बाज़ार जो बुलवाए-हिंदी व्यंग्य चिंत्तन


            यह हैरानी की बात है कि दिल्ली में एक युवती के साथ सामुहिक दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या की घटना के बाद जहां सारे देश में आक्रोश फैला वहीं अनेक लोगों को अपना नाम चमकाने के लिये बहसें करने के साथ ही बयान देने का अवसर मिला।  बाज़ार के सौदागरों के उत्पाद बिकवाने वाले प्रचार माध्यमों ने इस अवसर पर खूब नाटकबाजी की।  कहने को तो प्रचार माध्यमों में प्रस्तोता और बहसकर्ता शोकाकुल थे पर कहीं न कहीं जहां विज्ञापनों के माध्यम से कमाई हो रही थी तो विवादस्पद बयानों के माध्यम से अनेक लोगों को चमकाया जा रहा था।
           इस मामले में एक ऐसे गायक कलाकार  का नाम सामने आया जिसका नाम आम लोगों में तब तक प्रचलित नहीं था। उस गायक कलाकार के गीत में महिलाओं को लेकर कोई अभद्र टिप्पणी थी।  संभव है देश के कुछ युवा लोग उसका नाम जानते हों पर पर सामान्य रूप से वह इतना प्रसिद्ध नहीं था।  प्रचार माध्यम उसके पीछे हाय हाय करके पड़ गये। बाद में उस गायक कलाकार ने दावा किया कि वह गीता उसका गाया हुआ ही नहीं है।  यह मामला थम गया पर उस गायक कलाकार का नाम तब तक सारा देश जान गया।  क्या इसमें कोई व्यवसायिक चालाकी थी, यह कहना कठिन है।
      प्रचार माध्यमों ने पीड़िता का नाम गुप्त रखने की कानूनी बाध्यता जमकर बखानी।  यह सही है कि दैहिक जबरदस्ती की शिकार का नाम नहीं दिया जाना चाहिये पर यह शर्त इसलिये डाली गयी है ताकि उसे भविष्य में सामाजिक अपमान का सामना न करना पड़े।  जिसका देहावसान हो गया हो उसके लिये फिर मान अपमान का प्रश्न ही कहां रह जाता है?  हां, उसके माता पिता के लिये थोड़ा परेशानी का कारण होता है पर दिल्ली में दरिंदों की शिकार उस बच्ची का नाम उसके पिता ने ही उजागर कर दिया है। इंटरनेट पर ट्विटर पर आई एक मेल में एक अखबार की चर्चा है जिसमें उसके पिता का बयान भी है।  हम नाम नहीं लिखते क्योंकि हमारा उद्देश्य किसी घटना में समाज के उन पहलुओं पर विचार करना होता है जिन्हें लोग अनदेखा कर देते हैं-नाम अगर सार्वजनिक हुआ हो तो भी नहीं लिखते।
      इधर हम देख रहे हैं कि सामूहिक दुष्कर्म पर अनेक लोग बयानबाजी कर रहे हैं।  हमें अफसोस होता है यह देखकर कि वह बच्ची तो अपने दुर्भाग्य का शिकार हो गयी पर उसे विषय बनाकर लोग जाने क्या क्या कर रहे हैं।  हमने पहले भी यह कहा था कि यह घटना आम घटनाओं से अलग है। कहीं न कहीं इसमें राज्य प्रबंध का दोष है। अब तो यह भी मानने है कि समाज का भी इसमें कम दोष नहीं। लड़की के साथ जो लड़का था वह बच गया और उसके जो बयान आये हैं वह दूसरा पक्ष भी रख रहे हैं।  वह उसे दुर्भाग्यशाली बच्ची ने दरिंदों की क्रुरता तो झेली ही सज्जनों की उपेक्षा को भी झेला।  लड़की साथ वाले लड़के के अनुसार वह घायलवास्था में  सड़क पर पड़े आते जाते लोगों से मदद की याचना करता रहा पर लोग देखकर जाते रहे।  दुर्जनों की सक्रियता और सज्जनों की निष्क्रियता दोनों को उन दोनों ने जो रूप देखा वह हैरान करने वाला है।  उनकी उपेक्षा करने वाले मनुष्य थे कोई गाय या भैंस नहीं।
          इस  पर एक वाक्य याद आ रहा है। हमें पता नहीं किसी फिल्म में था या कहीं पढ़ा है।  इसमें एक धर्म विशेष को लेकर कहा गया कि ‘………धर्म हमें या तो आतंकवादी बनाता है या फिर बेबस’!
    यह वाकया देखकर हमें लग रहा है कि नाम से पहचाने जाने वाले सारे धर्मो की स्थिति यही है।  जहां तक भारतीय अध्यात्म का प्रश्न है वह पवित्र आचरण तथा अच्छे व्यवहार को ही धर्म मानता है।  श्रीमद्भागवत गीता में धर्म का कोई नाम नहीं बल्कि आचरण से उसे जोड़ा गया है।  कष्टकारक बात यह है कि श्रीमद्भागवत गीता को पढ़ने  का दावा करने वाले लोग यह मानते है कि वह महाज्ञानी हो गये और फिर वह उसकी व्याख्या मनमाने तरीके से करते हैं। उससे भी ज्यादा हैरान यह बात करती है कि जिन लोगों का यह दावा कि वह भारतीय धर्मो की समझ रखते हैं वही ऐसी बातें करते हैं जिनका सिर पैर नहीं होता।
    सामूहिक दुष्कर्म की घटना में वास्तविक रूप से क्या हुआ, यह तो वह लड़का भी एकदम पूरी तरह से नहीं बता सकता जो उस समय लड़की के साथ था।  अपने ऊपर वार होने की वजह से वह घायल होकर अपनी सुधबुध खो बैठा था  हालांकि पूरे हादसे के समय वह उस पीड़ा झेल रहा था। ऐसे में यह कहना कि उस लड़की को यह करना चाहिये था यह वह करना चाहिए था यह हास्यास्पद है।  इस घटना के परिप्रेक्ष्य में संपूर्ण समाज की स्थिति में देखना भी ठीक नहीं है।  जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा के आधार पर अपराध और पीड़ित को देखने वाले केवल दुर्भाग्यशाली पीड़िता के नाम के साथ अन्याय कर रहे हैं।  यह सच है कि मनुष्य एक शक्तिशाली जीव है पर भाग्य का अपना रूप है।  एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर जो लोग टिप्पणी कर रहे हैं उनका मुख्य उद्देश्य पर्दे पर अपना चेहरा और कागजों पर नाम चमकते देखने के अलावा कुछ नहीं है।  उनको ऐसा लगता है कि अगर हमने इस पर कुछ नहीं बोला तो प्रचार युद्ध में हम अपने प्रतिद्वंद्वियों से  पिछड़ जायेंगे।  फिर हम प्रचार माध्यमों की तरफ देखते हैं कि अगर उनके पास सनसनी पूर्ण समाचार और विवादास्पद बहसें नहीं होंगी तो उनके विज्ञापन का समय कैसे पास होगा।  बाज़ार के पास प्रचार है तो बोलने वाले बुत भी हैं। यह बुत अपना मुख प्रचार के भोंपुओं की तरफ हमेशा किये खड़े रहते हैं, मानो कह रहे हों कि ‘बोल बाज़ार।’
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप
ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।

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