विश्व में भारत से संदेश अध्यात्मिक ज्ञान से ही फैल सकता है, किसी फिल्म से नहीं-हिन्दी लेख (hindi film aur adhyatmik gyan-hindi article)


एक टीवी एंकर को एक बहुचर्चित अभिनेता की फिल्म इतनी अच्छी लगी कि उसे वह पूरे विश्व में संदेश भेजती हुई दिखाई दे रही है-उसने अपने अंतर्जाल पर निज पत्रक में यहां तक लिख दिया कि ऐसी फिल्म भारत में ही बन सकती थी और यह भी कि हमारा देश फिर पूरे विश्व में अच्छा संदेश भेजने में सफल रहा है। यह एंकर जिस चैनल से संबंधित है उसने पिछले दिनों उस अभिनेता और उसकी फिल्म के प्रचार में कोई कोर कसर नहीं उठा रखी थी। विशुद्ध रूप से वह व्यवसायिक प्रचार था और एंकर कहीं न कहीं तहेदिल से अपने कार्य में जुटा था।
जब कोई आदमी व्यवसाय करता है तो रोटी के प्रति उसका समर्पण उसे उसके प्रति पूरी तरह ईमानदार बना देता हैं-यहां तक कि उसके कृत्रिम विचार भी उससे प्रभावित होकर मौलिक स्वरूप धारण कर लेते हैं। जब वह एंकर बड़ी शिद्दत से उस अभिनेता को महानायक और फिल्म को अद्वितीय करने के व्यवसायिक प्रयास में लगा रहा होगा तब मस्तिष्क में स्थापित विचार इतनी गहराई तक उतर गया कि वह उससे निकल ही नहीं सकता था। हम यहां उसके व्यवसाय या विचार व्यक्त करने की शैली पर आपत्ति नहीं कर रहे बल्कि यह बात कह रहे हैं कि कोई भी फिल्म, किताब या व्यक्ति भारत का तब तक संदेशवाहक नहीं हो सकता जब उसके मस्तक पर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का तिलक नहीं लगा हो। भारत की पहचान आधुनिक गीत नहीं बल्कि लोकगीत ही होते हैं। आज भी विश्व में भारत की पहचान राम, कृष्ण, शिव, गांधी और यहां के सहृदय नागरिकों का सहज भाव है। भारत के संदेश वाहक बाबा रामदेव तो हो सकते हैं क्योंकि उनके द्वारा योगशिक्षा को व्यवसायिक रूप देकर विश्व में लोकप्रिय बनाया परंतु एक सामयिक फिल्म और उसका अभिनेता कतई नहीं हो सकता। बाबा रामदेव भारत की प्रमाणिक योग पद्धति का प्रचार कर रहे हैं जो कभी प्राचीन नहीं हो सकती जबकि किसी फिल्म की आयु इतनी बड़ी नहीं हो सकती।
उस एंकर ने जो विचार व्यक्त किये उसमें कोई आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है। जिस तरह हम लोग कार्यालय या दुकान से घर आकर भी तत्काल वहां में उपजे भावों से मुक्त नहीं हो पाते वही उनके साथ भी हुआ होगा। वह उस फिल्म को हिट बताने के लिये निरंतर व्यवसायिक प्रचार में जुटे रहे। उनको अपने नायक को महानायक बताने के लिये कुछ भटके लोग खलनायक के रूप में मिल गये। फिल्म तीन दिन तक सफलता से चली तो उनकी वजह से! वरना तो वह पहने ही दिन अच्छी शुरुआत के लिये तरस जाती-कम से कम इस फिल्म को देखकर आने वाले अन्य अंतर्जाल लेखकों के शब्द पढ़कर तो ऐसा ही लगता है। वैसे तीन बाद उस फिल्म का प्रचार भी अब प्रभावी नहीं लग रहा।
दूसरी बात यह कि हम प्रचार माध्यमों को दोष क्यों दें? उनको अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये येनकेन प्रकरेण कार्यक्रम के साथ पैसे भी बनाने हैं और यह लक्ष्य उनको क्रिकेट, फिल्म तथा अन्य प्रदर्शन आधारित व्यवसायों से बहुत आसानी से प्राप्त हो जाता है। जो लोग उनकी आलोचना करते हैं उनको व्यवसाय के स्वभाव को भी समझना चाहिये। सवाल यह है कि इस तरह के प्रचार से लोग प्रभावित हुए कि नहीं! जो आलोचना कर रहे हैं वह देखने गये कि नहीं! साथ ही यह भी सोचना चाहिए कि इतने सारे लोग अपना पैसा खर्च करने गये जिसकी फिल्म निर्माताओं, वितरकों, माल मालिकों तथा उनसे प्रश्रय पाने वाले प्रचार माध्यमों को जरूरत होती है। अगर आप कह रहे हैें कि उन्होंने लोगों को भ्रमित किया तो इसका उत्तर है कि आप जान जागरण के लिये अहिंसक प्रयास क्यों नहीं करते। इसकेे विपरीत फिल्म का कथित रूप से प्रदर्शन या तोड़फोड़ के द्वारा नकली विरोध कर उसका प्रचार करने वालों का समर्थन करते हैं! नतीजा यह होता है कि कुछ लोग ही फिल्म देखने जाते हैं तो वह भी नायक का दर्जा पाने के लिये प्रचार माध्यमों में विजय का प्रतीक उंगलियों को वी की आकृत्ति में प्रस्तुत करते नजर आते हैं।
इस लेखक ने न फिल्म देखी न देखने का इरादा है। अलबत्ता कहानी पढ़ी। उसके नायक जैसा कोई पात्र इस धरती पर सचमुच अगर है तो वाकई एक भावुक व्यक्ति होने के नाते इस लेखक को उससे सहानुभूति होगी । अल्लहड़, मस्तमौला तथा दूसरे के दुःख दर्द में सहानुभूति जताने वालों को यहां मनोरोगी माना जाता है। अगर कहानी वैसी है तो ठीक है। जहां तक फिल्म का सवाल है उस पर इतना बावेला बचना ठीक नहंी था। जिन लोगों को लगता है कि वह फिल्म गलत है उन्हें चाहिये कि वह प्रतिवाद स्वरूप फिल्म बनाने के लिये दूसरों को प्रेरणा दें या खुद बनायें। अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाना ठीक नहीं है। तर्क से वही लोग घबड़ाते हैं जिनके पास ज्ञान नहीं और जिनके पास ज्ञान है वह किसी के अपशब्द से भी विचलित नहीं होते। किसी के अभिव्यक्त विचार से अगर आप असहमत हैं तो उस पर अपनी अभिव्यक्ति इस तरह मजबूत ढंग से रखें कि सामने वाले के हाथ से तोते उड़ जायें। जब दूसरे के विचार पर हाय हाय और हो हो करते हैं तो वह इस बात का प्रमाण है कि विचार रहित विकारवान पुरुष हैं। आखिरी बात यह कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से ही कोई संदेश निकलकर विश्व में फैल सकता ह न कि किसी फिल्म से।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

Post a comment or leave a trackback: Trackback URL.

टिप्पणियाँ

  • AAKASH RAJ  On फ़रवरी 17, 2010 at 23:54

    फिल्म संदेश के लिए नही मनोरंजन के लिए होती है जो वो चाहते हैं वो ही देखते हैं दूसरों को इसकी जरूरत नही|हाँ कभी – कभी संदेश जैसा कुछ लगता भी है तो वो कुछ नया नही होता बस उसे दृश्य देकर दिखने का अंदाज नया होता है और जो संदेश है उसका ज्ञान तो सभी को पहले से ही होता है|यदि कोई इन फिल्मों का प्रचार कर रहा है तो ऐसा नही है कि मिडिया भी अपने पेज अंक कि पूर्ति मात्र कर रही है उनकी ख़बरों को छाप कर क्या वो उनसे पैसे नही बना रहे हैं|सच्चाई तो यही है फिल्मों कि ख़बरें काफी मसाले भरे होते हैं और ये सिर्फ पैसों के लिए होते हैं चाहे वो समर्थक हो या आलोचक|

एक उत्तर दें

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: