सहज तथा असहज योग-हिन्दी लेख(sahaj yog aur asahaj yog-hindi lekh)


धार्मिक विषयों पर अच्छी या बुरी चर्चायें अब इस लेखक पर प्रभाव नहीं डालती। इसका कारण यह है कि हमें लगता है कि श्रीगीता से पृथक होकर कोई भी ज्ञान चर्चा पूर्णता की तरफ जा ही नहीं सकती। दूसरा यह कि लोग श्रीमद्भागवतगीता को पढ़े बिना ही समझते हैं-मतलब यह है कि किसी के मुखार बिंद से सुन लिया और वही सत्य मान लिया। जबकि वास्तविकता यह है जैसे जैसे यह लेखक श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन कर रहा है उससे लगता है कि केवल भाषा के शब्द तथा व्याकरण का ही ज्ञान होना पर्याप्त नहीं बल्कि अपने अंदर यह संकल्प होना भी आवश्यक है कि यह पुस्तक एकमेव ज्ञान विज्ञान की पुस्तक है जिससे भक्ति और जिज्ञासा से पढ़कर ही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
अनेक लोगों ने श्रीगीता का अध्ययन इस उददृेश्य से किया है कि उसे पढ़कर अपना ज्ञान दूसरे लोगों को बेच सकें और समाज भी उन्हें एक संत मान लेता है जबकि सच यह है कि वह स्वयं ही नहीं जानते कि उस स्वर्णिक ज्ञान का मोल क्या है?
कहते हैं कि कोई भी आदमी अपने परिवार के किसी भी सदस्य को श्रीगीता पढ़ने का उपदेश नहीं   देता कि कहीं वह वैरागी न हो जाये। सच यही है कि आदमी उससे वैरागी होता है पर कर्म से पलायन नहीं करता। अलबत्ता जैसे जैसे ज्ञान चक्षु खुलते जाते हैं वह अकेला होता चला जाता है। इसलिये कहीं बड़ी सभा या बैठक में वह दूसरों की आदर्शवादी बातों से प्रभावित नहीं होता क्योंकि बहुत जल्दी उसे वहां पाखंड की अनुभूति हो जाती है।
इस समय देश में धर्म, जाति, वर्ण तथा अर्थ के आधार पर अनेक समूहों के बीच संघर्ष चल रहे हैं। उस पर बहसें केवल हास्यास्पद और समय बिताने का मार्ग ही लगती हैं यही कारण है कि संगठित प्रचार माध्यम उसे भुना रहे हैं। कभी कभी तो लगता है कि समाज के मानसिक तथा वैचारिक अंतद्वंद्व प्रचार माध्यमो में बिकने वाले विषय बन गये हैं।
एक मजे की बात यह है कि हिन्दू धर्म की रक्षा के नाम पर जितना नाटक इस देश में चलता रहा है उसके लिये लोगों का अज्ञान ही जिम्मेदार है। श्रीमद्भागवत गीता को लेकर एक बात आश्चर्य में डालती है कि वह कौन महान विभूतियां रही होंगी जिन्होंने महाभारत ग्रंथ से श्रीगीता को अलग कर प्रस्तुत करने का प्रयास किया। उनके इस प्रयास ने न केवल भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को एक महान स्त्रोत प्रदान किया वरन् उसे विश्व में एकमेव ज्ञान विज्ञान का ग्रंथ बना दिया। अगर यह महाभारत से पृथक नहीं किया जाता तो शायद इसकी मान्यता इतनी नहीं रह जाती।

भारतीय धर्म के आलोचकों की बात सुनकर अनेक बुद्धिजीवी उत्तेजित होकर अपनी आस्था पर प्रहार के विरुद्ध झंडा तो उठा लेते हैं पर श्रीगीता के ज्ञान के अभाव में कोई तर्क उनको नहीं सूझता। शायद वह नहीं जानते कि इस संसार में मनुष्य मन के-आदमी चलता है अपने मन की गति और चाल से ही है, यह सभी जानते हैं- चलने के दो ही मार्ग है। एक तो श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित सहज योज दूसरा है उससे पृथक असहज योग। आशय यह है कि योग तो हर इंसान करता ही है पर ज्ञान सहज योग तो अज्ञानी असहज योग में तत्पर होते हैं। जहां असंतोष, हिंसा, लालच, ईर्ष्या, लोभ तथा भेदभाव की प्रवृत्ति है वहां असहजता का भाव तनाव का अंधेरा फैलाता है और जहां संतोष, प्रेंम तथा समदर्शिता का भाव है वहां आनंद की रौशनी फैलती है। तय बात है कि इस संसार में अंधेरा पसंद लोगों की संख्या ज्यादा है जो उधार की रौशनी चाहते हैं जबकि ज्ञानी कम ही है जो अपने ज्ञान के प्रकाश में ही आनंद की अनुभूति करते हैं। दूसरी बात यह कि गुण ही गुणों को बरतते हैं यह वैज्ञानिक सूत्र है जिसके प्रतिकुल संसार की गतिविधियां तो हो ही नहीं सकती। रसायनों के अधिक प्रयोग से खान पान तथा रहन सहन में विषैले तत्वों का समावेश हो रहा है ऐसे में यह संभव नहीं है कि अमृत ज्ञान की चाहत सभी में हो। कहीं कहीं तो ऐसा भी होता है कि ज्ञान की बात करें तो पागल समझ लिये जाते हैं। शायद यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता का ज्ञान केवल अपने भक्तों में ही करने का उपदेश दिया है। इसलिये भारतीय धर्म के आलोचकों को निरुतर करने के लिये श्रीगीता के संदेश का उपयोग  करना भी कुछ विद्वानों को अच्छा नहीं लगता। बहरहाल यह अंतिम सत्य है कि विज्ञान तथा ज्ञान की एकमेव पुस्तक श्रीगीता का अध्ययन अपने आप में बहुत दिलचस्प तथा ज्ञान वर्द्धक है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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