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पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ियों पर दंड का मामला-आलेख (punishment to pakistani cricket player-hindi article)


पैसे का खेल हो या पैसे से खेल हो, दोनों स्थितियों उसके उतार चढ़ाव को समझना कठिन हो जाता है क्योंकि कहीं न कहीं बाजार प्रबंधन उसे प्रभावित अवश्य करता है। हम यहां बात क्रिकेट की कह रहे हैं जो अब खेल बल्कि एक सीधे प्रसारित फिल्म की तरह हो गया है जिसमें खिलाड़ी के अभिनय को खेलना भी कहा जा सकता है। इस चर्चा का संदर्भ यह है कि पाकिस्तान के सात खिलाड़ियों को दंडित कर दिया गया है।
बात ज्यादा पुरानी नहीं है। भारत में आयोजित एक क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में-जिसमें विभिन्न देशों के खिलाड़ियों को नीलामी में खरीदकर अंतर्राष्ट्रीय होने का भ्रम पैदा किया जाता है-पाकिस्तान के खिलाड़ियों को नहीं खरीदा गया। उस समय पाकिस्तान के प्रचार माध्यमों से अधिक भारतीय प्रचार माध्यमों में अधिक गम जताया गया। अनेक लोगों ने तो यहां तक कहा कि दोनों देशों के बीच मित्रता स्थापित करने वालों के प्रयासों को इससे धक्का लगेगा-जहां धन की महिमा है जिसकी वजह से बुद्धिजीवियों  लोगों की राजनीतिक सोच भी कुंद हो जाती है।
भारतीय फिल्मों एक अभिनेता ने-उसके भी भारतीय फिल्म उद्योग में नंबर होने का भ्रम अक्सर पैदा किया जाता है-तो यहां तक सवाल पूछा था कि आखिर बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता जीतने वाले पाकिस्तान के किसी खिलाड़ी को इस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में भाग लेने के लिये क्यों नहीं खरीदा गया?
दिलचस्प बात यह कि यह अभिनेता स्वयं एक ऐसे ही क्लब स्तरीय टीम का स्वामी है जो इस प्रतियोगिता में भाग लेती है। उसका प्रश्न पूछना एकदम हास्यास्पद तो था ही इस बात को भी प्रमाणित करता है कि धन से खेले जाने वाले इस खेल में वह एक टीम का नाम का ही स्वामी है और उसकी डोर तो बाजार के अदृश्य प्रबंधकों के हाथ में है। बहरहाल अब तो सवाल उन लोगों से भी किया जा सकता है जो बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता विजेता का हवाला देकर पाकिस्तान के खिलाड़ियों को न बुलाने की आलोचना कर रहे थे या निराशा में सिर पटक रहे थे। कोई देश के समाजसेवकों पर तो कोई पूंजीपतियों पर बरस रहा था।
पाकिस्तान ने एक ही झटके में सात खिलाड़ियों को दंडित किया है। इनमें दो पर तो हमेशा के लिये ही अतंराष्ट्रीय प्रदर्शन पर रोक लगा दी है। आधिकारिक रूप से टीम के आस्ट्रेलिया में कथित खराब प्रदर्शन को जिम्मेदार बताया गया है। कुछ अखबारों ने तो यहां तक लिखा है कि इन पर मैच फिक्सिंग का भी आरोप है-इस पर संदेह इसलिये भी होता है क्योंकि आजीवन प्रतिबंध लगाने के पीछे कोई बड़ा कारण होता है। यदि खराब प्रदर्शन ही जिम्मेदार था तो टीम से सभी को हटाया जा सकता है दंड की क्या जरूरत है? दुनियां में हजारों खिलाड़ी खेलते हैं और टीमें किसी को रखती हैं तो किसी को हटाती हैं। दंड की बात तो वहां आती है जहां खेल में अपराध का अहसास हो।
जिस टीम और खिलाड़ियों ने पाकिस्तान को विश्व विजेता बनाया उनको एक दौरे में खराब प्रदर्शन पर इतनी बड़ी सजा मिली तब खराबा प्रदर्शन की बात पर पर कौन यकीन कर सकता है?
फिर पाकिस्तान की विश्व विजेता छबि के कारण उसके खिलाड़ियों को भारत में क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में शामिल न करने की आलोचना करने वाले अब क्या कहेंगे? उस समय उन्होंने जो हमदर्दी दिखाई गयी थी क्या अब वह जारी रख सकते हैं यह कहकर कि उनको टीम से क्यों निकाला गया? फिर भारतीय धनपतियों पर संदेह करने का कारण क्या था क्योंकि उस समय पाकिस्तान की टीम आस्ट्रयेलिया में दौरे पर थी और उसका प्रदर्शन अत्यंत खराब और विवादास्पद चल रहा था तब भला उसके खिलाड़ियों को कैसे वह बुलाते? क्योंकि उनका खेल खराब चल ही रहा था साथ ही वह तमाम तरह के विवाद भी खड़े कर रहे थे तब भला कोई भारतीय धनपति कैसे जोखिम उठाता?
वैसे अगर कोई बुद्धिमान पाकिस्तान पर बरसे तो उसका विरोध नहीं करना चाहिये। कम से कम इस खेल में हमारा मानना है कि दोनों देशों की मित्रता असंदिग्ध (!) है। अगर कुछ पीड़ित पाकिस्तान खिलाड़ियों के समर्थन में कोई प्रचार अभियान छेड़े तो भी मान्य है। मामला खेल का है जिसमें पैसा भी शामिल है और मनोरंजन भी! हैरान की बात तो यह है कि जिन खिलाड़ियों के भारत न आने पर यहीं के कुछ बुद्धिजीवी, नेता तथा समाजसेवक विलाप कर रहे थे-कुछ शरमा भी रहे थे-उनको टीम से हटाने में पाकिस्तान क्रिकेट अधिकारियों को जरा भी शर्म नहीं आयी। कितनी विचित्र बात है कि क्रिकेट के मामले में भी उन्होंने भारत के कुछ कथित बुद्धिजीवियों से अपनी दोस्ती नहीं निभाई जिसका आसरा अक्सर किया जाता है।
एक मजे की बात यह है कि पाकिस्तान के आस्ट्रेलिया दौरे पर खराब प्रदर्शन की जांच करने वाली वहां की एक संसदीय समिति की सिफारिश पर ऐसा किया गया है। जाहिर तौर उसमें वहां के राजनीतिज्ञ होंगे। ऐसे में वहां के भी उन राजनीतिज्ञों की प्रतिक्रिया भी देखने लायक होगी जो अपने कथित विश्व विजेताओं-अजी काहे के विश्व विजेता, दुनियां में आठ देश भी इस खेल को नहीं ख्ेालते-को भारत में बुलाने पर गर्म गर्म बयान दे रहे थे। अब उनको भी क्या शर्म आयेगी?
हमारा मानना है कि क्रिकेट कितना भी लोकप्रिय हो पर उसमें पैसे का भी  खेल  बहुत है। जहां पैसा है वहां प्रत्यक्ष ताकतें अप्रत्यक्ष रूप से तो अप्रत्यक्ष ताकतें प्रत्यक्ष रूप से अपना प्रभाव दिखाती हैं और यही इन खिलाड़ियों के दंड की वजह बना। वजह जो बतायी जा रही है उस पर यकीन करना ही पड़ेगा क्योंकि हम जैसे आम लोगों के लिये पर्दे के पीछे झांकना तो दूर वहां तक पहुंचना भी कठिन है। जो खास लोग पर्दे के पीछे झांकने की ताकत रखते हैं वह सच छिपाने में भी माहिर होते हैं इसलिये वह कभी सामने नहीं आयेगा! टीवी चैनलों और समाचार पत्र पत्रिकाओं में छपी खबरों के आधार पर तो अनुमान ही लगाये जा सकते हैं।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

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कैसे होगा चंद्रमा की जमीन का बंटवारा-व्यंग्य आलेख


अब चंद्रमा पर धरती पर तमाम देशों के अधिकार की बात शुरु हो गयी है। अखबार में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार कुछ जागरुक लोगों मांग की है कि जिस तरह विश्व के अनेक देशों के अंतरिक्ष यान चंद्रमा के चक्कर लगा रहे हैं और वह सभी भविष्य में अपना वहां अधिकार वहां की जमीन पर जमा सकते हैं इसलिये एक कानून बना कर भविष्य में किसी विवाद से बचना चाहिए। एक बात तय है कि चंद्रमा पर पहुंचने वाले वही देश होंगे जो आर्थिक और तकनीकी दोनों ही दृष्टि से संपन्न हों। इस विश्व में ऐसे देशोें की संख्या पंद्रह से बीस ही होगी अधिक नहीं।

चंद्रमा की जमीन पर अधिकार को लेकर नियम बनाने वालों की मांग करने वालों का कहना है कि जिस तरह हर देश के समुद्र और आकाश का बंटवारा हुआ है वैसे ही चंद्रमा की जमीन का बंटावारा होना चाहिये। अब सवाल यह है कि समुद्र और आकाश का बंटवारा तो देशों की सीमा के आधार पर हुआ है जो कभी बदलते नहीं है पर चंद्रमा तो घूमता रहता है। फिर अपने आकाश और समुद्री सीमा की रक्षा के लिये सभी देश अपने यहां सेना रखते हैं पर चंद्रमा पर अपने क्षेत्र की रक्षा करने के लिये तभी समर्थ हो पायेंगे जब वहां पहुंच पायेंगे। बहरहाल इसलिये संभावना ऐसी ही हो सकती है कि जो देश वहां पहुंच सकते हैं उनमें ही यह बंटवारा हो।

अगर चंद्रमा की जमीन का बंटावारा हुआ तो उसका आधार यह भी बनेगा कि जो देश वहां पहुंच सकते हैं उनके देशों का क्षेत्रफल देखते हुए उसी आधार पर चंद्रमा की जमीन भी तय हो जाये। यानि समर्थवान देशोंे का क्षेत्रफल एक इकाई मानकर उसे चंद्रमा की पूरी जमीन के क्षेत्रफल से तोला जायेगा। उसके आधार पर जिसका हिस्सा बना वह उसका मालिक मान लिया जायेगा।

बाकी देशों का तो ठीक है भारत का क्षेत्रफल तय करने में भारी दिक्कत आयेगी भले ही भारत को उसी आधार पर चंद्रमा पर जमीन मिले जितना उसका क्षेत्रफल है। यह समस्या चीन और पाकिस्तान से ही आयेगी। चीन कहेगा कि अरुणांचल के क्षेत्र बराबर की जमीन भारत के हिस्से से कम कर उसे दी जाये तो पाकिस्तान कहेगा कि कश्मीर बराबर हिस्से की जमीन उसे दी जाये और वह उसे चीन को देगा। पाकिस्तान अभी चंद्रमा पर स्वयं पहुंचने की स्थिति में नहीं है।

वह वहां पहुंचकर भारत से तो नहीं लड़ सकता पर उसके मित्र ऐसे हैं जो उसके बिना चल ही नहीं सकते। फिर वह मित्र ऐसे हैं जो भारत को सहन नहीं कर सकते इसलिये वह पाकिस्तान को भले ही वहां न ले जायें पर उसका नाम लेकर भारत के लिये वहां भी संकट खड़ा कर सकते हैं।

वैसे देखा जाये तो जब से भारत ने चंद्रयान भेजा उसके खिलाफ गतिविधियां कुछ अधिक बढ़ ही गयीं हैं। कहने को अनेक देश भारत के साथ मित्रता का प्रदर्शन कर रहे हैं पर उनके दिल में पाकिस्तान ही बसता है और उनके लिये यह मुश्किल है कि वह चंद्रमा पर उसे भूल जायें-खासतौर भारत उनके सामने चुनौती की तरह खड़ा हो।

इस विवाद में पाकिस्तान के मित्र निश्चित रूप से उसका पक्ष लेकर झगड़ा करेंगे। अगर बैठक चंद्रमा पर होगी तो वह कहेंगे कि चूंकि भारत यहां एक दावेदार है उसके विरोधी पाकिस्तान का मौजूद रहना आवश्यक है सो बैठक जमीन पर ही हो। जमीन पर होगी तो कहेंगे कि पहले आपस में तय कर लो कि ‘वहां की जमीन का बंटवारा कैसे हो?’
सोवियत संघ एतिहासिक गलती ने पाकिस्तान को अमृतपान करा लिया है इसलिये यह देश आज हर उस देश को प्रिय है जो कभी सोवियत संध के विरोधी थे। 31 वर्ष पूर्व सोवियत संघ ने अफगानिस्तन में घुसपैठ की थी तब पश्चिम के सोवियत विरोधियों के लिये पाकिस्तान ही एक सहारा बना और उसे खूब हथियार और पैसा मिलने लगा। उसने वहां आतंकवाद जमकर फैलाया। सोवयत संघ को वहां से हटना पड़ा और उसके बाद तो पाकिस्तान के पौबारह हो गये। एक तरह से पूरा अफगानिस्तान उसके कब्जे में आ गया। मगर हालत अब बदले हैं तो वहां फिर अफगानियों का शासन आ गया पर पाकिस्तान अपनी खुराफतों से वहां भी आतंक फैलाये हुए है। वह अफगानिस्तान को अपने हाथ से छिनता नहीं देख पा रहा हैं।

अखबारों में यह भी पढ़ने में आया कि वहां तो बच्चों को स्कूल में ही भारत विरोधी शिक्षा दी जाती है। कहने को तो सभी भारतीय चैनल कह रहे हैं कि सारी दुनियां पाकिस्तान की औकात देख रही है। हो सकता है कि यह सच हो पर इसका एक पक्ष दूसरा भी है कि ‘पाकिस्तान बाकी दुनियां की औकात भारतवासियों को दिखा रहा है कि देखो अपने आतंक से सभी घबड़ाते हैं पर दूसरे का यहां फैला आतंकवाद उनको बहुत भाता है। भारत को शाब्दिक रूप से सहानुभूति सभी ने दी है पर किसी में पाकिस्तान के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की।

सभी देशों अब यह कह रहे हैं कि ‘आपस में बातचीत कर लो’। जब चंद्रमा पर जमीन का आवंटन होगा तब भी यही कहेंगे कि ‘पहले आपस में बातचीत कर लो।‘
इस तरह बाकी देश अपनी जमीन बांट लेंगे और भारत से कहेंगे कि ‘जब आपका पाकिस्तान से फार्मूला तय हो जाये तब जमीन आवंटित हो जायेगी।’

तब तक भारत क्या करेगा? उसके अंतरिक्ष यान क्या चंद्रमा की जमीन पर नहीं उतरेंगे? उतरेंगे तो सही पर उससे उसकी फीस मांगी जायेगी। जिस देश की जमीन पर उतरेगा उससे अनुमति मांगनी होगी। यह कहा जाये कि ‘आपका हक तो बनता है पर अभी आपको जमीन का आवंटन नहीं हुआ है।’

अगर हम तर्क देंगे कि ‘पाकिस्तान तो चंद्रमा पर पहुंच नहीं सकता तो उसके हक पर विवाद क्यों उठाया जा रहा है।’
दरअसल समस्या पाकिस्तान नहीं है। उसने अपनी स्थिति इस तरह बना ली है कि उसकी उपेक्षा तो कोई कर ही नहीं सकता। उसके पीछे फारस की खाड़ी तक फैले देश हैं जिनके पास तेल और गैस के कीमती भंडार हैं और बाकी अन्य ताकतवर देश उनके यहां पानी भरते हैं और वह सभी पाकिस्तान के बिना चल नहीं सकते।
कुल मिलाकर चंद्रमा पर जमीन विवाद में पाकिस्तान कोई कम संकट खड़े नहीं करेगा। उसके मित्र देश भी उसका फायदा उठाकर भारत की जमीन हथियाने का प्रयास करेंगे। हां, ऐसे में भारत के मित्र सोवियत संघ से ही उम्मीद की जा सकती है पर वहां भी उसने ऐसा कुछ किया तो पाकिस्तान के मित्र देश उसको चंद्रमा पर कर्ज या उधार के अंतरिक्ष यान देकर पहुंचा देंगे। वह हर हालात में लड़ेगा भारत ही। उसका एक ही आधार है भारत से लड़ना चाहे वह जमीन हो या चंद्रमा!’
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सीमित सैन्य कार्यवाही तो की जा सकती है-आलेख


अगर संकेतों को साफ समझें तो आने वाले दिनों में भारत और पाकिस्तान के बीच कुछ घटने वाला है। मुंबई में हुए आतंकी हमले में पाकिस्तान की जमीन उपयोग करने का प्रमाण साफ मिल गया है और जिस तरह हमले में विदेशी नागरिक मरे हैं उसका विश्वाव्यापी प्रभाव हुआ है और पूरी दुनियां भारत की तरफ देख रही है कि वह कार्यवाही करता है।
राजनीति और सैन्य विशेषज्ञों की राय तो यही है कि पाकिस्तान के साथ जो इस समय राजनीतिक तौर पर सौहार्दपूर्ण संबंध हैं उसके चलते सीधी सैन्य कार्यवाही की धमकी देना ठीक नहीं है पर सीमित मात्रा में उसके आतंकी इलाकों पर हमला कर देना चाहिये। यह राय जो विशेषज्ञ दे रहे हैं वह न केवल अनुभवी हैं बल्कि उनका सम्मान भी हर कोई करता है।

भारत पाकिस्तान के बीच कोई बड़ा युद्ध होगा इसकी संभावना अगर न ही लगती तो यह भी लगता है कि कुछ न कुछ होगा। क्या होगा? इसका उत्तर देने से पहले पाकिस्तान की अंदरूनी स्थिति को समझना जरूरी है। पाकिस्तान में इस समय लोकतंत्र है। मुंबई के आतंकी हमले को लेकर वहां के लोकतांत्रिक नेताओं पर सीधे कोई आरोप नहीं लगा रहा। भारत भी नाराज बहुत है फिर भी वहां के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के प्रतिकूल कोई टिप्पणी नहीं दिखाई दे रही। दोनों नये हैं और लोकतांत्रिक नेता होने के नाते जानते हैं कि इस हमले से भारत ही नहीं बल्कि विश्व के सभी लोग उससे नाराज हैं। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ जरदारी तो भारत के साथ मित्रता के लिये अनेक बयान दे चुके हैं। प्रधानमंत्री गिलानी भी कोई भारत के विरुद्ध कोई अनर्गल बात नहीं कहते। इन दोनों के साथ कठिनाई यह है कि सेना पर अभी तक इनका वर्चस्व स्थापित नहीं हो सका है। दोनों साफ नहीं कहते पर यह सच है कि दोनों ही सेना से डरे हुए हैं और वह जानते हैं कि उनकी खुफिया ऐजेंसी आई.एस.आई. सेना और अपराधी शामिल भारत में आतंकी गतिविधियों में हैं पर कोई कार्यवाही कर पायेंगे इसमें संदेह है।

इन दोनों में भी एक अंतर है। जरदारी सिंध और गिलानी पंजाब प्रांत के हैं । पाकिस्तान में चार प्रांत हैं-पंजाब,सिंध,सीमा प्रांत, और बलूचिस्तान। आजादी के बाद पंजाब प्रांत का ही प्रभाव बाकी तीनों प्रांतों पर रहा है। सेना और प्रशासन पर उनका वर्चस्व रहा है पर बाकी तीनों प्रांतों में लोग आज भी पाकिस्तान का हृदय से अस्तित्व नहीं स्वीकार करते। भारत के विरुद्ध सबसे अधिक सक्रियता पंजाब प्रांत के लोग ही दिखाते हैं। शुरु में कबायली लोगों ने कश्मीर पर कब्जा करने में पाकिस्तान की सहायता अवश्य की थी पर बाद वह भी वहां की सरकार से असंतुष्ट हो गये। गिलानी भले ही पीपुल्स पार्टी के हैं और उन पर आसिफ जरदारी का पूरा नियंत्रण लगता है पर उनका पंजाबी होना भी यह संदेह पैदा करता है कि वह शायद ही भारत के हितचिंतक हों। जरदारी उस सिंध के हैं जो पाकिस्तान भक्ति से कोसों दूर हैं। बलूचिस्तान और सीमाप्रांत तो नाम के लिये ही पाकिस्तान का भाग हैं बाकी वहां के लोग अपना स्वायत्त जीवन जीते हैं।

सबसे बड़ी बात यह है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ जरदारी ने तो पहले स्वयं ही माना है कि मुंबई में हुए हमले में उनके देश के उन तत्वों का हाथ हो सकता है जो दोनों के बीच दुश्मनी कराना चाहते हैं। उन्होंने तो यहां तक कहा है कि ‘उनकी सजा हमें क्यों देते हो?’ हालांकि बाद में भारत द्वारा 20 आंतकवादी मांगने के बाद उन्होंने इस बात से इंकार कर दिया। इससे यह तो पता चलता है कि पाकिस्तान में पंजाब की लाबी बहुत प्रभावी है और उसकी सहमति के बिना वहां काम करना कठिन है।

पाकिस्तान में लोकतांत्रिक सरकार होने के कारण भारत भी फूंक फूंक कर कदम रख रहा है क्योंकि वह ऐसा कोई काम नहीं करना चाहता कि वहां की लोकतांत्रिक सरकार वहां अलोकप्रिय हो। ऐसे पाकिस्तान के अंदर सीमित कार्यवाही करने की संभावना बनती दिख रही है हालांकि पाकिस्तानी सेना की इस पर क्या प्रतिक्रिया होगी यह भी देखने वाली बात है। इस सीमित कार्यवाही में पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकी शिविरों पर हमला करना भी शामिल है। वैसे अधिकतर विशेषज्ञ पाकिस्तान का बंटवारा करवाने के पक्ष में नहीं है पर कुछ लोग मानते हैं कि वहां की अदंरूनी राजनीति के गड़बड़झाले का लाभ उठाते हुए उसका विभाजन करना भी बुरा नहीं है।

भारतीय रक्षा,राजनीति और विदेश नीति विशेषज्ञ भी मानते हैं कि काबुल में हुए भारतीय दूतावास और अब मुंबई पर हमले में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी,सेना और अपराधियों का हाथ तो है पर वहां के प्रधानमंत्री,राष्ट्रपति और अन्य लोकतांत्रिक नेता उनसे जुड़े नहीं है। ऐसे में आक्रमण की स्थिति होने पर वहां की लोकतांत्रिक सरकार भला कैसे चुप बैठ सकती है? आखिर कैसे वह भारत का समर्थन कर सकते है?’

पाकिस्तान का पूरा प्रशासन तंत्र अपराधियों के सहारे पर टिका है। वहां की सेना और खुफिया अधिकारियों के साथ वहां के अमीरों को दुनियां भर के आतंकियों से आर्थिक फायदे होते हैं। एक तरह से वह उनके माईबाप हैं। यही कारण है कि भारत ने तो 20 आतंकी सौंपने के लिये सात दिन का समय दिया था पर उन्होंने एक दिन में ही कह दिया कि वह उनको नहीं सौंपेंगे। वैसे देखा जाये तो काबुल दूतावास पर भारतीय दूतावास पर हमले पर भारत में उच्च स्तर पर कड़ी प्रतिक्रिया हुई थी पर चूंकि आम जनता उससे सीधे जुड़ी नहीं थी इसलिये इसका भारतीय प्रचार माध्यमों ने प्रचार भी नहीं किया। वैसे भी प्रचार माध्यम इस समय भले ही पाकिस्तान के प्रति रोष दिखा रहे हैं पर यही अपने कार्यक्रमों और प्रकाशनों में वहां के लोगों को स्थान देने के लालायित रहते हैं। भारतीय प्रचार माध्यम पाकिस्तान से आम आदमी के स्तर पर सपंर्क के नाम पर वहां के कुछ खास लोगों का यहां अपने व्यवसायिक उपयोग करते हैं। आज जब मुंबई पर हमला हुआ है तब उन्हें पाकिस्तान खलनायक नजर आ रहा है पर इस प्रचार में भी उनका व्यवसायिक भाव दिख रहा है-दिलचस्प बात यह है कि पाकिंस्तान से सभी प्रकार के संपर्क तोड़ने का नारा कोई नहीं लगा रहा है क्योंकि सभी अपने भविष्य की व्यवसायिक संभावनाओं को जीवित रखना चाहते हैं।

बहरहाल आने दिनों वाले में क्या होगा? कुछ नहीं कहा जा सकता है पर इतना तय है कि भारत और पाकिस्तान में अंदरूनी राजनीतिक गतिविधियां तीव्र हो जायेंगी। अगर आगे आतंकी घटनायें रोकनी हैं तो कुछ कठोर कदम तो उठाने ही होंगे। सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो फिर लोगों को समझाना कठिन होगा। पाकिस्तान के खिलाफ एक बड़ा युद्ध न भी हो पर सीमित कार्यवाही अवश्यंभावी प्रतीत होती है क्योंकि इसके बिना भारत के शक्तिशाली होने का प्रमाण नहीं मिल सकता। अब यह देखने वाली बात होगी कि आगे क्या होता है? एक बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि जब तक भारत इस आतंकवाद का मूंहतोड़ जवाब नहीं देता तब तक लोग उसकी शक्ति पर यकीन नहीं करेंगे।
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