पिंजरे में फंसा धर्म-हिन्दी दिवस पर विशेष लेख (pinjre me fansa dharma-hindi diwas par vishesh lekh)


कैमरे के सामने फोटो खिंचवाने का सभी को शौक होता है। जिन लोगों की रोजी रोटी ही कैमरे के सामने होने से चलती है उनके लिये तो अपनी अदाऐं दिखाना ही धंधा हो जाता है। यह धंधा करने वाले इसके इतने आदी हो जाते हैं कि उसे छोड़ना तो दूर उसका सोचना भी उनको डरा देता है। कैमरर उनके लिये एक महल की तरह होता है जिसमें एक बार आने पर हर कोई रहना चाहताहै पर कुछ लोगों के लिये यह पिंजरा भी बन जाता है। एक तो पिंजरा उनके लिये होता है जो मज़बूरी की वजह से इसके सामने टिके रहना चाहते हैं क्योंकि यहीं से उनकी रोजी रोटी चलती है पर मन उनका नहीं होता। दूसरे वह लोग हैं जिनको जबरन तस्वीर बनाकर इसमें लाया जाता है।
आजकल यही कैमरा टीवी चैनल तथा खोजी पत्रकारों के लिये पिंजरा (sting operation) बन गया है और वह इसे लेकर पकड़ अभियान-स्टिंग ऑपरेशन  (sting operation) चलाते हैं। कभी अभिनेता, कभी नेता, कभी अधिकारी तो कभी संत इस कैमरे में ऐसे कैद होते हैं जैसे कि पिंजरे में चूहा।
बड़ा दिलचस्प दृश्य टीवी पर चलता है जब इसमें कैदी की तरह फंसे खास शख्सियतों का असली रूप सामने आता है। उस समय हंसते हुए पेट में बल पड़ जाते हैं क्योंकि यह देखकर मजा आता है कि ‘देखो, कैसे धंधे पानी की बात कर यह आदमी जाल में फंस रहा है।’ जैसे मछली कांटे में फंसती है और जैसा चूहा पिंजर में फंसकर छटपटाता है।
शिक्षण संस्था में प्रबंधक पद पर व्यक्ति आसीन लोग बड़े आदर्श की बातें करते हैं पर जब कैमरे में कैद होते हैं तो क्या कहते हैं कि ‘इतनी रकम दो तो मैं तुम्हें कॉलिज में प्रवेश दिला दूंगा। इस विषय में इतने तो उस विषय में इतने पैसे दो। इसकी रसीद नहीं मिलेगी।’
बिचारा धंधा कर रहा है पर उसे पता नहीं कि वह चूहे की तरह फंसने जा रहा है। बड़े विद्वान बनते हैं पर लालच उनकी अक्ल को चूहे जैसा बना देती है। हा…हा…
फिल्मी लाईन वाले कहते हैं कि उनके यहां लड़कियों का शोषण नहीं होता पर उनका एक अभिनेता-खलपात्र का अभिनय करने वाला-एक लड़की से कह रहा था कि ‘यहां इस तरह ही काम चलता है। आ जाओ! तुम मेरे पास आ जाओ।’
कुछ जनकल्याण का धंधा करने वाले भी फंसे गये जो केवल सवाल उठाने के लिये पैसे मांग रहे थे।
ऐसे में हंसी आती है। यह देखकर हैरानी होती है कि कैमरा किस तरह पिंजरा बन जाता है। यह फंसने वाले कोई छोटे या आम आदमी नहीं होतें बल्कि यह कहीं न कहीं आदर्श की बातें कर चुके वह लोग दिखाई देते हैं जिनका समाज में प्रभाव है।
सबसे अधिक मजा आता है संतों का चूहा बनना। अधिकारी, नेता और अभिनेता तो चलो बनते ही लोग पैसा कमाने के लिये हैं पर संतों का पेशा ऐसा है जिसमें आदर्श चरित्र की अपेक्षा की जाती है। यह संत भारतीय अध्यात्म में वर्णित संदेशों को नारों की तरह सुनाते हैं
‘काम, क्रोध, लोभ और मोह में नहीं फंसना चाहिये।’
‘यह जगत मिथ्या है।’
‘सभी पर दया करो।’
‘किसी भी प्रकार की हिंसा मत करो।
‘अपनी मेहनत से कमा कर खाओ।’
आदि आदि।
जब यह बोलते हैं तो ऐसा लगता है कि कितने मासूम और भोले हैं। इनमें सांसरिक चालाकी नहीं है तभी तो ऐसे उल्टी बातें-जी हां, अगर आम आदमी ऐसा कहे तो उसे पागल समझा जाता है-कर रहे हैं शायद संत हैं इसलिये।
मगर कैमरे में यह बड़े संत चूहे की तरह फंसते नज़र आते हैं तब क्या कहते हैं कि
‘चिंता मत करो। तुम्हारा काम हो जायेगा। अरे यहां कोई तुम्हारा बाल बांका भी नहीं कर सकता। यहां तो बड़े बड़े ताकतवर लोग मत्था टेकने आते हैं।’’
‘तुम कहंीं से भी धन लाओ हम उसका सलीके से उपयोग करना सिखा देंगे।’
‘हम तुम्हें ठेका दिला देंगे, हमारा कमीशन दस प्रतिशत रहेगा। हमें कार और पिस्तौल दिलवा देना।’
ऐसी ऐसी विकट बातें सुनकर कानों में यकीन नहीं होता। सोचते हैं कि-अरे, यार इसे तो रोज टीवी पर देखते हैं, कहां इसे संत और विद्वान समझते हैं यह तो बिल्कुल एक मामूली दुकानदार की तरह बात करने के साथ ही मोलभाव भी कर रहा है।’
पिंजरे में फंसे संत कहते हैं कि ‘चिंता मत करो, हमारे यहां तो तुमसे भी बड़े खतरनाक लोग आसरा पाते हैं’।
तब हम सोचते हैं कि यह रावण और कंस के विरुद्ध प्रतिदिन प्रवचन करने वाले उनसे भी खतरनाक लोगों को पनाह देते हैं। यहां यह बता दें कि कंस और रावण खतरनाक तत्व थे पर फिर भी कहीं न कहीं के राजा थे और उनके कुछ सिद्धांत भी थे पर आज के यह खतरनाक तत्व ऐसे हैं कि पुराने खलनायक हल्क नज़र आते हैं।
यह संत लोग कैमरे में फंसे पिंजरे में कहते हैं कि ‘कितना भी काला धन लाओ कमीशन देकर उसे सफेद पाओ।’
ऐसे प्रसंगों में एक संत की यह बात सबसे अज़ीब लगी कि ‘अमेरिका में कोई भी काम हो एक मिनट में हो जायेगा।’
मतलब वहां भी ताकतवर इंसानों की खरीद फरोख्त कर लेते हैं-वाकई धर्म की आड़ में अधर्म कितना ताकतवर हो जाता है। अभी तक अमेरिका और ब्रिटेन के बारे में यह धारणा हमारे यहां रही है कि वहां के लोग देशभक्त होते हैं और इस तरह नहीं बिकते पर एक मिनट में काम होने वाली बात से तो यही लगता है कि बाज़ार के वैश्वीकरण के साथ ही अपराध और आतंक का भी वैश्वीकरण हो गया है। उसके साथ ही हो गया है उनको धर्म की आड़ देने का व्यापार।
किस्सा मज़ेदार है। पकड़ अभियान-स्टिंग ऑपरेशन  (sting operation) करने वालों ने संत को बताया कि उनके साथ जो महिला है वह अमेरिका से आर्थिक अपराध कर भागी है। उसे शरण चाहिये। वह संत अपने आश्रम में शरण देने को तैयार है और कहता है कि
‘यहां तुम किसी को कुछ मत बताना! कहना यह कि ध्यान और दर्शन के लिये आयी हूं।’
बेसाख्ता हमारे मन में बात आयी कि ‘जैसे यह ध्यान और दर्शन करा रहे हैं।’
क्या सीख है! दर्शन और ध्यान की आड़ में छिप जाओ। यही संत कैमरे के सामने जब बोलते हैं तो उनके भक्त मंत्रमुग्ध हो जाते हैं पर इन पकड़ कर्ताओं ने उनको अपने गुप्त कैमरे को पिंजरा बनाकर चूहे की तरह फंसा डाला।
फिल्म वालों ने एक अंधविश्वास फैला रखा है कि भूत केवल आदमी को दिखता है मगर कैमरे में नहीं फंसता। एक फिल्म आई थी नागिन! जिसमें एक नागिन रूप बदल कर अपने नाग के हत्यारों से बदला ले रही थी। उसमें वह हत्यारों को तो अपनी इंसानी प्रेमिका में दिखती थी और बाद में उनको डस कर बदला लेती थी। उसमें एक नायक उसे पहचान लेता है क्योंकि वह कांच में नागिन ही दिखाई देती है। कैमरे में ही यह दर्पण भी होता है। जिस तरह वह रूपवती स्त्री कांच में नागिन दिखाई देती थी वही कैमरे की भी असलियत होती है। यह धर्म भी शायद एक भूत है जो पिंजरा बन जाने पर कैमरे में अधर्म जैसा दिखाई देता है। रहा धर्म का असली रूप में दिखने का सवाल तो उसके लिये चिंतन का होना जरूरी है क्योंकि वह एक अनुभूति है जो बाहर हमारे आचरण के रूप में अभिव्यक्त होती है और उसके बारे में निर्णय दूसरे लोग करते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि सच्चे धर्म वाले कभी किसी पिंजरे में नहीं फंसते।
आखिरी बात यह कि यह व्यंग्य का विषय नहीं बल्कि गंभीर बात है कि श्रीमद्भागवत गीता एक कैमरे का रूप है जिसका अध्ययन कर उसकी बात समझें तो अपना चित्र स्वयं ही खीचकर देख सकते हैं और साथ ही माया के पिंजरे में फंसे लोगों की अदायें देखने का लुत्फ् भी उठा सकते हैं। गीता सिद्ध जानते हैं कि धर्म क्या है और उसकी रक्षा कैसे होती है। उनके लिये कैमरा कभी पिंजरा नहीं बन पता क्योंकि वह उसके सहज अभ्यासी होते हैं और कथनी करनी में अंतर न होने की वजह से कभी चूहे नहीं बनते।
———

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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टिप्पणियाँ

  • vipul  On सितम्बर 14, 2010 at 20:57

    mahasay aap sayad tv ke bare me nahi jante. apko malum nahi ye tv channeel multinational companies ke paiso per chalte h. agar inme himmat hai to aap kisi padri ya imam ka sting operation karke dikhaye???bhartiya saint jo hamare hindu samajka prateek hai unko banaam karke ye hamare dharam ko badnaam karte h .in media good nes i no news bad news is news. because of TRP.ISLIYE AAP AISI KAVITA NA LIKHE JISSE KISI DIL AAHAT HO.

  • vipul  On सितम्बर 14, 2010 at 20:57

    Mahasay aap sayad tv ke bare me nahi jante. apko malum nahi ye tv channeel multinational companies ke paiso per chalte h. agar inme himmat hai to aap kisi padri ya imam ka sting operation karke dikhaye???bhartiya saint jo hamare hindu samajka prateek hai unko banaam karke ye hamare dharam ko badnaam karte h .In media good neWs i no news bad news is news. because of TRP.ISLIYE AAP AISI KAVITA NA LIKHE JISSE KISI DIL AAHAT HO.

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