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बहुत सारी खुशियां भी हैं इस जहां में -व्यंग्य चिंतन


अगर आप हमसे पूछें कि सबसे अधिक किस विषय पर लिखना पढ़ना बोझिल लगता है तो वह है अपने देवी देवताओं फूहड़ चित्र बनाने या उन पर हास्य प्रस्तुति करने वालों का विरोध का विषय ऐसा है जिस पर कुछ कहना बोझिल बना देता है। अगर कहीं ऐसा देख लेते हैंे तो निर्लिप्त भाव से देखकर मुख फेर लेते हैं। इसका कारण यह नहीं कि अपनी अभिव्यक्ति देने में कोई भय होता है बल्कि ऐसा लगता है कि एकदम निरर्थक काम कर रहे हैं। उनके कृत्य पर खुशी तो हो नहीं सकती, चिढ़ आती नहीं पर अगर केवल अभिव्यक्ति देनी है इसलिये उस पर लिखें तो ऐसा लगता है कि अपने को कृ़ित्रम रूप से चिढ़ाकर उसका ही लक्ष्य पूरा कर रहे हैं जिसमें हमें मिलना कुछ नहीं है। ऐसे में जब दूसरे लोग उनकी बात पर चिढ़कर अभिव्यक्त होते हैं तो लगता है कि वह ऐसे अप्राकृत्तिक लोगों का आसान शिकार बन रहे हैं-अपने कृत्यों से प्रचार पाना ही उन लोगों का लक्ष्य होता है भले ही उनको गालियां मिलती हों। उनका मानना तो यह होता है कि ‘बदनाम हुए तो क्या, नाम तो हुआ!’
भले ही कुछ लोग इससे सहमत न हों पर जब हम विचलित नहीं हो रहे तो दूसरों की ऐसी प्रवृत्ति पर कटाक्ष करने का अवसर इसलिये ही मिल पाता है। अभी दो प्रसंग हमारे सामने ऐसे आये जिनका संबंध भारतीय धर्मों या विचारधारा से नहीं है। वैसे यहां हम स्पष्ट कर दें कि हमारी आस्था श्रीमद्भागवत् गीता और योग साधना के इर्दगिर्द ही सिमट गयी है और इस देश का आम आदमी चाहे किसी भी धार्मिक विचाराधारा से जुड़ा हो हम भेद नहीं करते। हमारा मानना है कि हर धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्रीय समूहों का आम इंसान अपने जीवन की तकलीफों से जूझ रहा है इसलिये वह ऐसे विवादों को नहीं देखना चाहता जो प्रायोजित कर उसके सामने प्रस्तुत किये जाते हैं। मतलब हम आम लेखक अपने आम पाठकों से ही मुखातिब हैं और उन्हें यह लेख पढ़ते हुए अपनी विचारधारायें ताक पर रख देना चाहिये क्योकि यह लिखने वाला भी एक आम आदमी है।
चीन की एक कंपनी ने किसी के इष्ट का चिन्ह चप्पल के नीचे छाप दिया। अब उसको लेकर प्रदर्शन प्रायोजित किये जा रहे हैं। उधर किसी पत्रिका में किसी के इष्ट को मुख में बोतल डालते हुए दिखाया गया है। उस पर भी हल्ला मच रहा है। इन गैर भारतीय धर्मो के मध्यस्थ-जी हां, हर धर्म में सर्वशक्तिमान और आम इंसान के बीच इस धरती पर पैदा हुआ ही इंसान मार्गदर्शक बनकर विचरता है जो तय करता है कि कैसे धर्म की रक्षा हो-भारत में पैदा हुए धर्मों पर अविकासवादी चरित्र, असहिष्णु, क्रूर तथा अतार्किक होने का आरोप लगाते हैं। हम उनके जवाब में अपनी सहिष्णुता, तार्किकता, विकासमुखी चरित्र या उदारता की सफाई देने नहीं जा रहे बल्कि पूछ रहे हैं कि महाशयों जरा बताओ तो सही कि अगर किसी ने चप्पल के नीचे या किसी पत्रिका में ऐसा चित्र छाप दिया तो तुम उसे देख ही क्यों रहे हो? और देख रहे हो तो हमारी तरह मुंह क्यों नहीं फेरे लेते।
ऐसा एक बार नहीं अनेक बार हुआ है कि भारतीय देवी देवताओं का मजाक उड़ाया गया पर हमने कभी भी उस इतना शोर नहीं मचाया। इतना ही नहीं सर्वशक्तिमान के स्वरूपों को पेंट या जींस पहनाकर की गयी प्रस्तुति का विरोधी करने वाले सहविचारकों को भी विरोध करने पर फटकारा और समझाया कि ‘यह सब चलता है।’
एक ने हमसे कहा था कि‘आप कैसी बात करते हो, किसी दूसरे समाज के इष्ट स्वरूप की कोई ऐसी प्रस्तुति करता तो पता लगता कि वह कैसे शोर मचा रहे हैं।’
हमने जवाब दिया कि ‘याद रखो, उनसे हमारी तुलना नहीं है क्योंकि हमारे देश में ही ब्रह्म ज्ञानी और श्रीगीता सिद्ध पैदा होते हैं। इनमें कई योगी तो इतने विकट हुए हैं कि आज भी पूरा विश्व उनको मानता है।’
सर्वशक्तिमान का मूल स्वरूप निराकार और अनंत है। जिसके हृदय प्रदेश में विराज गये तो वह हर स्वरूप में उसका दर्शन कर लेता है, भले ही वह धोते पहने दिखें या जींस! कहने का तात्पर्य यह है कि भक्ति की चरम सीमा तक केवल भारतीय अध्यात्मिक ज्ञानी ही पहुंच पाते हैं-यही कारण है कि भारत के सर्वशक्तिमान के स्वरूपों का कोई भद्दा प्रदर्शन प्रस्तुत करता है तो उस पर बुद्धिजीवियों का ही एक वर्ग बोलता है पर संत और साधु समाज उसे अनदेखा कर जाते हैं।
जाकी रही भावना जैसी! गुण ही गुणों बरतते हैं। शेर चिंघाडता है, कुत्ता भौंकता है और गाय रंभाती है क्योंकि यह उनके गुण है। हंसना और मुस्कराना इंसान को कुदरत का तोहफा है जिसका उसे इस्तेमाल करना चाहिये। भौंकने का जवाब भौंकने से देने का अर्थ है कि अपने ही ज्ञान को विस्मृत करना। हमारे यहां हर स्वरूप में भगवान के दर्शन में एक निरंकार का भाव होता है।
एक चित्रकार ने भारतीय देवी देवताओं के भद्दे चित्र बनाये। लोगों ने उसका विरोध कर उसे विश्व प्रसिद्ध बना दिया। अज्ञानता वश हम विरोध कर दूसरों का विश्व प्रसिद्ध बनाते जायें इससे अच्छा है कि मुंह फेरकर उनकी हवा निकाल दें। उस चित्रकार के कृत्य हमने भी विचार किया तब यह अनुभूति हुई कि उसका क्या दोष? जैसे संस्कार मिले वैसा ही तो वह चलेगा। बुढ़ापे में एक युवा फिल्म अभिनेत्री से आशिकी के चर्चे मशहुर करा रहा था? दरअसल भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से वह बहुत दूर था। जब भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से जुड़े समाज में पैदा हुए लोग ही भूल जाते हैं तो वह तो पैदा ही दूसरे समाज में हुआ था। उसका उसे यह लाभ मिला कि वह आजकल विदेश में ऐश कर रहा है क्योंकि उसे यह कहने का अवसर मिल गया है कि मुझे वहां खतरा है।’
कहने का तात्पर्य यह है कि हम विरोध कर दूसरे को लोकप्रिय बना रहे हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उपेक्षासन का वर्णन है। यह पढ़ा तो अब हमने पर चल इस पर बरसों से रहे हैं। दूसरे समाजों के लिये तो यह नारा है कि ‘और भी गम हैं इस जमाने में’, पर हमारा नारा तो यह है कि ‘बहुत सारी खुशियां भी हैं इस जहां में’। देखने के लिये इतनी खूबसूरत चेहरे हैं। यहां कोई पर्दा प्रथा नहीं है। हम लोग सभी देवताओं की पूजा करते हैं और उसका नतीजा यह है कि वन, जल, तथा खनिज संपदा में दुनियां की कोई ऐसा वस्तु नहंी है जो यहां नहीं पायी जाती। विश्व विशेषज्ञों का कहना है कि ‘भूजल स्तर’ सबसे अधिक भारत में ही है। जहां जल देवता की कृपा है वहीं वायु देवता और अग्नि देवता-जल में आक्सीजन और हाईड्रोजन होता है-का भी वास रहता है। इतनी हरियाली है कि मेहनत कर पैसा कमाओ तो स्वर्ग का आनंद यहीं ले लो उसके लिये जूझने की जरूरत नहीं है। लेदेकर संस्कारों की बात आती है और भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में योग साधना तथा मंत्रोच्चार के साथ एसी सिद्धि प्रदान करने की सुविधा प्रदान करता है कि दैहिक और मानसिक अनुभूतियां इतनी सहज हो जाती हैं कि उससे किसी भी अपने अनुकूल किसी अच्छी वस्तु, पसंदीदा आदमी, या प्रसन्न करने वाली घटना से संयोग पर परम आनंद की चीजें प्राप्त हो जाती हैं। बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो तथा बुरा मत कहो की तर्ज पर हमारे यहां लोग आसानी से चलते हैं न कि हर जरा सी बात पर झंडे और डंडे लेकर शोर मचाने निकलते हैं कि ‘हाय हमारा धर्म खतरे में है।’
आखिरी बात यह है कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की महिमा ऐसी है कि यहां के आदमी बाहर जाकर भी इसे साथ ले जाते हैं और यहां रहने वाले दूसरे समाजों के आम लोग भी स्वतः उसमें समाहित होते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की यह खूबी है कि कुछ बाहर स्थापित विचारों को भले ही मानते हों पर उनमें संस्कार तो इसी जमीन से पैदा होते हैं। यही कारण है कि आम आदमी सभी समूहों के करीब करीब ऐक जैसे हैं पर उनको अलग दिखाकर द्वंद्व रस पिलाया जाये ताकि उनके जज़्बातों का दोहन हो सके इसलिये ही ऐसे शोर मचावाया जाता है। ऐसे लोगों का प्रयास यही रहता है कि आम आदमी एक वैचारिक धरातल पर न खड़ा हो इसलिये उनमें वैमनस्य के बीच रोपित किये जायें।
दरअसल प्रचार माध्यम आम आदमी के दुःख सुख तथा समस्याओं को दबाने के लिये ऐसे प्रायोजित कार्यक्रमों के जाल में फंस जाते हैं और इससे शोर का ही विस्तार होता है शांति का नहीं-जैसा कि वह दावा करते हैं।
इस लेखक का यह लेख उस गैरभारतीय धर्मी ब्लागर को समर्पित है जिसने अपने इष्ट पर कार्टून बनाने के विरोध में अपने समाज के ठेकेदारों द्वारा आयोजित प्रदर्शन पर व्यंग्य जैसी सामग्री लिखी थी। उसने बताया था कि किस तरह लोग उस प्रदर्शन में शामिल हुए थे कि उनको पता ही नहीं था कि माजरा क्या है? अनेक बार एक पत्रिका पर ब्लाग देखकर भी मन नहीं हुआ था पर उसके लेख ने ऐसा प्रेरित किया कि फिर लिखने निकल पड़े-क्योंकि पता लगा कि यह स्वतंत्र और मौलिक अभिव्यक्ति का एक श्रेष्ठ मार्ग है। अक्सर उसे ढूंढने का प्रयास करते हैं। संभावना देखकर अनेक ब्लाग लेखकों के तीन वर्ष पुराने पाठों तक पहुंच जाते हैं, पर अभी तक पता नहीं लगा पाये।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

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धरती की रक्षा के लिये अपील नहीं चेतावनी की जरूरत-आलेख


सुना है आज घरती प्रहर दिवस मनाया जा रहा है। नयी सस्कृति अपना चुके इस देश में धीरे धीरे पाश्चात्य संस्कृति स्थापित करने के जो प्रयास अभी तक हुए हैं उसमें कई विद्वान लोगों को सफलता नहीं मिल पा रही है और अब प्रेम दिवस, शुभेच्छु दिवस, मित्र दिवस, नारी दिवस, माता दिवस तथा अन्य अनेक प्रकार के दिवस मनाने की प्रथा के सहारे यह प्रयास किया जा रहा है। पहले अनेक प्रकार के आधुनिक विचार लाकर देश में संस्कृति के विकास अवरुद्ध करने के साथ ही लोगों में चिंतन क्षमता का अकाल पैदा किया और अब नये नये दिवस मनवाकर उसी चिंतन क्षमता को नये रूप मेें स्थापित करने का जो प्रयास हो रहा है।
बहरहाल माता की ममता, सहृदय का प्रेम,तथा स्नेही की मित्रता ऐसे तत्व हैं जिसकी सुगंध को हमारे देश का आदमी स्वाभाविक रूप से अनुभव करता है। लार्ड मैकाले की गुलाम बनाने की शिक्षा के बावजूद हमारे देश में कुछ गुरु और माता पिता अपने बच्चे को अपनी संस्कृति से परिचित कराने के लिये प्रयास करते हैं जिसके कारण आज भी देश की अधिकतर आबादी उस नये परिवेश से परिचित नहीं है जिसका नये विद्वान प्रचार करते है।

ब्रह्मांड में धरती ही जीवन का सबसे बड़ा आधार है। जीवन निर्माण के साथ ही ब्रह्मा ने सभी मनुष्यों से कहा कि आप लोग यज्ञों द्वारा देवताओं की पूजा करें और वह अपने कर्म से धरती पर जीवन का संचार करें। धरती भी उनमें एक ऐसे देवता की तरह है जो अन्य देवताओं को भी अपने यहां ठहरने का आधार देती है ताकि उनकी कृपा मनुष्यों पर निंरतर बनी रहे। देवराज इंद्र की कृपा से वरुण देव जल बरसाते हैं और धरती उसका संचय करती है। जो वायु देवता उन बादलों को खींचकर अपने साथ लाते है उसकी शक्ति को पाताल में न जाकर अपने यहां ही बहने देती है ताकि वह जल को सूखे स्थानों तक पहुंचा सके। सूर्य की गर्मी के संचय से उष्मा संचय कर बादलों का पानी नीचे खींचने में सहायता करती है। अपनी शक्ति से समस्त देवताओं को बांधने वाली इस धरती पर वही इंसान कहर बरपाता है जिसके सुख के लिये वह सभी करती है।

वैदिक धर्म ने अनेक ऐसे यज्ञों का प्रवर्तन किया जिससे धरती पर प्राकृतिक संतुलन बना रहे। प्राचीन काल मेंें राजा भागीरथ ने घोर तपस्या कर गंगा नदी को स्वर्ग से जमीन पर उतारा। गंगा जी में इतना तेज था कि उनके धरती पर न रुककर पाताल में घुस जाने की संभावना थी इसलिये राजा भागीरथ ने उनकी गति की तीव्रता कम रखने के लिये भगवान शिव जी की तपस्या की और उन्होंने उसे अपनी जटाओं में धारण किया। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे प्राचीनतम अध्यात्मिक दर्शन में प्रथ्वी पर जीवन सतत प्रवाहित करने के लिये मनुष्यों से प्रयास किये जाने की अपेक्षा की जाती है। यह माना जाता है कि मनुष्य प्रथ्वी पर पर्यावरण संतुलन करने के लिये जल और वायु प्रदूषण रोकने के साथ ही कृषि, वन, खनिज, और पशु संपदा की रक्षा और शुद्धता के लिये मनुष्य स्वयं निरंतर प्रयत्नशील रहे न कि किसी अवतार का इंतजार करे। यही कारण है कि उसके लिये कोई एक दिन तय नहीं किया गया।

हमने पाश्चात्य शैली का विलासी और सुविधाभोगी जीवन तो अपना लिया है पर धरती पर फैलते जा रहे पर्यावरण प्रदूषण को विचार तो तभी कर सकते हैं जब अपने देह की परवाह कर लें। सभी लोग उपभोग की प्रवृतियों में अपना दिमाग लगाये बैठे हैं। देह, मन और विचार के विकारों को निकालने के लिये लिये कोई प्रयास नहीं करते। अब यह कहना कठिन है कि पर्यावरण प्रदूषण के कारण लोग मनोरोगी हो रहे हैं या वह मनोरोगी हो गये हैं इसलिये पर्यावरण प्रदूषण फैल रहा है। अब समस्या यह भी है कि पहले पर्यावरण प्रदूषण दूर हो या पहले लोगों की मानसिकता में पवित्रता का भाव आये। तय बात है कि ब्रह्मा जी ने मनुष्यों ये देवताओं को प्रसन्न करने के लिये यज्ञ और देवताओं से प्रथ्वी के समस्त जीवों मेंे जीवन का संचार करने का जो आदेश दिया उसका उल्लंघन हो गया है। देवता तो अपनी कृपा करते रहते हैं पर मनुष्य यज्ञ कहां कर रहा है? पेड़ पौद्यों को काटकर वहां पत्थर के शहर बनाने वाला इंसान पत्थर होता जा रहा है। वैसे आज भी कुछ लोग हैं जो पेड़ पोद्यों की रक्षा करने केे लिये प्रयासरत हैं-यह भी एक तरह का यज्ञ है। हमारे देश में अनेक अवसरों पर पेड़ पौद्यों पर जल चढ़ाने की पंरपरा का कुछ लोग मजाक उड़ाते हैं पर उसका महत्व वह नहीं जानते। दरअसल हमारे कुछ यज्ञ भले ही आधुनिक समय में पाखंड लगते हैं पर उनका कोई न कोई वैज्ञानिक महत्व रहा है और इसे कई लोग प्रमाणित कर चुके है।
सच बात तो यह है कि पर्यावरण प्रदूषण से बचने के लिये प्राकृतिक संपदा की रक्षा के लिये लोगों में चेतना जाग्रत कर उनसे सहायता की अपील करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि यह चेतावनी देने की जरूरत है कि अगर विश्व में इसी तरह गर्मी बढ़ती रही तो न केवल वह स्वयं बल्कि उनकी आने वाली पीढि़यां ही अपंग और मनोरोगी पैदा होंगी। अपनी सात पीढि़यों तक को खिलाने के लिये कमाकर रखने का विचार करने वाले धनी लोगों को यह समझाना भी जरूरी है कि उनकी आने वाली पीढि़यां नाम के लिये मनुष्य होगी पर उसका चालचलन पशुओं की तरह हो जायेगा। वैसे भी देश में आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा अनेक प्रकार की बीमारियों से ग्रसित है पर मनोरोगी कितने हैं कोई नहीं जानता। पूरी तरह विक्षिप्त होना ही मनोरोग नहीं होता बल्कि अनावश्यक बातों से तनाव में आना, जल्दी थक जाना तथा निराशा में रहना भी एक तरह से मनोरोग हैं जिनका पता तो रोगी को भी नहीं चलता। कोई कहता है कि देश के चालीस प्रतिशत लोग मनोरोगी है तो कोई कहता है कि इससे भी ज्यादा हैं। अगर हम अपनी चिंतन क्षमता को जाग्रत करें तो यह अनुभव कर सकते हैं कि अधिकतर लोगों की मनोदशा बहुत खराब है। तय बात है कि बढ़ती गर्मी और प्राणवायु में कमी ही ऐसी दशा में इंसान को डालती है।
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मौलिक तथा स्वतंत्र लेखन के प्रोत्साहन के प्रयास जरूरी-आलेख


जब सामाजिक विषयों पर कुछ लिखा जाता है और वह व्यंजना विद्या में है तो अच्छा लगता है। सामाजिक विषयों में व्यापकता होती है इसलिये उस पर हर तरह से लिखा और पढ़ा जाता है पर कठिनाई यह है कि हिंदी ब्लाग जगत को लेकर अनेक बार ऐसी बातें आती हैं जो यह सोचने को मजबूर करती हैं कि आखिर संगठिन होकर हिंदी ब्लाग जगत क्यों नहीं चल पा रहा है? इस समय हिंदी ब्लाग जगत में कई ऐसे ब्लाग लेखक हैं जो चार सालों से लिख रहे हैं पर उनका नाम क्यों नहीं लोगों की जुबान पर चल रहा है? सच बात तो यह है कि हिंदी ब्लाग जगत का नियमित लेखन चालीस से अधिक लोगों के आसपास ही सिमटा लगता है।

एक समाचार के अनुसार भारत में सामाजिक विषयों में अब यौन संबंधी सामग्री के मुकाबले बढ़ी रही है। दरअसल इंटरनेट का भविष्य ही सामजिक विषयों पर टिका हआ है। यौन सामग्री से लोग बहुत जल्दी उकता जाते हैं।

अखबार में अनेक बार ब्लाग के बारे में पढ़ता हैं। यह चर्चा हिंदी के बारे में नहीं लगती बल्कि ‘ब्लाग’ शब्द तक सिमटी रहती है। जब ज्वलंत विषयों पर ब्लाग की चर्चा होती है तो अक्सर अंग्रेजी ब्लोग का नाम दिया जाता है पर हिंदी ब्लाग को एक भीड़ की तरह दिखाया जाता है। जिन हिंदी ब्लाग की चर्चा प्रचार माध्यमों में हुई है वह पक्षपातपूर्ण हुई है इसलिये दूर से हिंदी ब्लाग जगत देखने वाले इसे संदेह की दृष्टि से देखते हैं। इस हिंदी ब्लाग जगत में सम सामयिक विषयों पर अनूठा लिखा गया पर उसे देखा कितने लोगों ने-इसका अनुमान सक्रिय ब्लाग लेखक कर सकते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि जो लोग चाहते हैं कि हिंदी में अधिक से अधिक ब्लाग लिखें जायें और इसके लिये वह अपनी तरफ से शौकिया या पेशेवर प्रयास करते हुए केवल अपने चेहरे और नाम ही आगे रखना चाहते हैं-अधिक हुआ तो अपने ही किसी आदमी का नाम बता देते हैं।
भारत के लोगों में चाहे जितना तकनीकी ज्ञान,धन,तथा सामाजिक हैसियत हो पर उनका प्रबंध कौशल एक खराब हैं-यह सच सभी जानते हैं। इस प्रबंध कौशल के खराब होने का कारण यह है कि जो उच्च स्तर पर इस काम के लिये हैं वह हाथ से काम करने वाले को महत्वहीन समझते है। फिर उनकी एक आदत है कि वह उस आदमी का नाम नहीं लेना चाहते जिसने स्वयं नहीं कमाया हुआ हो। खिलाड़ी,अभिनेता,पत्रकार,और उच्च पदस्थ लोगों के साथ प्रतिष्ठत नामों का उपयोग करना चाहते हैं। ऐसे में भाग्य से कोई आम आदमी ही प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंच सकता है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि स्वयं अपने हाथ से मौलिक लिखने वाले लेखकों को यहां एक तरह से प्रयोक्ता की तरह समझा जा रहा है शायद यही कारण है कि कोई उनके नाम तक नहीं लेता।

मैंने कुछ वेबसाईट संचालकों तथा प्रचार प्रमुखों के बयान समाचार पत्रों में देखे हैं। वह हिंदी में ब्लाग बढ़ाने के अभियान में लगे होेने का दावा करते हैं और साथ ही उम्मीदें भी जगाते हैं। समाचार पत्रों में उनको अपना नाम देखकर शायद उनको प्रसन्नता होती है। इसमें कोई बुराई नहीं है पर क्या उनकी नजर में कोई ऐसा ब्लाग लेखक नहीं है जिसका नाम लेकर वह कह सकें कि ‘देखो अमुक अमुक ब्लाग लेखक हैं जो हिंदी में बहुत अच्छा लिख रहे हैं।’ वह ऐसा नहीं कहेंगे कि क्योंकि अगर उन्होंने दस या पंद्रह नाम लिये तो लोगों की जुबान पर चढ़ जायेंगे तब उनको अधिक पाठक मिलना तय है।

अभी हाल ही में पब और चड्डी विवाद में अंग्रेजी वेबसाईट का नाम दिया पर हिंदी वालों को एक भीड़ की तरह निपटा दिया। क्या यह खौफ नहीं था कि अगर नाम लिखा तो वह हिट पा लेंगे। अपनी वेबसाईटों के संचालक अपने ब्लाग का प्रचार खूब करते हैं पर उनके साथ पाठकों का कितना वर्ग जुड़ता है वह जानते हैं। जो हिंदी ब्लाग जगत में सक्रिय हैं वह जानते हैं कि कुछ ब्लाग अगर लोगों की नजर में पड़ जायें तो उसे पाठक अधिक मिलेंगे और उसका लाभ अंततः हिंदी ब्लाग जगत को ही मिलेगा। मगर उनका नाम सार्वजनिक रूप से लेने से कतराना प्रबंध कौशल का अभाव ही कहा जा सकता है।

कुछ लोग कहते हैं कि प्रसिद्ध सितारों और अन्य लोगों को लिखने के लिये प्रयोजित किया जा रहा है-पता नहीं यह सच है कि नहीं-पर इससे हिंदी ब्लाग जगत को कोई लाभ नहीं होने वाला है। अगर एक आम ब्लाग लेखक को प्रायोजित न करें तो उनके ब्लाग का ही थोड़ा प्रचार कर लिया जाये तो कौनसी बड़ी बात हो जाती। वैसे हम सामान्य प्रयोक्ता ही हैं और इंटरनेट कनेक्शन का भुगतान प्रतिमाह करते हैं और प्रसिद्ध होकर कहीं उससे कटवा न लें शायद यही एक भय रहता होगा। एक बात सत्य है कि भारत में ब्लाग का भविष्य हिंदी से ही जुड़ा है और जिस तरह ब्लाग के पाठों की संख्या बढ़ रही है वह संतोषप्रद नहीं है। हिंदी ब्लाग जगत को स्वतंत्र और मौलिक लिखने वाले ब्लाग लेखकों की सख्त जरूरत है पर इस भौतिकवादी युग में उनकों बिना किसी प्रश्रय के लंबे समय तक नहीं चलाया जा सकता। जहां तक पश्चिमी देशों की तुलना में भारतीयों की सामाजिक विषयों में कम रुचि का सवाल है तो उसका सीधा जवाब है कि भारत में हिंदी में सामाजिक विषयों में मौलिक तथा स्वतंत्र लेखकों के लिये कोई प्रश्रय नहीं है। अंग्रेजी में तो पाठकों की सीधे पहुंच होती है इसलिये उसके ब्लाग लेखकों को पाठक मिलना कोई कठिन काम नहीं है पर हिंदी की हालत यह है कि अभी ब्लाग लेखक फोरमों में अपने ही मित्रों से ही पाठक जुटाते हैं।
अभी उस दिनं एक वेबसाईट के संचालक का बयान अखबार में पढ़ने को मिला। मध्यप्रदेश में हिंदी के पाठक मिलने की उम्मीद उसने जताई थी पर उसने इस प्रदेश के किसी एक लेखक का नाम नहीं लिया जो लिख रहा है।
तब बड़ा आश्चर्य हुआ। हिंदी के लिये पाठक जुटाने की बात करने वाला वह शख्स क्या नहीं जानता कि हिंदी में मध्य प्रदेश से लिखने वाले कितने हैं और साथ में प्रसिद्ध भी हैं। ले देकर वहीं बात आ जाती है। कहते हैं कि हिंदी लेखन जगत में नहीं सभी जगह एक दूसरे को प्रोत्साहन देने की बजाय लोग टांग घसीटी में अधिक लगते हैं। अंतर्जाल पर सक्रिय प्रबंधक भी इस भाव से मुक्त नहीं हो पाये हैं। यह कोई शिकायत नहीं है। जिसकी मर्जी है वैसा करे फिर यहां ब्रह्मा होने का दावा भी तो कोई नहीं कर सकता। हां, एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि वह गलतफहमियों में न रहें। यहां वही ब्लाग लेखक डटकर लिखेंगे जिनको पाठक चाहेंगे। यह कोई अखबार नहीं है कि सुबह हाकर डालकर चला आयेगा तो पाठक वही पढ़ेंगे जो संपादक ने छापा हैं। वैसे भी अखबार खोलने में कम मेहनत होती है और खर्चा कम आता है। ब्लाग का मतलब है कि इंटरनेट पर एक बहुत बड़ी रकम खर्च करना। ऐसे में पाठक चाहेंगे बाहर से अलग कोई विषय या अनूठी सामग्री। जब तक आम पाठक को यहां के हिंदी ब्लाग जगत से परिचय नहीं कराया जायेगा तब तक इसके शीघ्र उत्थान की बात तो भूल ही जाईये। अनेक प्रतिष्ठित ब्लाग लेखक भी मानते हैं कि चार पांच वर्ष तक हिंदी ब्लाग जगत में कोई अधिक सुधार नहीं होने वाला। जिन लोगों ने हिंदी ब्लाग जगत का प्रबंध अपने हाथ में-शौकिया या पेशेवर रूप से-अपने हाथ में लिया है उन्हेें यह समझना चाहिये कि इसमें उन्नति और स्थिरता केवल स्वतंत्र और मौलिक ब्लाग लेखकों के हाथों से ही संभव है। अगर वह सोच रहे है कि बड़े और प्रसिद्ध नामों से प्रभावित लोग हिंदी ब्लाग जगत पर सक्रिय हो जायेंगे तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता पर आम पाठक के मन में स्थाई रुझान केवल आम लेखक के प्रसिद्ध होने पर होगा। वरना तो स्थिति दो वर्ष से तो मैं ही देख रहा हूं। अभी तक वही ब्लाग लेखक हम लोगों में लोकप्रिय हैं जो दो वर्ष पहले थे। जहां तक भारत में सामाजिक विषयों में यौन विषय से अधिक रुझान होने की बात है अभी ठीक नहीं लगती। अगर सामाजिक विषयों में लोगों के रुझान बढ़ाने की बात है तो फिर ब्लाग लेखकों से ही उम्मीद की जा सकती है पर उसे बनाये रखने का प्रयास कौन कर रहा है? शायद कोई नहीं। अगर इसी तरह चलता रहा तो दस वर्ष तक भी कोई सुधार नहीं होने वाला।
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