रुपयों से लिया जा रहा है हंटर का काम-हास्य कविताएँ (rupya aur hunter-hasya kavitaen)


जैसे जैसी बढ़ी महंगाई
नैतिकता की कीमत नीचे आई,
अपनी भूख से बढ़कर
इंसान की कोई जरूरत नहीं है
यह बात किसी अर्थविज्ञानी के समझ नहीं आई।
———–
बेकाबू हो रहा बाज़ार
सौदागर हो गये बेलगाम,
दौलतमंद के घरों पर
बिक रही है ज़माने को
काबू करने की ताकत
रुपयों से लिया जा रहा हंटर का काम।
———
जिनके पेट भरे हैं
भुखमरी पर सबसे अधिक वही रोते हैं,
अपने जज़्बात के दाम वसूल कर
फिर घोड़े बेचकर सोते हैं।
———–

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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टिप्पणियाँ

  • Prateek Shrivastava  On नवम्बर 14, 2010 at 16:47

    nice

  • Jandunia  On जुलाई 7, 2010 at 22:58

    खूबसूरत

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