Category Archives: bharat

संत कबीरदास के दोहे-भगवान के साथ चतुराई मत करो


सिहों के लेहैंड नहीं, हंसों की नहीं पांत
लालों की नहीं बोरियां, साथ चलै न जमात

संत शिरोमणि कबीर दास जी के कथन के अनुसार सिंहों के झुंड बनाकर नहीं चलते और हंस कभी कतार में नहीं खड़े होते। हीरों को कोई कभी बोरी में नहीं भरता। उसी तरह जो सच्चे भक्त हैं वह कभी को समूह लेकर अपने साथ नहीं चलते।

चतुराई हरि ना मिलै, ए बातां की बात
एक निस प्रेही निराधार का गाहक गोपीनाथ

कबीरदास जी का कथन है कि चतुराई से परमात्मा को प्राप्त करने की बात तो व्यर्थ है। जो भक्त उनको निस्पृह और निराधार भाव से स्मरण करता है उसी को गोपीनाथ के दर्शन होते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-लोगों ने तीर्थ स्थानों को एक तरह से पर्यटन मान लिया है। प्रसिद्ध स्थानों पर लोग छुट्टियां बिताने जाते हैं और कहते हैं कि दर्शन करने जा रहे हैं। परिणाम यह है कि वहां पंक्तियां लग जाती हैंं। कई स्थानों ंपर तो पहले दर्शन कराने के लिये बाकायदा शुल्क तय है। दर्शन के नाम पर लोग समूह बनाकर घर से ऐसे निकलते हैं जैसे कहीं पार्टी में जा रहे हों। धर्म के नाम पर यह पाखंड हास्याप्रद है। जिनके हृदय में वास्तव में भक्ति का भाव है वह कभी इस तरह के दिखावे में नहीं पड़ते।
वह न तो इस समूहों में जाते हैं और न कतारों के खड़े होना उनको पसंद होता है। जहां तहां वह भगवान के दर्शन कर लेते हैं क्योंकि उनके मन में तो उसके प्रति निष्काम भक्ति का भाव होता है।

सच तो यह है कि मन में भक्ति भाव किसी को दिखाने का विषय नहीं हैं। हालत यह है कि प्रसिद्ध तीर्थ स्थानों पर किसी सच्चे भक्त का मन जाने की इच्छा भी करे तो उसे इन समूहों में जाना या पंक्ति में खड़े होना पसंद नहीं होता। अनेक स्थानों पर पंक्ति के नाम पर पूर्व दर्शन कराने का जो प्रावधान हुआ है वह एक तरह से पाखंड है और जहां माया के सहारे भक्ति होती हो वहां तो जाना ही अपने आपको धोखा देना है। इस तरह के ढोंग ने ही धर्म को बदनाम किया है और लोग उसे स्वयं ही प्रश्रय दे रहे हैं। सच तो यह है कि निरंकार की निष्काम उपासना ही भक्ति का सच्चा स्वरूप है और उसी से ही परमात्मा के अस्तित्व का आभास किया जा सकता है। पैसा खर्च कर चतुराई से दर्शन करने वालों को कोई लाभ नहीं होता।
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लोहप्रेम-व्यंग्य कविताऐं


जब नदी बनकर बही समंदर
लोहे का बना हो गया लकड़ी का
हर घर उसमें बह गया,
जिस जीवन का मतलब नहीं समझते थे,
तबाही का परवाना लेकर आया
बाढ़ का पानी कह गया।
पैट्रोल गाड़ी चला सकता है
पर जीवन नहीं,
लोहे लंगर के बने ढांचे
फंसे रहे सड़क पर
अपने पैसे पर इतराने वालों!
जिसे रौंदा तुमने हर पल अपने पांव तले
चढ़कर आया वह पानी तुम्हारे सिर
जिसमें तुम्हारा लोहप्रेम ढह गया।
———
जल को तुम न जलाओ
वरना वह तुम्हें बहा ले जायेगा,
जिंदगी के आधार को सस्ता न समझना
वरना आग की तरह जलाने लगेगा
जब सिर पर चढ़ा चला आयेगा।
———

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स्वतंत्रता दिवस का एक दिन-व्यंग्य कविता कविता (one day of independence-hidi satire poem)


अपने ही गुलामों की
भीड़ एकत्रित कर आज़ादी पर
शिखर पुरुष करते हैं झंडा वंदन।
अपने खून को पसीना करने वाले
मेहनतकशों के लिये हमदर्दी के
कुछ औपचारिक शब्द बोल देते हैं
उसके हाथ भी खोल देते हैं
बस! एक दिन
फिर उसके पसीने का तेल बनाने के लिए
डाल देते हैं पांव में बंधन।।
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धर्म और अवतार-हिंदी हास्य कविता


फंदेबाज मिला रास्ते में
और बोला
‘चलो दीपक बापू
तुम्हें एक सम्मेलन में ले जायें।
वहां सर्वशक्तिमान के एक नये अवतार से मिलायें।
हमारे दोस्त का आयोजन है
इसलिये मिलेगा हमें भक्तों में खास दर्जा,
दर्शन कर लो, उतारें सर्वशक्तिमान का
इस जीवन को देने का कर्जा,
इस बहाने कुछ पुण्य भी कमायें।’

सुनकर पहले चौंके दीपक बापू
फिर टोपी घुमाते हुए बोले
‘कमबख्त,
न यहां दुःख है न सुख है
न सतयुग है न कलियुग है
सब है अनूभूति का खेल
सर्वशक्तिमान ने सब समझा दिया
रौशनी होगी तभी
जब चिराग में होगी बाती और तेल,
मार्ग दो ही हैं
एक योग और दूसरा रोग का
दोनों का कभी नहीं होगा मेल,
दृश्यव्य माया है
सत्य है अदृश्य
दुनियां की चकाचौंध में खोया आदमी
सत्य से भागता है
बस, ख्वाहिशों में ही सोता और जागता है
इस पूर्ण ज्ञान को
सर्वशक्मिान स्वयं बता गये
प्रकृति की कितनी कृपा है
इस धरा पर यह भी समझा गये
अब क्यों लेंगे सर्वशक्तिमान
कोई नया अवतार
इस देश पर इतनी कृपा उनकी है
वही हैं हमारे करतार
अब तो जिनको धंधा चलाना है
वही लाते इस देश में नया अवतार,
कभी देश में ही रचते
या लाते कहीं लाते विदेश से विचार सस्ते
उनकी नीयत है तार तार,
हम तो सभी से कहते हैं
कि अपना अध्यात्म्किक ज्ञान ही संपूर्ण है
किसी दूसरे के चंगुल में न आयें।
ऐसे में तुम्हारे इस अवतारी जाल में
हम कैसे फंस जायें?
यहां तो धर्म के नाम पर
कदम कदम पर
लोग किसी न किसी अवतार का
ऐसे ही जाल बिछायें।

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जज़्बात एक शय है-.हिन्दी शायरी


इंसान के जज्ब़ात शर्त से
और समाज के सट्टे के भाव से
समझे जाते हैं।
नये जमाने में
जज़्बात एक शय है
जो खेल में होता बाल
व्यापार में तौल का माल
नासमझी बन गयी है
जज़्बात का सबूत
जो नहीं फंसते जाल में
वह समझदार शैतान समझे जाते हैं
……………………….
एक दोस्त ने फोन पर
दूसरे दोस्त से
‘क्या स्कोर चल रहा है
दूसरा बिना समझे तत्काल बोला
‘यार, ऐसा लगता है
मेरी जेब से आज फिर
दस हजार रुपया निकल रहा है।’
……………………………..
छायागृह में चलचित्र के
एक दृश्य में
नायक घायल हो गया तो
एक महिला दर्शक रोने लगी।
तब पास में बैठी दूसरी महिला बोली
‘अरे, घर पर रोना होता है
इसलिये मनोरंजन के लिये यहां हम आते हैं
पता नहीं तुम जैसे लोग
घर का रोना यहां क्यों लाते हैं
अब बताओ
क्या सास ने मारकर घर से निकाला है
या बहु से लड़कर तुम स्वयं भगी
जो हमारे मनोरंजन में खलल डालने के लिये
इस तरह जोर जोर से रोने लगी।’
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हैती का भूंकप, ज्योतिष,पूंजीवाद और साम्यवाद-हिन्दी लेख


हैती में भूकंप, ज्योतिष, पूंजीवाद और समाजवाद जैसे विषयों में क्या साम्यता है। अगर चारों को किसी एक ही पाठ में लिखना चाहेंगे तो सब गड्डमड्ड हो जायेगा। इसका कारण यह है कि भूकंप का ज्योतिष से संबंध जुड़ सकता है तो पूंजीवाद और समाजवाद को भी एक साथ रखकर लिखा जा सकता है पर चार विषयों के दोनों समूहों को मिलाकर लिखना गलत लगेगा, मगर लिखने वाले लिख रहे हैं।
पता चला कि हैती में भूकंप की भविष्यवाणी सही निकली। भविष्यवक्ताओं को अफसोस है कि उनकी भविष्यवाणी सही निकली। पूंजीवादी देश हैती की मदद को दौड़ रहे हैं पर साम्यवादी बुद्धिजीवी इस हानि के लिये पूंजीवाद और साम्राज्यवाद को जिम्मेदार बता रहे हैं। दावा यहां तक किया गया है कि पहले आये एक भूकंप में साम्यवादी क्यूबा में 10 लोग मरे जबकि हैती यह संख्या 800 थी-उस समय तक शायद पूंजीवादी देशों की वक्र दृष्टि वहां नहीं पड़ी थी। अब इसलिये लोग अधिक मरे क्योंकि पूंजीवाद के प्रभाव से वहां की वनसंपदा केवल 2 प्रतिशत रह गयी है। अभिप्राय यह है कि पूंजीवादी देशों ने वहां की प्रकृति संपदा का दोहन किया जिससे वहां भूकंप ने इतनी विनाशलीला मचाई।
इधर ज्योतिष को लेकर भी लोग नाराज हैं। पता नहीं फलित ज्योतिष और ज्योतिष विज्ञान को लेकर भी बहस चल रही है। फलित ज्योतिष पीड़ित मानवता को दोहन करने के लिये है। ऐसे भी पढ़ने को मिला कि अंक ज्योतिष ने-इसे शायद कुछ लोग खगोल शास्त्र से भी जोड़ते है’ फिर भी प्रगति की है पर फलित ज्योतिष तो पुराने ढर्रे पर ही चल रहा है।
एक साथ दो पाठ पढ़े। चारों का विषय इसलिये जोड़ा क्योंकि हैती के भूकंप की भविष्यवाणी करने वाले की आलोचना उस साम्यवादी विचारक ने भी बिना नाम लिये की थी। यहां तक लिखा कि पहले भविष्यवाणी सही होने का दावा कर प्रचार करते हैं फिर निराशा की आत्मस्वीकृति से भी उनका लक्ष्य ही पूरा होता है। इधर फलित ज्योतिषियों पर प्रहार करता हुए पाठ भी पढ़ा। उसका भी अप्रत्यक्ष निशाना वही ज्योतिष ब्लाग ही था जिस पर पहले हैती के भूकंप की भविष्यवाणी सत्य होने का दावा फिर अपने दावे के सही होने को दुर्भाग्यपूणी बताते हुए प्रकाशित हुई थी। चार तत्व हो गये पर पांचवा तत्व जोड़ना भी जरूरी लगा जो कि प्रकृति की अपनी महिमा है।
मगर यह मजाक नहीं है। हैती में भूकंप आना प्राकृतिक प्रकोप का परिणाम है पर इतनी बड़ी जन धन हानि यकीनन मानवीय भूलों का नतीजा हो सकती है। हो सकता है कि साम्यवादी विचारक अपनी जगह सही हो कि पूंजीवाद ने ही हैती में इतना बड़ा विनाश कराया हो। ऐसी प्राकृतिक विपदाओं पर होने वाली हानि पर अक्सर प्रगतिशील और जनवादी बुद्धिजीवी अपने हिसाब से पूंजीवाद और साम्राज्यवादी को निशाना बनाते हैं। उनको अमेरिका और ब्रिटेन पर निशाना लगाना सहज लगता है। वह इससे आगे नहीं जाते क्योंकि प्रकृति को कुपित करने वालों में वह देश भी शामिल हैं जो ऐसे बुद्धिजीवियों को प्रिय हैं। हमारा तो सीधा आरोप है कि वनों की कटाई या दोहन तो उन देशों में भी हो रहा है जो साम्यवादी होने का दावा करते हैं और इसी कारण कथित वैश्विक तापवृद्धि से वह भी नहीं बचे।
अब विश्व में तापमान बढ़ने की बात कर लें। हाल ही मे पड़ी सर्दी ने कथित शोधकर्ताओं के होश उड़ा दिये हैं। पहले कह रहे थे कि प्रथ्वी गर्म हो रही है और अब कहते हैं कि ठंडी हो रही है। भारत के कुछ समझदार कहते हैं कि प्रकृति अपने ढंग से अपनी रक्षा भी करती है इसलिये गर्मी होते होते ही सर्दी होने लगी। दूसरी भी एक बात है कि भले ही सरकारी क्षेत्र में हरियाली कम हो रही है और कालोनियां बन रही हैं पर दूसरा सच यह भी है कि निजी क्षेत्र में पेड़ पौद्ये लगाने की भावना भी बलवती हो रही है। इसलिये हरित क्षेत्र का संकट कभी कभी कम होता लगता है हालांकि वह संतोषजनक नहीं है। गैसों का विसर्जन एक समस्या है पर लगता है कि प्रकृत्ति उनके लिये भी कुछ न कुछ कर रही है इसी कारण गर्मी होते होते सर्दी पड़ने लगी।
मुख्य मुद्दा यह है कि परमाणु बमों और उसके लिये होने वाले प्रयोगों पर कोई दृष्टिपात क्यों नहीं किया जाता? चीन, अमेरिका और सोवियत संघ ने बेहताश परमाणु विस्फोट किये हैं। इन परमाणु विस्फोटों से धरती को कितनी हानि पहुंची है उसका आंकलन कोई क्यों नही करता? हमारी स्मृति में आज तक गुजरात का वह विनाशकारी भूकंप मौजूद है जो चीन के परमाणु विस्फोट के कुछ दिन बाद आया था। इन देशों ने न केवल जमीन के अंदर परमाणु विस्फोट किये बल्कि पानी के अंदर भी किये-इनके विस्फोटों का सुनामी से कोई न कोई संबंध है ऐसा हमारा मानना है। यह हमारा आज का विचार नहीं बल्कि गुजरात भूकंप के बाद ऐसा लगने लगा है कि कहीं न कहीं परमाणु विस्फोटों का यह सिलसिला भी जिम्मेदारी है जो ऐसी कयामत लाता है। साम्यवादी विचारक हमेशा ही अमेरिका और ब्रिटेन पर बरस कर रह जाते है पर रूस के साथ चीन को भी अनदेखा करते हैं।
हमारा मानना है कि अगर यह चारों देश अपने परमाणु प्रयोग बंद कर सारे हथियार नष्ट कर दें तो शायद विश्व में प्रकृति शांत रह सकती है। विश्व में न तो पूंजीवाद चाहिये न समाजवाद बल्कि सहजवाद की आवश्यकता है। साम्राज्यवादी के कथित विरोधी देश इतने ही ईमानदार है तो क्यों पश्चिमी देशों की वीजा, पासपोर्ट और प्रतिबंधों की नीतियों पर चल रहे हैं। चीन क्यों अपने यहां यौन वेबसाईटों पर प्रतिबंध लगा रहा है जैसे कि अन्य देश लगाते हैं। वह अभी भी आदमी का मूंह बंद कर उसे पेट भरने के लिये बाध्य करने की नीति पर चल रहा है।
जहां तक ज्योतिष की बात है तो अपने देश का दर्शन कहता है कि जब प्रथ्वी पर बोझ बढ़ता है तो वह व्याकुल होकर भगवान के पास जाती है और इसी कारण यहां प्रलय आती है। वैसे पश्चिम अर्थशास्त्री माल्थस भी यही कहता था कि ‘जब आदमी अपनी जनंसख्या पर नियंत्रण नहीं करती तब प्रकृति यह काम स्वयं करती है।’ यह सब माने तो ऐसे भूकंप और सुनामियां तो आती रहेंगी यह एक निश्चिम भविष्यवाणी है। प्रसिद्ध व्यंगकार स्वर्गीय श्री शरद जोशी ने एक व्यंग्य में लिखा था कि ‘हम इसलिये जिंदा हैं क्योंकि किसी को हमें मारने की फुरसत नहीं है। मारने वालों के पास हमसे बड़े लक्ष्य पहले से ही मौजूद है।’
इसी तर्ज पर हम भी यह कह सकते हैं कि धरती बहुत बड़ी है और वह क्रमवार अपनी देह को स्वस्थ कर रही है और जहां हम हैं वहां का अभी नंबर अभी नहीं आया है। कभी तो आयेगा, भले ही उस समय हम उस समय यहां न हों।

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आंसुओं का व्यापार-हिन्दी शायरी


हमदर्दी जताने की कला
हमें कभी नहीं आई
किसी का दर्द देखकर
मन रोया मन भर आंसु
पर आंखें दरिया न बन पाई।
शायद लोग दिमाग से सोचते हैं
इसलिये हमदर्दी के शब्द जल्दी ढूंढ लेते
दिल तक नहीं पहुंचता
दूसरे का दर्द
कर लेते हैं दिखावे में कमाई।
नहीं करना सीखा पाखंड
इसलिये दूसरे के घाव पर मरहम लगाकर भी
अपने लिये ओढ़ लेते हैं तन्हाई।

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पेशेवर बौद्धिक विलासी- हिन्दी आलेख (peshevar buddhi vilasi)


हिटलर तानाशाह पर उसने जर्मनी पर राज्य किया। कहते हैं कि वह बहुत अत्याचारी था पर इसका मतलब यह नहीं है कि उसने हर जर्मनी नागरिक का मार दिया। उसके समय में कुछ सामान्य नागरिक असंतुष्ट होंगे तो तो कुछ संतुष्ट भी रहेंगे। कहने का मतलब यह कि वह एक तानाशाह पर उसके समय में जनता का एक बहुत बड़ा वर्ग शांति से रह रहा था। सभी गरीब नहीं थे और न ही सभी अमीर रहे होंगे। इधर हम दुनियां के अमीर देशों में शुमार किये जाने वाले जापान को देखते हैं जहां लोकतंत्र है पर इसका मतलब यह नहीं है कि वहां की सारी जनता अपनी व्यवस्था से खुश होगी। वहां भी अमीर और गरीब होंगे।
किसी राज्य में प्रजाजनों में सभी अमीर होंगे तो भी सभी संतुष्ट नहीं होंगे सभी गरीब होंगे तो सभी असंतुष्ट भी नहीं होंगे। कहने का मतलब यही है कि राज्य की व्यवस्था तानाशाही वाली है या प्रजातंात्रिक, आम आदमी को मतलब केवल अपने शांतिपूर्ण जीवन से है। अधिकतर लोग अपनी रोजी रोटी के साथ ही अपने सामाजिक जीवन में दायित्व निर्वाह के साथ ही धाार्मिक, जातीय, भाषाई तथा क्षेत्रीय समाजों द्वारा निर्मित पर्वों को मनाकर अपना जीवन अपनी खुशी और गमों के साथ जीते हैं। अलबत्ता पहले अखबार और रेडियो में समाचार और चर्चाओं से सामान्य लोगों को राजनीतिक दृष्टि विकसित होती थी । अब उनके साथ टीवी और इंटरनेट भी जुड़ गया है। लोग अपने मनपसंद विषयों की सामग्री पढ़ते, देखते और सुनते है और इनमें कुछ लोग भूल जाते हैं तो कुछ थोड़ी देर के लिये चिंतन करते है जो कि उनका एक तरह से बुद्धि विलास है। सामान्य आदमी के पास दूसरे की सुनने और अपनी कहने के अलावा कोई दूसरा न तो उपाय होता है न सक्रिय येागदान की इच्छा। ऐसे में जो खाली पीली बैठे बुद्धिजीवी हैं जो अपना समय पास करने के लिये सभाओं और समाचारों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। जिनके साथ अब टीवी चैनल भी जुड़ गये हैं। इनकी बहसों पेशेवर बौद्धिक चिंतक भाग लेते हैं। ऐसा नहीं है कि चिंतक केवल वही होते हैं जो सार्वजनिक रूप से आते हैं बल्कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो चिंतन की अभिव्यक्ति केवल अपने व्यक्ति गत चर्चाओं तक ही सीमित रखते हैं।
ऐसे जो गैर पेशेवर बुद्धिजीवी हैं उनके लिये अपना चिंतन अधिक विस्तार नहीं पाता पर पेशेवर बुद्धिजीवी अपनी चर्चा को अधिक मुखर बनाते हैं ताकि प्रचार माध्यमों में उनका अस्तित्व बना रहे। कहते हैं कि राजनीति, पत्रकारिता तथा वकालत का पेशा अनिश्चिताओ से भरा पड़ा है इसलिये इसमें निरंतर सक्रियता रहना जरूरी है अगर कहीं प्रदर्शन में अंतराल आ गया तो फिर वापसी बहुत मुश्किल हो जाती है। यही कारण है कि आधुनिक लोकतंत्र के चतुर्थ स्तंभ पत्रकारिता-समाचार पत्र पत्रिकाओं, टीवी चैनलों तथा रेडियो- में अपनी उपस्थित दर्ज कराने के लिये पेशेवर बौद्धिक चिंतक निरंतर सक्रिय रहते हैं। यह सक्रियता इतनी नियमित होती है कि उनके विचार और अभिव्यक्ति का एक प्रारूप बन जाता है जिसके आगे उनके लिये जाना कठिन होता है और वह नये प्रयोग या नये विचार से परे हो जाते हैं। यही कारण है कि हमारे देश के बौद्धिक चिंतक जिस विषय का निर्माण करते हैं उस पर दशकों तक बहस चलती है फिर उन्हें स्वामित्व में रखने वाले राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक शिखर पुरुष अपना नाम निरंतर चर्चा में देख प्रसन्न भी होते हैं। इधर अब यह भी बात समाचार पत्र पत्रिकाओं में आने लगी है कि इन्हीं बौद्धिक चिंतकों के सामाजिक, आर्थिक शिखर पुरुषों से इतने निकट संबंध भी होते हैं कि वह अपनी व्यवसायिक, राजनीतिक तथा अन्य गतिविधियों के लिये उनसे सलाह भी लेते हैं-यह अलग बात है कि इसका पता वर्षों बाद स्वयं उनके द्वारा बताये जाने पर लगता है। यही कारण है कि देश के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ढांचे में बदलाव की बात तो सभी करते हैं पर जिन पर यह जिम्मेदारी है उनके पास कोई चिंतन नहीं है और उनके आत्मीय बौद्धिक लोगों के पास चिंतन तो है पर उसमें बदलाव का विचार नहीं है। बदलाव लाने के लिये सभी तत्पर हैं पर स्वयं कोई नहीं लाना चाहता क्योंकि उसे उसमें अपने अस्तित्व बने रहने की गुंजायश नहीं दिखती।
लार्ड मैकाले वाकई एतिहासिक पुरुष है। उसने आज की गुलाम शिक्षा पद्धति का अविष्कार भारत पर अपने देश का शासन हमेशा बनाये रखने के लिये किया था पर उसने यह नहीं सोचा होगा कि उसके शासक यह देश छोड़ जायेंगे तब भी उनका अभौतिक अस्तित्व यहां बना रहेगा। इस शिक्षा पद्धति में नये चिंतन का अभाव रहता है। अगर आपको कोई विचार करना है तो उसके लिये आपके सामने अन्य देशों की व्यवस्था के उदाहरण प्रस्तुत किये जायेंगे या फिर विदेशी विद्वानों का ज्ञान आपके सामने रखा जायेगा। भारतीय सामाजिक सदंर्भों में सोचने की शक्ति बहुत कम लोगों के पास है-जो कम से कम देश में सक्रिय पेशेवर बुद्धिजीवियों के पास तो कतई नहीं लगती है।
इसका कारण यही है कि संगठित प्रचार माध्यमों-प्रकाशन संस्थान, टीवी चैनल और रेडियो-पर अभिव्यक्ति में भी एक तरह से जड़वाद हावी हो गया है। आपके पास कोई बड़ा पद, व्यवसाय या प्रतिष्ठा का शिखर नहीं है तो आप कितना भी अच्छा सोचते हैं पर आपके विचारों को कोई महत्व नहीं दिया जायेगा जितना पेशेवर बौद्धिक चिंतकों को दिया जाता है। आप बहुत अच्छा लिखते हैं तो क्या आपक पत्र संपादक के नाम पत्र में छपेगा न कि किसी नियमित स्तंभ में। कई बार टीवी और रेडियो पर जब सम सामयिक विषयों पर चर्चा सुनते हैं तो लोग संबंधित पक्षों पर आक्षेप, प्रशंसा या तटस्थता के साथ अभिव्यक्त होते हैं। किसी घटना में सामान्य मनुष्य की प्रकृतियों और उसके कार्यों के परिणाम के कारण क्या हैं इस पर कोई जानकारी नहीं देता। एक बात याद रखना चाहिये कि एक घटना अगर आज हुई है तो वैसी ही दूसरी भी कहीं होगी। उससे पहले भी कितनी हो चुकी होंगी। ऐसे में कई बार ऐसा लगता है कि यह विचार या शब्द तो पहले भी सुने चुके हैं। बस पात्र बदल गये। ऐसी घटनाओं पर पेशेवर ंिचंतकोें की बातें केवल दोहराव भर होती है। तब लगता है कि चितकों के शब्द वैसे ही हैं जैसे पहले कहे गये थे।
चिंताओं की अभिव्यक्ति को चिंतन कह देना अपने आप में ही अजीब बात है। उनके निराकरण के लिये दूरगामी कदम उठाने का कोई ठोस सुझाव न हो तो फिर किसी के विचार को चिंतन कैसे कहा जा सकता है। यही कारण है कि आजकल जिसे देखो चिंता सभी कर रहे हैं। सभी को उम्मीद है कि समाज में बदलाव आयेगा पर यह चिंतन नहीं है। जो बदलाव आ रहे हैं वह समय के साथ स्वाभाविक रूप से हैं न कि किसी मानवीय या राजकीय प्रयास से। हालांकि यह लेखक इस बात से प्रसन्न है कि अब राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक शिखर पर कुछ ऐसे लोग सक्रिय हैं जो शांति से काम करते हुए अभिव्यक्त हो रहे हैं पर उनकी संख्या नगण्य है। फिर मुश्किल यह है कि बौद्धिक चिंतकों का भी अपना महत्व है जो प्रचार माध्यमों पर अपनी ढपली और अपना राग अलापते हैं। फिर आजकल यह देखा जा रहा है कि प्रचार माध्यमों में दबाव में कार्यकारी संस्थाओं पर भी पड़ने लगा है।
आखिरी बात यह है कि देश के तमाम बुद्धिजीवी समाज में राज्य के माध्यमों से बदलाव चाहते हैं जबकि वास्तविकता यह है राज्य का समाज में कम से कम हस्तक्षेप होना चाहिये। समाज के सामान्य लोगों को बुद्धिहीन, आदर्शहीन तथा अकर्मण्य मानकर चलना अहंकार का प्रमाण है। एक बात तय रही कि दुनियां में सभी अमीर, दानी ओर भले नहीं हो सकते। इसके विपरीत सभी खराब भी नहीं हो सकते। राजनीतिक, आर्थिक, और सामजिक शिखर पर बैठे लोग भी सभी के भाग्यविधाता नहीं बल्कि मनुष्य को निचले स्तर पर सहयेाग मिलता है जिसकी वजह वह चल पाता है। इसलिये देश के बुद्धिजीवी अपने विचारों में बदलाव लायें और समाज में राज्य का हस्तक्षेप कम से कम हो इसके लिये चिंतन करें-कम से कम जिन सामाजिक गतिविधियों में दोष है पर किसी दूसरे पर इसका बुरा प्रभाव नहीं है तो उसे राज्य द्वारा रोकने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
भारत के सर्वश्रेष्ठ व्यंगकार स्वर्गीय शरद जोशी जी ने अपने एक व्यंग्य में बरसों पहले लिखा था कि ‘हम इसलिये जिंदा हैं क्योंकि किसी को हमें मारने की फुरतस नहीं है। जो लोग यह काम करते हैं उनके पास लूटमार करने के लिये बहुत अमीर और बड़े लोग मौजूद हैं ऐसे में हम पर वह क्यों दृष्टिपात करेंगे।’ कहने का तात्पर्य यह है कि आम आदमी इसलिये जिंदा है क्योंकि सभी आपस में मिलजुलकर चलते हैं न कि राज्य द्वारा उनको कोई प्रत्यक्ष मदद दी जाती है। ऐसे में समाज सहजता से चले और उसमें आपसी पारिवारिक मुद्दों पर कानून न हो तो ही अच्छा रहेगा क्योंकि देखा यह गया है कि उनके दुरुपयोग से आपस वैमनस्य बढ़ता है।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप
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तयशुदा लड़ाई-हिन्दी लघुकथा (fix religion war-hindi short story)


वह डंडा लेकर उस मैदान में लड़ने पहुंचे। यह मैदान ‘धर्मकुश्ती’ के लिये विख्यात था। मैदान के मध्य में उन दोनों ने अपने अपने धर्म का नाम लेकर लड़ाई शुरु की। पहले एक दूसरे पर डंडे से प्रहार करते-साथ में अपने धर्म की जय भी बोलते जाते। डंडे से डंडे टकराते। वह उनको चलाते चलाते थक गये तब वह डंडे फैंककर दोनों मल्लयुद्ध करने लगे। एक दूसरे पर घूंसे बरसाते जाते। काफी जमकर कुश्ती हुई। मगर कोई नहीं जीता। वह थककर वहीं बैठ गये। उनके हाथ पांव में घावों से रक्त भी बहता आ रहा था।
उनको प्यास लगी। वहीं से कुछ दूर मैदान के किनारे बने चबूतरे पर एक ज्ञानी भी बैठा था जिसके साथ पानी पिलाने वाला एक शिष्य था। अपने उसी शिष्य से उस ज्ञानी से कहा कि‘जाओ उनको पानी पिलाओ। अब वह थककर चूर होकर बैठे हैं।
वह पानी लेकर उनके पास पहुंचा और दोनों को ग्लास भरकर देने लगा। धर्मयोद्धाओं में से एक ने उससे पूछा-‘तुझे कैसे मालुम कि हमें पानी की प्यास लगी है।’
उस शिष्य ने कहा-‘यह मैदान धर्मकुश्ती के लिये विख्यात है। यहां आप जैसे अनेक लोग आते हैं। हमारे ज्ञानी जी यहां रोज आकर बैठते हैं क्योंकि उनको मालुम है कि यहां आकर धर्म कुश्ती करने से कोई नतीजा नहीं निकलेगा पर प्यास तो योद्धाओं उनको लगेगी। वह परेशान न हों इसलिये मुझे भी साथ रखते हैं ताकि उनको पानी दे सकूं।’
दूसरे ने पूछा-‘तेरा धर्म क्या है?’
शिष्य ने जवाब दिया-‘पानी पिलाना।’
पहले ने कहा-‘यह भी कोई धर्म है?’
शिष्य ने कहा-‘हमारे गुरुजी कहते हैं कि आज के अक्षरज्ञानी विद्वानों ने कुश्ती प्रदर्शन के लिये धर्मों का नाम रख लिया है। मनुष्य का आचरण, व्यवहार, कर्म तथा विचार से ही पता लगता है कि वह धर्मी है या अधर्मी।
पहले धर्म के नाम पर बांटकर लोगों पहले राज्य किया जाता है आज व्यापार भी किया जाता है। आप यहां कुश्ती करने आये कल यह खबर सभी जगह चमकेगी तो बताओ खबरफरोशों   का धंधा हुआ कि नहीं।’
उन दोनों ने पानी पिया और सुस्ताने लगे। उसी समय एक आदमी आया और बोला-‘शांति रखो! शांति रखो। सभी धर्म एक समान है। सभी धर्म शांति, अहिंसा और प्रेम का संदेश देते हैं।’
इससे पहले वह महायोद्धा कुछ कहते वह चला गया। इस तरह चार लोग शांति संदेश देकर चले गये। एक महायोद्धा ने शिष्य से पूछा-‘यह लोग कौन हैं?’
शिष्य ने कहा-‘‘ इनके नाम भी कल अपनी खबर के साथ देख लेना। यह पंच लोग हैं जो इस बात का इंतजार करते हैं कि कब यहां कुश्ती हो और शांति संदेश सुनाने पहुंच जायें। यह शांति सन्देश देकर अपना धर्म निभाते  हैं।  वैसे यह भी लोग नहीं जानते कि धर्म क्या है?’
दूसरे महायोद्धा ने कहा-‘पर इनका शांति संदेश तो ठीक लगता है। तुम्हारे गुरु जी किस धर्म को मानते हैं’।’
शिष्य ने कहा-‘वह ज्ञानी हैं और वह कहते हैं कि हमारे महापुरुषों तो अच्छे आचरण, व्यवहार, कर्म तथा सुविचार को ही धर्म मानते हैं और इसके विपरीत अधर्म। मेरा धर्म है प्यासे को पानी पिलाना और उनका धर्म है ज्ञान देना।’
एक महायोद्धा ने कहा-‘हम उनसे ज्ञान लेना चाहते हैं।’
शिष्य ने कहा-‘यह उनका ज्ञान देने का समय नहीं है। वह तो यहां इसलिये आते हैं ताकि ऐसी कुश्तियों से कुछ ज्ञान प्राप्त कर सकें। यहां आकर योद्धा आपस में मूंहवाद भी करते हैं। अपने अपने तर्क देते हैं उन्हें सुनकर वह अपना मंतव्य निर्धारित करते हैं। अब आप बाहर जाकर अपने जख्मों का इलाज कराओ। वहां भी एक चिकित्सक हैं जो सेवा भाव से धर्म कुश्ती में घायल होने वालों का इलाज करते हैं।’
वह दोनों लड़खड़ाते हुए बाहर चल दिये। चलते चलते भी दोनों एक दूसरे को गालियां देते रहे।
इधर यह शिष्य अपने गुरू के पास लौटा। गुरू ने उससे पूछा-‘उनको ठीक ढंग से पानी पिलाये आये?’
‘हां, गुरुजी, मैंने अपना धर्म निभा दिया।’शिष्य ने कहा।
गुरुजी अपने ध्यान में लीन हो गये। कुछ देर बाद उन्होंने आंखें खोली तो इधर अचानक शिष्य की नजर उन दो डंडों पर पड़ी जो दोनों योद्धा उस मैदान में छोड़ गये थे। वह बोला-‘गुरूजी! उनके डंडे छूट गये हैं। वह ले जाकर उनको वापस कर आता हूं। वह जरूर उसी डाक्टर के पास होंगे।’
गुरुजी ने कहा-‘रहने दे! डंडे अब उनके किसी काम के नहीं है। वह दोनों शांत हो गये हैं। अगर डंडा हाथ में लेंगे तो कहीं उनकी आग फिर भड़क उठी तो गलत होगा। तेरा काम पानी पिलाना है न कि आग लगाना।’
शिष्य ने कहा-‘नहीं गुरुजी, आपने कहा है कि हर किसी की मदद करना चाहिये। इन डंडों को वापस करना अच्छा होगा।’
इससे पहले गुरुजी कुछ समझाते वह भाग कर चला गया। कुछ देर बाद शिष्य लौटा तो उसके बदन पर भी पट्टी बंधी हुई थी। गुरुजी के कारण पूछने पर वह बोला-‘वह दोनों अपने जख्मों पर पट्टी बंधवा चुके थे। जब मैंने जाकर उनको डंडे दिये तो दोनों ने यह कहते हुए मुझ पर डंडे बरसाये कि तू हमारी इजाजत के बगैर हमारी कुश्ती देख कैसे रहा था?’
गुरुजी ने कहा-‘मैंने तुझसे कहा था कि तेरा धर्म पानी पिलाना पर तू आग लगाने पहुंच गया। यह धर्म परिवर्तन करना ही तेरे लिये घातक रहा। तेरे संस्कारों में डंडा चलाना नहीं लिखा तो तू चला भी नहीं सकता। इसलिये उसे हाथ लगाना भी तेरे लिये अपराध है। फिर तू उन लोगों की संगत करने गया जिनके संस्कार तेरे ठीक विपरीत हैं। तू धर्म ईमानदारी से निभाता है उन धर्मकुश्ती करने वाले योद्धाओं से पानी पिलाने तक ही तेरा संबंध ठीक था। इससे आगे तो यही होना था।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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हमदर्दी जताने में कमाई-हिन्दी क्षणिका


हमदर्दी जताने की कला
हमें कभी नहीं आई
किसी का दर्द देखकर
मन रोया मन भर आंसु
पर आंखें दरिया न बन पाई।
शायद लोग दिमाग से सोचते हैं
इसलिये हमदर्दी के शब्द जल्दी ढूंढ लेते
दिल तक नहीं पहुंचता
दूसरे का दर्द
कर लेते हैं दिखावे में कमाई।
नहीं करना सीखा पाखंड
इसलिये दूसरे के घाव पर मरहम लगाकर भी
अपने लिये ओढ़ लेते हैं तन्हाई।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com

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इसरो द्वारा चंद्रमा पर पानी की खोज तथा ओशियनसैट-2 सहित सात उपग्रहों का प्रक्षेपण-आलेख (ocianset-2 setelite-hindi article)


भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र ‘इसरो- ने एक ही दिन में वह भी केवल बीस मिनट में सात उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित किये जिसमें प्रमुख रूप से ओशियनसैट-2 भी शामिल है। ओशियनसैट-2 मौसम की जानकारी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा। चंद्रयान-1 की सफलता के बाद इसरो की यह दूसरी बड़ी सफलता है जिससे भारत का नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित होगा। इधर भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा चन्द्रमा पर पानी के खोज का भी समाचार मिला है जिसकी पुष्टि अमेरिका की वैज्ञानिक संस्था नासा ने की है। यकीनन भारत ने विज्ञान के क्षेत्र में जो प्रगति की है वह सराहनीय है। 
इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत अंतरिक्ष के रूप में एक महत्वपूर्ण शक्ति बन गया है और इससे उसकी सैन्य शक्ति का अंदाज भी लगाया जा सकता है। अनेक लोग सोचते होंगे कि अंतरिक्ष शक्ति का सैन्य शक्ति से क्या संबंध है तो उन्हें यह समझना चाहिये कि अंतरिक्ष की ताकत ही आजकल किसी भी देश की शक्ति की पहचान है। पहले युद्धों में पैदल सेना और फिर वायुसेना के द्वारा सफलतायें प्राप्त की जाती थीं पर आजकल बिना अंतरिक्ष क्षमता के यह संभव नहीं है। इधर इसरो दूसरा चंद्रयान-2 की तैयारी कर रहा है। इतना ही इसरो दूसरे देशों को भी अंतरिक्ष में उपग्रह भेजने में मदद कर रहा है। भारत के पास चीन से इस विषय में बढ़त प्राप्त है क्योंकि चीन अभी भी अपना चंद्रयान नहीं भेज पाया है। वैसे भारत का चंद्रयान अवधि से पूरी किये बिना ही अपना अस्तित्व गंवा बैठा पर ऐसे अभियानों में ऐसे विफलता कोई बड़ी चिंता की बात नहीं होती। वैसे भी उसने 95 प्रतिशत काम पूरा कर लिया था। इसी अभियान से विश्व को यह पता लगा कि चंद्रमा पर पानी है।
कहते हैं न कि घर की मुर्गी दाल बराबर-कुछ यही स्थिति हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की अपने देशवासियों के लिये है। आमतौर से हम लोग चीन और पाकिस्तान की सैन्य शक्ति को लेकर चिंतित रहते हैं पर उस समय केवल जल, थल और नभ की शक्ति पर विचार करते हैं। जल, थल और वायु की शक्ति महत्वपूर्ण है पर अंतरिक्ष शक्ति के आगे फीकी लगती हैं। हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की वजह से ही आज हमें महाशक्ति माना जाता है न कि पंरपरागत सैन्य उपलब्धियों से कोई यह सम्मान मिल रहा है।
अभी पिछले दिनों चीनी सेना की घुसपैठ की खबरें आयी थी जिसमें एक चैनल ने बताया कि चीनी सैनिक अपने देश का नाम भारतीय सीमा में दो किलोमीटर तक घुसकर कुछ पत्थरों पर लिखकर चले गये इस कथित समाचार पर एक भारी चिंता व्यक्त की गयी। हालांकि यह खबर प्रमाणित नहीं हुई पर इससे एक बात तो लगती है कि इस देश का बौद्धिक वर्ग के कुछ लोग कितने संकीर्ण ढंग से सोचते हैं।
सच तो यह है कि अब वह समय गया जब कोई सेना कहीं पहुंच गयी तो वहां से बिना लड़े हटती नहीं थी। अब विश्व समाज में एक अघोषित आचार संहिता तो बन गयी है कि किसी भी देश का स्वरूप इतनी आसानी से नहीं बदला जा सकता।
अगर प्रसंग चीन का आया तो पता नहीं आशियान देशों में भारत और चीन के संबंध क्यों भुला दिये जाते हैं? बहुत पहले अखबारों में एक खबर पड़ी थी कि आशियान देशों के घोषणा पत्र में भारत और चीन ने भी हस्ताक्षर किये गये जिसमें सदस्य देशों की वर्तमान सीमाओं में बदलाव को स्वीकार न करने की बात कही गयी थी। पता नहीं बाद में इस पर कोई जानकारी नहीं आई जबकि उसके बाद पाकिस्तान भारत पर आरोप लगाता रहा है कि भारत उसे आशियान का सदस्य नहीं बनने दे रहा है। आशियान ग्रुप में भारत और चीन के साथ सोवियत संघ भी है और पश्चिमी देश उसकी गतिविधियों को बहुत सतर्कता से देखते हैं। वहां चीन भारत के साथ अपने संबंध बेहतर रखता है जिसकी वजह उसकी आर्थिक और राजनीतिक बाध्यताऐं भी हो सकती हैं। यह संबंध ऐसे हैं कि भारत की इच्छा के विरुद्ध पाकिस्तान को उसमें शामिल करने की चीन ने कभी पहल नहीं की।
अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी से दुश्मनी लेकर आज कोई भी देश चैन से नहीं बैठ सकता चाहे वह चीन ही क्यों न हो? कुछ अखबारों में 1962 के भारत-चीन युद्ध का इतिहास भी हमने पढ़ा है जिसमें बताया गया कि चीन अंदर तक घुस आया था पर अमेरिकी दबाव में वह बहुत पीछे हट गया था हालांकि तब भी वह एक बहुत बड़े इलाके पर काबिज रहा। इसका आशय यह है कि कहीं न कहीं चीन भी अंतर्राष्ट्रीय दबाव के आगे घुटने टेक सकता है। आज की परिस्थिति में वह एक भी इंच जमीन पर अपना कब्जा नहीं जमा सकता। इसका कारण यह है कि जल, थल, और नभ क्षेत्र में भारतीय सेना चीन से कमतर मानी जाती है पर इतनी नहीं कि चीन उसे रसगुल्ले की तरह खा जाये। वियतनाम में पिट चुका चीन अब इतना साहस नहीं कर सकता कि भारत पर हमला करे। उस युद्ध में चीन की विश्व बिरादरी में बहुत किरकिरी हुई थी। फिर अपने अंतरिक्ष विज्ञान के कारण भारत उसके लिये कोई आसान लक्ष्य नहीं रह गया जिसकी बदौलत भारत विश्व में अपने मित्र बना रहा है।
इस अंतरिक्ष क्षमता की वजह से अमेरिका हमेशा विजेता बनता रहा है यह अलग बात है कि अपनी रणनीतिक गलतियों से जमीनी लड़ाई में फंस जाता है। चीन को पता है कि ऐसी गलतियां किसी भी देश की ताकत कम देती हैं। चीन न केवल अंतरिक्ष विज्ञान में भारत से पीछे हैं बल्कि कंप्यूटर साफ्टवेयर में भी उसकी भारत पर निर्भरता है। हमारे देश के प्रतिभाशाली युवाओं का माद्दा सभी मानते हैं। अपनी जनता में अपनी छबि बनाये रखने के लिये चीन के प्रचार माध्यम भले ही भारत की बुराई करते हैं पर भारत की ताकत को कमतर आंकन की गलती वहां के रणनीतिकार कभी नहीं करेंगे।

इसका सारा श्रेय भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को तो जाता ही है साथ ही निजी क्षेत्र के साफ्टवेयर इंजीनियों को भी इसके लिये प्रशंसा करना चाहिये जिन्होंने पूरे विश्व में अपना लोहा मनवा लिया है। इस अवसर पर इसरो के वैज्ञानिकों को हार्दिक बधाई और चंद्रयान-2 के भविष्य में सफल प्रक्षेपण के लिये शुभकामनायें।
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बजट सत्य-हास्य व्यंग्य (hindi vyangya on budget)


उन्होंने जैसे ही दोपहर में बजट देखने के लिये टीवी खोला वैसे ही पत्नी बोली-‘सुनते हो जी! कल तुमने दो हजार रुपये दिये थे सभी खर्च हो गये। अब कुछ पैसे और दो क्योंकि अभी डिस्क कनेक्शन वाला आने वाला होगा। कुछ देर पहले आया तो मैंने कहा कि बाद में आना।’
उन्होंने कहा-‘अरे, अब तो बैंक से पैसे निकालने पड़ेंगे। अभी तो मेरी जेब में पैसा नहीं है। अभी तो टीवी परबजट सुन लूं।’
पत्नी ने कहा-‘इस बजट की बजाय तुम अपने घर का ख्याल करो। अभी डिस्क कनेक्शन वाले के साथ धोबी भी आने वाला है। मुन्ना के स्कूल जाकर फीस जमा भी करनी है। आज आखिरी तारीख है।’
वह टीवी बंदकर बाहर निकल पड़े। सोचा पान वाले के यहां टीवी चल रहा है तो वहां पहुंच गये। दूसरे लोग भी जमा थे। पान वाले ने कहा-‘बाबूजी इस बार आपका उधार नहीं आया। क्या बात है?’
उन्होंने कहा-‘दे दूंगा। अभी जरा बजट तो सुन लूं। घर पर लाईट नहीं थी। अपना पर्स वहीं छोड़ आया।’
उनकी बात सुनते ही पान वाला खी खी कर हंस पड़ा-‘बाबूजी, आप हमारे बजट की भी ध्यान रखा करो।’
दूसरे लोग भी उनकी तरफ घूरकर देखने लगे जैसे कि वह कोई अजूबा हों।
वह अपना अपमान नही सह सके और यह कहकर चल दिये कि‘-अभी पर्स लाकर तुमको पैसा देता हूं।’
वहां से चले तो किराने वाले के यहां भी टीवी चल रहा था। वह वहां पहुंचे तो उनको देखते ही बोला-‘बाबूजी, अच्छा हुआ आप आ गये। मुझे पैसे की जरूरत थी अभी थोक दुकान वाला अपने सामान का पैसा लेने आता होगा। आप चुका दें तो बड़ा अहसान होगा।’
उन्होंने कहा-‘अभी तो पैसे नहीं लाया। बजट सुनकर चला जाऊंगा।’
किराने वाले ने कहा-‘बाबूजी अभी तो टीवी पर बजट आने में टाईम है। अभी घर जाकर ले आईये तो मेरा काम बन जायेगा।’
वहां भी दूसरे लोग खड़े थे। इसलिये तत्काल ‘अभी लाया’ कहकर वह वहां से खिसक लिये।
फिर वह चाय के होटल की दुकान पर पहुंचे। वहां चाय वाला बोला-‘बाबूजी, क्या बात इतने दिन बाद आये। न आपने चाय पी न पुराना पैसा दिया। कहीं बाहर गये थे क्या?’
दरअसल अब उसकी चाय में मजा नहीं आ रहा था इसलिये उन्होंने दो महीने से उसके यहां चाय पीना बंद कर दिया था। फिर इधर डाक्टर ने भी अधिक चाय पीने से मना कर दिया था। चाय पीना बंद की तो पैसा देना भी भूल गये।
वह बोले-यार, अभी तो पैसा नहीं लाया। हां, बजट सुनकर वापस घर जाकर पर्स लेकर तुम्हारा पैसा दे जाऊंगा।’
चाय वाला खी खी कर हंस पड़ा। एक अन्य सज्जन भी वहां बजट सुनने वहां बैठे थे उन्होंने कहा-‘आईये बैठ जाईये। जनाब! पुराना शौक इसलिये छूटता नहीं इसलिये बजट सुनने के लिये घर से बाहर ही आना पड़ता है। घर पर बैठो तो वहां इस बजट की बजाय घर के बजट को सुनना पड़ता है।’
यह कटु सत्य था जो कि सभी के लिये असहनीय होता है। अब तो उनका बजट सुनने का शौक हवा हो गया था। वह वहां से ‘अभी लाया’ कहकर निकल पड़े। जब तक बजट टीवी पर चलता रहा वह सड़क पर घूमते रहे और भी यह बजट तो कभी वह बजट उनके दिमाग में घूमता रहा।
……………………………
भूख भला कभी किसी की मिटी है-हिंदी शायरी (hindi shayri)
गरीब के घर पैदा होने पर
आयु पूरी होने से पहले मर नहीं जाते।
अमीर घर में लेकर जन्म
कोई सोने की रोटी नहीं खाते।
लेकर बड़े घरों से उधर का नजरिया
देख रहे हैं इस रंग बिरंगी दुनियां को
फिर कमजोर की शिकायत क्यों करने आते।
कपड़े मैले हो सकते हैं
हाथ में पकड़े थैले फटे हो सकते हैं
जरूरतों जितना सामान हो तो ठीक
सामान जितनी जरूरतें क्यों नहीं रख पाते।
अपनी झौंपड़ी मे रहते हुए
महलों के सुख यूं ही बड़े नजर आते।
गलतफहमियों में जिंदगी अमीर की भी रहती
गरीब भी कोई सच्चाई के साथ नहीं आते।
भूख भला कभी किसी की मिटी है
जो उसे मिटाने के सपने दिखाये जाते
जिसमें गरीब भी बह जाते।
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विवाद करने वाले श्री राम का चरित्र नहीं पढ़ते-आलेख


श्रीराम द्वारा रावण वध के बाद श्रीलंका से वापस आने पर श्रीसीता जी की अग्नि परीक्षा लेने का प्रसंग बहुत चर्चित है। अक्सर भारतीय धर्म की आलोचना करने वाले इस प्रसंग को उठाकर नारी के प्रति हमारे समाज के खराब दृष्टिकोण का प्रचार करते हैं। दरअसल समस्या वही है कि आक्षेप करने वाले रामायण पढ़ें इसका तो सवाल ही नहीं पैदा होता मगर उत्तर देने वाले भी कोई इसका अध्ययन करते हों इसका आभास नहीं होता। तय बात है कि कहीं भी चल रही बहस युद्ध में बदल जाती है। इन बहसों को देखकर ऐसा लगता है कि किसी भी विद्वान का लक्ष्य निष्कर्ष निकालने से अधिक स्वयं को श्रेष्ठ साबित करना होता है।
यह लेखक मध्यप्रदेश का है और यहां के लोग ऐसी लंबी बहसों में उलझने के आदी नहीं है। कभी कभी तो लगता है कि देश में चल रहे वैचारिक संघर्षों से हम बहुत दूर रहे हैं और अब अंतर्जाल पर देखकर तो ऐसा लगता है कि बकायदा कुछ ऐसे संगठन हैं जिन्होंने तय कर रखा है कि भारतीय धर्म की आलोचना कर विदेशी विचाराधाराओं के सहारे अपना वर्चस्व स्थापित करने के प्रयास करते रहेंगे। उनका यह कार्य इतना योजनाबद्ध ढंग से है कि वह बौद्धिक वर्ग की महिलाओं में भारतीय धर्म के प्रति अरुचि पैदा करते हैं क्योंकि उनको लगता है कि इससे वह भारतीय समाज को अस्थिर कर सकते हैं। हालांकि उनकी यह योजना लंबे समय में असफल हो जायेगी इसमें संशय नहीं है।
आईये हम उस प्रसंग की चर्चा करें। नारी स्वतंत्रय समर्थकों ने रामायण नहीं पढ़ी। श्रीसीता जी जब रावण वध के बाद श्रीराम के पास आयी तो वह उनको देखना भी नहीं चाहते थे-इसे यह भी कह सकते हैं कि वह इतनी तेजस्वी थी कि एकदम उन पर दृष्टि डालना किसी के लिये आसान नहीं था। वहां श्रीरामजी ने उनको बताया कि चूंकि वह दैववश ही रावण द्वारा हर ली गयी थी और उनका कर्तव्य था कि उसकी कैद से श्रीसीता को मुक्त करायें। अब यह कर्तव्य सिद्ध हो गया है इसलिये श्रीसीता जी जहां भी जाना चाहें चली जायें पर स्वयं स्वीकार नहीं करेंगे।
यह आलोचक कहते हैं कि श्रीसीता के चरित्र पर संदेह किया। यह पूरी तरह गलत है। दरअसल उन्होंने श्रीसीता से कहा कि ‘रावण बहुत क्रूर था और आप इतने दिन वहां रही इसलिये संदेह है कि वह आपसे दूर रह पाया होगा।’
तात्पर्य यह है कि भगवान श्रीराम ने श्रीसीता के नहीं बल्कि रावण के चरित्र पर ही संदेह किया था। बात केवल इतनी ही नहीं है। रावण ने श्रीसीता का अपहरण किया तो उसके अंग उनको छू गये। यह दैववश था। श्रीराम जी का आशय यह था कि इस तरह उसने अकेले में भी उनको प्रताड़ित किया होगा-श्रीसीता जी के साथ कोई जबरदस्ती कर सके यह संभव नहीं है, यह बात श्रीराम जानते थे।
भगवान श्रीराम और सीता अवतार लेकर इस धरती पर आये थे और उनको मानवीय लीला करनी ही थी। ऐसे में एक वर्ष बाद मिलने पर श्रीराम का भावावेश में आना स्वाभाविक था। दूसरा यह कि श्रीसीता से तत्काल आंख न मिलाने के पीछे यह भी दिखाना था कि उनको स्वयं की गयी गल्तियां का भी आभास है। एक तो वह अच्छी तरह जानते थे कि वह मृग सोने का नहीं बल्कि मारीचि की माया है। फिर भी उसके पीछे गये। यहां यह भी उल्लेख करना जरूरी है कि श्रीसीता जी उनको किसी भी प्रकार की हिंसा करने से रोकती थीं। सोने का वह मृग भी श्रीसीता ने जीवित ही मांगा था। एक तरह से देखा जाये तो श्रीसीता अहिंसा धर्म की पहली प्रवर्तक हैं। श्रीसीता जी के रोकने के बावजूद श्रीराम धर्म की स्थापना के लिये राक्षसों का वध करते रहे। उसकी वजह से रावण उनका दुश्मन हो गया और श्रीसीता जी को हभी उसका परिणाम भोगना पड़ा। मानव रूप में भगवान श्रीराम यही दिखा रहे थे कि किस तरह पति की गल्तियों का परिणाम पत्नी को जब भोगना पड़ता है और फिर पति को अपनी पत्नी के सामने स्वयं भी शर्मिंदा होना पड़ता है।
मानव रूप में कुछ अपनी तो कुछ श्रीसीता की गल्तियों का इंगित कर वही जताना चाहते थे कि आगे मनुष्यों को इससे बचना चाहिये।
भरी सभा में श्रीसीता से भगवान श्रीराम ने प्रतिकूल बातें कही-इस बात पर अनेक आलोचक बोलते हैं पर सच बात तो यह है कि श्रीसीता ने भी श्रीराम को इसका जवाब दिया है। उन्होंने श्रीराम जी से कहा-‘आप ऐसी बातें कर रहे हैं जो निम्नश्रेणी का पुरुष भी अपनी स्त्री से नहीं कहता।’
इतनी भरी सभा में श्रीसीता ने जिस तरह श्रीराम की बातों का प्रतिकार किया उसकी चर्चा कोई नहीं करता। सभी के सामने अपने ही पति को ‘निम्न श्रेणी के पुरुषों से भी कमतर कहकर उन्होंने यह साबित किया कि वह पति से बराबरी का व्यवहार करती थीं। श्रीराम दोबारा कुछ न कह सके और इससे यह प्रमाणित होता है कि वह उस लीला का विस्तार कर रहे थे।
यहां यह याद रखने लायक बात है कि श्रीसीता अग्नि से सुरक्षित निकलने की कला संभवतः जानती थी और यह रहस्य श्रीराम जी को पता था। जब श्री हनुमान जी ने लंका में आग लगायी तब वह श्रीसीता की चिंता करने लगे। जब अशोक वाटिका में पहुंचे तो देखा कि केवल श्रीसीताजी ही नहीं बल्कि पूरी अशोक वाटिका ही सुरक्षित है। तब उनको आभास हो गया कि श्रीसीता कोई मामूली स्त्री नहीं है बल्कि उनका तपबल इतना है कि आग उनके पास पहुंच भी नहीं सकती। श्रीसीता को पुनः स्त्री जाति में एक सम्मानीय स्थान प्राप्त हो इसलिये ही श्रीराम ने इस रहस्य को जानते हुए ही इस तरह का व्यवहार किया।
श्रीराम ने गलती की थी कि वह जानते हुए भी मारीचि के पीछे गये। रक्षा के लिये उन्होंने अपने छोटे भाई श्रीलक्ष्मण को छोड़ा। जब श्रीराम जी का बाण खाकर मारीचि ‘हा लक्ष्मण’ कहता हुआ जमीन पर गिरा तब उनको समझ में आया कि वह क्या गलती कर चुके हैं।
उधर श्रीलक्ष्मण भी समझ गये कि मरने वाला मारीचि ही है पर श्रीसीता ने उन पर दबाव डाला कि वह अपने बड़े भाई को देखने जायें। श्रीलक्ष्मण जाने को तैयार नहीं थे श्रीसीता ने भी उन पर आक्षेप किये। यह आक्षेप लक्ष्मण जी का चरित्र हनन करने वाले थे। भगवान श्रीराम इस बात से भी दुःखी थे और उन्हें इसलिये भी श्रीसीता के प्रति गुस्सा प्रकट किया।
यह आलेख नारी स्वतंत्रय समर्थकों को यह समझाने के लिये नहीं किया गया कि कथित रूप से वह भगवान श्रीराम पर श्रीसीता के चरित्र पर लांछन लगाने का आरोप लगाते हैं जबकि भगवान श्रीराम ने कभी ऐसा नहीं किया। उल्टे उन्होंने उनके प्रिय भ्राता श्रीलक्ष्मण पर आक्षेप किये थे। हमारा आशय तो भारतीय धर्म के समर्थकों को यह समझाना है कि आप जब बहस में पड़ते हैं तो इस तरह के विश्ेलषण किया करें। रामायण पर किसी भी प्रकार किसी भी स्त्री के चरित्र पर संदेह नहीं किया गया। जिन पर किया गया है उनमें रावण और श्रीलक्ष्मण ही हैं जो पुरुष थे।
कहने का तात्पर्य यह है कि ग्रंथों में परिवार और समाज को लेकर अनेक प्रकार के पात्र हैं उनमें मानवीय कमजोरियां होती हैं और अगर न हों तो फिर सामान्य मनुष्य के लिये किसी भी प्रकार संदेश ही नहीं निकल पायेगा। फिर पति पत्नी का संबंध तो इतना प्राकृतिक है कि दोनों के आपसी विवाद या चर्चा में आये संवाद या विषय लिंग के आधार पर विचारणीय नहीं होते। मुख्य बात यह होती है कि इन ग्रंथों से संदेश किस प्रकार के निकलते हैं और उसका प्रभाव समाज पर क्या पड़ता है? श्रीसीता जी एकदम तेजस्वी महिला थी। लंका जलाने के बाद श्रीहनुमान ने उनसे कहा कि ‘आप तो मेरी पीठ पर बैठकर चलिये। यह राक्षण कुछ नहीं कर सकेंगे।’
श्रीसीता ने कहा-‘मैं किसी पराये मर्द का अंग अपनी इच्छा से नहीं छू सकती। रावण ने तो जबरदस्ती की पर अपनी इच्छा से मैं तुम्हारा स्पर्श नहीं करूंगी। दूसरा यह है कि मैं चाहती हूं कि मेरे पति की प्रतिष्ठा में वृद्धि हो। वह होगी क्योंकि तुम जैसे सहायक हों तब उनकी जीत निश्चित है।’
इससे आप समझ सकते हैं कि श्रीसीता कितनी दृढ़चरित्र से परिपूर्ण हो गयी थी कि अवसर मिलने पर भी वह लंका से नहीं भागी चाहे उनको कितना भी कष्ट झेलना पड़ा। वह कोमल हृदया थी पर इसका मतलब यह नहीं है कि वह बिचारी या अबला थी।
नारी स्वतंत्रय समर्थकों ने हमेशा ही इस मसले को उठाया है और यह देखा गया है कि भारतीय धर्म समर्थक इसका जवाब उस ढंग से नहीं दे पाते जिस तरह दिया जाना चाहिये। अक्सर वह लोग श्रीसीता को अबला या बेबस कहकर प्रचारित करते हैं जबकि वह दृढ़चरित्र और तपस्वी महिला थी। वह भगवान श्री राम की अनुगामिनी होने के साथ ही उनकी मानसिक ऊर्जा को बहुत बड़ा स्त्रोत भी थीं। भगवान श्रीराम महान धनुर्धर पुरुष थे तो श्रीसीता भी ज्ञानी और विदुषी स्त्री थी। यही कारण है कि पति पत्नी की जोड़ी के रूप में वह भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान और दर्शन के मूल आधार कहलाते हैं।
शेष फिर कभी
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4.अनंत शब्दयोग
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

जीन के गुण ही तो गुण में बरतते हैं-चिंत्तन आलेख


पश्चिमी विज्ञान मानव शरीर में स्थित जीन के आधार पर अपने विश्लेषण प्रस्तुत करता है जबकि यही विश्लेषण भारतीय दर्शन ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं‘ के आधार पर करता है। पश्चिमी विश्लेषण मनुष्य के स्वभाव में उन जीनों के प्रभाव का वर्णन करते हैं जबकि भारतीय दर्शन उनको गुणों का परिणाम कहकर प्रतिपादित करता है।
मनुष्य की पहचान उसका मन है और देह में स्थित होने के कारण उसमें विद्यमान गुण या जीन से प्रभावित होता है इसमें संशय नहीं हैं। जब शरीर में कोई भीषण विकार या पीड़ा उत्पन्न होती है तब मन कहीं नहीं भाग पाता। उस समय केवल उससे मुक्ति की अपेक्षा के अलावा वह कोई विचार नहीं। करता। मन में विचार आते हैं कि ‘अमुक पीड़ा दूर हो जाये तो फिर मैं एसा कुछ नहीं करूंगा जिससे यह रोग फिर मुझे घेरे।’
कभी अपने आप तो कभी दवा से वह ठीक हो जाता है पर फिर उसका मन सब भूल जाता है। व्यसन करने वाले लोग इस बात को बहुत अच्छी तरह जानते हैं। जब अपने व्यसन की वजह से भारी तकलीफ में होते हैं तब सोचते हैं कि अब इसका प्रभाव कम हो तो फिर नहीं करेंगे।’

ऐसा होता नहीं है। व्यसन कर प्रभाव कम हाते े ही वह फिर उसी राह पर चलते हैं। अपने ज्ञान के आधार पर मै यह कह सकता हूं कि‘शुरूआत में व्यसन आदमी किसी संगत के प्रभाव में आकर करता है फिर वही चीज-शराब और तंबाकू-मनुष्य के शरीर में अपना गुण या जीन स्थापित कर लेती है और आदमी उसका आदी हो जाता है। याद रहे वह गुण व्यसन करने से पहले उस आदमी में नहीं होता।

पश्चिमी विज्ञान कहता है कि आदमी में प्रेम, घृणा, आत्महत्या, चिढ़चिढ़ेपन तथा अन्य क्रियाओं के जीन होते हैं पर वह यह नहीं बताता कि वह जीन बनते कैंसे हैं? भारतीय दर्शन उसको स्पष्ट करता है कि मनुष्य में सारे गुण खाने-पीने के साथ ही दूसरों की संगत से भी आते हैं। मेरा मानना है कि मनुष्य सांसें लेता और छोड़ता है और उससे उसके पास बैठा आदमी प्रभावित होता है। हां, याद आता है कि पश्चिम के विज्ञानी भी कहते हैं कि सिगरेट पीने वाले अपने से अधिक दूसरे का धुंआ छोड़कर हानि पहुंचाते हैं। इसका अर्थ यह है कि विकार वायु के द्वारा भी आदमी में आते हैं। अगर आप किसी शराबी के पास बैठेंगे और चाहे कितनी भी सात्विक प्रवृत्ति के हों और उसकी बातें लगातार सुन रहे हैं तो उसकी कही बेकार की बातें कहीं न कहीं आपके मन पर आती ही है जो आपका मन वितृष्णा से भर देती है। इसके विपरीत अगर आप किसी संत के प्रवचन-भले ही वह रटकर देता हो-सुनते हैं तो आपके मन में एक अजीब शांति हो जाती है। अगर आप नियमित रूप से किसी ऐसे व्यक्ति से मिलें जिसे आप ठीक नहीं समझते तो ऐसा लगेगा कि वह आपके तनाव का कारण बन रहा है। कहने का तात्पर्य यह है कि पांच तत्वों-प्रथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु- से बनी यह देह इनके साथ सतत संपर्क में रहती है और उनके परिवर्तनों से प्रभावित होती है और इसके साथ ही उसमें मौजूद मन, बुद्धि और अहंकार की प्रकृति भी प्रभावित होती है। इन परिवर्तनों से मनुष्य की देह में जीन या गुणों का निर्माण और विसर्जन होता है और वह उसका प्रदर्शन वह बाहर व्यवहार से कराते हैं।
पश्चिम के विद्वान इन जीन को लेकर विश्लेषण करते हुए उनके उपचार के लिए अनुसंधान करते हैं। अनेक तरह के आकर्षक तर्क और सुसज्तित प्रयोगशालाओं से निकले निष्कर्ष पूरे विश्व में चर्चा का विषय बनते हैं और भारतीय अध्यात्म को पूरी तरह नकार चुके हमारे देश के विद्वान अखबार, टीवी चैनलो, रेडियो और किताबों उनका प्रचार कर यहां ख्याति अर्जित करते हैं। हां, लोग सवाल करेंगे कि भारतीय अध्यात्म में भला इसका इलाज क्या है?

हमारा अध्यात्म कहता है लोग तीन तरह के होते हैं सात्विक, राजस और तामस। यहां उनके बारे में विस्तार से चर्चा करना ठीक नहीं लगता पर जैसा आदमी होगा वैसा ही उसका भोजन और कर्म होगा। वैसे ही उसके अंदर गुणों का निर्माण होगा।

श्रीगीता के सातवों अध्याय के (श्लोक आठ) अनुसार आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले तथा जो स्वभाव से ही मन को प्रिय हो ऐसा भोजन सात्विक को प्रिय होते हैं।

नौवें श्लोक के अनुसार कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक, दुःख, चिंता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार राजस पुरुष को प्रिय होते हैं।


दसवें श्लोक के अनुसार -अधपका, रसरहित, दुर्गंधयुक्त, बासी और उच्छिष्ट तथा अपवित्र है वह भोजन तामस को प्रिय होता है।

पश्चिम के स्वास्थ्य विज्ञान के अनुसार देह की अधिकतर बीमारियां पेट के कारण ही होती हैं। यही विज्ञान यह भी कहता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है। हमारा अध्यात्म और दर्शन भी यही कहता है कि गुण ही गुण को बरतते है। इसके बावजूद पश्चिमी विज्ञान और भारतीय अध्यात्म में मौलिक अंतर है। पश्चिमी विज्ञान शरीर और मन को प्रथक मानकर अलग अलग विश्लेषण करता है। वह मनुष्य की समस्त क्रियाओं यथा उठना, बैठना, चलना और कामक्रीडा आदि को अलग अलग कर उसकी व्याख्या करता है। इसके विपरीत भारतीय अध्यात्म या दर्शन मनुष्य को एक इकाई मानता है और उसके अंदर मौजूद गुणों के प्रभाव का अध्ययन करता है। अगर योग की भाषा के कहें तो सारा खेल ‘मस्तिष्क में स्थित ‘आज्ञा चक्र’ का है। पश्चिमी विज्ञान भी यह तो मानता है कि मानसिक तनाव की वजह से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं और वह उनका इलाज भी ढूंढता है पर जिन मानसिक विकारों से वह उत्पन्न होते हैं और मनुष्य की देह में अस्तित्वहीन रहें ऐसा इलाज उसके पास नहीं है।

भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान केवल धर्म प्रवचन के लिऐ नहीं है वह जीवन की वास्तविकताओं पर आधारित है। यह मनुष्य के देह और मन में स्थित विकारों को दूर करने के लिए केवल शब्दिक संदेश नहीं देता बल्कि योगासन, प्राणायम और ध्यान के द्वारा उनको दूर करने का उपाय भी बताता है। अध्यात्म यानि हमारी देह में प्राणवान जीव आत्मा और उससे जानने की क्रिया है ज्ञान। अन्य विचाराधारायें आदमी को प्रेम, परोपकार और दया करने के का संदेश देती हैं पर वह देह में आये कैसे यह केवल भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान ही बताता हैं। अगर सुबह उठकर योगासन, प्राणायम, और ध्यान किया जाये तो देह में वह जीन या गुण स्वयं ही आते है जिनसे आदमी प्रेम, परोपकार और दया करने लगता है। देह और मन के विकार को निकाले बिना आदमी को सही राह पर चलने का उपदेश ऐसा ही है जैसे पंचर ट्यूब में हवा भरना।
अगर कोई आदमी बीमार होता है तो डाक्टर कहते हैं कि चिकनाई रहित हल्का भोजन करो जबकि भारतीय दर्शन कहता है कि चिकना, रसयुक्त स्थिर भोजन ही सात्विक है। इसका अर्थ यह है कि डाक्टर जिनको यह भोजन मना कर रहा है उनमें विकार ही इस सात्विक भोजन के कारण है। ऐसा भोजन करने के लिये परिश्रम करना जरूरी है पर आजकल धनी लोग इसे करते नहीं है। श्रीगीता कहती है कि अकुशल श्रम से सात्विक लोग परहेज नहीं करते। आजकल के लोग अकुशल श्रम करने में संकोच करते हैं और यही कारण है कि लोगों में आत्म्विश्वास की कमी होती जा रही है और ऐसे जीन या दुर्गुण उसमें स्वतः आ जाते हैं जो उसे झूठे प्रेम,पुत्यकार की भावना से उपकार और कपटपूर्ण दया में लिप्त कर देते हैं। कुल मिलाकर पश्चिमी विज्ञान की खोज जीन चलते हैं जबकि भारतीय दशैन की खोज ‘गुण ही गुण बरतते हैं। वैसे देखा जाये तो देश में जितनी अधिक पुस्तकें पश्चिमी ज्ञान से संबंधित है भारत के पुरातन ज्ञान उसके अनुपात में कम है पर वह वास्तविकता पर आधारित हैं। संत कबीर दास जी के अनुसार अधिक पुस्तकें पढ़ने से आदमी भ्रमित हो जाता है और शायद यही कारण है कि लोग भ्रमित होकर ही अपना जीवन गुजार रहे हैं। इस विषय पर इसी ब्लाग पर मै फिर कभी लिखूंगा क्योंकि यह आलेख लिखते समय दो बार लाईट जा चुकी है और मेरा क्रम बीच में टूटा हुआ था इसलिये हो सकता है कि विषयांतर हुआ हो पर उस दौरान भी मैं इसी विषय पर सोचता रहा था। बहुत सारे विचार है जो आगे लिखूंगा।

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

रामनवमी:राम से भी बड़ा है राम का नाम-आलेख (ramnavmi-ram se bhi bada ram ka nam)


भारतीय अध्यात्म में भगवान श्रीराम के स्थान को कौन नहीं जानता? आज रामनवमी है और हर भारतीय के मन में उनके प्रति जो श्रद्धा है उसको प्रकट रूप में देख सकते है। आस्था और विश्वास के प्रतीक के रूप में भगवान श्रीराम की जो छवि है वह अद्वितीय है पर उनके जीवन चरित्र को लेकर आए दिन जो वाद-विवाद होते हैं और मैं उनमें उभयपक्षीय तर्क देखता हूं तो मुझे हंसी आती है। वैसे देखा जाये तो भगवान श्रीराम जी ने अपने जीवन का उद्देश्य अधर्म का नाश कर धर्म की स्थापना करना बताया पर उससे उनका आशय यह था कि आम इंसान शांति के साथ जीवन व्यतीत कर सके और तथा भगवान की भक्ति कर सके। उन्होंने न तो किसी प्रकार के धर्म का नामकरण किया और न ही किसी विशेष प्रकार की भक्ति का प्रचार किया।

मेरा यह आलेख किश्तों में आएगा इसलिये यह बता दूं कि मैं बाल्मीकि रामायण के आधार पर ही लिखने वाला हूं। मैं अपनी बुद्धि और विवेक से अपने वह तर्क रखूंगा जो भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र के अध्ययन से मेरे दिमाग में आते हैं। मेरा मौलिक चिंतन है और भगवान श्रीराम के चरित्र की व्याख्या करने वालों के मैं कई बार अपने को अलग अनुभव करता हूं। मैने अपने स्कूल की किताबें और बाल्मीकि रामायण की पढ़ाई एक साथ शुरू की और मेरे लेखक बन जाने का कारण भी यही रहा। शायद इसलिये जब मै भगवान श्रीराम के बारे में कई बार किसी की कथा सुनता हूं तो मुझे लगता है कि लोगों का भटकाया जा रहा है। कथा इस तरह होती है कि सुनाने वाला अपना अधिक महत्व प्रतिपादित करता है और उसमें भगवान श्रीराम के प्रति भक्ति कम दृष्टिगोचर होती है। शायद यही वजह है कि भगवान श्रीराम के चरित्र की आलोचना करने वाले लोगों का वह सही ढंग से मुकाबला नहीं कर पाते। कभी तो इस बात की अनुभूति होती है कि श्रीराम के जीवन चरित्र सुनाने वाले भी उसके बारे में किताबी ज्ञान तो रखते हैं पर मन में भक्ति नहीं होती उनका उद्देश्य कथा कर अपना उदरपूति करना होता है।

कई बार मेरे सामने ऐसा भी होता है कि जब भगवान श्रीराम के चरित्र की व्याख्या जब अपने मौलिक ढंग से करता हूं तो लोग प्रतिवाद करते हैं कि ऐसा नहीं वैसा। वह तो भगवान थे-आदि। कुल मिलाकर मनुष्य के रूप में की गयी लीला को भी लोग भगवान का ही सामथर््य मानते है। लोग अपने को विश्वास अधिक दिलाना चाहते हैं कि वह भगवान श्रीराम के भक्त हैं न कि विश्वास के साथ भक्ति करते हैं। अगर देखा जाय तो भक्ति का चरम शिखर अगर किसी ने प्राप्त किया है तो उनके सबसे बड़ा नाम संत कबीर और तुलसीदासजी का है-इस क्रम में मीरा और सूर भी आते हैं। ज्ञानियों में चरम शिखर के प्रतीक हम बाल्मीकि और वेदव्यास को मान सकते हैं। भगवान को पाने के दोनों मार्ग- भक्ति और ज्ञान- हैं। भगवान को दोनों ही प्रिय हैं पर ज्ञान के बारे में लोगों का मानना है कि भक्ति मार्ग मे रुकावट डालता है और जो आदमी भक्ति करता है और जब वह चरम पर पहुंचता है तो वह भी महाज्ञानी हो जाता है। बाल्मीकि और वेदव्यास ने ज्ञान मार्ग को चुना तो वह समाज को ऐसी रचनाएं दे गये कि सदियों तक उनकी चमक फीकी नहीं पड़ सकती और कबीर, तुलसी, सूर, और मीरा ने भक्ति का सर्वोच्च शिखर छूकर यह दिखा दिया है कि इस कलियुग में भी भगवान भक्ति में कितनी शक्ति है। किसी की किसी से तुलना नहीं हो सकती पर संत कबीर जी ने तो कमाल ही कर दिया। उन्होंने अपनी रचनाओं में भक्ति और ज्ञान दोनों का समावेश इस तरह किया कि वर्तमान समय में एसा कोई कर सकता है यह सोचना भी कठिन है और यहीं से शुरू होते हैं विवाद क्योंकि लोग कबीर की तरह प्रसिद्ध तो होना चाहते हैं पर हो नहीं सकते इसलिये उनके इष्ट भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र पर टिप्पणियां करने लगते हैं।

राम से बड़ा है राम का नाम। मतलब यह कि इस देश में राम से बड़ा तो कोई हो नहीं सकता पर आदमी में हवस होती है कि वह अपने मरने के बाद भी पुजता रहे और जब तक राम का नाम लोगों के हृदय पटल पर अंकित है तब तक अन्य कोई पुज नहीं सकता। गरीबी, बेकारी और तंगहाली गुजारते हुए इस देश में राम की महिमा अब भी गाई जाती है यह कई लोगों का स्वीकार्य नहीं है। इसलिये वह अनेक तरह के ऐसे विवाद खड़े करते हैं कि लोगों का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हो। इसलिये कई तरह के स्वांग रचते हैं। रामायण से कुछ अंश लाकर उसका नकारात्मक प्रचार करना, विदेशी पुस्तकों से उद्धरण लेकर अपने आपको आधुनिक साबित करना और उससे भी काम न बने तो वेदों से अप्रासंगिक हो चुके श्लोकांे का सामने लाकर पूरे हिंदू समाज पर प्रहार करना।

कहा जाता है कि श्रीगीता में चारों वेदों का सार है इसका मतलब यह कि जो उसमें नहीं है उस पर पुनर्विचार किया जा सकता है-वेदों की आलोचना करने वालों को यह मेरा संक्षिप्त उत्तर है और इस पर भी मैं अलग से लिखता रहूंगा। विदेशी पुस्तकों से उद्धरण लेकर यहां विद्वता दिखाने वालों को भी बता दूं कि संस्कृत और हिंदी के साथ देशी भाषाओं में जीवन के सत्य को जिस तरह उद्घाटित किया गया उसके चलते इस देश को विदेश से ज्ञान अर्जित करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि अधिकतर विदेशी ज्ञान माया के इर्दगिर्द केंद्रित है इसलिए भी उनको महत्व नहीं मिलने वाला।

अब आता है रामायण या रामचरित मानस से अंश लेकर आलोचना करने वालों के सवाल का जवाब देने का तो ऐसे लोग अपने अधिकतर उद्धरण-जिसमें शंबुक वध और सीता का वनगमन आदि है- वह उत्तर रामायण से ही ले आते हैं जिसके बारे में अनेक विद्वान कहते हैं कि वह मूल रामायण का भाग नहीं लगता क्योंकि उसमें जो भाषा शैली वह भिन्न है और उसे किन्हीं अन्य विद्वानों ने जोड़ा है। अगर आप कहीं श्रीराम कथा को देखें तो वह अधिकतर भगवान श्रीराम के अभिषेक तक ही होती है-इससे ऐसा लगता है कि यह मसला बहुत समय से विवादास्पद रहा है। मुझे जिन लोगों ने रामायण और रामचरित मानस पढ़ते देखा वह भी मुझे उत्तर रामायण न पड़ने की सलाह दे गये। इसका आशय यह है कि मैं उत्तर वाले भाग पर कोई विचार नहीं बना पाता।
अब आते हैं मूल रामायण के उस भाग पर जिसमें इस पूरे संसार के लिये ज्ञान और भक्ति का खजाना है। शर्त यही है कि श्रद्धा और विश्वास से प्रातः उठकर स्वयं उसका अध्ययन, मनन, और चिंतन करो-किसी एक प्रक्रिया से काम नहीं चलने वाला। यह आलेख लंबा जरूर हो रहा है पर इसकी जरूरत मुझे अनुभव इसलिये हो रही है कि आगे जब संक्षिप्त चर्चा करूंगा तो उसमें मुझे इनको दोहराने की आवश्यकता नहीं होगी। अगर सब ठीकठाक रहा तो मैं उस हर तर्क को ध्यस्त कर दूंगा जो श्रीराम के विरोधी देते है।

उस दिन गैर हिंदू घार्मिक टीवी पर एक गैरहिंदू विद्वान तमाम तरह के कुतर्क दे रहा था। मैने हिंदी फोरम पर एक ब्लाग देखा जिसमें उसके उन तर्को पर गुस्सा जाहिर किया गया। उसमें यह भी बताया गया कि उन महाशय ने इंटरनेट पर भी तमाम उल्टीसीधी चीजें रख छोड़ीं है। उसने कहीं किसी हिंदू विद्वान से बहस की होगी। वहंा भी झगड़ा हुआ। मैं उस गैरहिंदू विद्वान का नाम नहीं लिखूंगा क्योंकि एक तो उसका नाम लिखने से वह मशहूर हो जायेगा दूसरे उसके तर्क काटने के लिये मेरे पास ठोस तर्क हैं। एक बात तय रही बाल्मीकि रामायण और श्रीगीता से बाहर दुनियां का कोई सत्य नहीं है और अगर कोई उनके बारे में दुष्प्रचार कर रहा है तो वह मूर्ख है और जो उसका तर्क की बजाय गुस्से से मुकाबला करना चाहता है वह अज्ञानी है। मुझे अपने बारे में नहीं पता पर मैं जो भी लिखूंगा इन्हीं महान ग्रंथों से ग्रहण किया होगा और अपनी विद्वता सिद्ध करने का मोह मैने कभी नहीं पाला यह तो छोड दिया अपने इष्टदेव पर-जहां वह ले चले वहीं चला जाता हूं।

रामनवमी के पावन पर्व पर इतना बड़ा लेख शायद मैं लिखने की सोचता भी नहीं अगर मेरे मित्र ब्लागर श्रीअनुनादसिंह के ब्लाग पर कृतिदेव का युनिकोड टुल नहीं मिलता। आजकल मैं फोरमों पर जाता हूं और यह जरूरी नहीं है कि मेरी पंसद के ब्लाग वहां मिल ही जायें पर अनुनाद सिंह का वह ब्लाग मेरी नजर में आ गया और मैने यह टूल वहां से उठाया और सफल रहा। अगर मैं उस दिन नहीं जा पाता या मेरी नजर से चूक जाता तो इतना बड़ा बिना हांफे लिखना संभव नहीं होता और होता भी तो आगे की कडियां लिखने की घोषणा नहीं करता। यह भगवान श्रीराम की महिमा है कि अपने भक्तों के लिये रास्ते भी बना देते हैं अगर वह यकीन करता हो तो। आज मैंने कोई विवादास्पद बात नहीं लिखी पर आगे भगवान श्रीराम के भक्तों के लिये दिलचस्प और उनके विरोधियों के विवादास्पद बातें इसमें आने वालीं हैं।
अपने सभी मित्र और साथी ब्लागरों के साथ पाठकों को रामनवमी की बधाई।