आतंक का भूत-हिन्दी व्यंग (atank ka bhoot-hindi vyanga)


एक विशेषज्ञ का मानना है कि अफगानिस्तान में अमेरिकी हमले में बिन लादेन बहुत पहले ही मारा जा चुका है पर अमेरिका के रणनीतिकार युद्ध जारी रखने के लिये उसका भूत बनाये रखना चाहते हैं ताकि वहां की खनिज, कृषि और तेल संपदा पर कब्जा बना रहे। ऐसा लगता है कि अमेरिकन लोग भले ही भूत प्रेत को न मानते हों पर एशियाई देशों से उनकी मान्यता को लेकर उसका उपयोग करना सीख गये हैं। इसलिये वह रोज नयी भभूत बनाकर लादेनी भूत को निपटाने का काम करते हैं।
याद आता है जब बचपन में कई सिद्ध लोगों के पास जाते थे तब वह भूतों को भगाने के लिये भभूत दिया करते थे कि अगर जो शायद उनके यहां के यज्ञों की राख वगैरह हुआ करती थी। अब तो लगता है कि जैसे अगर किसी को बाबा बनना है तो उसे भूतों की सवारी तो करनी पड़ेगी। अपने देश के इतिहास में बहुत सारे बाबा हुए हैं। उनके नाम से चमत्कारों का प्रचार ऐसा चला कि उनके नाम पर अभी भी धंधे चल रहे हैं।
उस विशेषज्ञ की बात पर विश्वास करने के बहुत सारे कारण है। उस युद्ध के बाद फिर कभी लादेन का वीडियो नहीं आया। कुछ समय तक उसके घनिष्ट सहयोगी अल जवाहरी का वीडियो आता रहा पर फिर वह भी बंद हो गया। हालांकि विशेषज्ञ का कहना है कि लादेन बीमार भी हो सकता है पर जो हालात लगते हैं उससे तो यह लगता है कि उनका पहला ही दावा अधिक सही है कि लादेन अब केवल एक भूत का नाम है।
किसी को सिद्ध बनना या बनाना है तो वह पहले भूतों की पहचान करे। अमेरिका ने बिन लादेन नाम का एक भूत बना लिया है। दरअसल कभी कभी तो यह लगता है कि कहीं लादेन वाकई भूत तो नहीं था जिसे इंसानी शक्ल के रूप में प्रस्तुत किया गया। एक बात याद रखें अमेरिका पूरे विश्व में हथियारों का सौदागर है। वह उनका निर्माण कर फिर प्रदर्शन कर उनको बेचता है। जिस तरह कोई वाशिंग, मशीन तथा टीवी जैसी चीजें पहले चलाकर दिखाने के बाद बेची जाती हैं तो हथियारेां के लिये भी तो यही करना पड़ेगा तभी तो वह बिकेंगे। आरोप लगाने वाले तो यह भी कहते हैं कि अमेरिका दुनियां भर में युद्ध थोपता ही इसलिये है कि उसे अपने हथियारों का प्रदर्शन करना है ताकि अन्य देश उससे प्रभावित होकर अपने देश की गरीब जनता का पैसा देकर उसका खजाना भरे। आजकल आपने सुना होगा एक ‘ड्रोन’ नाम का एक हवाई जहाज है जो स्वयं ही निशाने चुनता है। उसे चलाने के लिये उसमें पायलट का होना जरूरी नहीं है। अनेक बार ऐसी खबरे आती हैं कि ‘ड्रोन’ ने लादेन के शक में अमुक वह भी जगह ‘अचूक बमबारी’ की। इससे पहले अफगानिस्तान युद्ध में भी अमेरिका के अनेक हथियारों तथा विमानों का प्रचार हुआ था।
हमारे देश में भूतों पर खूब यकीन किया जाता है। इसी कारण बाबाओं का खूब धंधा चलता है। एक आदमी ने बड़े मजे की बात कही थी। उससे उसके मित्र ने पूछा कि ‘एक बात बताओ कि तुम भूत वगैरह की बात करते हो? तुम्हें पता है कि पश्चिमी राष्ट्र हमसे अधिक प्रगति कर गये हैं वहां तो ऐसी बातों पर कोई यकीन नहीं करता। क्या वहां लोग मरते नहीं है? देखों हम लोग ऐसी फालतू बातों पर यकीन करते हैं इसलिये पिछड़ हुऐ हैं जबकि जो भूतों पर यकीन नहीं करते वह मजे कर रहे हैं। ’
उस आदमी ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया कि ‘वहां तो सभी कुछ आदमी को मिल जाता है। बंगला, गाड़ी, पैसा मिलने के साथ अन्य जरूरतें पूरी हो जाती है। वहां मरने वाले आदमी की कोई कोई ख्वाहिश नहीं रह जाती। यहां गरीबी के कारण लोग अनेक इच्छायें मन में दबाकर मर जाते हैं इसलिये उनको भूत की यौनि मिलती है। यही सोचकर यकीन करना पड़ता है।’

अमेरिका ने सारे झगड़े एशिया में ही किये हैं। उसका सबसे बड़ा शत्रु क्यूबा का फिदेल कास्त्रो उसके पास में ही रहता है पर कभी उस पर हमला नहीं किया। वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान में उसके हमले चर्चित रहे हैं जो कि एशिया में ही है। एशिया में ही लोग भूत बनते हैं और इसलिये वह अपने ही लोग यहां भेजकर उनका भूत यहां रचता है।

वैसे इसमें कोई संदेह नहीं है कि भूत रचकर अपनी ताकत दिखाने की तकनीकी उसने भारत या एशिया से ही सीखा होगा। सीधी सी बात है कि ऊनी सामान बेचने वाला सर्दी का, धर्म बेचने वाला अधर्म का, शराब बेचने वाला गमों का और ऋण देने वाले पैसा देकर फिर उसे बेदर्दी से वसूलने से पहले जरूरतों का भूत नहीं खड़ा करेगा तो फिर उसका काम कैसे चलेगा? अमेरिका ने लादेन नाम के भूत से अरबों डालरों की कमाई की होगी। लादेन के मरने का मतलब है कि उसे युद्ध छोड़ना पड़ेगा। युद्ध छोड़ा तो प्रयोग कैसे करेगा? ऐसे में उसके द्वारा निर्मित हथियार और विमान कोई नहीं खरीदेगा।
जिस तरह लोग प्रायोजित भूत खड़ा करते हैं उससे तो यह लगता है कि सचमुच में लादेन रहा भी होगा कि नहीं। ऐसा तो नहीं कभी इस नाम का कोई आदमी अमेरिका में रहता हो और फिर मर गया हो। फिर अमेरिकनों ने किसी दूसरे आदमी की प्लास्टिक सर्जरी कर उसका चेहरा बना कर अफगानिस्तान भेज दिया हो। उस मरे आदमी की पारिवारिक पृष्ठभूमि का इस्तेमाल किया गया हो क्योंकि एक बार अफगानिस्तान आने के बाद वह कभी घर नहीं गया और न ही परिवार वालों से मिला। उसके बारे में अनेक कहानियां आती रहीं पर उनको प्रमाणित किसी ने नहीं किया। इस तरह फिल्मों में अनेक बार देखने को भी मिला है कि नायक का चेहरा लगाकर खलनायक उसे बदनाम करता है। ऐसा ही लादेन नाम के भूत से भी हुआ हो। जिस आदमी ने चेहरा लगाया होगा। भूत के रूप में लादेन को स्थापित करने का काम खत्म होने के बाद वह लौट गया हो। इस तरह के प्रयोजन में पश्चिमी देशों को महारत हासिल है।
हम अभी तक जो सुनते, देखते और पढ़ते हैं उनका आधार तो टीवी, फिल्म और समाचार पत्र ही हैं। कोई कहेगा कि भला यह कैसे संभव है कि भूत को इतना लंबा जीवन मिल जाये? दरअसल आदमी को न मिलता हो पर भूत को कई सदियों तक जिंदा रखा जा सकता है। जिंदा आदमी की इतनी कीमत नहीं है जितना भूत की। हमारे देश में इतने सारे भूत बनाकर रखे गये हैं कि उनके नाम पर खूब व्यापार चलता है। कोई समाज वाद के नाम से चिढ़ता है तो कोई पूंजीवाद के नाम से। किसी को चीन सताता है तो किसी को पाकिस्तान! अमीर के सामने गरीब के हमले का और गरीब के सामने अमीर के शोषण का भूत खड़ा करने में अपने यहां बहुत लोग माहिर हैं। सबसे बड़ा भूत तो अमेरिका का नाम है। उसके सम्राज्यवाद से लड़ने के लिये लोग अपने देश में भी सक्रिय हैं जो बताते हैं कि उसका भूत अब यहां भी आ सकता है। जब वह साठ सालों तक ऐसे भूत को जिंदा रख सकते हैं तो फिर यह तो नयी तकनीकी और तीक्ष्ण चालें चलने वाला अमेरिका है। चाहे जितने भूत खड़ा कर ले उसके नाम पर भभूत यानि हथियार और विमान बेचता जायेगा। बाकी लोग तो छोड़िये उसके ही लोग ऐसे भूतों पर सवाल उठाने लगे हैं। वैसे भारतीय प्रचार माध्यम भी लादेन नाम का भूत बेचकर अपने समय और पृष्ठों के लिये सामग्री भरते रहे हैं।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

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