदातों निरंतर की जा रही है ताकि वह चलते रहें।


आम आदमी चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र का हो वह अपनी औकात जानता है-भले ही अपने समूह के साथ होने का भ्रम पालना उसे अच्छा लगता है।
पिछले दिनों एक दिलचस्प खबर आई थी कि भारत की खुफिया एजंसियां देश में सभी भागों में सक्रिय सभी आतंकवादी संगठनों के मुखौटा संगठनों की जांच कर रही हैं। यह मुखौटा संगठन किसी आतंकवादी के मारे या पकड़े जाने पर भीड़ जुटाकर उसके समर्थन में आते हैं और इसके अलावा समय समय पर उनका वैचारिक समर्थन भी करते हैं। यह चेतना देखकर प्रसन्नता हुई।
संभव है कुछ बुद्धिजीवी केवल शाब्दिक विलासिता के लिये अनजाने में ऐसे आतंकवादियों की कथित विचाराधारा-यकीन मानिए यह उनका दिखावा मात्र होता है-के पक्ष में लिख जाते हों और उनके मन में ऐसी किसी हिंसा का समर्थन करने वाली बात न हो पर इसके बावजूद कुछ बुद्धिजीवी रंगे सियार हैं जो केवल उनके हित साधने के लिये प्रचार माध्यमों में जूझते रहते हैं। कभी कभी तो लगता है कि उनको बकायदा इसके लिये नियुक्त किया गया है।
हम आम लेखक हैं किसी को रोक नहीं सकते और न ही हमारे प्रतिवाद पर कोई ध्यान देता पर इसका आशय यह नहीं है कि लोगों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने के लिये अनाप शनाप लिखने लगें। सच बात तो यह है कि प्रचार के शिखर पर वही लेखक छाये हुए हैं जिनको कहीं न कहीं से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बड़े व्यवसाययिक घरानों, कथित धार्मिक संगठनों और फिर सामाजिक संस्थाओं (?) से कुछ न कुछ लाभ अवश्य मिलता होगा। जब कहीं दो कंपनियां इतनी ताकतवर हो सकती हैं कि किसी आतंकवादी को छुड़ाने के लिये ब्रिटेन जैसे ताकतवर देश की सरकार को बाध्य कर सकती हैं तो उनके प्रभाव को समझा जा सकता है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अपराध और व्यापार एक दूसरे का सहारा हो गये हैं और कथित धर्मों, जातियों, भाषाओं के समूहों के आकर्षक नाम एक पट्टिका की तरह लगा देते हैं। यह सभी जानते हैं कि मानव मन की यह कमजोरी है कि वह अपनी जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र के नाम से बहुत मोह रखता है। इससे प्रचार माध्यमों का काम भी चलता है और उनको प्रचार भी मिलता है।
ऐसे में अपने साथी लेखकों और पाठकों से हम एक ही बात कह सकते हैं कि भई, तुम इस जाल में मत फंसो। यह एक ऐसा चक्क्र है जिसे समझने के लिये पैनी दृष्टि होना चाहिये।’ वैसे सच तो यह है कि इतनी सारी घटनायें और खबरे हैं कि एक सिरे से सोचेंगे तो दूसरे सिरे पर सोच ही बदल जायेगी। इसलिये सोचना ही बंद कर दो। मगर आदमी के पास बुद्धि है तो सोचेगा ही। हम तो धर्म जाति, भाषाओं के समूहों को ही भ्रामक मानते हैं। अमीर के लिये सभी दौड़े आते हैं गरीब की तरफ कोई नहीं झांकता। आदमी की स्थिति यह है कि अपना गरीब रिश्तेदार मर जाये तो उसकी अर्थी पर भी न जाये पर पराया अमीर भी मर जाये तो उसके शोक पर आंसु बहाता है ताकि समाज उसे संवदेनशील समझे।
जाने अनजाने कभी भी अपने समूह के नाम हिंसक तत्वों के प्रति हृदय में भी संवेदना नहीं लायें क्योंकि यह सभी समूह केवल अमीरो के लिये बने हैं। फिर क्या करें? अगर आप लेखक हैं तो कुछ सड़ी गली कवितायें लिखकर दिल बहला लीजिये और अगर आप पाठक हैं तो फिर उन बुद्धिजीवियों पर भी हंसें जो वैचारिक बहसें ऐसे करते हैं जैसे कि उनके समाज उनकी कल्पनाओं पर ही चलते है।
इसके अलावा अपने अंदर से भेदात्मक बुद्धि को परे कर दें जो अपने साथ अच्छा व्यवहार करे और उससे समय पर सहयोग की उम्मीद हो उसे अपना ही साथी समझें-जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र के नाम पर एकता की कोशिशों का आव्हान करने वालों के अपने स्वार्थ होते हैं जिसमें आम आदमी का स्थान केवल एक वस्तु के रूप में होता है।
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यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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टिप्पणियाँ

  • meenu khare  On सितम्बर 13, 2009 at 07:39

    सोचने पर मजबूर करती है आपकी यह बेहतरीन पोस्ट.

    बधाई.

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