हिन्दू धर्म संदेश-पैसा कमाने से कभी फुर्सत नहीं मिल सकती


किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला।
या तु वेश्येव सा मान्या पथिकैरपि भुज्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
उस संपत्ति से क्या लाभ जो केवल घर की अपने ही उपयोग में आती हो। जिसका पथिक तथा अन्य लोग उपयोग करें वही संपत्ति श्रेष्ठ है।
धनेषु जीवतिव्येषु स्त्रीषु चाहारकर्मसु।
अतृप्तः प्राणिनः सर्वे याता यास्यन्ति यान्ति च।।
हिन्दी में भावार्थ-
धन और भोजन के सेवन तथा स्त्री के विषयों में लिप्त रहकर भी अनेक मनुष्य अतृप्त रह गए, रह जाते हैं और रह जायेंगे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य के लोभ की सीमा अनंत है। वह जितना ही धन संपदा के पीछे जाता है उतना ही वह एक तरह से दूर हो जाती हैं। किसी को सौ रुपया मिला तो वह हजार चाहता है, हजार मिला तो लाख चाहता है और लाख मिलने पर करोड़ की कामना करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि दौलत की यह दौड़ कभी समाप्त नहीं होती। आदमी का मन मरते दम तक अतृप्त रहता है। जितनी ही वह संपत्ति प्राप्त करता है उससे ज्यादा पाने की भावना उसके मन में जाग्रत होने लगती है।
आखिर अधिकतर लोग संपत्ति का कितना उपयोग कर पाते हैं। सच तो यह है कि अनेक लोग जीवन में जितना कमाते हैं उतना उपभोग नहीं कर पाते। उनके बाद उसका उपयोग उनके परिजन करते हैं। बहुत कम लोग हैं जो सार्वजनिक हित के लिये दान आदि कर समाज हित का काम करते हैं। ऐसे ही लोग सम्मान पाते हैं। जिन लोगों की अकूल संपत्ति केवल अपने उपयोग के लिये है तो उसका महत्व ही क्या है? संपत्ति तो वह अच्छी है जिसे समाज के अन्य लोग भी उपयोग कर सके। जब समाज किसी की संपत्ति का उपयोग करता है तो उसको याद भी करता है।  इसके बावजूद इंसान संचय करने में लगा रहता है और भक्ति तथा ज्ञान से परे हो जाता है।

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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