Category Archives: अध्यात्म

भगवान श्रीराम और कृष्ण ने जन्म से नहीं कर्म से भगवत्स्वरूप प्राप्त किया-हिन्दी लेख (bhagwan shir ram and shri krishna-hindi article)


अगर रावण ने भगवान राम की भार्या श्रीसीता का अपहरण न किया होता तो क्या दोनों के बीच युद्ध होता? कुछ लोग इस बात की ना हामी भरें पर जिन्होंने बाल्मीकि रामायण को पढ़ा है वह इस बात को मानते हैं कि राम रावण का युद्ध तो उसी दिन तय हो गया था जब ऋषि विश्वमित्र की यज्ञ की रक्षा के लिये भगवान श्री राम ने मारीचि और सुबाहु से युद्ध किया। सुबाहु इसमें मारा गया और मारीचि तीर खाकर उड़ता हुआ दूर जाकर गिरा था और बाद के मृग का वेश बनाकर उसने रावण की सीता हरण प्रसंग में सहायता की थी।
भारतीय दर्शन के पात्रों पर लिखने वाले एक उपन्यासकार कैकयी को चतुर राजनेता और भद्र महिला बताया है। शायद यह बात सच भी हो क्योंकि मारीचि और सुबाहु से युद्ध के बाद शायद कैकयी ने यह अनुभव किया था कि अब रावण कभी भी अयोध्या पर हमला कर सकता है। दूसरा रावण उस समय एक आतंक था और कैकयी ने अनुभव किया श्रीराम ही उसका वध करें इसलिये उसे उनको बनवास भेजने की योजना बनाई। ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि मंथरा की मति देवताओं ने ही भ्रमित करवाई थी क्योंकि श्रीराम उस समय के महान धनुर्धर थे और रावण को ही मार सकते थे। ऐसे में श्रीराम का वहां रहना ठीक नहीं है यह सोचकर ही कैकयी ने उनको बनवाय दिया-ऐसा उपन्यासकार का मानना है। दूसरा यह भी कि रावण के हमले से अयोध्या की रक्षा करने के प्रयास में पराक्रमी श्री राम का कौशल प्रभावित हो सकता यह संभावना भी थी। फिर जब उनके हाथ से रावण का वध संभव है कि तो क्यों न उनको वही भेज दिया जाये। संभवत कैकयी को यह अनुमान नहीं रहा होगा कि श्रीसीता का वह अपहरण करेगा मगर उस समय की राजनीिितक हालत ऐसे थे कि रणनीतिकार रावण के पतन के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार थे। वैसे भी रावण ने श्रीराम को अपने यहां लाकर उनको मारने की योजना के तहत ही सीता जी का अपहरण किया था।
वन प्रवास के दौरान जब श्रीराम अगस्त्य ऋषि के यहां गये तो वहां इं्रद पहले से ही विराजमान थे और उनको आता देखकर तुरंत चले गयंे। दरअसल वह राम रावण के संभावित युद्ध के बारे में बातीचत करने आये थे। ऋषि अगस्तय ने वहां श्रीराम को अलौकिक हथियार दिये जो बाद में रावण के युद्ध के समय काम आये। कहा जाता है कि वानरों की उत्पति भी भगवान श्री राम की सहायतार्थ देवताओं की कृपा से हुई थी। इस तरह राम के विवाह से लेकर रावण वध तक अदृश्य राजनीतिक श्ािक्तयां भगवान श्रीराम का संचालन करती रहीं। वह सब जानते थे पर अपना धर्म समझकर आगे बढ़ते रहे।
आज जब हम देश के राजनीतिक स्थिति को देखते हैं तो केवल दृश्यव्य चरित्रों को देखते हैं और अदृश्यव्य ताकतों पर नज़र नहीं जाती। ऐसे में हमारे आराध्य भगवान श्री राम और श्रीकृष्ण के जीवन को व्यापक ढंग से देखने वाले इस बात को समझ पाते हैं कि किस तरह रामायण और श्रीगीता के अध्यात्म पक्ष को अनदेखा किया जाता है जो कि हमारे धर्म का सबसे मज़बूत पक्ष है।
हम थोड़ा श्रीकृष्ण जी के चरित्र का भी अवलोकन करें। मथुरा के कारावास में जन्म और वृंदावन में पलने वाले श्रीकृष्ण जी के जीवन का सवौच्च आकर्षक रूप महाभारत में दिखाई देता है जहां उन्होंने कुशल सारथी की तरह अपने मित्र अर्जुन के साथ ही उनके रथ का भी संचालन किया। भगवान श्रीराम की तरह स्वयं उन्होंने युद्ध नहीं किया बल्कि सारथि बनकर पूरे युद्ध को निर्णायक स्थिति में फंसाया। हम महाभारत का अध्ययन करें तो इस बात का पता लगता है कि अनेक तत्कालीन बुद्धिमान लोगों को यह लगने लगा था कि अंततः कौरवों तथा पांडवों में कभी न कभी युद्ध जरूर होगा। भगवान श्रीकृष्ण इस बात को जानते थे इसलिये कभी दोनों के बीच वैमनस्य कम करने का प्रयास न कर पांडवों की सहायता की । दरअसल कुछ लोग मानते हैं कि महाभारत युद्ध की की नींव कौरवों और पांडवों में जन्म के कारण पड़ी है पर यह सच नहीं है। महाभारत की नींव तो द्रोपदी के विवाह के समय ही पड़ गयी थी जब अपने स्वयंवर में द्रोपदी ने सूतपुत्र कर्ण का वरण करने से इंकार किया था फिर विवाह बाद कुंती के वचन की खातिर उसे पांच भाईयों की पत्नी बनना पड़ा। द्रोपदी श्रीकृष्ण की भक्त थी और वे शायद इसे कभी स्वीकार नहीं कर पाये कि एक क्षत्राणी मां है तो उसका वचन धर्म की प्रतीक बन गया और दूसरी पत्नी है तो उसे वस्तु मानकर उस पर वह वचन धर्म की तरह थोपा गया। मां के रूप में कुंती पूज्यनीय है तो क्या द्रोपदी पत्नी के रूप में तिरस्काणीय है? जब भगवान श्रीकृष्ण युद्ध से पहले बातचीत करने दुर्योधन के महल में जा रहे थे तब द्रोपदी ने उनसे यही आग्रह किया कि किसी भी तरह यह युद्ध होना चाहिए।
श्रीकृष्ण उस समय मुस्कराये थे। अधर्म और धर्म के बीच की लकीर का वह अंतर जानते थे और वह धर्म की स्थापना के लिये अवतरित हुए थे। उनके लिये पांडवों और कौरव दोनों ही निर्मित मात्र थे जिनके बीच यह युद्ध अनिवार्य था। वह न कौरवों के शत्रु थे न पांडवों के मित्र! वह केवल धर्म के मित्र थे और भक्तों के आश्रय दाता थे। अपनी भक्त द्रोपदी के अपमान का बदला लेने में उनके धर्म स्थापना का मूल छिपा हुआ था। जिसे उन्होंने श्रीमद्भागवत गीता का संदेश स्थापित कर प्राप्त किया।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण जी का चरित्र जनमानस में हमेशा ही प्रभावी रहा है शायद इसी कारण ही संवेदनाओं के आधार पर काम करने वाले उनके नाम की आड़ अवश्य लेते हैं। ऐसा करते हुए वह केवल आस्था की बातें करते हैं पर ज्ञान पक्ष को भुला देते है-सच तो यह है कि ऐसा वह जानबुझकर करते हैं क्योंकि ज्ञानी आदमी को बहलाया नहीं जा सकता। उसके ज्ञान चक्षु हमेशा खुले रहते हैं और वह सभी में परमात्मा का स्वरूप देखता है पर संवदेनशीलता का दोहन करने वाले सीमित जगहों पर आस्था का स्वरूप स्थापित करते हैं। पहले तो पेशेवर संतों की बात करें जो भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की बाललीलाओं के आसपास ही अपनी बात रखते हें। इससे महिलाओं का कोमल मन बहुत प्रसन्न हो जाता है और वह अपने बाल बच्चों में भी ऐसे ही स्वरूप की कामना करती हैं तो पुरुष भी तन्मय हो जाते हैं। धनुर्धर । श्री राम और सारथी श्रीकृष्ण के जन्म तथा बाललीलाओं में तल्लीन रहने वालों को उनके संघर्ष तथा उपलब्धियों में रुचि अधिक नहीं दिखती।
अब तो भक्तों का ध्यान लीलाओं से अधिक जन्म स्थानों पर केंद्रित किया जा रहा है। अयोध्या में भगवान राम की जन्मभूमि और मथुरा में श्रीकृष्ण का जन्मस्थान विवादों के घेरे में है। बरसों तक नहीं सुना था पर अब बरसों से सुन भी रहे हैं। सच क्या है पता नहीं? कभी कभी तो लगता है देश की धार्मिक आस्थाओं के दोहन के लिये यह सब हो रहा है तो कभी लगता है कि वाकई कोई बात होगी। ऐसे में हम जैसे आम भक्त और लेखक अपनी कोई भूमिका नहीं देख पाते खासतौर से जब जब श्रीमद्भागवत गीता की तरफ ध्यान जाता है। श्रीगीता में जन्म से अधिक निष्काम कर्म को मान्यता दी गयी है। भगवान श्रीराम ने रावण के युद्ध के समय केवल उसे मारने का ही लक्ष्य किया था तब वह इतना एकाग्र थे कि वहां पर अपने प्रिय भ्राता भरत को भी मदद के लिये याद नहीं किया। लक्ष्मण ने भी अपनी तरह आक्रामक रहने वाले शत्रुध्न को को एक आवाज तक नहीं दीं। इससे भी यह लगता है कि दोनों भाई यह समझ गये थे कि अयोध्या पर संकट न आये इसलिये ही रावण वध के प्रसंग में उनको लिप्त होना ही है। उसी तरह भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता संदेश मेें अपने श्रीमुख से किसी का नाम तक नहीं लिया। उस श्री राधा का भी नहीं जिसके साथ उनका नाम प्रेम प्रतीक में रूप में लिया जाता है। उस सुदामा का भी स्मरण नहीं किया जिनके साथ उनकी मित्रता सर्वोपरि मानी जाती है। पिता वासुदेव और देवकी के लिये भी एक शब्द नहीं कहा। स्पष्टतः वह इस संसार के रहस्य को उद्घाटित करते रहे जो बनता बिगड़ता रहता है और जहां जन्म स्थान तथा दैहिक संबंध परिवर्तित होते रहते हैं। अपने जन्मस्थानों या शहर से भी कोई सद्भाव भी दोनों ने नहीं दिखाया। सच तो यह है कि भगवान श्रीराम के लिये पूरा संसार ही अयोध्या तो श्रीकृष्ण के लिये यह द्वारका रहा। इस चर्चा को मतलब किसी विवाद पर निष्कर्ष देना नहीं है बल्कि यह एक सत्संग चर्चा है। लोग विवादों को उठायें उनको कोई रोक नहीं सकता। वह लोग अज्ञानी हैं या आस्था से उनका कोई लेना देना नहीं है यह कहना भी अहंकार की श्रेणी में आता है। अलबत्ता एक अध्यात्मिक लेखक के रूप में अपने जैसे लोगों के लिये कुछ लिखने का मन हुआ तो लिख दिया। आखिर यह कैसे संभव है कि जब सारे देश में चर्चा चल रही है उस पर लिखा न जाये। एक बात याद रखने वाली है कि भगवान श्रीराम और कृष्ण अपने जन्म की वजह से नहीं कर्म की वज़ह से भगवत्स्वरूप प्राप्त कर सके यह नहीं भूलना चाहिए।
जय श्रीराम जय श्रीकृष्ण

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सहज तथा असहज योग-हिन्दी लेख(sahaj yog aur asahaj yog-hindi lekh)


धार्मिक विषयों पर अच्छी या बुरी चर्चायें अब इस लेखक पर प्रभाव नहीं डालती। इसका कारण यह है कि हमें लगता है कि श्रीगीता से पृथक होकर कोई भी ज्ञान चर्चा पूर्णता की तरफ जा ही नहीं सकती। दूसरा यह कि लोग श्रीमद्भागवतगीता को पढ़े बिना ही समझते हैं-मतलब यह है कि किसी के मुखार बिंद से सुन लिया और वही सत्य मान लिया। जबकि वास्तविकता यह है जैसे जैसे यह लेखक श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन कर रहा है उससे लगता है कि केवल भाषा के शब्द तथा व्याकरण का ही ज्ञान होना पर्याप्त नहीं बल्कि अपने अंदर यह संकल्प होना भी आवश्यक है कि यह पुस्तक एकमेव ज्ञान विज्ञान की पुस्तक है जिससे भक्ति और जिज्ञासा से पढ़कर ही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
अनेक लोगों ने श्रीगीता का अध्ययन इस उददृेश्य से किया है कि उसे पढ़कर अपना ज्ञान दूसरे लोगों को बेच सकें और समाज भी उन्हें एक संत मान लेता है जबकि सच यह है कि वह स्वयं ही नहीं जानते कि उस स्वर्णिक ज्ञान का मोल क्या है?
कहते हैं कि कोई भी आदमी अपने परिवार के किसी भी सदस्य को श्रीगीता पढ़ने का उपदेश नहीं   देता कि कहीं वह वैरागी न हो जाये। सच यही है कि आदमी उससे वैरागी होता है पर कर्म से पलायन नहीं करता। अलबत्ता जैसे जैसे ज्ञान चक्षु खुलते जाते हैं वह अकेला होता चला जाता है। इसलिये कहीं बड़ी सभा या बैठक में वह दूसरों की आदर्शवादी बातों से प्रभावित नहीं होता क्योंकि बहुत जल्दी उसे वहां पाखंड की अनुभूति हो जाती है।
इस समय देश में धर्म, जाति, वर्ण तथा अर्थ के आधार पर अनेक समूहों के बीच संघर्ष चल रहे हैं। उस पर बहसें केवल हास्यास्पद और समय बिताने का मार्ग ही लगती हैं यही कारण है कि संगठित प्रचार माध्यम उसे भुना रहे हैं। कभी कभी तो लगता है कि समाज के मानसिक तथा वैचारिक अंतद्वंद्व प्रचार माध्यमो में बिकने वाले विषय बन गये हैं।
एक मजे की बात यह है कि हिन्दू धर्म की रक्षा के नाम पर जितना नाटक इस देश में चलता रहा है उसके लिये लोगों का अज्ञान ही जिम्मेदार है। श्रीमद्भागवत गीता को लेकर एक बात आश्चर्य में डालती है कि वह कौन महान विभूतियां रही होंगी जिन्होंने महाभारत ग्रंथ से श्रीगीता को अलग कर प्रस्तुत करने का प्रयास किया। उनके इस प्रयास ने न केवल भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को एक महान स्त्रोत प्रदान किया वरन् उसे विश्व में एकमेव ज्ञान विज्ञान का ग्रंथ बना दिया। अगर यह महाभारत से पृथक नहीं किया जाता तो शायद इसकी मान्यता इतनी नहीं रह जाती।

भारतीय धर्म के आलोचकों की बात सुनकर अनेक बुद्धिजीवी उत्तेजित होकर अपनी आस्था पर प्रहार के विरुद्ध झंडा तो उठा लेते हैं पर श्रीगीता के ज्ञान के अभाव में कोई तर्क उनको नहीं सूझता। शायद वह नहीं जानते कि इस संसार में मनुष्य मन के-आदमी चलता है अपने मन की गति और चाल से ही है, यह सभी जानते हैं- चलने के दो ही मार्ग है। एक तो श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित सहज योज दूसरा है उससे पृथक असहज योग। आशय यह है कि योग तो हर इंसान करता ही है पर ज्ञान सहज योग तो अज्ञानी असहज योग में तत्पर होते हैं। जहां असंतोष, हिंसा, लालच, ईर्ष्या, लोभ तथा भेदभाव की प्रवृत्ति है वहां असहजता का भाव तनाव का अंधेरा फैलाता है और जहां संतोष, प्रेंम तथा समदर्शिता का भाव है वहां आनंद की रौशनी फैलती है। तय बात है कि इस संसार में अंधेरा पसंद लोगों की संख्या ज्यादा है जो उधार की रौशनी चाहते हैं जबकि ज्ञानी कम ही है जो अपने ज्ञान के प्रकाश में ही आनंद की अनुभूति करते हैं। दूसरी बात यह कि गुण ही गुणों को बरतते हैं यह वैज्ञानिक सूत्र है जिसके प्रतिकुल संसार की गतिविधियां तो हो ही नहीं सकती। रसायनों के अधिक प्रयोग से खान पान तथा रहन सहन में विषैले तत्वों का समावेश हो रहा है ऐसे में यह संभव नहीं है कि अमृत ज्ञान की चाहत सभी में हो। कहीं कहीं तो ऐसा भी होता है कि ज्ञान की बात करें तो पागल समझ लिये जाते हैं। शायद यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता का ज्ञान केवल अपने भक्तों में ही करने का उपदेश दिया है। इसलिये भारतीय धर्म के आलोचकों को निरुतर करने के लिये श्रीगीता के संदेश का उपयोग  करना भी कुछ विद्वानों को अच्छा नहीं लगता। बहरहाल यह अंतिम सत्य है कि विज्ञान तथा ज्ञान की एकमेव पुस्तक श्रीगीता का अध्ययन अपने आप में बहुत दिलचस्प तथा ज्ञान वर्द्धक है।
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‘सहज योग’ से दूर भागता है आधुनिक बाजार-हिन्दी लेख (modern bazar and sahajyog-hindi satire)


उन वरिष्ठ ब्लोगर महोदय ने अपनी टिप्पणी में उस ब्लाग का लिंक रखकर अपने सतर्क निगाहों का परिचय देकर अच्छा किया पर यह लेखक उस पाठ को पहले ही पढ़ चुका था और फिर आगे दो बार यह देखने के लिये भी जाना ही था कि उस पर टिप्पणियां कैसी हैं? हां, यहां अंतर्जाल पर कई बार पाठों पर विद्वतापूर्ण टिप्पणियां भी पढ़ने को मिल जाती हैं जिनका आगे उस विषय पर मार्गदर्शन प्राप्त होता है। वैसे यह पाठ लेखक नहीं पढ़ता तो भी यह सब लिखने वाला था जो लिख रहा है। वह यह कि आधुनिक बाजार मनुष्य में असहजता का भाव पैदा अधिक से अधिक कमाना चाहता है और उसके लिये उसने बकायदा ऐसा प्रचारतंत्र बना रखा है जो चिल्ला चिल्लाकर उसे वस्तुऐं खरीदने के लिये प्रेरित करता है, फिल्म देखने के लिये घर से निकालता है और क्रिकेट मैच में अपने महानायको के प्रत्यक्ष दर्शन करने के लिये दौड़ लगवाता है। इस बाजार का असली शत्रु है भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का वह ‘सहज योग’ का भाव-चारों वेदों के सारतत्व के साथ इसका श्रीमद्भागवत में बहुत सरलता से उल्लेख किया गया है-यह बात समझने की है और उसके लिये हर इंसान को अपने विवेक का उपयोग करना पड़ता है। केवल बुद्धि से काम नहंी चल पाता जो केवल शब्दों के अर्थ तक ही सीमित रहती है-उसका भाव समझने के लिये मनुष्य को अपने अंदर संकल्प और धैर्य धारण करना पड़ता है तभी उसके विवेक चक्षु खुलते हैं।
दरअसल भारतीय योग और अध्यात्म पर अनुकूल और प्रतिकूल लिखने वाले बहुत हैं पर उसे पढ़ता कौन कितना है यह समझ में नहीं आता। समर्थकों ने भी कुछ अच्छे विचार दिमाग में रख लिये हैं और वही उसे नारे बनाकर प्रस्तुत करते हैं। आलोचकों की स्थिति तो बदतर और दयनीय है जिनके पास पूरे भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से दो तीन श्लोक या दोहे हैं-जिनको समाज अब स्वयं ही अप्रसांगिक मानता है-जिनको नारे की तरह रटकर सुनाते हैं। समर्थक तो फिर भी प्रशंसा के पात्र हैं कि वह पढ़ते तो रहते हैं पर आलोचक पढ़ी पढ़ाई बातों की विवेचनाओं को ही अपना आधार बनाकर चलते हैं। जिन किताबों की चर्चा करते हैं उनको पढ़ना तो दूर वह देखना तक पसंद नहीं करते, पर विचार व्यक्त करने में नहीं चूकते।
उन वरिष्ठ ब्लोगर महोदय द्वारा सुझाये गये ब्लाग का पाठ यकीनन एक विद्वान द्वारा ही लिखा गया था। उनका अपना दृष्टिकोण हो सकता है मगर उसमें असहमति की भारी गुंजायश छोड़ी गयी। योग को रोग बताते हुए लिखे गये उस पाठ में महर्षि विवेकानंद पर भी प्रतिकूल लिखा गया। उस पाठ में योग के बारे में लिखी गयी बातों ने इस बात के लिये बाध्य किया कि पतंजलि येाग दर्शन की किताबों को पलट कर देखा जाये। कहीं भी रसायनों के मिश्रण से औषधि बनाने की बात सामने नहीं आयी। कैवल्यपाद-4 में एक श्लोक मिला
जन्मोषधिमन्त्रतपः समाधिजाः सिद्धयः।।9।।
इसका हिन्दी में भावार्थ है कि ‘जन्म, ओषधि मंत्र, तप, और समाधि, इस तरह पांच तरह की सिद्धियां होती हैं।
जब पतंजलि साहित्य खोलें तो कुछ न कुछ ऐसा मिल ही जाता है जो दिलचस्प होता ही है। दरअसल हमने आज एक पाठ अन्य भी पढ़ा था जिसमें कथित वैलंटाईन ऋषि और हमारे महर्षि मनु के बीच तुलनात्मक अध्ययन भारतीय जाति व्यवस्था पर आक्षेप किये गये। तय बात है कि मनु को जन्म पर आधारित व्यवस्था का निर्माता माना जाता है पर पतंजलि योग दर्शन में यह दिलचस्प श्लोक मिला जो कि इस बात का प्रमाण है कि हमारी जाति व्यवस्था का आधार कर्म और व्यवहार रहा है।
जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात्।
इसका हिन्दी भावार्थ यह है कि ‘एक जाति से दूसरी जाति में जाने का रूप प्रकृति पूर्ण होने से होता है। महर्षि विश्वामित्र ने तप से ही ब्रह्म्णत्व प्राप्त किया था। दरअसल ब्राह्म्णत्व का अर्थ है समाज का आपने ज्ञान से श्रेष्ठता प्रमाणित कर समाज मार्ग दर्शन करना और यह कार्य तो कोई भी कर सकता है।
इसका आशय यह है कि अगर कोई मनुष्य योग साधना, मंत्र और तप से चाहे तो अपनी प्रकृतियां पूर्ण कर उच्च और प्रतिष्ठित पद पर स्थापित हो सकता है और जन्म के आधार पर ही सभी कुछ होना जरूरी नहीं है। यह अलग बात है कि लोग जन्म और ओषधियों के सहारे भी श्रेष्ठता हासिल कुछ लोग प्राप्त कर लेते हैं। जन्म का सभी जानते है पर ओषधियों की बात आयी तो आपने देखा होगा कि अनेक खेल प्रतियोगिताओं में उनके सेवन से अनेक लोग स्वर्ण पदक प्राप्त करते हैं-यह अलग बात है कि इनमें कुछ प्रतिबंधित होती हैं कुछ नहीं।
याद रखिये हमारे देश में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिनका जन्म कथित उच्च जातियों में नहंी हुआ पर अपने कर्म के आधार पर उन्होंने ऐसी प्रतिष्ठा प्राप्त की पूरा समाज आज उनको याद करता है। असली बात यह है कि योग साधना एक प्राकृतिक क्रिया है। योगासनों की तुलना सुबह सैर करने या जिम जाने से करना अपने अज्ञान का प्रमाण है। जहां तक लाभ होने वाली बात है तो इस लेखक के इस पाठ का हर शब्द उसी योगसाधना के शिखर से प्रवाहित है। अगर इनका प्रभाव कम है तो उसके पीछे इस लेखक के संकल्प की कमी हो सकती है पर अगर वह अधिक प्रभावी है तो उसका पूरा श्रेय योगसाधना को जाना चाहिये। यह अलग बात है कि अगर आर्थिक रूप से ही लाभ को तोला जाना है तो यकीनन उसके लिये इस लेखक का अकुशल प्रबंधन जिम्मेदार है जो ब्लाग लिखने से एक पैसा नहीं मिलता पर जिस तरह भारतीय अध्यात्म का संदेश फैल रहा है वह योग साधना का ही परिणाम है। यह पाठ आत्म प्रचार के लिये नहीं लिखा बल्कि यह बताने के लिये लिखा है कि जब सात वर्ष पूर्व इस लेखक ने योग साधना प्रारंभ की थी तब उसके जीवन का यह दूसरा दौर था यानि कम से इस लेखक को तो योग साधना का लाभ मिला है-किसी को नहीं मिला इस बात का तो खंडन हो ही गया।
अब करें बाजार और उसके प्रचारतंत्र की बात! यह वही बात है कि अगर वरिष्ठ ब्लोगर महोदय ने वह लिंक नहीं देते तो भी यह लिखा ही जाना था। विदेशियों को क्या देश के ही बड़े बड़े धनाढ्यों को यह नहीं सुहाता।
पहले यह लेखक भी संगठित प्रचार माध्यमों और अंतर्जाल लेखकों के प्रभाव में आकर बाबाओं की अर्जित संपत्तियों पर अपनी नाखुशी लिखता था पर अब जैसे जैसे नवधनाढ्य लोगों की पोल सामने आ रही है-इसका श्रेय भी आधुनिक प्रचारतंत्र को ही है जो बाजार का रक्षक है पर समय पास करने के लिये उसे ऐसी पोल लानी पड़ती है-वैसे लगता है कि बाबा भला क्या बुरा कर रहे हैं? उनका कमाया पैसा रहता तो समाज के बीच में ही है। वह कोई ठगी या भ्रष्टाचार तो नहीं करते! युवक युवतियों को आधुनिकता के नाम अनैतिक संबंधों के लिये प्रेरित तो नहीं करते। केवल शादी के नाम पर अंतर्जातीय विवाहों पर खुश होने वाले विद्वान इस बात पर चिंतन नहीं करते कि उसके बाद घर भी चलाना पड़ता है जिसकी समझ युवक युवतियों को होना चाहिये। साथ ही यह भी परिवार चलाने के लिये समाज की जरूरत होती है इसे भुलाना सच्चाई से मुंह फेरना है। भारतीय संत इस बात को समझते हैं इसलिये ही निरंतर आध्यात्मिक ज्योति जगाते रहते हैं।
पिछले अनेक अवसरों पर आसाराम बापू, बाबा रामदेव तथा सुधांशु महाराज पर अनेक आक्षेप किये जाते रहे। यह लेखक इन तीनों में किसी का शिष्य नहीं है पर उसे हैरानी हुई जब आसाराम बापू पर तो तंत्र मंत्र का आरोप लगा दिया-इतनी समझ उन लोगों में नहीं है कि आसाराम बापू उस समाज में पैदा हुए जो अध्यात्म के प्रति समर्पित है पर तंत्रमंत्र की बात से कोसों दूर रहता है। यह सही है कि अनेक लोग धर्म के नाम पर ढोंग कर रहे हैं पर इतनी ऊंचाई बिना तप, अध्ययन और ज्ञान के नहीं मिलती।
योग साधना का अभ्यास जितना करेंगे उतनी ही सिद्धियां आयेंगी और उससे आप स्वयं क्या आपके आसपास के लोगों पर भी उसका अच्छा प्रभाव पड़ेगा-मुख्य बात यह है कि आपकी नीयत कैसी है, यह आपको देखना होगा।
दरअसल बाजार और उसका प्रचारतंत्र परेशान है। वह वैलेंटाईन को बेचना चाहता है क्योंकि नवाधनाढ्यों के पास नयी चीजें खरीदने का शौक उसी से ही बढ़ता है और आधुनिक बाजार उसका निर्माता है। महाशिवरात्रि पर कोई ऐसी चीज नहीं बिकती जिसका विज्ञापन मिलता हो। यही हालत क्रिसमस और नववर्ष पर भी होती है क्योंकि गुड़ी पड़वा और मकर सक्रांति तो परंपरागत बाजार का व्यापार है जिसे विज्ञापन करने की आवश्यकता नहीं होती।
दरअसल बाबा रामदेव, आसाराम बापू या सुधांशु महाराज के कार्यक्रमों में एक बहुत बड़ा जनसमुदाय होता है और आधुनिक बाजार के स्वामी और प्रचार प्रबंधक यह देखकर परेशान हो जाते हैं कि उनके बिना यह सब कैसे हो रहा है? दूसरा वहां से अपने लिये ग्राहक ढूंढना चाहते हैं। उनका गुस्सा तब अधिक बढ़ जाता है जब वहां युवक युवतियों का भी समूह देखते हैं क्योंकि उनको लगता है कि यह तो उनको दोहन स्त्रोत हैं, भला वहां क्यों जा रहे हैं।
अनेक संकीर्ण मानसिकता के बुद्धिजीवी उनके प्रवचन कार्यक्रमों में दलित, पिछडे, और अगड़े का भेदभाव छोड़कर जाते हुए लोगों को सहन नहीं कर पाते। उनको लगता है कि इससे तो उनका प्रभाव खत्म हो रहा है। उससे ज्यादा गुस्सा उनको तब आता है जब गैर हिन्दू भी उनसे जुड़ते हैं। उनकी चिंतायें स्वाभाविक हैं और उनको रोकने का हमारा लक्ष्य भी नहीं है। ऋषि प्रसाद, अखंड ज्योति और कल्याण पत्रिकाओं को बिकना अगर बंद हो जाये तो हिन्दी का आधुनिक प्रकाशन अधिक अमीर हो जायेगा। जब देश की हालतें देखते हैं तो अन्य बुद्धिजीवियों की तरह हम भी चिंतित होते हैं पर जब इन संतों और उनके भक्तों की उपस्थिति देखते हैं तो दिल को संतोष भी होता है पर दूसरे असंतुष्ट होकर उनको भी निशाना बनाते हैं। शेष फिर कभी।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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बुरे आदमी से संगत सांप पालने से अधिक दुःखदायी-हिन्दी संदेश


संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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नीति विशारद चाणक्य महाराज का कहना है कि
क्षान्तिश्चत्कवचेन किं किमनिरभिः क्रोधीऽस्ति चेद्दिहिनां ज्ञातिश्चयेदनलेन किं यदि सहृदद्दिव्यौषधं किं फलम्।
किं सर्पैयीदे दुर्जनाः किमु धनैर्विद्याऽनवद्या चदि व्रीडा चेत्किमुभूषणै सुकविता यद्यपि राज्येन किम्।।
हिंदी में भावार्थ-
यदि क्षमा हो तो किसी कवच की आवश्यकता नहीं है। यदि मन में क्रोध है तो फिर किसी शत्रु की क्या आवश्यकता? यदि मंत्र है तो औषधियो की आवश्यकता नहीं है। यदि अपने दुष्ट की संगत कर ली तो सांप की क्या कर लेगा? विद्या है तो धन की मदद की आवश्यकता नहीं। यदि लज्जा है तो अन्य आभूषण की आवश्यकता नहीं है।
वर्तमान में संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- ध्यान दें तो भर्तृहरि महाराज ने पूरा जीवन सहजता से व्यतीत करने वाला दर्शन प्रस्तुत किया है। अगर आदमी विनम्र हो और दूसरे के अपराधों को क्षमा करे तो उसे कहीं से खतरा नहीं रहता। जैसा कि हम देख रहे हैं कि आजकल अस्त्र शस्त्र रखने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। इसका कारण यह है कि लोगों का विश्वास अपने ऊपर से उठ गया है। अपने छोटे छोटे विवादों के बड़े हमले में परिवर्तित होने का भय उनको रहता है इसलिये ही लोग हथियार रखते हैं। उनको यह भी विश्वास है कि वह किसी को क्षमा नहीं करते इसलिये उनके क्रोध या हिंसा का शिकार कभी भी उन पर हमला कर सकता है। जिन लोगों में क्षमा का भाव है वह किसी प्रकार की आशंका से रहित होकर जीवन व्यतीत करते हैं। क्षमा का भाव होता है तो क्रोध का भाव स्वतः ही दूर रहता है। ऐसे में अन्य कोई शत्रु नहीं होता जिससे आशंकित होकर हम अपनी सुरक्षा करें।

उसी तरह अपनी संगत का भी ध्यान रखना चाहिये। जिनकी सामाजिक छबि खराब है उनसे दूर रहें इसी में अपना हित समझें। वैसे आजकल तो हो यह रहा है कि लोग दादा और गुंडा टाईप के लोगों से मित्रता करने में अपनी इज्जत समझते हैं मगर सच तो यह है कि ऐसे लोग उसी व्यक्ति को तकलीफ देते हैं जो उनको जानता है। इसके अलावा अपने दोस्तों से रुतवे के बदल अच्छी खासी कीमत भी वसूल करते हैं भले ही उनका कोई काम नहीं करते हों पर भविष्य में सहयोग का विश्वास दिलाते हैं। देखा यह गया है कि दुष्ट लोगों की संगत हमेशा ही दुःखदायी होती है।
अपनी देह को स्वस्थ रखने के लिये प्रतिदिन योग साधना के साथ अगर मंत्र जाप करें तो फिर आप औषधियों के नाम जानने का भी प्रयास न करें। राह चलते हुए फाईव स्टार टाईप के अस्पताल देखकर भी आपको यह ख्याल नहीं आयेगा कि कभी आपको वहां आना है।
जहां तक हो सके अच्छी बातों का अध्ययन और श्रवण करें ताकि समय पड़ने पर आप अपनी रक्षा कर सकें। याद रखिये जीवन में रक्षा के लिये ज्ञान सेनापति का काम करता है। अगर आपके पास धन अल्प मात्रा में है और ज्ञान अधिक मात्रा में तो निश्चिंत रहिये। ज्ञान की शक्ति के सहारे दूसरों की चालाकी, धूर्तता तथा लालच देकर फंसाने की योजनाओं से बचा जा सकता है। अगर ज्ञान न हो तो दूसरे लोग हम पर शासन करने लगते हैं।
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इंटरनेट और कंप्यूटर की व्याधियों से बचने का उपाय योग साधना-आलेख (internet,computer and yog sadhna-hindi article)


कुछ समाचारों के अनुसार इंटरनेट पर अधिक काम करना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। इंटरनेट का संबंध कंप्यूटर से ही है जिसके उपयोग से वैसे भी अनेक बीमारियां पैदा होती हैं। एक खबर के अनुसार कंप्यूटर पर काम करने वालों में विटामिन डी की कमी हो जाती है इसलिये लोगों को धूप का सेवन अवश्य करना चाहिये। अगर इन खबरों का विश्लेषण करें तो उनसे यही निष्कर्ष निकलता है कि कंप्यूटर और इंटरनेट के अधिक प्रयोग से ही शारीरिक और मानसिक विकार उत्पन्न होते हैं। इसके अलावा इनके उपयोग के समय अपने आपको अनावश्यक रूप से थकाने के साथ ही अपनी शारीरिक तथामानसिक स्थिति पर पर्याप्त ध्यान न देना बहुत तकलीफदेह यह होता है। सच बात तो यह है कि इंटरनेट तथा कंप्यूटर पर काम करने वालों के पास उससे होने वाली शारीरिक और मानसिक व्याधियों से बचने का एकमात्र उपाय योग साधना के अलावा अन्य कोई उपाय नज़र नहीं आता।
दरअसल कंप्यूटर के साथ अन्य प्रकार की शारीरिक तथा मानसिक सावधानियां रखने के नुस्खे पहले बहुत पढ़ने को मिलते थे पर आजकल कहीं दिखाई नहीं देते । कुछ हमारी स्मृति में हैें, जो इस प्रकार हैं-
कंप्यूटर पर बीस मिनट काम करने के बाद विश्राम लें। पानी अवश्य पीते रहें। खाने में नियमित रूप से आहार लेते रहें। पानी पीते हुए मुंह में भरकर आंखों पर पानी के छींटे अवश्य मारें। अगर कंप्यूटर कक्ष से बाहर नहीं आ सकें तो हर बीस मिनट बार अपनी कुर्सी पर ही दो मिनट आंख बंद कर बैठ जायें-इसे आप ध्यान भी कह सकते हैं। काम खत्म करने पर बाहर आकर आकाश की तरफ जरूर अपनी आंखें केंद्रित करें ताकि संकीर्ण दायरे में काम कर रही आंखें व्यापक दृश्य देख सकें।
दरअसल हम भारतीयों में अधिकतर नयी आधुनिक वस्तुओं के उपयोग की भावना इतनी प्रबल रहती है कि हम अपने शरीर की सावधनी रखना फालतु का विषय समझते हैं। जहां तक बीमारियों का सवाल है तो वह शराब, सिगरेट और मांस के सेवन से भी पैदा होती हैं इसलिये इंटरनेटर और कंप्यूटर की बीमारियों से इतना भय खाने की आवश्यकता नहीं है मगर पर्याप्त सावधानी जरूर रखना चाहिए।
इंटरनेट और कंप्यूटर पर काम करने वाले हमारे देश में दो तरह लोग हैं। एक तो वह है जो शौकिया इससे जुड़े हैं और दूसरे जिनको इससे व्यवसायिक बाध्यता ने पकड़ा है। जो शौकिया है उनके लिये तो यह संभव है कि वह सावधानी रखते हुए काम करें-हालांकि उनके मनोरंजन की प्यास इतनी गहरी होती है कि वह इसे समझेंगे नहीं-पर जिनको नौकरी या व्यवसाय के कारण कंप्यूटर या इंटरनेट चलाना है उनके स्थिति बहुत दयनीय होती है। दरअसल इंटरनेट और कंप्यूटर पर काम करते हुए आदमी की आंखें और दिमाग बुरी तरह थक जाती हैं। यह तकनीकी काम है पर इसमें काम करने वालों के साथ एक आम कर्मचारी की तरह व्यवहार किया जाता है। जहां कंप्यूटर या इंटरनेट पर काम करते एक लक्ष्य दिया जाता है वहां काम करने वालों के लिये यह भारी तनाव का कारण बनता है। दरअसल हमारे देश में जिनको कलम से अपने कर्मचारियेां को नियंत्रित करने की ताकत मिली है वह स्वयं कंप्यूटर पर काम करना अपने लिये वैसे ही हेय समझते हैं जैसे लिपिकीय कार्य को। वह जमीन गड़ढा खोदने वाले मजदूरो की तरह अपने आपरेटरों से व्यवहार करते हैं। शारीरिक श्रम करने वाले की बुद्धि सदैव सक्रिय रहती है इसलिये वह अपने साथ होने वाले अनाचार या बेईमानी का मुकाबला कर सकता है। हालांकि यह एक संभावना ही है कि उसमें साहस आ सकता है पर कंप्यूटर पर काम करने वाले के लिये दिमागी थकावट इतनी गहरी होती है कि उसकी प्रतिरोधक क्षमता काम के तत्काल बाद समाप्त ही हो जाती है। इसलिये जो लोग शौकिया कंप्यूटर और इंटरनेट से जुड़े हैं वह अपने घर या व्यवसाय में परेशानी होने पर इससे एकदम दूर हो जायें। जिनका यह व्यवसाय है वह भी अपने साइबर कैफे बंद कर घर बैठे या किसी निजी संस्थान में कार्यरत हैं तो पहले अवकाश लें और फिर तभी लौटें जब स्थिति सामान्य हो या उसका आश्वासन मिले। जब आपको लगता हो कि अब आपको दिमागी रूप से संघर्ष करना है तो तुरंत कीबोर्ड से हट जायें। घर, व्यवसाय या संस्थान में अपने विरोधी तत्वों के साथ जब तक अमन का यकीन न हो तब कंप्यूटर से दूर ही रहें ताकि आपके अंदर स्वाभाविक मस्तिष्कीय ऊर्जा बनी रहे।
कंप्यूटर पर लगातार माउस से काम करना भी अधिक थकाने वाला है। जिन लोगों को लेखन कार्य करना है अगर वह पहले कहीं कागज पर अपनी रचना लिखे और फिर इसे टाईप करें। इससे कंप्यूटर से भी दूरी बनी रहेगी दूसरे टाईप करते हुए आंखें कंप्यूटर पर अधिक देर नहंी रहेंगी। जो लेाग सीधे टाईप करते हैं वह आंखें बंद कर अपने दिमाग में विचार करते हुए टंकित करें।
वैसे गूगल के फायरफाक्स में बिना माउस के कंप्यूटर चलाया जा चलाया जा सकता है। जहां तक हो सके माउस का उपयोग कम से कम करें। वैसे भी बेहतर कंप्यूटर आपरेटर वही माना जाता है जो माउस का उपयोग कम से कम करता है।
कुछ लोगों का कहना है कि कंप्यूटर पर काम करने से आदमी का पेट बाहर निकल आता है क्योंकि उसमें से कुछ ऐसी किरणें निकलती हैं जिससे आपरेटर की चर्बी बढती है। इस पर थोड़ा कम यकीन आता है। दरअसल आदमी जब कंप्यूटर पर काम करता है तो वह घूमना फिरना कम कर देता है जिसकी वजह से उसकी चर्बी बढ़ने लगती है। अगर सुबह कोई नियमित रूप से घूमें तो उसकी चर्बी नही बढ़ेगी। यह अनुभव किया गया है कि कुछ लोगों को पेट कंप्यूटर पर काम करते हुए बढ़ गया पर अनेक लोग ऐसे हैं जो निरंतर काम करते हुए पतले बने हुए हैं।
आखिरी बात यह है कि कंप्यूटर पर काम करने वाले योगसाधना जरूर करें। प्राणायाम करते हुए उन्हेंइस बात की अनुभूति अवश्य होगी कि हमारे दिमाग की तरफ एक ठंडी हवा का प्रवाह हो रहा हैं। सुबह प्राणायाम करने से पूर्व तो कदापि कंप्यूटर पर न आयें। रात को कंप्यूटर पर अधिक देर काम करना अपनी देह के साथ खिलवाड़ करना ही है। सुबह जल्दी उठकर पहले जरूर पानी जमकर पियें और उसके बाद अनुलोम विलोम प्राणायाम निरंतर करंें। इससे पांव से लेकर सिर तक वायु और जल प्रवाहित होगा उससे अनेक प्रकार के विकार बाहर निकल आयेंगे। जब आप करेंगे तो आपको यह लगने लगेगा कि आपने एक दिन पूर्व जो हानि उठाई थी उसकी भरपाई हो गयी। यह नवीनता का अनुभव प्रतिदिन करेंगे। वैसे कंप्यूटर पर काम करते समय बीच बीच में आंखें बंद कर ध्यान अपनी भृकुटि पर केद्रित करें तो अनुभव होगा कि शरीर में राहत मिल रही है। अपने साथ काम करने वालों को यह बता दें कि यह आप अपने स्वास्थ्य के लिये कर रहे हैं वरना लोग हंसेंगे या सोचेंगे कि आप सो रहे हैं।
किसी की परवाह न करें क्योंकि सबसे बड़ी बात तो यह है कि जान है तो जहान हैं। भले ही इस लेख की बातें कुछ लोगों को हास्यप्रद लगें पर जब योगासन, ध्यान, प्राणायाम तथा मंत्रोच्चार-गायत्री मंत्र तथा शांति पाठ के सा ओम का जाप- करेंगे और प्रतिदिन नवीनता के बोध के साथ इंटरनेट या कंप्यूटर से खेलें्रगे तक इसकी गंभीरता का अनुभव होगा।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

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महान बुझे चिराग-व्यंग्य चिंतन (mahan bujhe chira-hindi vyangya chitan)


महान होने का मतलब क्या होता है? कम से कम हम इसका आशय तो उसी व्यक्ति से लेते हैं जिसने अपनी मेहनत, लगन तथा चिंतन के आधार पर कोई ऐसी उपलब्धि हासिल की हो जिससे समाज का भला हुआ हो या उसे फिर गौरवान्वित किया हो। अगर किसी ने नित्य प्रतिदिन अपना स्वाभावाविक कर्तव्य पूरा करते हुए केवल अपने लिये ही उपलब्धि प्राप्त की हो तो उसे महान कतई नहीं माना जा सकता। समाज हमेशा ही अपनी रक्षा, विकास तथा निर्देशन के लिये महान आत्माओं का धारण करने वाली देहों को देखकर अपना मन प्रसन्न करना चाहता है।
यही से शुरु होता है वह खेल जिसे बाजार अपने ढंग से खेलता है। अपने देश में महान लोगों की इज्जत होती है पर महान होना कोई आसान काम नहीं है। महान बनते बनते लोगों ने अपने घर और व्यवसाय तक त्याग डाले। उनकी तपस्या ने समाज को जो दिया वह एक अक्षुण्ण संपदा बन गया। मगर हमेशा ऐसा नहीं होता। कहते हैं न कि हजारों साल धरती जब तरसती है तब कहीं जाकर उसकी झोली में एक दो दिलदार आकर गिरता है।
मगर बाजार क्या करे? उसे तो रोज कोई न कोई महान आदमी चाहिए। देवता नहीं तो राक्षस, दानी न मिले तो अपराधी और समाज को लिये कुछ न करने वाला न मिले तो अपने लिये करने वाला भी चलेगा। बाजार की ताकत इतनी अधिक है कि अगर कोई स्वयं वाकई महान काम कर चुका हो तो भी उसके मुंह से दूसरे का नाम महान के रूप में रखवा ले।
किसी अपराधी को खूंखार कहना भी उसकी एक तरह से प्रशंसा करना है। जब विदेश में बैठे अपराधी भारतीय प्रचार माध्यमों में अपने साथ ‘खूंखार’ की उपाधि लगते हुए देखतेे होंगे तो खुश होते होंगे। अपराधी तो अपराधी होता है-छोटा क्या बड़ा क्या, खूंखार क्या रहम दिल क्या?
अगर यहां चलते फिरते किसी दादा से कहो कि तुम अपराधी हो तो वह लड़ने दौड़ेगा। अगर आप उससे कहो कि तुम खूंखार अपराधी हो तो वह हंसकर कहेगा-‘तो मुझसे डरते क्यों नहीं।’
टीवी चैनलों पर रोज हर क्षेत्र में महानतम नाम आते हैं। बाजार अपने लिये ही कई ऐसी प्रतियोगितायें कराता है जिसमें विजेता के नाम पर उसे महानतम लोग मिल जाते हैं। विश्व सुंदरी और अन्य खेल प्रतियोगिताओं में उसे ऐसी महानतम हस्तियां हर वर्ष मिल जाती हैं। उनके देश को क्या मिला? इससे बाजार मतलब नहीं रखता। प्रचार तंत्र भी इसी बाजार का अभिन्न हिस्सा है। यही प्रचारतंत्र उससे विज्ञापन पाता है तो उसके सौदागरों को भी महान धनी, दानी, और होशियार बताकर प्रशंसा प्रदान करता है। ऐसे में यह कहना कठिन होता है कि प्रचार तंत्र बाजार को चला रहा है या बाजार उसको। कल्पित नायकों की फौज महानतम बन गयी है। फिल्मों के नायक और खेलों के खिलाड़ियों में अब अधिक अंतर नहीं दिखाई देता। फिल्मी हस्तियां क्रिकेट मैच करवा रही हैं तो क्रिकेट खिलाड़ी कही रैम्प पर नाचते हैं तो कहीं टीवी चैनलों पर हास्य प्रतियोगिताओं के निर्णायक बन रहे हैं। सब महानतम हैं। भारत में कोई पैदा हुआ पर काम करता है अमेरिका में। उसे नोबल पुरस्कार मिला तो बस प्रचारतंत्र लग जाता है उसे महानतम बताने में। जैसे कि उसे इस देश ने ही बनाया।
कई बार तो समझ में नहीं आता कि आखिर यह महान हो कैसे गये। अरे, भई अपने लिये तो सभी उपलब्धियां जुटाते हैं। कोई अधिक तो कोई कम! अभी उस दिन एक क्रिकेट खिलाड़ी के बीस बरस पूरा होने पर सारा प्रचारतंत्र फिदा था। अब भी उसे भुना रहा है। इधर हमें याद आ रहा है कि भारत ने एक दिवसीय क्रिकेट प्रतियोगिता में विश्व कप 1983 में जीता था जिससे 26 बरस हो गये। फिर भारत ने बीस ओवरीय प्रतियोगिता में विश्व कप जीता तो उसका वह सदस्य नहीं था। उसने एक बार भी भारत को विश्व कप नहीं जितवाया मगर उसे बाजार महान बना रहा है। उसके नाम पर एक भी बड़ी प्रतियोगिता नहीं है मगर वह महानतम है क्योंकि वह बड़े शहर में रहता है जहां फिल्मों में कल्पित नाायक का अभिनय करने वाले बड़े बड़े अभिनेता रहते हैं। यह बड़ा शहर मुंबई भारत की देश की आर्थिक राजधानी माना जाता है-यह विवादास्पद है क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था की बागडोर आज भी किसानों की पैदावर के हाथ में मानी जाती है, अगर बरसात समय पर न हो या अकाल पड़े तो उसके बाद इस देश की क्या हालत होगी यह समझी जा सकती है। कभी कभी तो लगता है कि देश का पैसा वहां जा रहा है न कि वहां से देश के अन्य भागों में आ रहा है। यह सही है कि नये अर्थतंत्र के आधार मुंबई में है और वही इस प्रचार तंत्र का आधार हैं। यही कारण है कि भारतीय बाजार और प्रचारतंत्र के मसीहा वहीं बसते हैं। इधर उस खिलाड़ी को महानतम बताने के लिये कोई ठोस वजह नहीं मिल रही थी तो उससे अपने भारतीय होने के गौरव का बयान दिलवाया फिर उसका विरोधी एक वयोवृद्ध शख्सियत से करवा लिया जिससे उसे खिलाड़ी से कहा कि‘ तुम तो अपनी पिच संभालो।’
बस प्रचारतंत्र में बवाल मच गया। मचना ही था क्योंकि यही तो बाजार चाहता था। अब उसे खिलाड़ी की राष्ट्रभक्ति के गुणगान किये जाने लगे। अगले ही दिन उस वयोवृद्ध शख्सियत का बयान आया कि उसने तो यह केवल प्रचारतंत्र में अपने ही एक प्रतिद्वंद्वी पर बढ़त बनाने के लिये दिया था। क्या गजब की योजनाएं बनती हैं कि देखकर दिल दिमाग दंग रह जाते हैं। एक भी विश्व कप उसके नाम पर नहीं है तो आखिर उस खिलाड़ी की महानता को आगे बाजार कैसे चलाता? सो उस पर देशभक्त का लेबल लगाकर उसके नायकत्व को आगे जारी रखने का यह प्रयास अद्भुत है! फिल्म अभिनेता महान, सुंदरियां महान, खिलाड़ी महान और धर्म का सौदा करने वाले संत महान! समाज जस का तस! अपने अंधेरों से जूझता हुआ इस इंतजार में कि ‘कब कोई उसको रौशनी देगा।
टीवी चैनलों और समाचार पत्र पत्रिकाओं अध्यात्मिक चर्चाएं और सड़कों पर सभायें होती हैं। नैतिकता और आदर्श का ऐसा प्रचार कि देखकर लगता है कि हम स्वर्ग में रह रहे हैं। जब सत्य से वास्ता पड़ता है तो लगता है कि यह कोई नरक हैं जहां गलती से आ गये। पिछले चार सौ सालों की एतिहासिक गाथाओं में अनेक महानतम लोगों की चर्चा आती है पर देश का क्या? जब रहीम, तुलसी, कबीर और गुरुनानक जी की वाणी को पढ़ते हैं तो लगता है कि समाज उस समय भी ऐसा ही था। इतना ही अंधेरा था। उनकी वाणी आज भी रौशनी की तरह जलती है पर लोगों को शायद अंधेरा ही पंसद है या उनको पता ही नहीं कि रौशनी होती क्या है?
किसे दोष दें। कल्पित नायकों की गाथा सुनाते हुए प्रचार तंत्र को या उसे सुनकर भावुक होते हुए आम लोगों को। बाजार तो वही बेचेगा जो लोगों को पंसद आयेगा। लोगों को क्या अंधेरा ही पसंद है। पता नहीं! मगर सभी अंधे नहीं है। कुछ लोगों में चिंतन है जो इस बात को समझते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो संतों और महापुरुषों की वाणी की रौशनी इस तरह आगे चलती हुई नहीं जाती। बाजार के महानतम उसके सामने बुझे चिराग जैसे दिखते हैं।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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आत्मप्रचार का प्रयास-आलेख (atma prachar ka prayas-hindi lekh)


अगर सभी लोग जीवन सहज भाव से व्यतीत करें तो शायद उनके बीच कोई विवाद ही न हो। मगर यह संभव नहीं है क्योंकि अधिकतर लोग बाह्यमुखी होते हैं और उनमें कुछ ऐसे होते हैं जो अपने व्यवसाय के हित के लिये शोर शराबा करते हुए लोगों का ध्यान अपनी ओर बनाये रखते हैं। आज के आधुनिक युग में इंटरनेट, टीवी, एफ.एम. रेडियो तथा समाचार पत्र पत्रिकाओं में विज्ञापनों का भंडार है उनका लक्ष्य केवल एक ही है कि किसी तरह लोगों को उलझाये रखा जाये। ऐसे में श्रीगीता में वर्णित सहज ज्ञान योग ही वह शक्ति है जो व्यक्ति को आत्मकेंद्रित बनाकर दूसरों के जाल में फंसने से बचा सकती है। यही कारण है कि जितनी उपभोग की प्रवृत्तियां के साथ स्वाभाविक रूप से योग का प्रचार भी बढ़ रहा है। दरअसल यही योग भी एक विक्रय योग्य वस्तु बन गया है यही कारण कि विश्व विख्यात योग शिक्षक भी लोगों के केंद्र बिन्दू में आ गये हैं और लोग उनको अपने कार्यक्रमों में देखकर एक सुख की अनुभूति करते हैं। योग शिक्षक भारतीय धर्म के प्रतीक हैं और उन्होंने एक गैर हिन्दू कार्यक्रम में शामिल होकर यह सािबत भी किया कि
उनके लिये पूरा विश्व एक परिवार है। यहां योग गुरु को गलत ठहराना ठीक नहीं है पर कुछ सवाल ऐसे हैं उनके जवाब में हम ऐसे विचारों तक पहुंच सकते हैं जिनसे सहजयोग के सिद्धांत का विस्तार हो।

यह विश्व विख्यात योग शिक्षक कहने के लिये भले ही गैर हिन्दूओं के कार्यक्रम में गये हों पर वह सभी इसी देश के ही बाशिंदे हैं। मुख्य बात यह है कि इस तरह के कार्यक्रम में उनको बुलाकर आयोजक सिद्ध क्या करना चाहते हैं?
अधिक चर्चा से पहले एक बात स्पष्ट करें कि आम भारतीय अपनी रोजमर्रा के संघर्ष में ही व्यस्त है। किसी भी जाति, धर्म और भाषा समूह के आम आदमी के दिल में झांकिये वहां उसकी निज समस्यायें डेरा डाले बैठे रहती हैं। इनमें से कुछ लोग टीवी तो कुछ समाचार पत्रों में समाचार पढ़कर ऐसे जातीय, भाषाई और धार्मिक समूहों के सम्मेलनों की जानकारी पढ़ते हैं। अगर उनका भावनात्मक जुड़ाव होता है तो कुछ देर सोचकर भूल जाते हैं। आम आदमी में इतना सामथ्र्य नहीं है कि वह ऐसे कार्यक्रमों के लिये धन और समय का अपव्यय करे। मगर चूंकि उसकी सोच में जातीय, धार्मिक और भाषाई विभाजनों का बोध रहता है इसलिये उसका ध्यान आकर्षित करने के लिये उनके शिखर पुरुष ऐसी बैठकें कर अपनी शक्ति का बाहरी समाजों के सामने प्रदर्शन करते हैं। हर समूह के शिखर पुरुष ऐसी गतिविधियों से अपनी कथित समाज सेवा का प्रदर्शन करते हैं।

जिन लोगों ने यह कार्यक्रम किया वह एक भारतीय योग शिक्षक को बुलाकर अपने और बाहरी समाज के सामने अपनी शक्ति के प्रदर्शन करने के साथ ही अपनी छबि भी बनाना चाहते थे। वह जताना चाहते थे कि विश्व भर के प्रचार माध्यमों में छायी एक बड़ी हस्ती उनके कार्यक्रम में आयी। योग शिक्षक ने उनको क्या सिखाया या वह क्या सीखे यह इसी बात से पता चलता है कि अपने इसी सम्मेलन में एक गीत के विरुद्ध अपना निर्णय सुनाया। एक गीत से अपने समाज को डराने वाले यह लोग उस योग शिक्षक से क्या सीखे होंगे-यह आसानी से समझा जा सकता है। 1.10 अरब की इस आबादी में विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं। देश के एक प्रतिशत से भी कम लोग हैं जिनके पास धन अपार मात्रा में है। अगर हम आम और खास आदमी का अंतर देखें तो इतनी दूरी दिखाई देगी जितनी चंद्रमा से इस धरती की। आम आदमी के संघर्ष पर अधिक क्या लिखें? उसके दर्द का भी व्यापार होने लगा है। अगर हम जातीय, धार्मिक और भाषाई सम्मेलनों को देखें तो उसमें खास लोग और उनके अनुयायी शामिल होते हैं पर वह अपने समाज का सही प्रतिनिधित्व नहीं करते हालांकि वह लोगा ऐसा भ्रम वह पैदा करते हैं। मुश्किल यह है कि यह मान लिया जाता है कि उनके पास ही समाज को नियंत्रित करने की शक्ति है इसलिये बाहरी समाज के शिखर पुरुष उनसे संबंध रखते हैं। आम आदमी का कोई संगठन नहीं होता तो जो बनाते हैं वह बहुत जल्दी खास बन जाते हैं उनका लक्ष्य भी यही होता है कि आम आदमी को भीड़ में भेड़ की तरह हांके।

योग शिक्षक बाकायदा उस वैचारिक सम्मेलन में गये जिसे गैर हिन्दू धर्मी लोगों का भी कहा जा सकता ह-हालांकि इस युग में यह शब्द ही मूर्खतापूर्ण लगता है पर पढ़ने वालों को अपनी बात समझाने के लिये लिखना ही पड़ता है। शायद योगाचार्य यह दिखाने के लिये गये होंगे कि इससे शायद देश में एकता का आधार मजबूत होगा। उन्होंने यह भी उम्मीद लगायी होगी कि इसमें वह उस समाज को कोई संद्रेश दे पायेंगे। उनका यह प्रयास एक सामान्य घटना बनकर रह गया क्योंकि वहां तो समाज के ऐसे शिखर पुरुषों का बाहुल्य था जो कि उनकी उपस्थिति को अपने कार्यक्रम का प्रभाव बढ़ाना चाहते थे। किसी दूसरे समुदाय के धर्माचार्य का संदेश ऐसे शिखर पुरुष कभी भी अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली का भाग नहीं बनाते। वह जानते हैं कि ऐसी जरा भी भी कोशिश उनका अपने समूह से नियंत्रण खत्म करेगी। एक व्यक्ति हाथ से निकला नहीं कि सारा समाज ही हाथ से निकल जायेगा। आखिर एक गीत से घबड़ाने वाले इतने साहसी हो भी कैसे सकते हैं।
भारतीय योग में केवल योगासन और प्राणायाम ही नहीं आते बल्कि मंत्रोच्चार भी होता है। मंत्रोच्चार में ऐसे शब्द है जिसमें देवी देवताओं की उपासना होती है-एक गीत से घबड़ाने वाले शिखर पुरुष भला दूसरे समूह के इष्टों का नाम अपने लोगों को कैसे लेने दे सकते हैं? कुल मिलाकर यह एक अर्थहीन प्रयास था। योगशिक्षक की उपस्थिति से उनकोकोई अंतर नहीं पड़ा पर आयोजकों के शिखर पुरुष एक अंतर्राष्ट्रीय हस्ती के पास बैठकर अपना वजन बढ़ाने में सफल रहे।

कहने का तात्पर्य यह है कि आम आदमी चाहे किसी भी जाति, भाषा या धर्म का हो उसके समूह के शिखर पुरुष प्रचार माध्यमों में छाये लोगों को अपने यहां बुलाकर अपना वजन बढ़ाते हैं भले ही वह उनके समुदाय का न हो-प्रचार माध्यमों में अपनी छबि बनाने के अलावा उनका कोई उद्देश्य नहीं होता। यह किसी एक समूह के साथ नहीं है बल्कि हर समूह में ऐसा हो रहा है। इसका कारण यह है कि आज की महंगाई, बेकारी, पर्यावरण प्रदूषण तथा सामाजिक कटुता ने आम आदमी को असहज बना दिया है। इसी असहजता को अधिक बढ़कार सभी समाजों को शिखर पुरुष उसे सांत्वना और साहस देने के नाम पर ऐसे सम्मेलन करते हैं पर उनका लक्ष्य केवल आत्म प्रचार करना होता है। जहां तक आदमी आदमी की जिंदगी का प्रश्न है तो वह कठिन से कठिन होती जा रही है और सभी समूहों शिखर पुरुषों के केवल अपने सदस्यों की संख्या की चिंता रहती है।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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दक्षिण भारत के लोगों की भावुकता अस्वाभाविक नहीं-आलेख (bhakti bhav in south india-hindi lekh)


फिल्मी अभिनेताओं और नेताओं के प्रति दक्षिण भारतीय लोगों की भावुकता देखकर अनेक लोग हतप्रभ रह जाते हैं। दक्षिण भारतीय जहां अपने नेताओं और अभिनेताओं के जन्म दिन पर अत्यंत खुशी जाहिर करते हैं वहीं उनके साथ हादसा होने पर गमगीन हो जाते हैं। इतना ही नहीं उनके निधन पर कुछ लोगों को इतना धक्का पहुंचता है कि उनकी मौत हो जाती है या कुछ आत्महत्या कर लेते हैं। इस पर भारत के अन्य दिशाओं तथा शेष विश्व के लोगों को बहुत हैरानी होती है मगर बहुत कम लोग इस बात को जानेंगे और समझेंगे कि उनकी यह भावुकता एकदम स्वाभाविक है। जिन लोगों को भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की समझ है वह दक्षिण भारतीयों के इस तरह के भक्ति भाव पर बिल्कुल आश्चर्य नहीं करते।
कई बातें तर्क से परे होती हैं और जहां मनोविज्ञान हो तो तर्क ढूंढना कोई आसान नहीं होता। इससे पहले कि हम दक्षिण भारतीयों की स्वाभाविक भावुकता पर दृष्टिपात करें उससे पहले श्रीगीता का यह संदेश समझे लें कि यह पूरा विश्व त्रिगुणमयी माया के वशीभूत हो रहा है और गुण ही गुणों को बरतते हैं। स्पष्तः हमारी देह में तीन गुणों में से-सात्विक, राजस और तामस- कोई एक मौजूद रहता है और उनका निर्माण हमारे अंदर खानपान, जलवायु और संगत से ही होता है उसी के वशीभूत होकर काम करते है। । ऐसा लगता है कि दक्षिण की जलवायु में ही कुछ ऐसा है जो वहां के लोगों में भक्ति का भाव एकदम शुद्ध रूप से मौजूद होता है और सच कहें तो वह एकदम पवित्र होता है। वजह यह है कि भक्ति का जन्म ही द्रविण प्रदेश में होता है। वहां वह एकदम बाल्यकाल में होती है और हम सभी जानते हैं कि यह काल ही भगवत्स्वरूप होता है।
श्रीमद्भागवत में प्रारंभ में ही एक कथा आती है जिसमें वृंदावन में पहुंची भक्ति की मुलाकात श्री नारद जी से होती है। वह वहां सुंदर युवती के रूप में थी पर उसके साथ दो बूढ़े थे जो कि उसके पुत्र वैराग्य और ज्ञान थे। वह करूणावस्था में थी और नारद जी को अपनी कथा सुनाते हुए कहती है कि ‘मेरा जन्म द्रविण प्रदेश में हुआ। कर्नाटक प्रदेश में पली बढ़ी और महाराष्ट्र में कुछ जगह सम्मानित हुई पर गुजरात में मुझे बुढ़ापा आ गया। इधर वृंदावन में आई तो मुझे तो तरुणावस्था प्राप्त हो गयी।’
हम यहां कथा का संदर्भ केवल दक्षिण तक ही सीमित रखें तो समझ सकते हैं कि वहां की जलवायु, अन्न जल तथा मिट्टी में ही कुछ ऐसा होता है कि लोगों की भक्ति एकदम शिशु मन की तरह पवित्र तथा कोमल होती है। भक्ति तो वह अदृश्य देवी है जो हर मनुष्य के मन में विचरती है और चाहे इंसान जैसा भी हो उसको इसका सानिध्य मिलता है क्योंकि कोई भी इंसान ऐसा नहीं हो सकता हो जो किसी व्यक्ति से प्रेम न करता हो। बुरा से बुरा आदमी भी किसी न किसी से प्रेम करता है। भक्ति हमारे अंदर सारे भावों की स्वामिनी है। पंचतत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार तमाम तरह के भावों के साथ चलते हैं और कहीं न किसी से प्रेम या भक्ति अवश्य होती है-यह अलग बात है कि कहीं सजीव तो कहीं निर्जीव वस्तु से लगाव होता है पर देन इसी भक्ति भाव की है। कुछ लोग कह सकते हैं कि अगर यह बात है तो वहां के सभी लोगों में एक जैसी भक्ति नहीं है क्योंकि नेताओ के साथ हादसे में कुछ ही लोग आघात नहीं झेल पाते और उनकी इहलीला समाप्त हो जाती है पर बाकी तो बचे हुए रहते हैं। दरअसल भक्ति का मतलब यह नहीं है कि सभी भक्त अपने प्रिय के साथ हादसा होते ही एक जैसा कदम उठायें। जो लोग बचे रहते हैं वह भी मानसिक आघात कम नहीं झेल रहे होते हैं। याद रखिये भगवान ने पांचों उंगलियां एक जैसी नहीं! दूसरा यह भी कि भक्ति के दो पुत्र भी हैं जिन्होंने भगवत्काल में तरुणावस्था प्राप्त कर ली थी और उनका भी अब महत्व कम नहीं है और संचार साधनों के विस्तार के साथ उनकी पहुंच भी सब जगह है।
हमारे अध्यात्मिक में ज्ञान के साथ मनोविज्ञान और विज्ञान भी है और वह गुण विभाग का कर्म के साथ परिणाम भी बताता है पर उनमें दुनियावी चीजों पर शोध नहीं हुआ कि ऐसा क्यों होता है? या कौनसा जींस दक्षिण में अधिक सक्रिय है? यह काम तो पश्चिमी वैज्ञानिक करते हैं और हो सकता है कि किसी दिन वह इस तरह भी खोज करें कि आखिर दक्षिण में ऐसी भावुकता के पीछे कौनसा जींस या चीज काम कर रही है पर हमारे अध्यात्मिक दर्शन को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो यही निष्कर्ष निकलता है कि हमारे दक्षिणवासियों की यह भावुकता कोई अस्वाभाविक नहीं है।
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मंदिरों पर गौरव की अनुभूति-आलेख (hindu temple in the middle east-hindi lekh)


वह एक ब्राह्म्ण लेखक का पाठ था-ऐसा उन्होंने अपने पाठ में स्वयं ही बताया था। उसने बताया कि राजस्थान के सीमावर्ती गांवों में विभाजन के समय आये सिंधी किस तरह अपनी संस्कृति को संजोये हुए हैं। एक सिंधी ने उससे कहा कि ‘आपमें और हममें बस इतना अंतर है कि हम अभी कुछ समय पहले वहां से आये हैं और आप तीन चार सौ साल पहले बाहर से आये हैं।’
उस लेखक ने इसी आधार पर अपना विचार व्यक्त करते हुए लिखा कि बाहर से कितने ही आक्रांता इस देश के लूटने आये पर यहां के लोगों ने उनके विचारों में नयापन होने के कारण स्वीकार किया। यहां नित नित नये समाज बने। उस लेखक ने यह भी लिखा है कि इस समाज की यह खूबी है कि वह नये विचारों को ग्रहण करने को लालायित रहता है।
उस लेखक और इस पाठ के लेखकों में विचारों की साम्यता लगी और ऐसा अनुभव हुआ कि इस देश के इतिहास में कई ऐसी सामग्री हैं जिनका विश्लेषण नये ढंग से किया जाना चाहिये। हुआ यह है कि मैकाले की शिक्षा पद्धति से शिक्षित इस देश बौद्धिक समाज दूसरे द्वारा थोपे गये विषयों पर विचार भी उनके ढंग से करता है। पिछले तीस चालीस वर्ष के समाचार पत्र पत्रिकायें उठाकर देख लीजिये इतिहास की गिनी चुनी घटनाओं के इर्दगिर्द ही नये ढंग से विचार ऐसे प्रस्तुत किया जाता है जैसे नया हो।
अधिकतर तो हम पिछले बासठ वर्ष के इतिहास पर ही अपना ध्यान केंद्रित करते हैं तो कभी कभी हजारों वर्ष पीछे चले जाते हैं। इन सबमें हम अपना गौरव ढूंढने से अधिक कुछ नहीं करते। इससे कभी निराशा का भाव आता है। दरअसल हमारी समस्या यह है कि हम यथास्थिति से आत्ममुग्ध हैं और उसमें अपना गौरव ढूंढना ही अधिक सुविधाजनक लगता है।
इसमें एक गौरव पूर्ण बात कही जाती है कि हिन्दू धर्म कभी इतना विस्तृत था कि उसका विस्तार मध्य एशिया तक था। मध्य एशिया में बने हिन्दू मंदिरों को अपना गौरव बताने की यह प्रवृत्ति हमारे देश में बहुत है। इसके पीछे वास्तविकता क्या है और नये संदर्भों में हम उसे कैसे देखें? यह विचार करने का साहस कोई विद्वान नहीं करता। आईये हम कुछ इस पर प्रकाश डालें।

एक पश्चिमी विद्वान ने खोजकर बताया था कि मनुष्य की उत्पति दक्षिण अफ्रीका में हुई। वह वहां बिल्कुल बंदरों की तरह था। उसके बाद वह भारत आया और वहां उसने ज्ञान प्राप्त किया फिर वह मध्य एशिया में गया जहां उसने सभ्यता का नया स्वरूप प्राप्त किया। फिर वह भारत की तरफ लौटा और बौद्धिक रूप से परिष्कृत होकरउसके बाद अन्य स्थानों पर गया। हम इसे अगर सही माने तो आज भी कुछ नहीं बदला। भारत आकर इंसान ने यहां की आबोहवा मेें राहत अनुभव की और अपने प्रयोग से उसने सत्य का ज्ञान प्राप्त किया। उसके प्रचार के लिये वह मध्य एशिया में गया जहां उसे सांसरिक और भौतिकता का ज्ञान भी मिला। दोनों ही ज्ञानों में संपन्न होने के बाद वह पूरे विश्व में फैला। इसमें एक बात निश्चित रही कि जिस तत्व ज्ञान की वजह से भारत विश्व में अध्यात्मिक गुरु है उसका आभास इसी धरती पर होता है। मुश्किल यह है कि तत्व ज्ञान अत्यंत सूक्ष्म और संक्षिप्त है और बाह्य रूप से उसका आकर्षण दिखता नहीं है। जब इंसान अपने अंदर की आंखों खोले तभी उसका महत्व उसे अनुभव हो सकता है।

भारत में हमेशा ही प्रकृति की कृपा रहने के साथ जनसंख्या का भी घनत्व हमेशा अधिक रहा है इसलिये यहां हमेशा आदमी खातापीता रहा हैं इसके विपरीत अन्य देशों में इतना प्राकृतिक कृपा नहीं है इसलिये यहां का भौतिक आकर्षण विदेशियों को हमेशा ही यहां खींच लाता है। इनमें कुछ पर्यटक के रूप में आते हैं तो कोई आक्रांता के रूप में।
विदेशों से यहां आवागमन हमेशा रहा है और तय बात है कि विदेशों से जो लोग आये उनकी सभ्यता भी यहां मिलती गयी। यही कारण है कि हम अनेक समाजों के कर्मकांडों में विविधता देखते हैं। इतिहासकारों के अनुसार भारत में मूर्तिपूजा का प्रवृत्ति मध्य एशिया से आयी है। उनकी बात में दम इसलिये भी नजर आती है कि भारतीय धर्म ग्रंथों मेें यज्ञ हवन आदि की चर्चा तो होती है पर मूर्ति पूजा यहां के मूल धर्म का भाग हो ऐसा नहीं लगता। रामायण काल में भी रावण द्वारा यज्ञों में विध्वंस पैदा करने की घटनाओं की चर्चा होती है पर मंदिर आदि पर हमला कहीं हुआ हो इसकी जानकारी नहीं मिलती।
श्रीगीता में भी द्रव्य यज्ञ और ज्ञान यज्ञ की चर्चा होती है। द्रव्य यज्ञ से आशय वही यज्ञ हैं जिनमें धन का व्यय होता है और निश्चित रूप से उनका आशय उन यज्ञों से है जिनमें भौतिक सामग्री का प्रयोग होता है।
इतिहास में इस बात की चर्चा होती है कि मध्य एशिया में किसी समय अनेक देवी देवताओं की पूजा होती थी और इस कारण वहां सामाजिक वैमनस्य भी बहुत था। लोग अपने देवी देवताओं को श्रेष्ठ बताने के लिये आपस में युद्ध करते थे। इन देवी देवताओं की संख्या भारत में वर्तमान में प्रचलित देवी देवताओं से कई गुना अधिक थी।
इतिहासकारों के अनुसार वहां एक राजा हुआ जो सूर्य का उपासक था। उसने सूर्य को छोड़कर अन्य देवी देवताओं की पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया। दरअसल उसका मानना था कि सूर्य ही सृष्टि का आधार है और वही पूज्यनीय है। उसने अन्य देवी देवताओं के मंदिर और मूर्तियां तुड़वा दीं। इससे लोग नाराज हुए और उसे इतिहास का क्रूर राजा माना गया। बाद में उस राजा की हत्या हो गयी। इतिहासकार मानते हैं कि भले ही उसकी जनता उससे नाराज थी पर उसने यह सत्य स्थापित तो कर ही दिया कि इस सृष्टि का स्वामी एक परमात्मा है।
कुछ इतिहासकार कहते हैं कि उस राजा के मरने के बाद फिर पुनः विभिन्न देवी देवताओं की पूजा होने लगी। नतीजा फिर आपसी संघर्ष बढ़ने लगे और यह तब तक चला जब तक वहां एक ईश्वर का सिद्धांत ताकत के बल पर स्थापित नहीं हो गया।
दरअसल हम इतिहास पर विचार करें तो मूर्ति पूजकों और उनके विरोधियों का संघर्ष वहीं से होता भारत तक आ पहुंचा। भारत में इसे अधिक महत्व नहीं मिला क्योंकि यहां तत्व ज्ञान हमेशा ही अपना काम करता रहता है। यह तत्वज्ञान श्रीगीता में पूरी तरह वर्णित है। इसके अलावा एक अन्य बात यह भी है कि भारतीय समाज मानता है कि समय समय पर महापुरुष पैदा होकर समाज सुधार के लिये कुछ न कुछ करते रहते हैं और उनका यह विश्वास गलत नहीं है। आधुनिक काल में कबीर, तुलसी, रहीम, मीरा, रैदास तथा अन्य संत कवियों ने अपनी रचनाओं ने केवल तत्व ज्ञान का प्रचार किया बल्कि भक्ति के ऐसे रस का निर्माण किया जिसके सेवन से यह समाज हमेशा ही तरोताजा रहता है। इसके विपरीत जहां नवीन विचारों के आगमन पर रोक है वह समाज जड़ता को प्राप्त हो गये हैं।
पूर्व में ऋषियों मुनियों और तपस्वियों द्वारा खोजे गये तत्व ज्ञान तथा आधुनिक काल के संत कवियों के भक्ति तत्व का प्रचार हमारी सबसे बड़ी ताकत हैं। अगर हम यह कहते हैं कि मध्य एशिया में फैले मंदिर हमारे गौरव हैं तो यह भी याद रखिये वह मंदिर हमारे तत्वज्ञान और भक्ति भाव का प्रतीक नहीं है। इसके अलावा सूर्य मंदिरों का मध्य एशिया में होना तो कोई अजूबा नहीं है क्योंकि वहां कभी उनकी पूजा होती है। हम उनके साथ अपनी संस्कृति और सभ्यता को नहीं जोड़ सकते क्योंकि उनके साथ आपसी खूनी संघर्षों का इतिहास भी जुड़ा है। कहने को तो भारत में भी विभिन्न धार्मिक मतों को लेकर विवाद होते रहे हैं पर कभी ऐसा नहीं हुआ कि इसको लेकर किसी ने किसी पर हमला किया हो।
हमारी वर्तमान सभ्यता, संस्कृति और धर्म अनेक तरह के प्रयोगों के दौर से होते हुए वर्तमान स्वरूप को प्राप्त हुआ है। इसके आधार स्तंभ तत्व ज्ञान और भक्ति ही हमारी वास्तविक पहचान है। एक बात याद रखिये इतिहासकार कहते हैं कि दक्षिण अफ्रीका से चलकर इंसान भारत में ज्ञानी हुआ और फिर प्रचार के लिये मध्य एशिया में गया जहां उसे अन्य ज्ञान मिला। वह उसे प्राप्त कर यहां लौटा फिर पूरी तरह से परिष्कृत होकर अन्य जगह पर गया। इसका आशय यह है कि अतीत का गौरव जो हमारे देश में यहीं को लोगों की तपस्य और परिश्रम से निर्मित हुआ है वही श्रेष्ठ है और उससे आगे की सीमा का गौरव तो धूल धुसरित हो गया है। यह वहां रहे लोगों को तलाशना है उस पर हमें गर्व करना बेकार है। इसलिये कहीं मध्य एशिया के पुराने मंदिर ही नहीं बल्कि पश्चिम देशों में बनने वाले मंदिरों में अपने धर्म का गौरव ढूंढना का प्रयास किसी को अच्छा लग सकता है पर अघ्यात्मिक ज्ञानी जानते हैं कि यह केवल एक क्षणिक मानसिक सुख है और इसका उस ज्ञान से कोई लेना देना नहीं है जिसकी वजह से यह देश विश्व का अध्यात्मिक गुरु माना जाता है।
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वैचारिक महाभारत की आवश्यकता-आलेख (baba shri ramdev,shri shri ravishankar & shri gita)


कभी समलैंगिकता तो कभी सच का सामना, युवक युवतियों के बिना विवाह साथ रहने और इंटरनेट पर यौन सामग्री से संबंधित सामग्री पर प्रतिबंध जैसे विषयों पर जूझ रहे अध्यात्मिक गुरुओं और समाज चिंतकों को देखकर लगता है कि वैचारिक रूप से इस देश में खोखलापन पूरी तरह से घर कर चुका है। इसलिये बाबा रामदेव अगर योग के बाद अगर ज्ञान को लेकर कोई वैचारिक धर्मयुद्ध छेड़ते हैं तो वह एक अच्छी बात होगी। आज के युग में अस्त्रों शस्त्रों से युद्ध की बजाय एक वैचारिक महाभारत की आवश्यकता है। समलैंगिकता और सच का सामना जैसे विषयों पर देश के युवाओं का ध्यान जाये उससे अच्छा है कि उनको अध्यात्मिक वाद विवाद की तरफ लाना चाहिये। पहले शास्त्रार्थ हुआ करता था और यही शास्त्रार्थ अब आधुनिक प्रचार माध्यमों में आ जाये तो बहुत बढ़िया है।

अध्यात्मिक विषयों पर लिखने में रुचि रखने वाले जब बेमतलब के मुद्दों पर बहस देखते हैं तो उनके लिये निराशा की बात होती है। बहुत कम लोग इस बात को मानेंगे कि इसी शास्त्रार्थ ने ही भारतीय अध्यात्म को बहुत सारी जानकारी और ज्ञान दिया है और उसके दोहराव के अभाव में अध्यात्मिक प्रवृत्ति के लोगों को एकतरफा ही ध्यान केंद्रित करना पड़ता है। दूसरी बात यह है कि अनेक साधु संत शास्त्रार्थ करने की बजाय अकेले ही प्रवचन कर चल देते हैं। अपनी बात कहने के बाद उस पर उनसे वाद विवाद की कोई सुविधा नहीं है। दरअसल उनके पास ही मूल ज्ञान तत्व का अभाव है।

आचार्य श्रीरामदेव ने भी आज इस बात को दोहराया कि श्रीगीता के उपदेशो की गलत व्याख्या की जा रही है। यह लेखक तो मानता है कि श्रीगीता से आम आदमी को परे रखने के लिये ही कर्मकांडोें, जादू टोने और कुरीतियों को निभाने के लिये आदमी पर जिम्मेदारी डाली गयी। समाज और धर्म के ठेकेदारों ने यह परंपरायें इस तरह डाली कि लोग आज भी इनको बेमन से इसलिये निभाते हैं क्योंकि अन्य समाज यही चाहता है। अपने अध्यात्म ज्ञान से हमारे देश का शिक्षित वर्ग इतना दूर हो गया है कि वह अन्य धर्मों के लोगों द्वारा रखे गये कुतर्कों का जवाब नहीं दे पाता।

विदेशों में प्रवर्तित धर्मों के मानने वाले यह दावा करते हैं कि उनके धर्म के लोगों ने ही इस देश को सभ्यता सिखाई। वह विदेशी आक्रांतों का गुणगान करते हुए बताते हैं कि उन्होंने यहां की जनता से न्यायप्रियता का व्यवहार किया। अपने आप में यह हास्याप्रद बात है। आज या विगत में जनता की राजनीति में अधिक भूमिका कभी नहीं रही। भारत के राजा जो विदेशी राज्यों से हारे वह अपने लोगों की गद्दारी के कारण हारे। सिंध के राजा दाहिर को हराना कठिन काम था। इसलिये ईरान के एक आदमी को उसके यहां विश्वासपात्र बनाकर भेजा गया। अपने लोगों के समझाने के बावजूद वह उस विश्वासपात्र को साथ रखे रहा। उसी विश्वासपात्र ने राजा दाहिर को बताया कि उसकी शत्रु सेना जमीन के रास्ते से आ रही है जबकि वह आयी जलमार्ग से। इस तरह राजा दाहिर विश्वास में मारा गया। यहां के लोग सीधे सादे रहे हैं इसलिये वह छलकपट नहीं समझते। दूसरा यह है कि जो अध्यात्मिक ज्ञान और योग साधना उनको सतर्क, चतुर तथा शक्तिशाली बनाये रख सकती है उससे समाज का दूर होना ही इस देश का संकट का कारण रहा है। दरअसल सभ्य हमारा देश पहले हुआ विदेश में तो बाद में लोगों ने बहुत कुछ सीखा जिसके बारे में हमारे पूर्वज पहले ही जान चुके थे। पर हमारा देश अपने अध्यात्मिक ज्ञान के कारण ही कभी आक्रामक नहीं रहा जबकि विदेशी लोग उसके अभाव में आक्रामक रहें। फिर जितनी प्रकृत्ति की कृपा इस देश में कहीं नहीं है यह इतिहास विपन्न देशों द्वारा संपन्न लोगों को लूटने के साथ भी जोड़ा जा सकता है। इसलिये अनेक इतिहासकार कहते भी है कि जो भी यहां आया वह लूटने ही आया।

फिर कुछ आक्रामक लोग अपने साथ अपने साथ मायावी ज्ञान उनको प्रचार करने वाले कथित सिद्ध भी ले आये जिनके पास चमत्कार और झूठ का घड़ा पूरा भरा हुआ था। आश्चर्य की बात है कि अन्य धर्म के लोग जब बहस करते हैं तो कोई उनका जवाब नहीं देता। हां, जो गैर भारतीय धर्मों पर गर्व करते हैं कभी उनसे यह नहीं कहा गया कि ‘आप अपने धर्म पर इतरा रहे हो पर आपके कथित एतिहासिक पात्रों ने जो बुरे काम किये उसका जिम्मा वह लेंगे। क्या इस देश के राजाओं, राजकुमारों और राजकुमारियों के साथ उनके एतिहासिक पात्रों द्वारा की गयी अमानुषिक घटनाओं को सही साबित करेंगे? उन्हों बताना चाहिये कि मीठा खा और कड़वा थूक की नीति धार्मिक चर्चाओं में नहीं चलती।

धार्मिक प्रवचनकर्ता ढेर सारा धन बटोर रहे हैं। इस पर हमें आपत्ति नहीं करेंगे क्योंकि अगर माया के खेल पर बहस करने बैठे तो मूल विचार से भटक जायेंगे। पर यह तो देखेंगे कि साधु और संत अपने प्रवचनों और उपदेशों से किस तरह के भक्त इस समाज को दे रहे हैं। केवल खाली पीली जुबानी भगवान का नाम लेकर समाज से परे होकर आलस्य भाव से जीवन बिताने वाले भक्त न तो अपना न ही समाज का भला कर सकते हैं। भक्ति का मतलब है कि आप समाज के प्रति भी अपने दायित्वों का पालने करें। श्रीगीता का सार आप लोगों ने कई बार कहीं छपा देखा होगा। उसमें बहुत अच्छी बातें लिखी होती है पर उनका आशय केवल सकाम भक्ति को प्रोत्साहन देना होता है और उनका एक वाक्य भी श्रीगीता से नहीं लिया गया होता। हां, यह आश्चर्य की बात है और इस पर चर्चा होना चाहिये। बाबा रामदेव और श्रीरविशंकर दो ऐसे गुरु हैं जो वाकई समाज को सक्रिय भक्त प्रदान कर रहे हैं-इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि उनकी आलोचना करने वाले बहुत हैं। यही आलोचक ही कभी सच का सामना तो कभी समलैंगिक प्रथा पर जोरशोर से विरोध करने के लिये खड़े होते हैं। योगासन, ध्यान, मंत्रजाप और श्रीगीता का अध्ययन करने वाले भक्त कभी इन चीजों की तरफ ध्यान नही देते। हमें ऐसा समाज चाहिये जिसके बाह्य प्रयासों से बिखर जाने की चिंता होने की बजाय अपनी इच्छा शक्ति और दृढ़ता से अपनी जगह खड़े का गर्व हमारे साथ हो। कम से कम बाबा रामदेव और श्रीरविश्ंाकर जैसे गुरुओं की इस बात के लिये प्रशंसा की जानी चाहिये कि वह इस देश में ऐसा समाज बना रहे हैं जो किसी अन्य के द्वारा विघटन की आशंका से परे होकर अपने वैचारिक ढांचे पर खड़ा हो। बाबा श्रीरामदेव द्वारा धर्म के प्राचीन सिद्धांतों पर प्रहार करने से यह वैचारिक महाभारत शुरु हो सकता है और इसकी जरूरत भी है। आखिर विदेशी और देशी सौदागर देश के लोगों का ध्यान अपनी खींचकर ही तो इतना सारा पैसा बटोर रहे हैं अगर उस पर स्वदेशी विचाराधारा का प्रभाव हो तो फिर ऐसी बेवकूफ बनाने वाली योजनायें स्वतः विफल हो जायेंगी।
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श्रीगीता संदेश-स्वप्न, भय, शोक, विषाद और मद तामसी धारणाशक्ति के प्रतीक (gita sandesh in hindi)


यथा स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुंचति दुमेंधा धृति सा पार्थ तामसी।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य में जिस धारणा शक्ति में स्वप्न, भय, शोक, विषाद और मद व्याप्त होते हैं उसे तामसी धारणाशक्ति कहा जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पंचतत्वों से बनी यह देह नश्वर है पर मनुष्य अपना पूरा जीवन इसकी रक्षा करते हुए बिता देता है। यह देह जो कभी इस संसार को छोड़ देगी-इस सत्य से मनुष्य भागता है और इसी कारण उसे भय की भावना हमेशा भरी होती है। मनुष्य कितना भी धन प्राप्त कर ले पर फिर भी उसमें यह भय बना रहता है कि कभी वह समाप्त न हो जाये। परिणामतः वह निरंतर धन संग्रह में लगता है। भगवान की सच्ची भक्ति करने की बजाय वह दिखावे की भक्ति करता है-कहीं वह स्वयं को तो कहीं वह दूसरों को दिखाकर अपने धार्मिक होने का प्रमाण जुटाना ही उसका लक्ष्य रहता है।
दिन रात वह अपनी उपलब्धियों के स्वप्न देखता है। अगर आपको रात का सपना सुबह याद रहे तो इसका अर्थ यह है कि आप रात को सोये नहीं-निद्रा का सुख आपसे दूर ही रहा। लोग इसके विपरीत रात के स्वप्न याद रखकर दूसरों को सुनाते हैं। दिन में भौतिक लक्ष्य की प्राप्ति का हर मनुष्य हर पल सपना देखता है। जो उसके पास है उससे संतुष्ट नहीं होता।

सभी जानते हैं कि इस संसार में जो आया है उसे एक दिन यह छोड़ना है पर फिर भी अपने सगे संबंधी के मरने पर वह दुःखी होता है। न हो तो भी जमाने को दिखाने के लिये शोक व्यक्त करता है।
यह देह कभी स्वस्थ होती है तो कभी अस्वस्थ हो जाती है। इस दैहिक विपत्ति से बड़े बड़े योगी मुक्त नहीं हो पाते पर मनुष्य के शरीर में जब पीड़ा होती है तब वह विषाद में सब भूल जाता हैं वह पीड़ा उसके मस्तिष्क और विचारों में ग्रहण लगा देती है। देह में यह परेशान मौसम, खान पान या परिश्रम से कभी भी आ सकती है और जैसे ही उसका प्रभाव कम हो जाता है वैसे ही मनुष्य स्वस्थ हो जाता है पर इस बीच वह भारी विषाद में पड़ा रहता है।
थोड़ा धन, संपदा और शक्ति प्राप्त होने से मनुष्य में अहंकार आ जाता है। उसे लगता है कि बस यह सब उसके परिश्रम का परिणाम है। सब के सामने वह उसका बखान करता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि हम दृष्टा की तरह इस संसार को देखें। गुण ही गुणों को बरतते हैं अर्थात हमारे अंदर सपनें, शोक, भय, विषाद और मद की प्रवृत्ति का संचालन वाले तत्व प्रविष्ट होते हैं जिनका अनुसरण यह देह सहित उसमें मौजूद इंद्रियां करती हैं। जब हम दृष्टा बनकर अपने अंदर की चेष्टाओं और क्रियाओं को देखेंगे तब इस बात का आभास होगा कि हम देह नहीं बल्कि आत्मा हैं।
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श्री गीता से-दूसरे के रोजगार का नाश करना तामस प्रकृत्ति का परिचायक (shri gita sandesh in hindi)


अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्रीच कर्ता तामस उच्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
युक्ति के बिना कार्य करने वाला, प्राकृत ( संसार की शिक्षा प्राप्त न करने वाला), स्तब्ध (इस संसार की भौतिकता को देखकर हैरान होने वाला, दुष्ट, किसी की कृति (जीविका) का नाश करने वाला, शोक करने वाला और लंबी चौड़ी योजनायें बनाकर काम करने वाला तामस प्रवृत्ति का कहा जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के नाम पर उत्पात मचाने वाले दूसरों पर आक्रमण करते हैं। दूसरे का रोजगार उनसे सहन नहीं होता और वह उसका नाश करने पर आमादा हो जाते हैं। सबसे हैरानी की बात तो तब होती है कि श्रीगीता को पवित्र मानने वाले लोग यह काम बेझिझक करते हैं। थोड़ी थोड़ी सी बात पर रास्ता जाम करना, दुकानें-बसें जलाना तथा राह चलते हुए लोगों और अपने रोजगार का कर्तव्य निभा रहे सुरक्षा जवानों पर पत्थर फैंकना कोई अच्छी बात नहीं है। आधुनिक लोकतंत्र में आंदोलन चलते हैं पर उनको चलाने का अहिंसक तरीका भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने बता ही दिया है-जैसे सत्याग्रह और बहिष्कार। आज सारी दुनियां उनको मानती है पर इसी देश में जरा जरा सी बात पर हिंसा का तांडव दिखाई देता है। इस तरह युक्ति रहित आंदोलन तामसी प्रवृत्ति का परिचायक हैं।

नैतिक और धार्मिक सहिष्णुता और दृढ़ता हमारे भारतीय अध्यात्म की सबसे बड़ी शक्ति है। जीवन मरण तो सभी के साथ लगा रहता है। मुख्य बात यह है कि कोई मनुष्य किस तरह जिया-उसने सात्विक, राजस या तामस
में से किस प्रवृत्ति को उसने अपनाया। इस देश की विचारधारा को इतनी चुनौती मिलती हैं पर फिर भी वह अक्षुण्ण बनी हुई क्योंकि वह उस सृष्टि के उस सत्य को जानती है जिस पर पश्चिम अब काम कर रहा है। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि किसी धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्रीय समूह के सदस्यों की संख्या अधिक है या कम-देखा तो यह जाता है कि उस समूह के सदस्य किस प्रवृत्ति-सात्विक, राजस या तामस-के हैं। जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के आधार पर कोई दूसरा मनुष्य हमसे अलग भी हो तो भी उसकी जीविका का नाश करना अधर्म है-हमें यह नहीं देखना चाहिये कि उसका समूह या वह क्या करता है बल्कि इस बात पर दृष्टि रखना चाहिये कि हम क्या कर रहे हैं? हमारा और समूह का आचरण दृढ़ और धर्म पर आधारित होना चाहिये और यह निश्चय शक्तिशाली बना सकता है।
आज के कठिन युग में जहां तक हो सके दूसरे को रोजगार में सहायता देना चाहिये। इसके लिये अपनी तरफ से कोई प्रयास करना पड़े तो झिझकना नहीं चाहिये। यह न कर सकें तो कम से कम इतना तो करना चाहिये कि दूसरे के रोजगार का नाश न हो।
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मंगलवार का दिन भारी-व्यंग्य आलेख (bhartiya jyotish ki jay ho-hasya vyangya-in hindi)


सप्ताह में सात दिन और दिन में 24 धंटे पर मंगलवार का सुबह 11.45 मिनट का समय सभी लोगों के लिये भारी होता है-जी नहीं! यह खबर किसी भारतीय ज्योतिषवेता की नहीं बल्कि पश्चिम के शोधकर्ताओं की है। इसे शिरोधार्य करना चाहिये क्योंकि वह तमाम तरह के प्रयोग करते हैं और किसी ज्योतिष गणना का सहारा नहीं लेते। अगर कोई भारतीय विशेषज्ञ ज्योतिषी कहता तो शायद लोग उसका मखौल उड़ाते।
वैसे भारतीय ज्योतिष में भी मंगल को एक तरह से भारी ग्रह माना जाता है और जिसकी राशि का स्वामी होता है उसके लिये जीवन साथी भी वैसा ही ढूंढना पड़ता है। लड़के और लड़की की जाति बंधन के साथ आजकल ग्रह बंधन भी हो गया है। इस देश में दो प्रकार के अविवाहित युवक युवतियां होती हैं-एक जो मांगलिक हैं दूसरे जो नहीं है। हम अब यह तो कतई नहीं कह सकते कि एक मांगलिक दूसरे अमांगलिक क्योंकि इससे अर्थ का अनर्थ हो जायेगा।
अनेक बार लोग एक दूसरे को शुभकामनायें देते हुए कहते हैं कि ‘तुम्हारा मंगल हो‘, ‘तुम्हारा पूरा दिन मंगलमय हो’ या ‘तुम्हारा अगला वर्ष मंगलमय हो‘। इसके बावजूद भारतीय ज्योतिष में मंगल ग्रह एक भारी ग्रह माना जाता है।
अपने यहां एक कहावत भी है कि ‘मंगल को होये दिवारी, हंसे किसान रोये व्यापारी‘। वैसे मंगल कामनायें कृषि के लिये नहीं बल्कि व्यापार में अधिक दी जाती हैं। कृषि के लिये तो सारे दिन एक जैसे हैं। अपने यहां पहले मंगलवार को ही व्यापार में अवकाश रखने का प्रावधान अधिक था। समय के साथ अब लोग रविवार को भी अवकाश रखने लगे।
शोधकर्ताओं ने मंगल 11.45 मिनट का समय इसलिये भारी बताया है कि शनिवार और रविवार के अवकाश-जी हां, वहां दो दिन का अवकाश ही रखा जाता है-के बाद आदमी सोमवार को अलसाया हुआ रहता है और पूरा दिन ऐसे ही निकाल देता है। मंगलवार को काम के मूड में सुबह वह काम पर आता है तो उसे पता लगता है कि उसके सामने तो काम बोझ रखा हुआ है। सुबह काम शुरु करने के बाद यह सोच 11.45 मिनट के आसपास उसके दिमाग में आता है। शोधकर्ताओं ने पांच हजार कर्मचारियों पर यह शोध किया।

वैसे नहीं मानने वाले अब भी यह नहीं मानेंगे कि भारतीय ज्योतिष ग्रहों के मनुष्य के दिमाग पर परिणाम की जो व्याख्या करता है वह सच है। वैसे देखा जाये तो सुबह उठकर जब यह याद आता है कि आज अवकाश का दिन है तो आदमी के दिमाग में एक स्वतः तरोताजगी आती है इसका किसी वार से कोई संबंध नहीं है। उसी तरह जब सुबह यह याद आता है कि आज काम पर जाना है तब तनाव भी स्वाभाविक रूप से आता है।
भारतीय ज्योतिष को लेकर अनेक तरह के विवाद हैं। दो ज्योतिषी एक मत नहीं होते। इसके अलावा एक बात जो स्पष्ट नहीं होती कि ज्योतिष और खगोलशास्त्र में क्या अंतर है? खगेालशास्त्र में ग्रहों की गति के आधार पर समय और अन्य गणनायें की जाती हैं। भारतीय खगोलशास्त्र कितना संपन्न है कि उनकी गणना के अनुसार सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण उसी समय पर आते हैं जब पश्चिम के वैज्ञानिक बताते हैं। भारतीय खगोलशास्त्रियेां की उनकी कई ऐसी गणनायें और खोज हैं जिनकी पश्चिम के वैज्ञानिक अब प्रमाणिक पुष्टि करते हैं। बुध,शुक्र,शनि,मंगल,गुरु तथा अन्य ग्रहों के बारे में भारतीय खगोलशास्त्री बहुत पहले से जानते हैं। भारत में सात वार है और पश्चिम में भी-इससे यह तो प्रमाणित होता कि कहीं न कहीं हमारे खगोलशास्त्री विश्व के अन्य देशों से आगे थे। संभवतः ज्योतिष विद्या उन ग्रहों की स्थिति के ह आधार पर मनुष्य और धरती पर पड़ने वाले प्रभावों की व्याख्या करने वाली विद्या मानी जा सकती है।

चंद्रमा हमारे सबसे निकट एक ग्रह है इसलिये उसके प्रभाव की अनुभूति तत्काल की जा सकती है। गर्मी में जब सूर्यनारायण दिन भर झुलसा देते हैं तब रात को आकाश में चंद्रमा आंखों मेें जो ठंडक देता है उसे हम उसे शीघ्र अनुभव करते हैं। अन्य ग्रह कुछ अधिक दूर है इसलिये उनके प्रभावों का एकदम पता नहीं चलता-उनका प्रभाव होता है यह तो हम मानते हैं।
समस्या इस बात की है कि ज्योतिष के नाम पर ढोंग और पाखंड अधिक हो गया है। कुछ कथित ज्योतिषी अपने पैसे कमाने के लिये तमाम तरह के ऐसे हथकंडे अपनाते हैं जिससे समाज में ज्योतिष विद्या की छबि खराब होती है। वैसे इन ग्रहों के दुष्प्रभाव से बचने का एक ही उपाय है परमात्मा की सच्चे मन से भक्ति और निष्काम भाव से अपना कर्म करते रहना। अगर आदमी निष्काम भाव से रहे तो फिर उसके लिये अच्छा क्या? बुरा क्या? अपना क्या? पराया क्या?
योग साधन, ध्यान, मंत्र जाप और प्रार्थना से मनुष्य को अपनी देह में ही ऐसी शक्तियों का आभास होता है जो उसका बिगड़ता काम बना देती है। लक्ष्य उनके कदम चूमता है। हां, सकाम रूप से भक्ति और अन्य कार्य करने वालों की ही ज्योतिष की सहायता की आवश्यकता होती है। बहरहाल यह कहना कठिन है कि इस देश में कितने ज्योतिष ज्ञानी है और कितने अल्पज्ञानी। अलबत्ता धंधा केवल वही कर पाते हैं जिनके पास व्यवसायिक चालाकियां होती हैं।

इन ज्योतिष ज्ञानियों द्वारा दी गयी जानकारियों में विरोधाभास अक्सर देखने को मिलता है। इंटरनेट पर इसका एक रोचक अनुभव हुआ। एक महिला ज्योतिष विद् ने इस लेखक के ब्लाग/पत्रिका पर टिप्पणी की। वह ज्योतिष के नाम पर होने वाले पाखंड के विरुद्ध अभियान शुरु किये हुए हैं-उन्होंने अपनी प्रकाशित एक किताब की जानकारी भी भेजी। उन्होंने अध्यात्म ब्लाग पर लिखने के लिये इस लेखक की प्रशंसा करते हुए अपने अभियान में समर्थन का आश्वासन मांगा। मुझे बहुत खुशी हुई। लेखक ने जवाब में समर्थन के आश्वासन के साथ अंतर्जाल पर सक्रिय एक अन्य ज्योतिषी के ब्लाग का पता भी दिया और साथ में यह राय भी कि आप उनका ब्लाग देखकर उनसे भी इस मामले में सहायता मांगे। लौटती डाक से जवाब आया कि ‘वह उन ज्योतिषी की गणनाओं से सहमत नहीं है।’
तब यह देखकर हैरानी हुई कि दो ज्योतिष विशारद आखिर क्यों आपस में इस तरह असहमत होते हैं? हम तो इस मामले में पैदल हैं इसलिये कहते हैं कि यह भी सही और वह भी सही मगर जब जानकार लोग इस तरह भ्रम पैदा करें तो…………..शायद यही कारण है कि भारतीय ज्योतिष विश्व में कभी वह स्थान प्राप्त नहीं कर पाया जिसकी अपेक्षा की जाती रही है। हां , उपरोक्त शोध से एक बात तो सिद्ध हो गयी कि भारतीय ज्योतिष का भी कोई न कोई तार्किक आधार होगा तभी इतने लंबे समय से वहा प्रचलन में है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अध्यात्मिक ज्ञान का एक भाग ज्योतिष ज्ञान भी माना जाता है। पश्चिम के वैज्ञानिकों के शोध के आधार पर यह तो कहा जा सकता है कि ‘भारतीय ज्योतिष की जय हो’
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भर्तृहरि नीति शतक-रोजी पाने वाले से प्रणाम पाकर आदमी को अंहकार का बुखार चढ़ जाता है (ahankar ka bukhar-adhyatmik sandesh)


स जातः कोऽप्यासीनमदनरिमुणा मूध्निं धवलं कपालं यस्योच्चैर्विनहितमलंकारविधये।
नृभिः प्राणत्राणप्रवणमतिभिः कैश्चिदधुना नमद्धिः कः पुंसामयमतुलदर्प ज्वर भरः।
हिंदी में भावार्थ-
महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि भगवान शिव ने अपने अनेक खोपड़ियों की माला सजाकर अपने गले में डाल ली पर जिन मनुष्यों को अहंकार नहीं आया जिनके नरकंकालों से वह निकाली गयीं। अब तो यह हालत है कि अपनी रोजी रोटी के लिये नमस्कार करने वाले को देखकर उससे प्रतिष्ठित हुआ आदमी अहंकार के ज्वर का शिकार हो जाता है।

न नटा न विटा न गायकाः न च सभ्येतरवादचंचवः।
नृपमीक्षितुमत्र के वयं स्तनभारानमिता न योषितः।।
हिंदी में भावार्थ-
महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि न तो हम नट हैं न गायक न असभ्य ढंग से बात करने वाले मसखरे और न हमारा सुंदर स्त्रियों से कोई संबंध है फिर हमें राजाओं से क्या लेना देना?

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिसे देखो वही अहंकार में डूबा है। जिसने अधिक धन, उच्च पद और अपने आसपास असामाजिक तत्वों का डेरा जमा कर लिया वह अहंकार में फूलने लगता है। अपने स्वार्थ की वजह से सामने आये व्यक्ति को नमस्कार करते हुए देखकर कथित बड़े, प्रतिष्ठित और बाहूबली लोग फूल जाते हैं-उनको अहंकार का बुखार चढ़ता दिखाई देता है। यह तो गनीमत है कि भगवान ने जीवन के साथ उसके नष्ट होने का तत्व जोड़ दिया है वरना वह स्वयं चाहे कितने भी अवतार लेते ऐसे अहंकारियों को परास्त नहीं कर सकते थे।
अधिक धन, उच्च पद और बाहूबल वालों को राजा मानकर हर कोई उनसे संपर्क बढ़ाने के लिये आतुर रहता है। जिसके संपर्क बन गये वह सभी के सामने उसे गाता फिरता है। इस तरह के भ्रम वही लोग पालते हैं जो अज्ञानी है। सच बात तो यह है कि अगर न हम अभिनेता है न ही गायक और न ही मसखरी करने वाले जोकर और न ही हमारी सुंदर स्त्रियों से कोई जान पहचान तब आजकल के नये राजाओं से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह हमसे संपर्क रखेंगे। बड़े और प्रतिष्ठित लोग केवल उन्हीं से संपर्क रखते हैं जिनसे उनको मनोरंजन या झूठा सम्मान मिलता है या फिर वह उनके लिये व्यसनों को उपलब्ध कराने वाले मध्यस्थ बनते हों। अगर इस तरह की कोई विशेष योग्यता हमारे अंदर नहीं है तो फिर बड़े लोगों से हमारा कोई प्रयोजन नहीं रह जाता।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

हिंदी भाषा का प्रसार स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा-आलेख


भीषण गर्मी के कारण पिछले कई दिनों से लिखने का मन नहीं हो रहा था। आज एक ब्लाग पर श्री बालसुब्रण्यम का पाठ पढ़ते हुए कुछ लिखने का मन हो उठा। उन्होंने अपने पाठ में हिंदी के विश्वभाषा बनने का प्रसंग उठाया था। उन्होंने अपने पाठ में बताया कि एक ईरानी छात्रा ने उनको हिंदी में ईमेल भेजकर उनसे हिंदी के व्याकरण के बारे में कुछ जानना चाहा था। उस ईरानी लड़की ने अंतर्जाल पर ही श्री बालसुब्रण्यम का पता ढूंढा था। श्री बालसुब्रण्यम के अनुसार वह स्वयं एक अनुवादक भी हैं। उन्होंने अपने व्यय पर ही एक किताब उस लड़की को भेज दी। उसका परिणाम भी अच्छा निकला। श्री बालसुब्रण्यम के उस पाठ पर कुछ टिप्पणियों भी थी जो इस का प्रमाण दे रही थी कि हिंदी अब एक विश्व भाषा बनने की तरफ अग्रसर है।

एक टिप्पणीकार ने एक विदेशी विद्वान का यह कथन भी उद्धृत किया कि भारतीयों ने अपने को रामायण और महाभारत की रचनाऐं कर बचाया है। श्रीबालसुब्रण्यम अपने पाठों में अक्सर अच्छी बातें लिखते हैं और जिनसे प्रेरित होकर लिखने का मन करता है।
अगर हम अंग्रेजी और हिंदी पर कोई संक्षिप्त टिप्पणी करना चाहें तो बस यही कहा जा सकता है कि अंग्रेजी आधुनिक विज्ञान की भाषा है इसलिये उसका प्रचार प्रसार बहुत हुआ पर उसके अविष्कारों से ऊब चुके लोगों को अपने मन की शांति के लिये जिस अभौतिक अविष्कार की आवश्यकता है वह केवल अध्यात्मिक ज्ञान से ही प्राप्त हो सकता है जिसकी भाषा हिंदी है इसलिये इसका प्रसार बढ़ेगा और इसमें अंतर्जाल भी सहायक होगा।
अंतर्जाल पर इस लेखक द्वारा लिखना प्रारंभ करना संयोग था। सच बात तो यह है कि अपने ब्लाग व्यंग्य, कहानियां और कवितायें लिखने के लिये प्रारंभ किया। इससे पूर्व इस लेखक ने कुछ पत्रिकाओं में प्राचीन गं्रथों और महापुरुषों पर संदेशों की वर्तमान संदर्भों की सार्थकता दिखाते हुए कुछ चिंतन लिखे। वह मित्रों और पाठकों ने बहुत पंसद किया और कुछ तो यह कहते थे कि तुम तो केवल इसी विषय पर लिखा करो। बहरहाल जब अंतर्जाल पर लिखना प्रारंभ किया तो अध्यात्मिक विषयों पर लिखने का मन में ऐसे ही विचार आया। तब उनको छदम नाम ‘शब्दलेख सारथी’ से लिखना शुरु किया। इसका मुख्य उद्देश्य यही था कि लोग केवल चिंतन लिखने का आग्रह न करें। अध्यात्मिक विषयों पर लिखने से प्रसिद्धि होती है पर सबसे बड़ी मुश्किल यह होती है कि तब आपसे सिद्ध होने का प्रमाणपत्र भी मांगा जाता है और यकीनन यह लेखक को कोई सिद्ध नहीं है। इसलिये छद्म नाम से लिखकर अपने मन की इच्छा को संतोष प्रदान करने के अलावा कोई ध्येय नहीं था। वह ब्लाग ब्लागस्पाट था और ऐसा लगा रहा था कि कोई ब्लाग वर्डप्रेस पर भी होना चाहिए तब अपने यथार्थ नाम से बने ब्लाग पर लिखना शुरू किया क्योंकि शैली एक जैसी थी इसलिये ही शब्दलेख सारथी पर भी असली नाम लिख दिया। बहरहाल यह अजीब अनुभव हुआ कि संत कबीर, रहीम, तुलसी, श्रीगीता, योग साधना, चाणक्य, विदुर, मनुस्मृति, तथा कौटिल्य का अर्थशास्त्र जैसे विषयों पर लिखने का मतलब यह होता है कि पाठ पठन और पाठकों के आवागमन की चिंता से मुक्त होना। पहले तो सारे ब्लाग पर ही अध्यात्म विषयों पर लिखा फिर तीन ब्लाग निश्चित कर दिये मगर आम पाठकों तक यह बात नहीं पहुंची और वह कुछ ऐसे ब्लाग पर टिप्पणियों में यह बात कह जाते हैं कि कबीर, रहीम तथा अन्य अध्यात्मिक विषयों पर और भी लिखें।
जहां तक पाठ पठन/पाठकों के आवगमन का प्रश्न है ऐसा कौनसा देश है जहां अध्यात्मिक विषयों वाले ब्लाग नहीं खुलते। उन जगहों पर भी जहां विदेशों में अन्य धर्मों के प्रसिद्ध स्थान हैं। अंगे्रजी टूल पर पढ़ने वाले अपनी प्रतिक्रिया देते हैं तो इस बात पर यकीन करना कठिन होता है कि उसने यह पढ़ा भी होगा। इस ब्लाग लेखक के ब्लागों पर पाठ पठन/पाठकों का आवागमन का संख्या में आंकलन किया जाये तो वह प्रतिदिन तेरह से सत्रह सौ के बीच होती है। गूगल की रैंकिंग में चार ब्लाग 4 अंकों के साथ सफलता की तरफ बढ़ रहे हैं इनमें दो केवल अध्यात्म विषयों पर केंद्रित हैं और जो दो अन्य भी है तो उनमें भी उनका योगदान समान रूप से दिखता है।
यह पाठ आत्म प्रचार के लिये नहीं है बल्कि अपना अनुभव मित्र ब्लाग लेखकों और पाठकों के साथ इस उद्देश्य से लिखा जा रहा है कि हिंदी को लेकर अपने मन से कुंठायें निकालें। न केवल अपने मन से भाषा कों लेकर बल्कि अपने धर्म और अपने मूल व्यक्तित्व-जिसको हिंदुत्व भी कह सकते हैं वह भी धर्म को लेकर नहीं-पर कोई कुुंठा न पालें। लोभ, लालच और भौतिकता के भ्रम ने हमें भ्रष्ट कर दिया है पर हमारा अध्यात्म ज्ञान जो कि संस्कृत के साथ अब हिंदी में भी उपलब्ध है दुनियां का सबसे श्रेष्ठ और सत्य ज्ञान हैं-कृपया इसे उन कर्मकांडों से न जोड़ें जो स्वर्ग में दिलाने के लिये होते हैं।
सच बात है कि हमारा सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान संस्कृत में हैं जिससे अनेक भाषायें पैदा हुई हैं पर हिंदी उसकी सबसे बड़ी बेटी मानी जाती है और उसमें समस्त ज्ञान-निष्काम भाव वाले हिंदी विद्वानों और धनपतियों की वजह से-हिंदी में उपलब्ध है। वैसे ही कुछ विद्वान कहते हैं कि हिंदी एक नयी भाषा है जो अपने पांव पसारेगी न कि सिमटेगी। भारत में विदेशों को देखकर अपनी हिंदी से अंग्रेजी को श्रेष्ठ मानना एक भ्रम है। इस चक्कर में अनेक लोग न तो हिंदी अच्छी सीख पाते हैं न ही अंग्रेजी। वह अच्छा कमा लेते हैं। उनकी इज्जत भी होती है पर उनका जुबान बंद रखना एक अच्छा विचार माना जाता है क्योंकि जब वह बोलते हैं तो समझ में नहीं आता। उनका चेहरा चमकता रहे इससे बाजार में सौदागर कमाते हैं। वह खेलते या दौड़ते हैं तो पैसा बरसता है पर उनके मूंह से शब्द निकलते ही उनके प्रशसंकों को चेहरा उतर जाता है। कम से कम वह विशुद्ध हिंदी भाषियों के समाज में उठने बैठने लायक नहीं रहते। कहा जाता है इस देश में अंग्रेजी केवल दो प्रतिशत लोग जानते हैं पर इस लेखक को शक है कि इसमें भी दो प्रतिशत लोगों को अंग्रेजी अच्छी आती होगी। अलबत्ता उनके हावभाव और शब्दों से दूसरे को बात समझ में आ जाती होगी इसलिये उनको जवाब मिल जाता है। वैसे भी इस लेखक ने अनेक बार टूलों से हिंदी का अंग्रेजी में अनुवाद कर दूसरों को भेजा है और उसका जवाब वैसा ही आया है जैसी कि अपेक्षा थी और इन टूलों के चलते अब अंग्रेजी में लिख पाने या हिंदी लेखक होने की कुंठा नहीं होती। यह यकीन हो गया है कि हिंदी निश्चित रूप से विश्व की भाषा बनेगी क्योंकि यह अध्यात्म की भाषा है। भारत में इसका क्या स्वरूप होगा कहना कठिन है? इस पर फिर कभी।
साभार
हिंदी सचमुच विश्व भाषा बन चुकी है
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