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पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ियों पर दंड का मामला-आलेख (punishment to pakistani cricket player-hindi article)


पैसे का खेल हो या पैसे से खेल हो, दोनों स्थितियों उसके उतार चढ़ाव को समझना कठिन हो जाता है क्योंकि कहीं न कहीं बाजार प्रबंधन उसे प्रभावित अवश्य करता है। हम यहां बात क्रिकेट की कह रहे हैं जो अब खेल बल्कि एक सीधे प्रसारित फिल्म की तरह हो गया है जिसमें खिलाड़ी के अभिनय को खेलना भी कहा जा सकता है। इस चर्चा का संदर्भ यह है कि पाकिस्तान के सात खिलाड़ियों को दंडित कर दिया गया है।
बात ज्यादा पुरानी नहीं है। भारत में आयोजित एक क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में-जिसमें विभिन्न देशों के खिलाड़ियों को नीलामी में खरीदकर अंतर्राष्ट्रीय होने का भ्रम पैदा किया जाता है-पाकिस्तान के खिलाड़ियों को नहीं खरीदा गया। उस समय पाकिस्तान के प्रचार माध्यमों से अधिक भारतीय प्रचार माध्यमों में अधिक गम जताया गया। अनेक लोगों ने तो यहां तक कहा कि दोनों देशों के बीच मित्रता स्थापित करने वालों के प्रयासों को इससे धक्का लगेगा-जहां धन की महिमा है जिसकी वजह से बुद्धिजीवियों  लोगों की राजनीतिक सोच भी कुंद हो जाती है।
भारतीय फिल्मों एक अभिनेता ने-उसके भी भारतीय फिल्म उद्योग में नंबर होने का भ्रम अक्सर पैदा किया जाता है-तो यहां तक सवाल पूछा था कि आखिर बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता जीतने वाले पाकिस्तान के किसी खिलाड़ी को इस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में भाग लेने के लिये क्यों नहीं खरीदा गया?
दिलचस्प बात यह कि यह अभिनेता स्वयं एक ऐसे ही क्लब स्तरीय टीम का स्वामी है जो इस प्रतियोगिता में भाग लेती है। उसका प्रश्न पूछना एकदम हास्यास्पद तो था ही इस बात को भी प्रमाणित करता है कि धन से खेले जाने वाले इस खेल में वह एक टीम का नाम का ही स्वामी है और उसकी डोर तो बाजार के अदृश्य प्रबंधकों के हाथ में है। बहरहाल अब तो सवाल उन लोगों से भी किया जा सकता है जो बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता विजेता का हवाला देकर पाकिस्तान के खिलाड़ियों को न बुलाने की आलोचना कर रहे थे या निराशा में सिर पटक रहे थे। कोई देश के समाजसेवकों पर तो कोई पूंजीपतियों पर बरस रहा था।
पाकिस्तान ने एक ही झटके में सात खिलाड़ियों को दंडित किया है। इनमें दो पर तो हमेशा के लिये ही अतंराष्ट्रीय प्रदर्शन पर रोक लगा दी है। आधिकारिक रूप से टीम के आस्ट्रेलिया में कथित खराब प्रदर्शन को जिम्मेदार बताया गया है। कुछ अखबारों ने तो यहां तक लिखा है कि इन पर मैच फिक्सिंग का भी आरोप है-इस पर संदेह इसलिये भी होता है क्योंकि आजीवन प्रतिबंध लगाने के पीछे कोई बड़ा कारण होता है। यदि खराब प्रदर्शन ही जिम्मेदार था तो टीम से सभी को हटाया जा सकता है दंड की क्या जरूरत है? दुनियां में हजारों खिलाड़ी खेलते हैं और टीमें किसी को रखती हैं तो किसी को हटाती हैं। दंड की बात तो वहां आती है जहां खेल में अपराध का अहसास हो।
जिस टीम और खिलाड़ियों ने पाकिस्तान को विश्व विजेता बनाया उनको एक दौरे में खराब प्रदर्शन पर इतनी बड़ी सजा मिली तब खराबा प्रदर्शन की बात पर पर कौन यकीन कर सकता है?
फिर पाकिस्तान की विश्व विजेता छबि के कारण उसके खिलाड़ियों को भारत में क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में शामिल न करने की आलोचना करने वाले अब क्या कहेंगे? उस समय उन्होंने जो हमदर्दी दिखाई गयी थी क्या अब वह जारी रख सकते हैं यह कहकर कि उनको टीम से क्यों निकाला गया? फिर भारतीय धनपतियों पर संदेह करने का कारण क्या था क्योंकि उस समय पाकिस्तान की टीम आस्ट्रयेलिया में दौरे पर थी और उसका प्रदर्शन अत्यंत खराब और विवादास्पद चल रहा था तब भला उसके खिलाड़ियों को कैसे वह बुलाते? क्योंकि उनका खेल खराब चल ही रहा था साथ ही वह तमाम तरह के विवाद भी खड़े कर रहे थे तब भला कोई भारतीय धनपति कैसे जोखिम उठाता?
वैसे अगर कोई बुद्धिमान पाकिस्तान पर बरसे तो उसका विरोध नहीं करना चाहिये। कम से कम इस खेल में हमारा मानना है कि दोनों देशों की मित्रता असंदिग्ध (!) है। अगर कुछ पीड़ित पाकिस्तान खिलाड़ियों के समर्थन में कोई प्रचार अभियान छेड़े तो भी मान्य है। मामला खेल का है जिसमें पैसा भी शामिल है और मनोरंजन भी! हैरान की बात तो यह है कि जिन खिलाड़ियों के भारत न आने पर यहीं के कुछ बुद्धिजीवी, नेता तथा समाजसेवक विलाप कर रहे थे-कुछ शरमा भी रहे थे-उनको टीम से हटाने में पाकिस्तान क्रिकेट अधिकारियों को जरा भी शर्म नहीं आयी। कितनी विचित्र बात है कि क्रिकेट के मामले में भी उन्होंने भारत के कुछ कथित बुद्धिजीवियों से अपनी दोस्ती नहीं निभाई जिसका आसरा अक्सर किया जाता है।
एक मजे की बात यह है कि पाकिस्तान के आस्ट्रेलिया दौरे पर खराब प्रदर्शन की जांच करने वाली वहां की एक संसदीय समिति की सिफारिश पर ऐसा किया गया है। जाहिर तौर उसमें वहां के राजनीतिज्ञ होंगे। ऐसे में वहां के भी उन राजनीतिज्ञों की प्रतिक्रिया भी देखने लायक होगी जो अपने कथित विश्व विजेताओं-अजी काहे के विश्व विजेता, दुनियां में आठ देश भी इस खेल को नहीं ख्ेालते-को भारत में बुलाने पर गर्म गर्म बयान दे रहे थे। अब उनको भी क्या शर्म आयेगी?
हमारा मानना है कि क्रिकेट कितना भी लोकप्रिय हो पर उसमें पैसे का भी  खेल  बहुत है। जहां पैसा है वहां प्रत्यक्ष ताकतें अप्रत्यक्ष रूप से तो अप्रत्यक्ष ताकतें प्रत्यक्ष रूप से अपना प्रभाव दिखाती हैं और यही इन खिलाड़ियों के दंड की वजह बना। वजह जो बतायी जा रही है उस पर यकीन करना ही पड़ेगा क्योंकि हम जैसे आम लोगों के लिये पर्दे के पीछे झांकना तो दूर वहां तक पहुंचना भी कठिन है। जो खास लोग पर्दे के पीछे झांकने की ताकत रखते हैं वह सच छिपाने में भी माहिर होते हैं इसलिये वह कभी सामने नहीं आयेगा! टीवी चैनलों और समाचार पत्र पत्रिकाओं में छपी खबरों के आधार पर तो अनुमान ही लगाये जा सकते हैं।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

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दक्षिण भारत के लोगों की भावुकता अस्वाभाविक नहीं-आलेख (bhakti bhav in south india-hindi lekh)


फिल्मी अभिनेताओं और नेताओं के प्रति दक्षिण भारतीय लोगों की भावुकता देखकर अनेक लोग हतप्रभ रह जाते हैं। दक्षिण भारतीय जहां अपने नेताओं और अभिनेताओं के जन्म दिन पर अत्यंत खुशी जाहिर करते हैं वहीं उनके साथ हादसा होने पर गमगीन हो जाते हैं। इतना ही नहीं उनके निधन पर कुछ लोगों को इतना धक्का पहुंचता है कि उनकी मौत हो जाती है या कुछ आत्महत्या कर लेते हैं। इस पर भारत के अन्य दिशाओं तथा शेष विश्व के लोगों को बहुत हैरानी होती है मगर बहुत कम लोग इस बात को जानेंगे और समझेंगे कि उनकी यह भावुकता एकदम स्वाभाविक है। जिन लोगों को भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की समझ है वह दक्षिण भारतीयों के इस तरह के भक्ति भाव पर बिल्कुल आश्चर्य नहीं करते।
कई बातें तर्क से परे होती हैं और जहां मनोविज्ञान हो तो तर्क ढूंढना कोई आसान नहीं होता। इससे पहले कि हम दक्षिण भारतीयों की स्वाभाविक भावुकता पर दृष्टिपात करें उससे पहले श्रीगीता का यह संदेश समझे लें कि यह पूरा विश्व त्रिगुणमयी माया के वशीभूत हो रहा है और गुण ही गुणों को बरतते हैं। स्पष्तः हमारी देह में तीन गुणों में से-सात्विक, राजस और तामस- कोई एक मौजूद रहता है और उनका निर्माण हमारे अंदर खानपान, जलवायु और संगत से ही होता है उसी के वशीभूत होकर काम करते है। । ऐसा लगता है कि दक्षिण की जलवायु में ही कुछ ऐसा है जो वहां के लोगों में भक्ति का भाव एकदम शुद्ध रूप से मौजूद होता है और सच कहें तो वह एकदम पवित्र होता है। वजह यह है कि भक्ति का जन्म ही द्रविण प्रदेश में होता है। वहां वह एकदम बाल्यकाल में होती है और हम सभी जानते हैं कि यह काल ही भगवत्स्वरूप होता है।
श्रीमद्भागवत में प्रारंभ में ही एक कथा आती है जिसमें वृंदावन में पहुंची भक्ति की मुलाकात श्री नारद जी से होती है। वह वहां सुंदर युवती के रूप में थी पर उसके साथ दो बूढ़े थे जो कि उसके पुत्र वैराग्य और ज्ञान थे। वह करूणावस्था में थी और नारद जी को अपनी कथा सुनाते हुए कहती है कि ‘मेरा जन्म द्रविण प्रदेश में हुआ। कर्नाटक प्रदेश में पली बढ़ी और महाराष्ट्र में कुछ जगह सम्मानित हुई पर गुजरात में मुझे बुढ़ापा आ गया। इधर वृंदावन में आई तो मुझे तो तरुणावस्था प्राप्त हो गयी।’
हम यहां कथा का संदर्भ केवल दक्षिण तक ही सीमित रखें तो समझ सकते हैं कि वहां की जलवायु, अन्न जल तथा मिट्टी में ही कुछ ऐसा होता है कि लोगों की भक्ति एकदम शिशु मन की तरह पवित्र तथा कोमल होती है। भक्ति तो वह अदृश्य देवी है जो हर मनुष्य के मन में विचरती है और चाहे इंसान जैसा भी हो उसको इसका सानिध्य मिलता है क्योंकि कोई भी इंसान ऐसा नहीं हो सकता हो जो किसी व्यक्ति से प्रेम न करता हो। बुरा से बुरा आदमी भी किसी न किसी से प्रेम करता है। भक्ति हमारे अंदर सारे भावों की स्वामिनी है। पंचतत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार तमाम तरह के भावों के साथ चलते हैं और कहीं न किसी से प्रेम या भक्ति अवश्य होती है-यह अलग बात है कि कहीं सजीव तो कहीं निर्जीव वस्तु से लगाव होता है पर देन इसी भक्ति भाव की है। कुछ लोग कह सकते हैं कि अगर यह बात है तो वहां के सभी लोगों में एक जैसी भक्ति नहीं है क्योंकि नेताओ के साथ हादसे में कुछ ही लोग आघात नहीं झेल पाते और उनकी इहलीला समाप्त हो जाती है पर बाकी तो बचे हुए रहते हैं। दरअसल भक्ति का मतलब यह नहीं है कि सभी भक्त अपने प्रिय के साथ हादसा होते ही एक जैसा कदम उठायें। जो लोग बचे रहते हैं वह भी मानसिक आघात कम नहीं झेल रहे होते हैं। याद रखिये भगवान ने पांचों उंगलियां एक जैसी नहीं! दूसरा यह भी कि भक्ति के दो पुत्र भी हैं जिन्होंने भगवत्काल में तरुणावस्था प्राप्त कर ली थी और उनका भी अब महत्व कम नहीं है और संचार साधनों के विस्तार के साथ उनकी पहुंच भी सब जगह है।
हमारे अध्यात्मिक में ज्ञान के साथ मनोविज्ञान और विज्ञान भी है और वह गुण विभाग का कर्म के साथ परिणाम भी बताता है पर उनमें दुनियावी चीजों पर शोध नहीं हुआ कि ऐसा क्यों होता है? या कौनसा जींस दक्षिण में अधिक सक्रिय है? यह काम तो पश्चिमी वैज्ञानिक करते हैं और हो सकता है कि किसी दिन वह इस तरह भी खोज करें कि आखिर दक्षिण में ऐसी भावुकता के पीछे कौनसा जींस या चीज काम कर रही है पर हमारे अध्यात्मिक दर्शन को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो यही निष्कर्ष निकलता है कि हमारे दक्षिणवासियों की यह भावुकता कोई अस्वाभाविक नहीं है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

पाकिस्तान का यह 62 वर्ष पुराना सच है-आलेख


पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ जरदारी का कहना है कि पाकिस्तान तालिबान के विरुद्ध अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। एक बहुत बड़े भूभाग पर उसने कब्जा कर लिया और वहां उनकी नहीं चलती। यह एक कड़वा सच है पर एक प्रश्न है कि जिस भूभाग की वह बात कर रहे हैं उस पर वैसे भी पाकिस्तान का शासन तो हमेशा नाममात्र का रहा है। हां, यह अलग बात है कि पाकिस्तान के हुक्मरानों ने अपने स्वार्थ की खातिर वहां के लोगों को उन स्थानों पर फैलने की आजादी नहीं दी जहां वह नहीं पहुंचे थे। अपने सभ्य समाज पर नियंत्रण के लिये उन्हें वह उग्रपंथी बहुत पसंद आये पर वही अब उनके जीजान का संकट बन गये हैं। वैसे भी पाकिस्तान का सभ्य समाज भी कम गलतफहमियों में नहीं रहा। आजादी के बाद से वह संपूर्ण भारत पर कब्जा करने का ख्वाब सजाये उन्हीं कट्टरपंथी जमातों को पालता रहा जो आज उनको संकट का कारण दिखाई दे रही हैं। जब तक सेना का शासन रहता है यह उग्रपंथी खामोशी से अपना काम करते हैं जैसे ही लोकतांत्रिक शासन आता है वैसे ही उनकी आक्रामकता बढ़ जाती है क्योंकि उनको गैरहिंसक शासन पसंद नहीं आता।

भारतीय बुद्धिजीवियों, लेखकों और पत्रकारों का सोच कभी लाहौर से आगे गया ही नहीं। समय समय पर अनेक बुद्धिजीवियों और लेखकों के पाकिस्तान दौरे हुए-या यह कहना चाहिये कि लाहौर के दौरे ही हुए-वहां उन्होंने पाकिस्तान के बौद्धिक लोगांें से चर्चा की और यहां आकर सीमित दायरे में अपने विचार व्यक्त कर दिये। वह उस गहराई तक पहुंचे ही नहीं जहां उग्रपंथ हमेशा बैठा ही रहा। तालिबान और अलकायदा की उपस्थिति से पाकिस्तान के सीमाप्रांत और ब्लूचिस्तान में उग्रपंथ नहीं फैला बल्कि वहां मौजूद तत्वों का इन संगठनों ने फायदा उठाया। हां, उन्होंने इतना जरूर किया कि पाकिस्तान के सिंध प्रांत में मौजूद सुविधाओं का उपयोग करने के लिये वहां अपना ठिकाना बनाया और उग्रपंथ वहां तक ले आये। बहुत कम लोग इस बात की चर्चा करते हैं कि पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लोग अपने देश के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते। अपने उपेक्षा के कारण उनमें भारी असंतोष है और कुछ भारतीय सैन्य विशेषज्ञ कहते हैं कि वह तो एक रसगुल्ले की तरह चाहे जब पाकिस्तान से अलग कर दो।

असल बात यह है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में एक बहुत बड़े इलाके के लोगों में स्वाभाविक रूप से आक्रामकता है और अशिक्षा,गरीबी और पिछड़ापन उन्हें विकसित नहीं होने देता। पाकिस्तान की स्वात घाटी-जिसे उसका स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है-अब उग्रपंथियेां के हाथ में चली गयी है पर पाकिस्तान के हाथ में थी ही कब? अब वहां जिस तरह के स्वर सुनाई दे रहे हैं उससे पाकिस्तान का प्रबुद्ध समझ रहा है यह लगता नहीं है और वह अब भी भारत विरोध पर कायम है।

वहां के लोगों के बारे में भारत के बहुत कम लोग जानते हैं सिवाय इसके कि वहां के निवासी आक्रामक हैं-यदाकदा कुछ विद्वान इस बात की चर्चा जरूर करते हैं। हमारे देश में जो बुजुर्ग आजाद के समय वहां से पलायन कर यहां आये हैं वह अनेक प्रकार की कहानियां सुनाते हैं और उससे तो यही लगता है कि यह आतंकवाद वहां बहुत पहले से ही था। इस लेखक की एक ऐसे बुजुर्ग से चर्चा हुई जो वहां से 12 वर्ष की आयु में ही यहां आये थे और उनके जेहन में वहां की कुछ यादें बसी थीं-वह अपने पिता के साथ काबुल और कंधार तक घूम कर आये थे। जब अमेरिका ने पाकिस्तान पर हमला किया तब वह टीवी पर यह खबर देख कर हंसे थे और कहा था-‘वह चाहे कितना भी ताकतवर है पर उसे विजय नहीं मिलेगी। वह लोग मारता रहेगा पर दूसरे पैदा होते रहेंगे। अंग्रेजों ने लाख कोशिश कर ली पर वह डूरंड लाईन पार नहीं कर पाये तो अमेरिका भी वहां कामयाब नहीं हो पायेगा।’

वहां कबीलाई सरदारों का शासन है। बाकी लोग उनके गुलाम की तरह होते हैं। उनके परिश्रम और शक्ति के सहारे सरदार खूब धन संचय करते हैं और फिर अवसर मिल जाये तो दूसरों से हफ्ता या चंदा भी वसूल करते हैं। जब अफगानिस्तान में नार्दन अलायंस की सेना प्रवेश हुई थी तब पता लगा कि अनेक तालिबानी सरदारों ने पैसा लेकर पाला बदला था और वह उनके साथ हो गये थे। एक बार सत्ता बदली तो फिर वह अपने पुराने ढर्रे पर लौट गये। अगर पाकिस्तान को वहां अपना नियंत्रण स्थापित करना था तो उसे आधुनिक शिक्षा प्रणाली का वहां प्रचार करना था पर पाकिस्तान के स्वार्थी हुक्मरानों ने भारत विरोध के मुद्दे के सहारे ही अपना शासन चलना उचित समझा और बाकी अन्य प्रांतों को वह भूल गये। प्रबुद्ध वर्ग ने भी यही सोचा कि कबीलाई लोगों की आक्रमकता से वह युद्धों में विश्वविजेता बन जायेंगे।
मगर यह संकट गहरा है या फिर उसे बना दिया गया है। पाकिस्तान की सेना अभी इन आतंकवादियों से लड़ रही है पर जरदारी साहब स्वयं मान रहे हैं कि उग्रपंथियों के खिलाफ वह उतनी ही शक्तिशाली नहीं है। फिर इसका हल क्या है? अमेरिका बमबारी करता है तो पाकिस्तान उसका विरोध भी करता है और भारत से मदद लेने की बात आये तो वहां का प्रबुद्ध वर्ग हायतौबा मचा देता है जबकि संकट अब उसकी तरफ ही आने वाला है। मतलब यह है कि वहां का प्रबुद्ध वर्ग उग्रपंथ की चपेट में आने को तैयार है पर भारत से मित्रता उसे स्वीकार्य नहीं है। भारत में जाकर उनके लेखक,बुद्धिजीवी,गायक,अभिनेता,अभिनेत्रियां और अन्य कलाकार जाकर कमायें पर फिर भी मित्रता न बने यह उनका ध्येय है। भारत से मित्रता होते ही उनकी रचनात्मकता के आधार समाप्त हो जायेंगे। पाकिस्तान की शैक्षणिक पुस्तकोंं में भारत और हिंदू धर्म का विरोध पढ़ाया जाता है। भारत को वणिक देश मानते हुए वह कायर तो कहते हैं पर धन और व्यापार की ताकत को स्वीकार न कर वह शतुरमुर्ग की भूमिका अदा करना चाहते हैं।

प्रसंगवश कुछ लोग देश में कभी महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसक वारदातों पर इतने उत्तेजित होकर तालिबानी संस्कृति आने की चर्चा करते हैं। वह घोर अज्ञानी है वह जानते ही नहीं जिस तालिबानी संस्कृति की बात कह रहे हैं वह तो केवल नाम भर है पाकिस्तान और अफगानिस्तान में वह सदियों से है। भारत में कम से कम एक प्रबुद्ध वर्ग तो है जो कभी भी इन हिंसंक वारदातों पर पीडि़तों के साथ खड़ा होने का साहस करता है पर पाकिस्तान में यह संभव नहीं है। भारत में जिस तरह दहेज एक्ट का प्रयोग निर्दोष पुरुषों के विरुद्ध होने की शिकायतेंं हो रही हैं वैसे ही पाकिस्तान में महिलाओं के विरुद्ध वैश्यावृत्ति कानून के दुरुपयोग की बात कही जाती है।

पाकिस्तान में पंजाबी लाबी हमेशा ही हावी रही है। जरदारी सिंध के हैं और वह जानते हैं कि देश की सामाजिक स्थिति क्या है? इसके बावजूद वह दिखावे के लिये अखंड पाकिस्तान के लिये जूझ रहे हैं जिसका कभी अस्तित्व रहा ही नहीं। सबसे बड़ी बात यह है कि अपने प्रांत के प्रति उनके न्याय की जो अपेक्षा की जा रही है वह भारत से मित्रता के बिना संभव ही नहीं है। पाकिस्तान का सिंध प्रांत विदेशी और कबाइली आतंकियों का गढ़ बन गया है और वहां सिंध प्रांत के लोग उनको पसंद कम ही करते हैं मगर सेना, प्रशासन और अन्य राजनीतिक संस्थाओं में वहां के लोगों का प्रभाव बहुत कम है। वहां की पंजाबी लाबी अपने प्रांत को तो आतंक से मुक्त रखना चाहती है पर उनको इस बात की परवाह नहीं कि अन्य प्रांतों में क्या होगा? अखबारों जब पाकिस्तान के बारे में समाचार आते हैं तो कई तरह की विचित्रता दिखती है। कभी पाकिस्तान क्या कहता है कभी क्या? लाहौर तक ही सोचने वाले लोग केवल पाकिस्तान देखते हैं पर जो इससे आगे की जानकारी का ध्यान रखते हैं वह अच्छी तरह से समझते हैं कि यह सब वहां सक्रिय लाबियों के आपसी द्वंद्व का परिणाम है।
ऐसे में पाकिस्तान के प्रबुद्ध वर्ग को यह बात समझ लेना चाहिये कि वह आपसी द्वंद्व में उलझने और भारत से बैर रखने की नीति त्याग कर इस बात की फिक्र करें कि एक आसन्न संकट उनके सामने आने वाला है जिसमें उनकी आवाज ही बंद कर दी जायेगी। अभी तक उनको अपनी सरकारों से जो सुरक्षा मिलती आ रही थी वह कभी भी तालिबान के हाथ में जा सकती है। 62 साल से बना हुआ सच अब उनके राष्ट्रपति ने कहा इससे बाहर के लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता-उनके कबाइली लोग युद्धों में पाकिस्तान को युद्धों में विश्वविजेता नहीं बना सकतें इस बात को सभी समझ गये हैं-पर पाकिस्तान के प्रबुद्ध वर्ग को यह बात ध्यान रखना चाहिये कि इस बार यह आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया है कि पाकिस्तान के एक बहुत बड़े इलाके में वहां का संविधान नहीं चलता।
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दूसरे के तय वैचारिक नक्शे पर चर्चा घर सजाते हैं-आलेख


बिना धन के कहीं भी आतंकवाद का अभियान चल ही नहीं सकता और वह केवल धनाढ़यों से ही आता है। आतंकवाद एक व्यापार की तरह संचालित है और इसका कहीं न कहीं किसी को आर्थिक लाभ होता है। आतंकवाद को अपराधी शास्त्र से अलग रखकर बहस करने वाले जालबूझकर ऐसा करते हैं क्योंकि तब उनको जाति,भाषा,वर्ण,क्षेत्र और संस्कारों की अलग अलग व्याख्या करते हैं और अगर वह ऐसा नहीं करेंगे फिर एकता का औपचारिक संदेश देने का अवसर नहीं मिलेगा और वह आम आदमी के मन में अपनी रचात्मकता की छबि नहीं बना पायेंगें

कोई भी अपराध केवल तीन कारणों से होता है-जड़,जोरू और जमीन। आधुनिक विद्वानों ने आतंकवाद को अपराध से अलग अपनी सुविधा के लिये मान लिया है क्योंकि इससे उनको बहसें करने में सुविधा होती है। एक तरह से वह अपराध की श्रेणियां बना रहे हैं-सामान्य और विशेष। जिसमें जाति,भाषा,धर्म या मानवीय संवेदनाओंं से संबंधित विषय जोड़कर बहस नहीं की जा सकती है वह सामान्य अपराध है। जिसमें मानवीय संवेदनाओं से जुड़े विषय पर बहस हो सकती है वह विशेष अपराध की श्रेणी में आतेे हैं। देश के विद्वनों, लेखकों और पत्रकारों में इतना बड़ा भ्रम हैं यह जानकार अब आश्चर्र्य नहीं होता क्योंकि आजकल प्रचार माध्यम इतने सशक्त और गतिशील हो गये हैं कि उनके साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संपर्क निरंतर बना रहता है। निरंतर देखते हुए यह अनुभव होने लगा कि प्रचार माध्यमों का लक्ष्य केवल समाचार देना या परिचर्चा करने तक ही सीमित नहीं है बल्कि हर पल अपने अस्तित्व का अहसास कराना भी है।
हत्या,चोरी,मारपीट डकैती या हिंसा जैसे अपराघ भले ही जघन्य हों अगर मानवीय संवदेनाओं से जुड़े विषय-जाति,धर्म,भाषा,वर्ण,लिंग या क्षेत्र से-जुड़े नहीं हैं तो प्रचार माध्यमों के लिये वह समाचार और चर्चा का विषय नहीं हैं। अगर सामान्य मारपीट का मामला भी हो और समूह में बंटे मानवीय संवदेनाओं से जुड़े होने के कारण सामूहिक रूप से प्रचारित किया जा सकता है तो उसे प्रचार माध्यमों में अति सक्रिय लोग हाथोंहाथ उठा लेते हैं। चिल्ला चिल्लाकर दर्शकों और पाठकों की संवदेनाओं को उबारने लगते हैं। उनकी इस चाल में कितने लोग आते हैं यह अलग विषय है पर सामान्य लोग इस बात को समझ गये हैं कि यह भी एक व्यवसायिक खेल है।

यह प्रचार माध्यमों की व्यवसायिक मजबूरियां हैं। उनको भी दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि मानवीय संवेदनाओं को दोहन करने के लिये ऐसे प्रयास सदियों से हो रहे हैं। यही कारण है कि अध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण भारतीय ज्ञान की अनदेखी तो वह लोग भी करते हैं जो उसे मानते हैं। अध्यात्मिक ज्ञान की जगह धर्म के रूप में सार्वजनिक कर्मकांडों के महत्व का प्रतिपादन बाजार नेे ही किया है। कहीं यह कर्मकांड शक्ति के रूप में एक समूह अपने साथ रखने के लिये बनाये गये लगते हैं। मुख्य बात यह है कि हमें ऐसे जाल में नहीं फंसना और इसलिये इस बात को समझ लेना चाहिये कि अपराध तो अपराध होता है। हां, दूसरे को हानि पहुंचाने की मात्रा को लेकर उसका पैमाना तय किया जा सकता है पर उसके साथ कोई अन्य विषय जोड़ना बेवकूफी के अलावा कुछ नहीं है। जैसे चोरी, और मारपीट की घटना डकैती या हत्या जैसी गंभीर नहीं हो सकती पर डकैती या हत्या को किसी धर्म, भाषा,जाति और लिंग से जोड़ने के अर्थ यह है कि हमारी दिलचस्पी अपराध से घृणा में कम उस पर बहस मेें अधिक है।
बाजार और प्रचार का खेल है उसे रोकने की बात करना भी ठीक नहीं है मगर आम आदमी को यह संदेश देना जरूर आवश्यक लगता है कि वह किसी भी प्रकार के अपराध में जातीय,भाषा,धर्म,वर्ण,लिंग और क्षेत्रीय संवेदनाएं न जोड़े-अपराध चाहे उनके प्रति हो या दूसरे के प्रति उसके प्रति घृणा का भाव रखें पर अपराधी की जाति,भाषा,धर्म,वर्ण,लिंग और क्षेत्रीय आधार को अपने हृदय और मस्तिष्क में नहीं रखें।

एक बात हैरान करने वाली है वह यह कि यह विद्वान लोग विदेश से देश में आये आतंकियों के जघन्य हमले और देश के ही कुछ कट्टरपंथी लोगों द्वारा गयी किसी एक स्थान पर सामान्य मारपीट की घटना में को एक समान धरातल पर रखते हुए उसमें जिस तरह बहस कर रहे हैं उससे नहीं लगता कि वह गंभीर है भले ही अपने कार्यक्रम की प्रस्तुति या आलेख लिखते समय वह ऐसा प्रदर्शित करते हों। इस बात पर दुःख कम हंसी अधिक आती है। मुख्य बात की तरफ कहीं कोई नहीं आता कि आखिर इसके भौतिक लाभ किसको और कैसे हैं-यानि जड़ जोरु और जमीन की दृष्टि से कौन लाभान्वित है। बजाय इसके वह मानवीय संवेदनाओं से विषय लेकर उस पर बहस करते हैं।

आतंकवाद विश्व में इसलिये फैल रहा है कि कहीं न कहीं विश्व मेें उनको राज्य के रूप में सामरिक और नैतिक समर्थन मिल जाता है। कहीं राज्य खुलकर सामरिक समर्थन दे रहे हैं तो कही उनके अपराधों से मूंह फेरकर उनको समर्थन दिया जा रहा है। एक होकर आतंकवाद से लड़ने की बात तो केवल दिखावा है। जिस तरह अपने देश में बंटा हुआ समाज है वैसे ही विश्व में भी है। हमारे यहां सक्रिय आतंकवादी पाकिस्तान और बंग्लादेश से पनाह और सहायता पाते हैं और विश्व के बाकी देश इस मामले में खामोश हो जाते हैं। वह तो अपने यहां फैले आतंकवाद को ही वास्तविक आतंकवाद मानते हैंं। वैसे ऐसी बहसें तो वहां भी होती हैं कि कौनसा धर्म आतंकवादी है और कौनसा नहीं या किसी धर्म के मानने वाले सभी आतंकवादी नहीं होते। यह सब बातें कहने की आवश्यकता नहीं हैं पर लोगों को व्यस्त रखने के लिये कही जातीं हैं। इससे प्रचार माध्यमों को अपने यहां कार्यक्रम बनाने और उससे अपना प्रचार पाने का अवसर मिलता है। आतंकवाद से लाभ का मुख्य मुद्दा परिचर्चाओं से गायब हो जाता है और वहां यहां तो आतंकवादी संगठनों की पैतरेबाजी की चर्चा होती है या फिर धार्मिक,जाति,भाषा, और लिंग के आधार बढि़या और लोगों को अच्छे लगने वाले विचारों की। आतंकवादियों के आर्थिक स्त्रोतों और उनसे जुड़ी बड़ी हस्तियों से ध्यान हटाने का यह भी एक प्रयास होता है क्योंकि वह प्रचार माध्यमों के लिये अन्य कारणों से बिकने वाले चेहरे भी होते हैं।

प्रसंगवश अमेरिका के नये राष्ट्रपति को भी यहां के प्रचार माध्यमों ने अपना लाड़ला बना दिया जैसे कि वह हमारे देश का आतंकवाद भी मिटा डालेंगे। भारत से अमेरिका की मित्रता स्वाभाविक कारणों से है और वहां के किसी भी राष्ट्रपति से यह आशा करना कि वह उसके लिये कुछ करेंगे निरर्थक बात है। यहां यह भी याद रखने लायक है कि ओबामा ने भारत के अंतरिक्ष में चंद्रयान भेजने पर चिंता जताई थी। शायद उनको मालुम हो गया होगा कि वहां से जो फिल्में उसने भेजीं हैं वह इस विश्व को पहली बार मिली हैं और अभी तक अमेरिकी वैज्ञानिक भी उसे प्राप्त नहीं कर सके थे। बहरहाल आतंकवादियों की पैंतरे बाजी पर चर्चा करते हुए विद्वान बुद्धिजीवी और लेखक जिस तरह मानवीय संवेदनाओं से जुड़े विषय पैंतरे के रूप में आजमाते हैं वह इस बात को दर्शाता है कि वह भी अपने आर्थिक लाभ और छबि में निरंतरता बनाये रखने के लिये एक प्रयास होता है। वह बनी बनायी लकीर पर चलना चाहते हैं और उनके पास अपना कोई मौलिक और नया चिंतन नहीं है। वह दूसरे के द्वारा तय किये गये वैचारिक नक्शे पर ही अपने चर्चा घर सजाते हैं।
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2.दीपक भारतदीप की हिंदी-पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका

पाकिस्तान कब तक करेगा चालाकियां-आलेख


पिछले कई वर्षों से अनेक हिंदी के विद्वानों के आलेख पाकिस्तान के विषय में पढ़ने के बाद तो यही निष्कर्ष निकलता है कि उनके अन्य विषयों के साथ इसमें भी वैचारिक दायरा अत्यंत संकीर्ण है। वह पाकिस्तान के बारे में लाहौर तक ही सोचते हैं। अनेक भारतीय विद्वान और लेखकों के दौरे लाहौर तक ही होते हैं। उनके मित्र आदि भी वहीं रहते हैं। फिर अपने देश के पंजाब से लगा हुआ उसका प्रांत भी पंजाब भी है जहां के लेखक और पत्रकार इस विषय पर अधिक मुखर होकर लिखते हैं। वैसे उनको क्या दोष? पाकिस्तान के बुद्धिजीवी वर्ग की भी स्थिति कुछ ऐसे ही लगती है। वहां पाकिस्तान का मतलब पंजाब है और वह सिकुड़ते हुए लाहौर तक ही आ जाता है। पंजाब के बुद्धिजीवी और प्रबुुद्ध वर्ग के लोग बाकी तीन प्रांतों के प्रति सौहार्द का भाव दिखाने की बजाय भारत के प्रति दुर्भावना फैलाने में अपना मनोरंजन करते हैं।

इस लेखक ने देश के अनेक बुद्धिजीवियों और लेखकों विचार पढ़े हैं और उनसे तो यही लगता है कि वह पाकिस्तान के विषय में न तो अधिक जानते हैं और न ही प्रयास करते है। वह पाकिस्तान के बुद्धिजीवियों और लेखकों द्वारा तय की गयी ‘लाहौर सीमा’ से अधिक नहीं सोचते। वहां भाषा और प्रांत के आधार पर जबरदस्त वैमनस्य है यह एक सच्चाई है और यह भारत में कभी कभी प्रकट होने वाले आंदोलनों से अधिक खतरनाक तथा स्थाई है-कम से कम इस विषय पर देशी और विदेशी प्रचार माध्यमों के समाचार तो यही कहते हैं यह अलग बात है कि वह उनका विश्लेषण करते समय ‘लाहौर सीमा’ तक ही सिमट जाते हैं।
पाकिस्तान पर पंजाब और पंजाब पर लाहौर-मुल्तान के लोगों का वर्चस्व एक जाना पहचाना तथ्य है। सिंध,बलूचिस्तान ओर सीमा प्रांत यह तीन अन्य प्रदेश भी है। सिंध के लोग आक्रामक नहीं है इसलिये पंजाब का वर्चस्व झेल रहे हैं पर बाकी दो अन्य प्रांत में आज भी पाकिस्तान का संविधान नहीं चलता क्योंकि विश्व की आक्रामक कौमों के लोग वहां रहते हैं और अपने नियम चलाते हैं-यह अलग बात है कि वहां ताकतवर हमेशा ही कमजोर पर अनाचार करते हैं। उनका महिलाओं के प्रति व्यवहार अत्यंत खतरनाक है।
बहुत समय तक यह भेद विदेशी लोगों को भी इसका आभास नहीं हुआ क्योंकि पूरे पाकिस्तान में पंजाब के लोगों का वर्चस्व है और वही अधिक मुखर होकर विदेश से संपर्क रखते हैं पर अब जैसे जैसे प्रचार माध्यमों में आधुनिकता आती जा रही है वैसे उसका आभास भी होता जा रहा है कि पाकिस्तान एक नाम का ही देश है। दिल्ली दूरदर्शन पर एक कार्यक्रम आता था ‘पाकिस्तान रिपोर्टर’। भारतीय दूरदर्शन का वह कार्यक्रम न केेवल दिलचस्प था बल्कि उससे तो यही लगता था कि जैसे पंजाब ने बाकी तीन प्रांतों को गुलाम बना रखा था-पता नहीं अब आता है कि नहीं। उन कार्यक्रमों को देखकर भारतीय बुद्धिजीवियों और लेखकों के विचारों में अंतर देखकर यह लगता था कि उस कार्यक्रम को बहुत कम लोग देखते हैं या अपनी कोई राय बना पाते है। वर्तमान राष्ट्रपति आसिफ जरदारी के साथ जेल में दुव्र्यवहार होने के समाचार उनके साथ सहानुभूति दिखाते हुए भी दिखाये गये थे। उसमें जरदारी के सिंध प्रांत होने के कारण ही ऐसा होने की बात भी कही गयी थी।

सिंध प्रांत के लोग पंजाबियो से कभी मिल बैठ सकते हैं यह बात अभी भी वहां कोई नहीं मानता। बल्कि वहाँ के सिंध के कुछ ब्लाग लेखकों ने तो जरदारी की इस बात के लिये आलोचना की थी कि वह ‘मुहाजिर कौमी मूवमेंट’ के साथ समझौता कर पंजाबियों के वर्चस्व को स्वीकार कर रहे हैं क्योंकि वह अंततः उनके साथ ही जायेगी।

आज एक टीवी चैनल में कसाब को अपने देश का मान लेने पर पाकिस्तान में मचे कोहराम की चर्चा थी। उसमें पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार दुर्रानी को हटाने पर जरदारी की नाराजगी की चर्चा की गयी थी। दरअसल इस समाचार का विश्लेषण करने पर ऐसा लग रहा था जैसे कि वहां सिंधी लाबी और पंजाबी लाबी के बीच शायद कोई द्वंद्व है जो हमें दिखाई नहीं दे रहा है। दुर्रानी ने सबसे पहले अधिकारिक रूप से यह स्वीकार किया था कि कसाब पाकिस्तानी है। इसका बाद में हर स्तर पर खंडन किया गया। ऐसा लगता है कि यहीं से दोनों लाबियों के बीच संघर्ष प्रारंभ हुआ है। कसाब पंजाब का है। इतना ही नहीं उसके नौ अन्य साथी भी पंजाब से हैं अजहर मसूद भी पंजाब का है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम सोच रहे हों कि कसाब को पाकिस्तानी मान लेने पर भारत या विश्व में सामने अपनी छबि खराब होने से वहां के नेता परेशान ह ैंपर वास्तव में तो वहां की पंजाबी लाबी बाकी तीन प्रांतों के सामने अपने आपको गिरा हुआ अनुभव कर रही हो। गिलानी पंजाब के हैंं और जरदारी से उनकी अधिक समय तब बनेगी यह संभावना शुरु से ही नहीं रही है पर दोनों के बीच यह संघर्ष इतनी जल्दी शुरु हो जायेगा यह अनुमान नहीं था। अगर आप ध्यान करें तो जरदारी के अब बयान अधिक नहीं आ रहे। क्या उन्होंने यह सारा जिम्मा पंजाबी होने के कारण गिलानी पर डाल दिया है? प्रारंभ में वह स्वयं आक्रामक थे पर अब गिलानी अधिक दिखाई दे रहे हैं।

भारत द्वारा दिये गये सबूतों पर पहले पाकिस्तान का यह बयान आया था कि उनको खारिज किया जा रहा है, पर बाद में आया कि उनकी जांच की जा रही है। फिर एक बयान आया कि पाकिस्तान ने मान लिया है कि कसाब पाकिस्तानी ही है। फिर इसका खंडन आया पर पाकिस्तान की सूचनामंत्री शेरी रहमान ने जब टीवी पर इसकी पुष्टि की तो फिर पाक प्रधानमंत्री के हवाले से सुरक्षा सलाहकार दुर्रानी को बर्खास्त करनें का समाचार भी आया। शेरी रहमान पीपुल्स पार्टी की हैं और स्वर्गीय बेनजीर की अत्यंत निकट रही हैं। इस समय पाकिस्तानी प्रधानमंत्री गिलानी सबसे अधिक आक्रामक हैं। कहते हैें कि एक समय तो भारत से विवाद के चलते उन्होंने इस्तीफे देने की धमकी दे डाली थी।
दरअसल जरदारी और गिलानी के बीच सत्ता का संघर्ष होना स्वाभाविक है क्योंकि दोनों के बीच भाषा और प्रांत के कारण जो पारंपरिक टकराव संभावित है उससे टालना कठिन है। नवाज शरीफ की पार्टी ने समर्थन वापस ले लिया फिर भी गिलानी की सरकार चल रही है तो केवल इसलिये कि वह पंजाब के हैं। जरदारी ने उनकी सरकारी बनते ही जल्दी जल्दी राष्ट्रपति इसलिये हथियाया क्योंकि वह जानते थे कि देरी उनके लिये संकट बन जायेगी-कहीं न कहीं गिलानी के ताकतवर हो जाने पर अपना आधार खिसक जाने का भय उनके अंदर था इसलिये गिलाने के पांव जमने से पहले ही राष्ट्रपति बन गये।

गिलानी के पास विकल्प बहुत कम हैं। वह अपने पद पर स्वर्गीय प्रधानमंत्री बेनजीर के बलिदान के कारण है और चाहें भी तो वह अपनी अलग से राजनीतिक जमीन नहीं बना सकते। जरदारी की बात मानते रहने पर ही उनका हित है पर जिस तरह पंजाब के आतंकवादियों की चर्चा विश्व भर में हो रही है उससे उनका परेशान होना स्वाभाविक है क्योेंकि इससे बाकी तीन प्रांतों के लोग भी विरोध करने के मामले अधिक मुखर हो जायेंगे। भारत में कसाब पाकिस्तानी आतंकवादी है तो पाकिस्तान में पजंाबी टेररिस्ट। शायद गिलानी को उससे अधिक सहानुभूति है बनस्बित जरदारी के । यह दोनों ही सेना के मोहरे हैं पर गिलानी शायद दिल से कसाब के साथ है और जरदारी दिखाने के लिये। फिर गिलानी पर वहां के ताकतवर पंजाबी लाबी का भी बहुत दबाव पड़ रहा हो जो जरदारी के राष्ट्रपति रहते हुए उनसे सीधे टकराव नहीं ले सकती पर सेना में सक्रिय उसके अधिकारी जरूर यह काम करते रहेंगे कि वह उनकी ही भाषा बोलें।

समय आगे क्या रुख लेगा कोई नहीं जानता पर इतना तय है कि आतंकवादी घटना में पाकिस्तानी संलिप्तता प्रमाणित होने के बाद उसका संकट बढ़ता ही रहेगा। भारतीय रणनीतिकारों ने अभी हमले का मन नहीं बनाया पर पाकिस्तानी के अंदरूनी हालत उसे गहरे संकट में धकेल रहे हैं। उसकी सेना ने राजनीतिक मुखौटे लगा रखे हैं जो यह कभी स्वीकार नहीं करते कि उनके देश के हालत उनसे नहीं संभलते। दो प्रातों में तो उनका संविधान ही नहीं चलता। वहां के प्रचार माध्यमों ने भारत का विरोध करने का अभियान छेड़ रखा है और जनता को सच नहीं बता रहे। वहां के ताकतवर प्रचार माध्यमों पर पंजाबी लाबी का ही वर्चस्व है और उनसे ही जानकारी मिल पाती है। अन्य भाषा के प्रचार माध्यमों में क्या है यह पता तो केवल दूरदर्शन के पाकिस्तानी रिपोर्टर से ही लगता था जो शायद अब बंद हो गया है। बहुत दिन से देखने का प्रयास भी नहीं किया। उससे ही यह जानकारी मिल पाती थी कि बाकी तीन प्रांतों में पंजाब का बहुत विरोध है इतना कि वह पाकिस्तान से ही अलग होना चाहते हैं। कुछ लोग तो यह कहते हैं कि सिंध प्रांत तो ऐसा रसगुल्ला है जिसे भारत चाहे जब हथिया ले। हालंाकि यह पाकिस्तान के राजनीतिक क्षेत्रों की यह चालाकी भी हो सकती है कि वह इस तरह जरदारी और गिलानी के बीच द्वंद्व दिखा रहे हों ताकि दुनियां के साथ भारत का भी ध्यान मुख्य मुद्दे से हटे पर यह भी सच है कि वह उनमें स्वाभाविक से है इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता। जिस तरह कसाब को लेकर पाकिस्तान झूठ पर झूठ बोलता चला गया है उससे तो यही लगता है कि उसके नेता हल्के स्तर के हैं चाहे वह जरदारी हों या गिलानी।
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कैसे होगा चंद्रमा की जमीन का बंटवारा-व्यंग्य आलेख


अब चंद्रमा पर धरती पर तमाम देशों के अधिकार की बात शुरु हो गयी है। अखबार में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार कुछ जागरुक लोगों मांग की है कि जिस तरह विश्व के अनेक देशों के अंतरिक्ष यान चंद्रमा के चक्कर लगा रहे हैं और वह सभी भविष्य में अपना वहां अधिकार वहां की जमीन पर जमा सकते हैं इसलिये एक कानून बना कर भविष्य में किसी विवाद से बचना चाहिए। एक बात तय है कि चंद्रमा पर पहुंचने वाले वही देश होंगे जो आर्थिक और तकनीकी दोनों ही दृष्टि से संपन्न हों। इस विश्व में ऐसे देशोें की संख्या पंद्रह से बीस ही होगी अधिक नहीं।

चंद्रमा की जमीन पर अधिकार को लेकर नियम बनाने वालों की मांग करने वालों का कहना है कि जिस तरह हर देश के समुद्र और आकाश का बंटवारा हुआ है वैसे ही चंद्रमा की जमीन का बंटावारा होना चाहिये। अब सवाल यह है कि समुद्र और आकाश का बंटवारा तो देशों की सीमा के आधार पर हुआ है जो कभी बदलते नहीं है पर चंद्रमा तो घूमता रहता है। फिर अपने आकाश और समुद्री सीमा की रक्षा के लिये सभी देश अपने यहां सेना रखते हैं पर चंद्रमा पर अपने क्षेत्र की रक्षा करने के लिये तभी समर्थ हो पायेंगे जब वहां पहुंच पायेंगे। बहरहाल इसलिये संभावना ऐसी ही हो सकती है कि जो देश वहां पहुंच सकते हैं उनमें ही यह बंटवारा हो।

अगर चंद्रमा की जमीन का बंटावारा हुआ तो उसका आधार यह भी बनेगा कि जो देश वहां पहुंच सकते हैं उनके देशों का क्षेत्रफल देखते हुए उसी आधार पर चंद्रमा की जमीन भी तय हो जाये। यानि समर्थवान देशोंे का क्षेत्रफल एक इकाई मानकर उसे चंद्रमा की पूरी जमीन के क्षेत्रफल से तोला जायेगा। उसके आधार पर जिसका हिस्सा बना वह उसका मालिक मान लिया जायेगा।

बाकी देशों का तो ठीक है भारत का क्षेत्रफल तय करने में भारी दिक्कत आयेगी भले ही भारत को उसी आधार पर चंद्रमा पर जमीन मिले जितना उसका क्षेत्रफल है। यह समस्या चीन और पाकिस्तान से ही आयेगी। चीन कहेगा कि अरुणांचल के क्षेत्र बराबर की जमीन भारत के हिस्से से कम कर उसे दी जाये तो पाकिस्तान कहेगा कि कश्मीर बराबर हिस्से की जमीन उसे दी जाये और वह उसे चीन को देगा। पाकिस्तान अभी चंद्रमा पर स्वयं पहुंचने की स्थिति में नहीं है।

वह वहां पहुंचकर भारत से तो नहीं लड़ सकता पर उसके मित्र ऐसे हैं जो उसके बिना चल ही नहीं सकते। फिर वह मित्र ऐसे हैं जो भारत को सहन नहीं कर सकते इसलिये वह पाकिस्तान को भले ही वहां न ले जायें पर उसका नाम लेकर भारत के लिये वहां भी संकट खड़ा कर सकते हैं।

वैसे देखा जाये तो जब से भारत ने चंद्रयान भेजा उसके खिलाफ गतिविधियां कुछ अधिक बढ़ ही गयीं हैं। कहने को अनेक देश भारत के साथ मित्रता का प्रदर्शन कर रहे हैं पर उनके दिल में पाकिस्तान ही बसता है और उनके लिये यह मुश्किल है कि वह चंद्रमा पर उसे भूल जायें-खासतौर भारत उनके सामने चुनौती की तरह खड़ा हो।

इस विवाद में पाकिस्तान के मित्र निश्चित रूप से उसका पक्ष लेकर झगड़ा करेंगे। अगर बैठक चंद्रमा पर होगी तो वह कहेंगे कि चूंकि भारत यहां एक दावेदार है उसके विरोधी पाकिस्तान का मौजूद रहना आवश्यक है सो बैठक जमीन पर ही हो। जमीन पर होगी तो कहेंगे कि पहले आपस में तय कर लो कि ‘वहां की जमीन का बंटवारा कैसे हो?’
सोवियत संघ एतिहासिक गलती ने पाकिस्तान को अमृतपान करा लिया है इसलिये यह देश आज हर उस देश को प्रिय है जो कभी सोवियत संध के विरोधी थे। 31 वर्ष पूर्व सोवियत संघ ने अफगानिस्तन में घुसपैठ की थी तब पश्चिम के सोवियत विरोधियों के लिये पाकिस्तान ही एक सहारा बना और उसे खूब हथियार और पैसा मिलने लगा। उसने वहां आतंकवाद जमकर फैलाया। सोवयत संघ को वहां से हटना पड़ा और उसके बाद तो पाकिस्तान के पौबारह हो गये। एक तरह से पूरा अफगानिस्तान उसके कब्जे में आ गया। मगर हालत अब बदले हैं तो वहां फिर अफगानियों का शासन आ गया पर पाकिस्तान अपनी खुराफतों से वहां भी आतंक फैलाये हुए है। वह अफगानिस्तान को अपने हाथ से छिनता नहीं देख पा रहा हैं।

अखबारों में यह भी पढ़ने में आया कि वहां तो बच्चों को स्कूल में ही भारत विरोधी शिक्षा दी जाती है। कहने को तो सभी भारतीय चैनल कह रहे हैं कि सारी दुनियां पाकिस्तान की औकात देख रही है। हो सकता है कि यह सच हो पर इसका एक पक्ष दूसरा भी है कि ‘पाकिस्तान बाकी दुनियां की औकात भारतवासियों को दिखा रहा है कि देखो अपने आतंक से सभी घबड़ाते हैं पर दूसरे का यहां फैला आतंकवाद उनको बहुत भाता है। भारत को शाब्दिक रूप से सहानुभूति सभी ने दी है पर किसी में पाकिस्तान के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की।

सभी देशों अब यह कह रहे हैं कि ‘आपस में बातचीत कर लो’। जब चंद्रमा पर जमीन का आवंटन होगा तब भी यही कहेंगे कि ‘पहले आपस में बातचीत कर लो।‘
इस तरह बाकी देश अपनी जमीन बांट लेंगे और भारत से कहेंगे कि ‘जब आपका पाकिस्तान से फार्मूला तय हो जाये तब जमीन आवंटित हो जायेगी।’

तब तक भारत क्या करेगा? उसके अंतरिक्ष यान क्या चंद्रमा की जमीन पर नहीं उतरेंगे? उतरेंगे तो सही पर उससे उसकी फीस मांगी जायेगी। जिस देश की जमीन पर उतरेगा उससे अनुमति मांगनी होगी। यह कहा जाये कि ‘आपका हक तो बनता है पर अभी आपको जमीन का आवंटन नहीं हुआ है।’

अगर हम तर्क देंगे कि ‘पाकिस्तान तो चंद्रमा पर पहुंच नहीं सकता तो उसके हक पर विवाद क्यों उठाया जा रहा है।’
दरअसल समस्या पाकिस्तान नहीं है। उसने अपनी स्थिति इस तरह बना ली है कि उसकी उपेक्षा तो कोई कर ही नहीं सकता। उसके पीछे फारस की खाड़ी तक फैले देश हैं जिनके पास तेल और गैस के कीमती भंडार हैं और बाकी अन्य ताकतवर देश उनके यहां पानी भरते हैं और वह सभी पाकिस्तान के बिना चल नहीं सकते।
कुल मिलाकर चंद्रमा पर जमीन विवाद में पाकिस्तान कोई कम संकट खड़े नहीं करेगा। उसके मित्र देश भी उसका फायदा उठाकर भारत की जमीन हथियाने का प्रयास करेंगे। हां, ऐसे में भारत के मित्र सोवियत संघ से ही उम्मीद की जा सकती है पर वहां भी उसने ऐसा कुछ किया तो पाकिस्तान के मित्र देश उसको चंद्रमा पर कर्ज या उधार के अंतरिक्ष यान देकर पहुंचा देंगे। वह हर हालात में लड़ेगा भारत ही। उसका एक ही आधार है भारत से लड़ना चाहे वह जमीन हो या चंद्रमा!’
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चंद्रयान-1 के प्रक्षेपण पर ओबामा का चिंतित होना स्वाभाविक-संपादकीय


अमेरिका में राष्ट्रपति के उम्मीदवार श्री ओबामा ने भारत के चंद्रयान भेजने पर चिंता जाहिर की और इसे अपने नासा संस्थान के लिये चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि वह विजय प्राप्त कर नासा की प्रगति के लिये काम करेंगे। यह खबर दो दिन पुरानी है पर आज नयी खबर यह पढ़ने को मिली कि अमेरिका का चैदहवां बैंक दिवालिया हो गया। अमेरिका अभी तक आतंकवाद से परेशान था पर आर्थिक मंदी भी उसके लिये संकट बन गयी है ऐसे में भारत का चंद्रयान भेजने का दर्द वह उस तरह व्यक्त नहीं की जैसे कर सकता था।

कुछ लोगों को ओबामा साहब की यह चिंता कोई अधिक महत्वपूर्ण नहीं लगती होगी पर जिन लोगों ने खबरे पढ़ते हुए अपनी जिंदगी गुजार दी वह इस बात को बहुत महत्व दे रहे हैं यह अलग बात है कि उनके दिल की बात लिखने वाला कोई बुद्धिजीवी नहीं है। सच तो यह है कि आर्थिक विशेषज्ञ स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि वर्तमान मंदी से उबरने के लिये अमेरिका को कम से कम पांच वर्ष लग जायेंगे। अमेरिकी सरकार अपने यहां की मंदी से जूझ रही है और उसे इसके लिये बहुत कुछ करना है।
भारतीय बुद्धिजीवी इस समय आंतकवाद को लेकर इस बहस में उलझे है कि कौनसा भाषाई,धार्मिक या वैचारिक समूह अच्छा है और कौन खराब। उन्हें यह सब दिखाई नहीं दे रहा कि जिस अमेरिका की उदारीकरण की वह प्रशंसा करते थे वहां की सरकार आखिर अब अपना धन क्यों लगा रही है? इधर भारत के सार्वजनिक बैंक सुरक्षित हैं तो यहां को लेकर आर्थिक विशेषज्ञ चिंतित नहीं हैंं।

कहा जाता था कि भारत की सरकार की नियंत्रित प्रणाली के कारण विकास नहीं हो पा रहा है पर चंद्रयान-1 क प्रक्षेपण से यह स्पष्ट हो गया है कि यह केवल एक भ्रांत धारणा थी। इसने भारत की प्रतिष्ठा में चार चांद लगा दिये और उसकी बढ़ती वैज्ञानिक शक्ति से इस बात की संभावना बन रही है कि विश्व के अनेक गरीब और विकासशील राष्ट्र भारत की तरफ झुक सकते हैं ताकि उन्हें अपने लिये सस्ते में तकनीकी मदद मिल सके। देने को तो अमेरिका भी ऐसी सहायता देता है पर न केवल पूरा पैसा वसूल करता है बल्कि अपनी अनेक ऐसी शर्तें भी मनवाता है जो किसी सार्वभौमिक राष्ट्र के लिये तकलीफदेह होती हैं। अमेरिका के अलावा अन्य विकसित राष्ट्र भी अब भारत को बराबरी का दर्जा दे सकते हैं-इसके लिये संयुक्त राष्ट्रसंघ में स्थाई सीट होने की जरूरत अब कम ही लोग मानते हैंंं।

भारत ने नियंत्रित प्रणाली होते आर्थिक विकास किया और साथ विज्ञान में भी वह स्थान प्राप्त कर लिया जो अभी चीन के लिये भी थोड़ा दूर है-हालांकि वह भी जल्द ही अपना चंद्रयान अंतरिक्ष में भेजने वाला है। ऐसे में अमेरिका के लिये उस क्षेत्र में चुनौती मिल रही है जिस पर उसका एकाधिकार था। निजी क्षेत्र की हमेशा वकालत करने वाले भारत के बुद्धिजीवी यह सोचकर हैरान होंगे कि कुछ लोगों ने वहां दबे स्वर मेें भारत की तरह मिश्रित अर्थ व्यवस्था अपनाने की आवाज उठाई है। मिश्रित अर्थव्यवस्था का अगर संक्षिप्त मतलब यह है कि जनहित के कुछ व्यवसाय और सेवायें सीधे सरकार के नियंत्रण में रहें ताकि उससे देश की आम जनता के जनजीवन को कभी पटरी से न उतारा जा सके। भारत में वैसे अधिकतर लोग इसी तरह की अर्थव्यवस्था के ही समर्थक हैं, पर सरकार की नियंत्रण की सीमाओं पर क्षेत्रों की संख्या पर मतभेद रहे हैं। हालांकि कुछ बुद्धिजीवी इसके कड़े विरोधी है और यह तय बात है कि वह पूंजीपतियों के लिये लिखने और पढ़ने वाले हैं।

बहरहाल भारत के बुद्धिजीवियों को अब यह समझ लेना चाहिये कि तमाम तरह के विवादों के बावजूद भारत अब विश्व महाशक्ति बनने की तरफ बढ़ रहा है और इस समय इस पर पर विराजमान अमेरिका और अन्य पश्चिमी राष्ट्र अपनी अर्थव्यवस्थाओं को लेकर जूझ रहे हैं। वैसे भारत के विश्व में सर्वशक्तिमान होने की बात का पहले भी अनेक लोग मखौल उड़ाते रहे हैं पर जिस तरह अमेरिका की मंदी ने वहां के हालात बिगाड़े हैं उससे ऐसा लगता है कि तमाम तरह के परिवर्तन इस विश्व में आ सकते हैं। अधिकतर लोगों को लगता है कि अमेरिका केवल हथियारों की वजह से ताकतवर है पर यह केवल अद्र्धसत्य है। अमेरिका के शक्तिशाली होने का कारण यह भी है कि अंतरिक्ष तकनीकी पर एकाधिकार होने के कारण अनेक देश उस निर्भर हैं और यही कारण है कि अपनी पूंजी भी वहीं लगाते हैं। यही कारण है कि अमेरिकी बैंक निजी होते हुए भी बहुत सारी पूंजी अर्जित कर लेते थे।

अब जिस तरह वहां बैंक दिवालिया हो रहे हैं उससे अमेरिका की साख पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है क्योंकि अमेरिका सरकार कब तक इन बैंकों को बचायेगी। इसके विपरीत भारतीय बैंकों पर सरकार का नियंत्रण है। हालांकि भारत में भी निजी बैंक अस्तित्व में आ गये हैं पर इस मंदी के कारण उनकी अभी कोई बृहद भूमिका नहीं है। यही कारण है कि भारत के आर्थिक विशेषज्ञ यहां की अर्थव्यवस्था को चिंतित नहीं है। अमेरिका में आर्थिक मंदी का प्रकोप है और ऐसे में अगर भारत से तकनीकी, विज्ञान और अंतरिक्ष के क्षेत्र में चुनौती मिलने वाली खबर मिलती है तो उस पर श्री ओबामा का चिंतित होना स्वाभाविक है।
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आर्थिक मंदी और निजीकरण का खेल-आलेख


भारत तो फिर भी इस आर्थिक मंदी से उबर लेगा पर अमेरिका के लिये यह एक बहुत बड़ी चुनौती रहने वाली है। इसका कारण यह है कि अमेरिकी कंपनियों के मुखिया चाह कोई भी हों पर उनमें एक बहुत बड़ी राशि विदेशी निवेशकों की हैं। इनमें अनेक भारतीय तो हैं पर साथ में चीन, जापान और खाड़ी देशों के अनेक धनीमानी रईस है। उस दिन अंतर्जाल पर एक ब्लाग ने आंकड़ा दिया था कि अमेरिका की कंपनियों में 36 प्रतिशत तो खाड़ी देशों के लोगों का है। उस ब्लाग पर लेखक ने लिखा था कि ईरान सहित खाड़ी देशों के मुखिया इसलिये अमेरिका से नाराज नहीं हैं कि वह आतंकवाद के विरुद्ध उनकी विचाराधारा का हनन कर रहा है। उनकी नाराजगी कारण यह है कि वह उनकी पूंजी के सहारे ही टिका हुआ है पर वैसा सम्मान उनका नहीं करता। यह एक राजनीतिक विषय हो सकता है पर एक बात तो पता लगती है कि अंग्रेजों की तरह अमेरिका भी दूसरे देशों के धन के कारण विश्व के आर्थिक और सामरिक शिखर पर है.

अब यह तो पता नहीं कि उस लेखक की बात में कितनी सच्चाई है पर उससे एक आभास तो हुआ कि अमेरिका की आर्थिक ताकत का मुख्य आधार ही विदेशी धन है। अमेरिका की बड़ी कंपनियों को करारा झटका लगा है। वहां की एक डूबती हुई बीमा कंपनी को सरकारी सहायता से बचाया गया। दुनियां की एक महाशक्ति और संपन्नता का प्रतीक अमेरिका जिस मंदी से जूझ रहा है उसके कारण अभी खोजना सहज नहीं हैं। एक बात तय है कि पूरे विश्व की औद्योगिक ताकत कुछ लोगों के हाथ में हैं और वह अपने हिसाब से रणनीति बनाकर अपने हित साध सकते हैं यह अलग बात है कि उसका असर आम आदमी पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ता न दिखे पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ता ही है।

भारत में निजीकरण के अंधभक्तों से इस समय अनेक सवाल पूछ जा सकते हैं-
1. जब शेयर बाजार में उथल पुथल होती है तब सरकार से यह अपेक्षा क्यों की जाती है कि वह गिरते हुए भावों पर नियंत्रण करने का प्रयास करे। एक तरफ निजीकरण की वकालत दूसरी तरफ सरकार से अपेक्षायें क्या दोहरा मापदंड नहीं है?
2. हर बार सरकारी कर्मचारियों पर दोषारोपण करने वाले यह बतायें कि वह निजी क्षेत्रों में दी जाने वाली सब्सिडी को विरोध क्यों नहीं करते? जब निजी क्षेत्रों को सब्सिडी दी जाती है तो उसका सही उपयोग होने का क्या प्रमाण है? सरकारी कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार और लापरवाही का ढेर सारे आरोप लगते हैं पर निजी क्षेत्र को तमाम तरह की सुविधायें सस्ती या मुफ्त दर देने से राजस्व की जो हानि होती है क्या वह कर्मचारियों को दिये जाने वाले वेतन से अधिक नहीं होती। निजी उद्योग या सेवा पर संकट आने पर एकदम कर्मचारियों की नौकरी खत्म कर दी गयी तो समाज के लोग उनसे सहानुभूति जताने लगे। यह ठीक बात है पर उन उद्योगों और सेवाओं के उच्च पदस्थ लोगों ने सरकार से कितनी मदद ली और उसका क्या किया?क्या उनके कामकाज में कोई दोष नहीं है। मंदी की वजह से निजी क्षेत्रों में नौकरी का संकट होने पर सरकार को प्रयास करने पड़ते हैं और तब कई अत्यावश्यक सेवाओं के निजीकरण की मांग पर सवाल उठना स्वाभाविक हैं।
3. कुछ सेवायें और उद्यम सरकारी संरक्षण में होने चाहिये-अब यह बात तय लगती है। अनेक आरोपों के बावजूद यह एक सत्य बात है कि निजी क्षेत्रों के कर्मचारियों से महंगे और भविष्य सुरक्षित होने के कारण सरकारी कर्मचारी अपनी नौकरी पर आंच आने के भय से ठीक काम करते हैं।
अब बात अमेरिका की करें। अमेरिकी अगर अपना सामरिक साम्राज्य सी.आई.ए के सहारे चलाता है तो आर्थिक साम्राज्य इन्हीं कंपनियों के भरोसे ही पूरे विश्व में फैला है। अंग्रेज भी ईस्ट इंडिया कंपनी के सहारे हमारे भारत देश में आये और फिर राज्य करने के लिये फैल गये पर अमेरिकी की कई कंपनियों ने अप्रत्यक्ष रूप से पूरे विश्व में अपना जाल फैला रखा है भले ही प्रत्यक्ष रूप से उनका राज्य नहीं दिखता पर वहां के धनपति दूसरे देशों में अपना प्रभाव तो बनाये ही रहते हैं। अब जिस तरह उसकी कंपनियां दबाव में है उससे तो लगता है कि विश्व में राजनीतिक पटल पर भी उसे चुनौती मिलने वाली है। भारतीय कंपनियों कोई दबाव बना पायेंगी इसकी संभावना नहीं के बराबर है पर अमेरिका को राजनीति पटल पर चुनौती देने वाले चीन की कंपनियां एसा प्रयास कर सकती हैं जिससे अमेरिका की अर्थव्यवस्था डांवाडोल हो जाये।

हालांकि इस समय पूरे विश्व के शेयर बाजार संकट में है पर इससे वही देश अधिक संकट में होंगे जिनके शीर्षस्थ लोग वहां विनिवेश करते हैं। यहां यह बात याद रखनी चाहिये कि अनेक गरीब देशों में भी अब ऐसे शीर्षस्थ लोग हैं हो दिखाने के लिये भले ही अमेरिका के बैरी या आलोचक हों पर अपने देश के लोगों को खून की तरह चूसकर अपना पैसा अमेरिका में ही लगाते हैंं। अगर वह आर्थिक रूप से टूटे तो फिर अपने देशों की आम जनता से पैसा वसूल करेंगे। इसमें कई देश ऐसे हैं जहां तानाशाही है और वहां जो शीर्षस्थ लोगों की मनमानी होगी वह भला कौन रोक पायेगा?
अब देखना यह है कि अमेरिका अपने यहां आयी इस मंदी को थाम पाता है कि नहीं क्योंकि विश्व में फैले उसके आर्थिक और सामरिक साम्राज्य का ऐसी कंपनियां आधार है जिन्हें बचाने का वह प्रयास कर रहा है।
यहां निजीकरण पर थोड़ी चर्चा करना बुरा नहीं हैं। वैसे सरकार को व्यवसायिक कामकाज से दूर रहना चाहिये-ऐसा माना जाता है। पर जिस तरह निजीकरण के बाद आवश्यक उद्यमों और सेवाओं का जो परिणाम सामने आ रहा है उससे तो लगता है कि मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाने वाले पूर्वज भी गलत नहीं थे। इसी के चलते इस देश ने प्रगति की पर निजीकरण के रास्ते पर चले हमारे देश की कितनी प्रगति है-यह भी एक विचारणीय प्रश्न है। सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों पर कुप्रबंध का शिकार होने के आरोप लगते हैं पर निजी क्षेत्र सुप्रबंध वाले हैं यह भी नहीं लगता। इस बात पर विचार करना चाहिए कि आखिर हमारे देश के अनुकूल कौनसी व्यवस्था है। अनेक आथिक विशेषज्ञ अमेरिकी बैंकों जैसी हालत भारत की बैंकों की होने को खारिज करते हैं क्योंकि उनके पीछे सीधे सरकार खड़ी है। यह आत्मविश्वास आखिर उसी व्यवस्था की देन है जिसकी आलोचना की जाती है। एक बात निश्चित है कि कुप्रबंध की समस्या अगर सरकारी क्षेत्रों के साथ है तो निजी क्षेत्र की भी है। जिसका परिणाम अंतत: आम आदमी को ही भोगना पड़ता है। भारतील अर्थव्यवस्था का एस दुर्गुण है कुप्रबंध और यही विचार करते हुए अर्थव्यवस्था के स्वरूप में बदलाव लाने चाहिए न कि अमेरिका का अंधानुकरण करना चाहिए। क्या निजीकरण से वाकई आम आदमी को लाभ हुआ है? इस पर कभी विचार करते हुए लिखने का प्रयास इसी ब्लाग पर किया जायेगा।