फेसबुक पर हिंग्लिश के सामने हिन्दी भाषा कितनी टिकेगी-हिन्दी चिंत्तन लेख


            जनसंपर्क, प्रचार तथा लोकप्रियता का जो बाज़ार हिन्दी भाषियों से कमाते हैं उनमें आत्मविश्वास की  भारी कमी है या नित्य चलायमान बने रहने की परंपरा के तहत भाषा से छेड़छाड़ उसके प्रबंधक तथा कार्यकर्ता कर रहे हैं यह कहना कठिन है। हम बात कर रहे हैं फेसबुक पर अभी हाल ही में हिन्दी प्रारूपण में हिंग्लिश शब्द जोड़ने की।  अभी तक हमें दो शब्द दिखाई दिये। एक तो हिन्दी के पुष्टिकरण  की जगह हिंग्लिश  का कंफर्म (conform) दूसरा  मुखपृष्ठ की  जगह होम (home) कर दिया गया है। हमारी दृष्टि से अब समय आ गया है कि हिंग्लिश और हिन्दी वालों को अलग अलग कर देखा जाना चाहिये। कम से कम स्थापित, प्रचलित तथा आदत में जो शब्द आदत में आ गये हैं, उनमें हिन्दी प्रारूपण अपनाने वाले अंतर्जालीय प्रयोक्ताओं का हृदय विदीर्ण करने के लिये ऐसे परिवर्तन नहीं करना चाहिये जो अनावश्यक हों। हमारा मानना है कि फेसबुक पर किये गये ऐसे परिवर्तन एकदम अनावश्यक हैं।

            पहली बात तो हम यह बता दें कि हमने आज तक अपने संपर्क में आये जितने भी युवाओं को फेसबुक पर कार्य करते देखा है वह अंग्रेजी प्रारूप का उपयोग करते हैं।  वह सभी हिंग्लिश वाले हैं। उनमें से कोई भी हिन्दी प्रारूप का उपयोग करना चाहेगा यह हमें लगता नहीं है।  हम जैसे अंग्रेजी से निरक्षर लोग ही फेसबुक का हिन्दी प्रारूप अपनाये हुऐ हैं। देवनागरी हिन्दी में यह सोचते हुए भी लिखना जारी रखे हुए हैं कि इससे व्यापक आधार पर अभिव्यक्ति का आधार नहीं मिलता।  हिंग्लिश वाले हमसे पढ़ेंगे या हम उनको पढ़ायेंगे यह भ्रम हमें नहीं है। हिन्दी दिवस पर हिन्दी प्रयोकताओं को सामान्य समझने वाले अंग्रेजी प्रेमी भाषाई व्यवसायिक विद्वानों के कथित महान विचार सुनने के पश्चात् तो हमें यह भी लगने लगा है कि हिन्दी में हिंग्लिश मिलाने पर प्रतिकूल लिखना भी व्यर्थ है।

            यह पता नहीं है कि फेसबुक पर इस तरह का  परिवर्तन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विद्वान भारतीय सलाहकारों की राय पर हुआ या फिर भारत में स्थित किन्हीं कार्यकर्ताओं या उनके समूह ने ऐसा कर अपनी निरंतर सक्रियता का प्रमाण देकर प्रबंधकों को प्रसन्न करने का प्रयास किया यह कहना कठिन है।  कम से कम हिन्दी भाषियों को प्रयोक्ता की तरह अपने रचना उत्पादों के लिये बाज़ार बनाने वालों को अब हिंग्लिश तथा हिन्दी भाषियों को अलग अलग दृष्टिकोण से देखने का विचार कर ही लेना चाहिये।  उन्हें अब अंग्रेजी रोमन लिपित अंतर्जालीय प्रारूपों में हिन्दी से लोकप्रिय या प्रचलित शब्द रोमन लिपि में लिखना चाहिये।  हिन्दी प्रारूपण का उपयोग केवल हम जैसे अंग्रेजी से अपरिचित लोग ही करते हैं।  उनको ऐसे होम या कंफर्म शब्द अटकते हुए पढ़ने पढ़ते हैं।  स्वर के साथ ही सोच भी तोतली हो जाती है। हिन्दी प्रारूपण एक बार बनाकर उससे मुंह ही फेर लें तो अच्छा है क्योंकि हम जैसे प्रयोक्ता उसी से खुश रहते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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