बहुत सारी खुशियां भी हैं इस जहां में -व्यंग्य चिंतन


अगर आप हमसे पूछें कि सबसे अधिक किस विषय पर लिखना पढ़ना बोझिल लगता है तो वह है अपने देवी देवताओं फूहड़ चित्र बनाने या उन पर हास्य प्रस्तुति करने वालों का विरोध का विषय ऐसा है जिस पर कुछ कहना बोझिल बना देता है। अगर कहीं ऐसा देख लेते हैंे तो निर्लिप्त भाव से देखकर मुख फेर लेते हैं। इसका कारण यह नहीं कि अपनी अभिव्यक्ति देने में कोई भय होता है बल्कि ऐसा लगता है कि एकदम निरर्थक काम कर रहे हैं। उनके कृत्य पर खुशी तो हो नहीं सकती, चिढ़ आती नहीं पर अगर केवल अभिव्यक्ति देनी है इसलिये उस पर लिखें तो ऐसा लगता है कि अपने को कृ़ित्रम रूप से चिढ़ाकर उसका ही लक्ष्य पूरा कर रहे हैं जिसमें हमें मिलना कुछ नहीं है। ऐसे में जब दूसरे लोग उनकी बात पर चिढ़कर अभिव्यक्त होते हैं तो लगता है कि वह ऐसे अप्राकृत्तिक लोगों का आसान शिकार बन रहे हैं-अपने कृत्यों से प्रचार पाना ही उन लोगों का लक्ष्य होता है भले ही उनको गालियां मिलती हों। उनका मानना तो यह होता है कि ‘बदनाम हुए तो क्या, नाम तो हुआ!’
भले ही कुछ लोग इससे सहमत न हों पर जब हम विचलित नहीं हो रहे तो दूसरों की ऐसी प्रवृत्ति पर कटाक्ष करने का अवसर इसलिये ही मिल पाता है। अभी दो प्रसंग हमारे सामने ऐसे आये जिनका संबंध भारतीय धर्मों या विचारधारा से नहीं है। वैसे यहां हम स्पष्ट कर दें कि हमारी आस्था श्रीमद्भागवत् गीता और योग साधना के इर्दगिर्द ही सिमट गयी है और इस देश का आम आदमी चाहे किसी भी धार्मिक विचाराधारा से जुड़ा हो हम भेद नहीं करते। हमारा मानना है कि हर धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्रीय समूहों का आम इंसान अपने जीवन की तकलीफों से जूझ रहा है इसलिये वह ऐसे विवादों को नहीं देखना चाहता जो प्रायोजित कर उसके सामने प्रस्तुत किये जाते हैं। मतलब हम आम लेखक अपने आम पाठकों से ही मुखातिब हैं और उन्हें यह लेख पढ़ते हुए अपनी विचारधारायें ताक पर रख देना चाहिये क्योकि यह लिखने वाला भी एक आम आदमी है।
चीन की एक कंपनी ने किसी के इष्ट का चिन्ह चप्पल के नीचे छाप दिया। अब उसको लेकर प्रदर्शन प्रायोजित किये जा रहे हैं। उधर किसी पत्रिका में किसी के इष्ट को मुख में बोतल डालते हुए दिखाया गया है। उस पर भी हल्ला मच रहा है। इन गैर भारतीय धर्मो के मध्यस्थ-जी हां, हर धर्म में सर्वशक्तिमान और आम इंसान के बीच इस धरती पर पैदा हुआ ही इंसान मार्गदर्शक बनकर विचरता है जो तय करता है कि कैसे धर्म की रक्षा हो-भारत में पैदा हुए धर्मों पर अविकासवादी चरित्र, असहिष्णु, क्रूर तथा अतार्किक होने का आरोप लगाते हैं। हम उनके जवाब में अपनी सहिष्णुता, तार्किकता, विकासमुखी चरित्र या उदारता की सफाई देने नहीं जा रहे बल्कि पूछ रहे हैं कि महाशयों जरा बताओ तो सही कि अगर किसी ने चप्पल के नीचे या किसी पत्रिका में ऐसा चित्र छाप दिया तो तुम उसे देख ही क्यों रहे हो? और देख रहे हो तो हमारी तरह मुंह क्यों नहीं फेरे लेते।
ऐसा एक बार नहीं अनेक बार हुआ है कि भारतीय देवी देवताओं का मजाक उड़ाया गया पर हमने कभी भी उस इतना शोर नहीं मचाया। इतना ही नहीं सर्वशक्तिमान के स्वरूपों को पेंट या जींस पहनाकर की गयी प्रस्तुति का विरोधी करने वाले सहविचारकों को भी विरोध करने पर फटकारा और समझाया कि ‘यह सब चलता है।’
एक ने हमसे कहा था कि‘आप कैसी बात करते हो, किसी दूसरे समाज के इष्ट स्वरूप की कोई ऐसी प्रस्तुति करता तो पता लगता कि वह कैसे शोर मचा रहे हैं।’
हमने जवाब दिया कि ‘याद रखो, उनसे हमारी तुलना नहीं है क्योंकि हमारे देश में ही ब्रह्म ज्ञानी और श्रीगीता सिद्ध पैदा होते हैं। इनमें कई योगी तो इतने विकट हुए हैं कि आज भी पूरा विश्व उनको मानता है।’
सर्वशक्तिमान का मूल स्वरूप निराकार और अनंत है। जिसके हृदय प्रदेश में विराज गये तो वह हर स्वरूप में उसका दर्शन कर लेता है, भले ही वह धोते पहने दिखें या जींस! कहने का तात्पर्य यह है कि भक्ति की चरम सीमा तक केवल भारतीय अध्यात्मिक ज्ञानी ही पहुंच पाते हैं-यही कारण है कि भारत के सर्वशक्तिमान के स्वरूपों का कोई भद्दा प्रदर्शन प्रस्तुत करता है तो उस पर बुद्धिजीवियों का ही एक वर्ग बोलता है पर संत और साधु समाज उसे अनदेखा कर जाते हैं।
जाकी रही भावना जैसी! गुण ही गुणों बरतते हैं। शेर चिंघाडता है, कुत्ता भौंकता है और गाय रंभाती है क्योंकि यह उनके गुण है। हंसना और मुस्कराना इंसान को कुदरत का तोहफा है जिसका उसे इस्तेमाल करना चाहिये। भौंकने का जवाब भौंकने से देने का अर्थ है कि अपने ही ज्ञान को विस्मृत करना। हमारे यहां हर स्वरूप में भगवान के दर्शन में एक निरंकार का भाव होता है।
एक चित्रकार ने भारतीय देवी देवताओं के भद्दे चित्र बनाये। लोगों ने उसका विरोध कर उसे विश्व प्रसिद्ध बना दिया। अज्ञानता वश हम विरोध कर दूसरों का विश्व प्रसिद्ध बनाते जायें इससे अच्छा है कि मुंह फेरकर उनकी हवा निकाल दें। उस चित्रकार के कृत्य हमने भी विचार किया तब यह अनुभूति हुई कि उसका क्या दोष? जैसे संस्कार मिले वैसा ही तो वह चलेगा। बुढ़ापे में एक युवा फिल्म अभिनेत्री से आशिकी के चर्चे मशहुर करा रहा था? दरअसल भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से वह बहुत दूर था। जब भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से जुड़े समाज में पैदा हुए लोग ही भूल जाते हैं तो वह तो पैदा ही दूसरे समाज में हुआ था। उसका उसे यह लाभ मिला कि वह आजकल विदेश में ऐश कर रहा है क्योंकि उसे यह कहने का अवसर मिल गया है कि मुझे वहां खतरा है।’
कहने का तात्पर्य यह है कि हम विरोध कर दूसरे को लोकप्रिय बना रहे हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उपेक्षासन का वर्णन है। यह पढ़ा तो अब हमने पर चल इस पर बरसों से रहे हैं। दूसरे समाजों के लिये तो यह नारा है कि ‘और भी गम हैं इस जमाने में’, पर हमारा नारा तो यह है कि ‘बहुत सारी खुशियां भी हैं इस जहां में’। देखने के लिये इतनी खूबसूरत चेहरे हैं। यहां कोई पर्दा प्रथा नहीं है। हम लोग सभी देवताओं की पूजा करते हैं और उसका नतीजा यह है कि वन, जल, तथा खनिज संपदा में दुनियां की कोई ऐसा वस्तु नहंी है जो यहां नहीं पायी जाती। विश्व विशेषज्ञों का कहना है कि ‘भूजल स्तर’ सबसे अधिक भारत में ही है। जहां जल देवता की कृपा है वहीं वायु देवता और अग्नि देवता-जल में आक्सीजन और हाईड्रोजन होता है-का भी वास रहता है। इतनी हरियाली है कि मेहनत कर पैसा कमाओ तो स्वर्ग का आनंद यहीं ले लो उसके लिये जूझने की जरूरत नहीं है। लेदेकर संस्कारों की बात आती है और भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में योग साधना तथा मंत्रोच्चार के साथ एसी सिद्धि प्रदान करने की सुविधा प्रदान करता है कि दैहिक और मानसिक अनुभूतियां इतनी सहज हो जाती हैं कि उससे किसी भी अपने अनुकूल किसी अच्छी वस्तु, पसंदीदा आदमी, या प्रसन्न करने वाली घटना से संयोग पर परम आनंद की चीजें प्राप्त हो जाती हैं। बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो तथा बुरा मत कहो की तर्ज पर हमारे यहां लोग आसानी से चलते हैं न कि हर जरा सी बात पर झंडे और डंडे लेकर शोर मचाने निकलते हैं कि ‘हाय हमारा धर्म खतरे में है।’
आखिरी बात यह है कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की महिमा ऐसी है कि यहां के आदमी बाहर जाकर भी इसे साथ ले जाते हैं और यहां रहने वाले दूसरे समाजों के आम लोग भी स्वतः उसमें समाहित होते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की यह खूबी है कि कुछ बाहर स्थापित विचारों को भले ही मानते हों पर उनमें संस्कार तो इसी जमीन से पैदा होते हैं। यही कारण है कि आम आदमी सभी समूहों के करीब करीब ऐक जैसे हैं पर उनको अलग दिखाकर द्वंद्व रस पिलाया जाये ताकि उनके जज़्बातों का दोहन हो सके इसलिये ही ऐसे शोर मचावाया जाता है। ऐसे लोगों का प्रयास यही रहता है कि आम आदमी एक वैचारिक धरातल पर न खड़ा हो इसलिये उनमें वैमनस्य के बीच रोपित किये जायें।
दरअसल प्रचार माध्यम आम आदमी के दुःख सुख तथा समस्याओं को दबाने के लिये ऐसे प्रायोजित कार्यक्रमों के जाल में फंस जाते हैं और इससे शोर का ही विस्तार होता है शांति का नहीं-जैसा कि वह दावा करते हैं।
इस लेखक का यह लेख उस गैरभारतीय धर्मी ब्लागर को समर्पित है जिसने अपने इष्ट पर कार्टून बनाने के विरोध में अपने समाज के ठेकेदारों द्वारा आयोजित प्रदर्शन पर व्यंग्य जैसी सामग्री लिखी थी। उसने बताया था कि किस तरह लोग उस प्रदर्शन में शामिल हुए थे कि उनको पता ही नहीं था कि माजरा क्या है? अनेक बार एक पत्रिका पर ब्लाग देखकर भी मन नहीं हुआ था पर उसके लेख ने ऐसा प्रेरित किया कि फिर लिखने निकल पड़े-क्योंकि पता लगा कि यह स्वतंत्र और मौलिक अभिव्यक्ति का एक श्रेष्ठ मार्ग है। अक्सर उसे ढूंढने का प्रयास करते हैं। संभावना देखकर अनेक ब्लाग लेखकों के तीन वर्ष पुराने पाठों तक पहुंच जाते हैं, पर अभी तक पता नहीं लगा पाये।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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