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बैचेन रहने की आदत है साहित्यक चोरी देखकर-हिन्दी व्यंग्य (baocjen rahne ki aadat hai sahityak chori dekhkar)


लिखना तथा एक तिवारी जी नामक हिन्दी पटकथा लेखक पर संयोग ऐसा बन गया कि हमें अपना नाम जोड़कर भी इस लेख को लिखना पड़ रहा है क्योंकि इंतजार है उस ब्लाग लेखक के उत्तर का जिसने बिना कांट छांट किये हमारी एक कविता को अपने ब्लाग पर बिना नाम के छाप दिया और हमने उस पर अपनी टिप्पणी लिख कर मामले के निपटारे की मांग की है।
हिन्दी में रचनाकार नहीं है, यह नारा बहुत दिनों से सुन रहे हैं-इस नारे में बाज़ार, राज्य तथा प्रचार व्यवसाय के जुड़े लोगों के जो वह बुद्धिजीवी लगाते हैं जो केवल आलेख लिखते हैं वह भी प्रायोजन मिलने पर। इधर राखी का इंसाफ धारावाहिक विवाद में फंसा तो एक राखी का स्वयंवर धारावाहिक का एक पटकथा लेखक सामने आया जिसने यह दावा किया है कि वह उसकी चुराई हुई है। स्थिति यह है कि उसने आत्महत्या करने की धमकी दे डाली है जैसे कि राखी के इंसाफ में ताने से प्रेरित होकर झांसी के एक लक्ष्मण युवक ने कर ली है।
तिवारी नाम धारी उसे लेखक का दावा था कि जब उसने अपनी पटकथा का होने का दावा किया तो उसे धमकाया गया और कहा गया कि ‘इसकी नायिका एक तरह से पूरे मीडिया की बेटी है। इसलिये उससे पंगा मत लो।’
हमें उस तिवारी नामधारी लेखक से सहानुभूति है। ऐसा लगता है कि वह सच बोल रहा होगा क्योंकि फिल्मों के बारे में मिली यह पहली शिकायत नहीं है। हमारे एक चौरसिया नाम के एक मित्र कहानीकार हैं। उन्होंने कम से कम पच्चीस वर्ष पूर्व एक कलात्मक फिल्म में अपनी कहानी चोरी होने की बात कही थी। तब हंसी आयी थी पर इसमें कोई शक नहीं था चौरसिया जी उच्च दर्जे के कहानीकार हैं। इधर हमने यह भी देखा कि एक अखबार हमारे ही चिंतनों को जस का तस छापता रहा है। जब नाम छापने को कहते हैं कि तो जवाब मिलता है कि ब्लाग का नाम छापने की परंपरा नहीं है। नाम छापने को कहा गया तो जवाब मिला कि अपने संपादक से कहेंगे कि आपकी रचनायें नहीं ले।
कितनी तुच्छ मानसिकता है उन लोगों की जो हिन्दी की खा रहे हैं। हिन्दी लेखक उनकी नज़र में है क्या? क्या खौफ है कि नाम छापेंगे तो लेखक अमिताभ बच्चन बन जायेगा और उसे साबुन, क्रीम या मोटरसाइकिल के विज्ञापन मिलने लगेंगे। मजे की बात है कि नामा न देने की बात स्वीकार तो हिन्दी लेखक कर ही लेते हैं कि क्योंकि उनको पता है कि हिन्दी लेखन और पूंजीपतियों के बीच जो दलाल हैं वह अपना ही पेट मुश्किल से भर पाते हैं पर नाम न देने की बात हमारे समझ में नहीं आयी। स्थिति यह हो गयी है कि समाचार पत्र पत्रिकाओं के पास अब साफ सुथरी हिन्दी लिखने वाले ही नहीं बचे। महंगाई बढ़ रही है कि हिन्दी के अखबार की कीमत आज भी दो ढाई रुपये से अधिक नहीं है। अब तो ऐसा लगता है कि प्रचार माध्यमों के लिये पाठक और दर्शक एक तरह से गूंगी फौज हो गयी है जिसके सहारे वह उच्च स्तर पर अपनी ताकत दिखा रहे हैं वरना आम आदमी में उनकी कोई पकड़ नहीं है। आजकल तो हर आदमी टीवी की तरह मुंह किये बैठा है। इसलिये ही स्थानीय स्तर पर टीवी चैनलों ने अपने पंाव फैला दिये हैं। अखबार छपने की संख्या और उसे पढ़ने वालों की संख्या में बहुत अंतर है। उससे भी अधिक अंतर तो पढ़ने वाले और उस अखबार से हमदर्दी रखने और पढ़ने वालों के बीच है। मतलब यह कि पहले लोग न केवल अखबार पढ़ते थे बल्कि उसे मानसिक हमदर्दी भी रखते थे। यह अब नहंी है।
हिन्दी ब्लाग पर लिखना और लिखवाना आसान नहीं है। अगर किसी लेखक से लिखने को कहो तो वह कहता है कि रचना चोरी हो जायेगी। मतलब यह कि लिखने को तैयार नहीं है और जो लिख रहे हैं वह चोरी का शिकार हो रहे हैं। लोग झूठ कहते हैं कि हिन्दी के ब्लाग केवल ब्लाग लेखक ही पढ़ रहे हैं और अच्छा नहीं लिखा जा रहा है। जबकि इस लेखक के गांधी और ओबामा पर लिखे पाठों के अनेक एक स्तंभकार ने चोरी किये जो कि इसका प्रमाण है कि कथित बुद्धिजीवी भी अब अंतर्जाल पर अपनी सामग्री टटोल रहे हैं। यह शायद मजाक लगता हो पर सच यही है कि कुछ ब्लाग लेखकों का नाम बाहर नहीं लिया जा रहा पर सच यही है कि उनके पाठ दूरगामी मार वाले हैं और बुद्धिजीवी उनसे प्रभावित हैं। हिन्दी ब्लाग पर कूड़ा लिखा जा रहा है तो बताईये बाहर कौनसा सदाबाहर साहित्य लिखा पढ़ने को मिल रहा है। इस ब्लाग लेखक के ब्लागों पर पाठकों की टिप्पणियां इस तरह की आती हैं कि ‘गजब! आप ऐसा भी सोच और लिख सकते हैं।’
लोगों के पास चिंतन नहीं है, दावा चाहे कितने भी करें। नारों पर लिखते हैं और वाद सजाते हैं। फिर उसमें किसी न किसी की तारीफ या निंदा का बिगुल बजाते हैं। फिल्म वालों के पास तो काल्पनिकता और यथार्थ का समन्वय करने की कभी शक्ति ही नहीं दिखी है क्योंकि वहां के निर्माता और निर्देशक हिन्दी लेखकों को स्वतंत्रता न देकर लिपिक बना लेते हैं। समाचार पत्र पत्रिकाओं में लेखकों को लिपिक की तरह ही देखा जाता है। स्थिति यह है कि अधिकतर हिन्दी अखबार अब अंग्रेजी शब्दों के मोह में फंस गये हैं। प्रबंधन करना नहीं आया तो अब मैनेजमेंट करने लगे हैं। क्या खाक करेंगे? प्रबंधन हो या मैनेजमेंट बिना चिंतन और मनन के नहीं होते। हिन्दी का खाकर उसे मिटाने की योजना या साजिश रची गयी है। कहते हैं कि हिन्दी को विश्व स्तर पर पहुंचाना है। क्या खाक पहुंचायेंगे खुद को आती नहीं है। फिर दावा कि हम भाषाविद हैं? क्या खाक हैं एक ढंग की कविता नहीं लिख सकते। हम जैसी कि चुराने का मन हो? कुछ गुस्सा और कुछ हंसी! इस भाव से हम यह लेख लिख रहे हैं क्योंकि चोरी का सदमा है तो खुशी इस बात की है कि हम अच्छा लिख रहे हैं।
आईये पहले उस ब्लाग का नाम देखें। उससे पहले देखकर आयें कि उसने हमारी टिप्पणी का क्या किया? उसने न टिप्पणी प्रकाशित की और न ही जवाब दिया। हम भी उसका नाम नहीं लिख रहे। उसकी बेवसाईट का पता रख लिया है। ऐसा लगता है कि बिचारा रोमन में हिन्दी लिखता है और यह उसकी पहली ऐसी रचना है जो देवानगारी में है। हम उसे बदनाम नहीं करना चाहते पर उम्मीद है कि भाई लोग इसे पढ़कर उसे समझायेंगे। वैसे वह  हमारी टिप्पणियाँ नहीं छाप रहा पर रोमन लिपि में अपनी रचनाएँ प्रकाशित कर रहा  है । हम यह सब  इसलिए रहे हैं क्योंकि बैचेन रहने की आदत ऐसे नहीं जाएगी। यहाँ यह भी बता दें हमारी रचना छापने का दाम पूछकर एक हज़ार और न पूछना पर दो हज़ार है और हम इसकी विधिवत माग करेंगे। इस लेख का लिखने का दंड अलग से वसूल करेंगे।  
हमारी   रचना यह है 
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बैचेन रहने की  आदत 
लोगों की हमेशा बेचैन रहने की
आदत ऐसी हो गयी है कि
जरा से सुकून मिलने पर भी
डर जाते हैं,
कहीं कम न हो जाये
दूसरों के मुकाबले
सामान जुटाने की हवस
अभ्यास बना रहे लालच का
इसलिये एक चीज़ मिलने पर
दूसरी के लिये दौड़ जाते हैं
। 
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हमारा लिंक यह हैं
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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धरती की रक्षा के लिये अपील नहीं चेतावनी की जरूरत-आलेख


सुना है आज घरती प्रहर दिवस मनाया जा रहा है। नयी सस्कृति अपना चुके इस देश में धीरे धीरे पाश्चात्य संस्कृति स्थापित करने के जो प्रयास अभी तक हुए हैं उसमें कई विद्वान लोगों को सफलता नहीं मिल पा रही है और अब प्रेम दिवस, शुभेच्छु दिवस, मित्र दिवस, नारी दिवस, माता दिवस तथा अन्य अनेक प्रकार के दिवस मनाने की प्रथा के सहारे यह प्रयास किया जा रहा है। पहले अनेक प्रकार के आधुनिक विचार लाकर देश में संस्कृति के विकास अवरुद्ध करने के साथ ही लोगों में चिंतन क्षमता का अकाल पैदा किया और अब नये नये दिवस मनवाकर उसी चिंतन क्षमता को नये रूप मेें स्थापित करने का जो प्रयास हो रहा है।
बहरहाल माता की ममता, सहृदय का प्रेम,तथा स्नेही की मित्रता ऐसे तत्व हैं जिसकी सुगंध को हमारे देश का आदमी स्वाभाविक रूप से अनुभव करता है। लार्ड मैकाले की गुलाम बनाने की शिक्षा के बावजूद हमारे देश में कुछ गुरु और माता पिता अपने बच्चे को अपनी संस्कृति से परिचित कराने के लिये प्रयास करते हैं जिसके कारण आज भी देश की अधिकतर आबादी उस नये परिवेश से परिचित नहीं है जिसका नये विद्वान प्रचार करते है।

ब्रह्मांड में धरती ही जीवन का सबसे बड़ा आधार है। जीवन निर्माण के साथ ही ब्रह्मा ने सभी मनुष्यों से कहा कि आप लोग यज्ञों द्वारा देवताओं की पूजा करें और वह अपने कर्म से धरती पर जीवन का संचार करें। धरती भी उनमें एक ऐसे देवता की तरह है जो अन्य देवताओं को भी अपने यहां ठहरने का आधार देती है ताकि उनकी कृपा मनुष्यों पर निंरतर बनी रहे। देवराज इंद्र की कृपा से वरुण देव जल बरसाते हैं और धरती उसका संचय करती है। जो वायु देवता उन बादलों को खींचकर अपने साथ लाते है उसकी शक्ति को पाताल में न जाकर अपने यहां ही बहने देती है ताकि वह जल को सूखे स्थानों तक पहुंचा सके। सूर्य की गर्मी के संचय से उष्मा संचय कर बादलों का पानी नीचे खींचने में सहायता करती है। अपनी शक्ति से समस्त देवताओं को बांधने वाली इस धरती पर वही इंसान कहर बरपाता है जिसके सुख के लिये वह सभी करती है।

वैदिक धर्म ने अनेक ऐसे यज्ञों का प्रवर्तन किया जिससे धरती पर प्राकृतिक संतुलन बना रहे। प्राचीन काल मेंें राजा भागीरथ ने घोर तपस्या कर गंगा नदी को स्वर्ग से जमीन पर उतारा। गंगा जी में इतना तेज था कि उनके धरती पर न रुककर पाताल में घुस जाने की संभावना थी इसलिये राजा भागीरथ ने उनकी गति की तीव्रता कम रखने के लिये भगवान शिव जी की तपस्या की और उन्होंने उसे अपनी जटाओं में धारण किया। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे प्राचीनतम अध्यात्मिक दर्शन में प्रथ्वी पर जीवन सतत प्रवाहित करने के लिये मनुष्यों से प्रयास किये जाने की अपेक्षा की जाती है। यह माना जाता है कि मनुष्य प्रथ्वी पर पर्यावरण संतुलन करने के लिये जल और वायु प्रदूषण रोकने के साथ ही कृषि, वन, खनिज, और पशु संपदा की रक्षा और शुद्धता के लिये मनुष्य स्वयं निरंतर प्रयत्नशील रहे न कि किसी अवतार का इंतजार करे। यही कारण है कि उसके लिये कोई एक दिन तय नहीं किया गया।

हमने पाश्चात्य शैली का विलासी और सुविधाभोगी जीवन तो अपना लिया है पर धरती पर फैलते जा रहे पर्यावरण प्रदूषण को विचार तो तभी कर सकते हैं जब अपने देह की परवाह कर लें। सभी लोग उपभोग की प्रवृतियों में अपना दिमाग लगाये बैठे हैं। देह, मन और विचार के विकारों को निकालने के लिये लिये कोई प्रयास नहीं करते। अब यह कहना कठिन है कि पर्यावरण प्रदूषण के कारण लोग मनोरोगी हो रहे हैं या वह मनोरोगी हो गये हैं इसलिये पर्यावरण प्रदूषण फैल रहा है। अब समस्या यह भी है कि पहले पर्यावरण प्रदूषण दूर हो या पहले लोगों की मानसिकता में पवित्रता का भाव आये। तय बात है कि ब्रह्मा जी ने मनुष्यों ये देवताओं को प्रसन्न करने के लिये यज्ञ और देवताओं से प्रथ्वी के समस्त जीवों मेंे जीवन का संचार करने का जो आदेश दिया उसका उल्लंघन हो गया है। देवता तो अपनी कृपा करते रहते हैं पर मनुष्य यज्ञ कहां कर रहा है? पेड़ पौद्यों को काटकर वहां पत्थर के शहर बनाने वाला इंसान पत्थर होता जा रहा है। वैसे आज भी कुछ लोग हैं जो पेड़ पोद्यों की रक्षा करने केे लिये प्रयासरत हैं-यह भी एक तरह का यज्ञ है। हमारे देश में अनेक अवसरों पर पेड़ पौद्यों पर जल चढ़ाने की पंरपरा का कुछ लोग मजाक उड़ाते हैं पर उसका महत्व वह नहीं जानते। दरअसल हमारे कुछ यज्ञ भले ही आधुनिक समय में पाखंड लगते हैं पर उनका कोई न कोई वैज्ञानिक महत्व रहा है और इसे कई लोग प्रमाणित कर चुके है।
सच बात तो यह है कि पर्यावरण प्रदूषण से बचने के लिये प्राकृतिक संपदा की रक्षा के लिये लोगों में चेतना जाग्रत कर उनसे सहायता की अपील करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि यह चेतावनी देने की जरूरत है कि अगर विश्व में इसी तरह गर्मी बढ़ती रही तो न केवल वह स्वयं बल्कि उनकी आने वाली पीढि़यां ही अपंग और मनोरोगी पैदा होंगी। अपनी सात पीढि़यों तक को खिलाने के लिये कमाकर रखने का विचार करने वाले धनी लोगों को यह समझाना भी जरूरी है कि उनकी आने वाली पीढि़यां नाम के लिये मनुष्य होगी पर उसका चालचलन पशुओं की तरह हो जायेगा। वैसे भी देश में आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा अनेक प्रकार की बीमारियों से ग्रसित है पर मनोरोगी कितने हैं कोई नहीं जानता। पूरी तरह विक्षिप्त होना ही मनोरोग नहीं होता बल्कि अनावश्यक बातों से तनाव में आना, जल्दी थक जाना तथा निराशा में रहना भी एक तरह से मनोरोग हैं जिनका पता तो रोगी को भी नहीं चलता। कोई कहता है कि देश के चालीस प्रतिशत लोग मनोरोगी है तो कोई कहता है कि इससे भी ज्यादा हैं। अगर हम अपनी चिंतन क्षमता को जाग्रत करें तो यह अनुभव कर सकते हैं कि अधिकतर लोगों की मनोदशा बहुत खराब है। तय बात है कि बढ़ती गर्मी और प्राणवायु में कमी ही ऐसी दशा में इंसान को डालती है।
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यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
1.दीपक भारतदीप का चिंतन
2.दीपक भारतदीप की हिंदी-पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका