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इसरो द्वारा चंद्रमा पर पानी की खोज तथा ओशियनसैट-2 सहित सात उपग्रहों का प्रक्षेपण-आलेख (ocianset-2 setelite-hindi article)


भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र ‘इसरो- ने एक ही दिन में वह भी केवल बीस मिनट में सात उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित किये जिसमें प्रमुख रूप से ओशियनसैट-2 भी शामिल है। ओशियनसैट-2 मौसम की जानकारी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा। चंद्रयान-1 की सफलता के बाद इसरो की यह दूसरी बड़ी सफलता है जिससे भारत का नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित होगा। इधर भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा चन्द्रमा पर पानी के खोज का भी समाचार मिला है जिसकी पुष्टि अमेरिका की वैज्ञानिक संस्था नासा ने की है। यकीनन भारत ने विज्ञान के क्षेत्र में जो प्रगति की है वह सराहनीय है। 
इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत अंतरिक्ष के रूप में एक महत्वपूर्ण शक्ति बन गया है और इससे उसकी सैन्य शक्ति का अंदाज भी लगाया जा सकता है। अनेक लोग सोचते होंगे कि अंतरिक्ष शक्ति का सैन्य शक्ति से क्या संबंध है तो उन्हें यह समझना चाहिये कि अंतरिक्ष की ताकत ही आजकल किसी भी देश की शक्ति की पहचान है। पहले युद्धों में पैदल सेना और फिर वायुसेना के द्वारा सफलतायें प्राप्त की जाती थीं पर आजकल बिना अंतरिक्ष क्षमता के यह संभव नहीं है। इधर इसरो दूसरा चंद्रयान-2 की तैयारी कर रहा है। इतना ही इसरो दूसरे देशों को भी अंतरिक्ष में उपग्रह भेजने में मदद कर रहा है। भारत के पास चीन से इस विषय में बढ़त प्राप्त है क्योंकि चीन अभी भी अपना चंद्रयान नहीं भेज पाया है। वैसे भारत का चंद्रयान अवधि से पूरी किये बिना ही अपना अस्तित्व गंवा बैठा पर ऐसे अभियानों में ऐसे विफलता कोई बड़ी चिंता की बात नहीं होती। वैसे भी उसने 95 प्रतिशत काम पूरा कर लिया था। इसी अभियान से विश्व को यह पता लगा कि चंद्रमा पर पानी है।
कहते हैं न कि घर की मुर्गी दाल बराबर-कुछ यही स्थिति हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की अपने देशवासियों के लिये है। आमतौर से हम लोग चीन और पाकिस्तान की सैन्य शक्ति को लेकर चिंतित रहते हैं पर उस समय केवल जल, थल और नभ की शक्ति पर विचार करते हैं। जल, थल और वायु की शक्ति महत्वपूर्ण है पर अंतरिक्ष शक्ति के आगे फीकी लगती हैं। हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की वजह से ही आज हमें महाशक्ति माना जाता है न कि पंरपरागत सैन्य उपलब्धियों से कोई यह सम्मान मिल रहा है।
अभी पिछले दिनों चीनी सेना की घुसपैठ की खबरें आयी थी जिसमें एक चैनल ने बताया कि चीनी सैनिक अपने देश का नाम भारतीय सीमा में दो किलोमीटर तक घुसकर कुछ पत्थरों पर लिखकर चले गये इस कथित समाचार पर एक भारी चिंता व्यक्त की गयी। हालांकि यह खबर प्रमाणित नहीं हुई पर इससे एक बात तो लगती है कि इस देश का बौद्धिक वर्ग के कुछ लोग कितने संकीर्ण ढंग से सोचते हैं।
सच तो यह है कि अब वह समय गया जब कोई सेना कहीं पहुंच गयी तो वहां से बिना लड़े हटती नहीं थी। अब विश्व समाज में एक अघोषित आचार संहिता तो बन गयी है कि किसी भी देश का स्वरूप इतनी आसानी से नहीं बदला जा सकता।
अगर प्रसंग चीन का आया तो पता नहीं आशियान देशों में भारत और चीन के संबंध क्यों भुला दिये जाते हैं? बहुत पहले अखबारों में एक खबर पड़ी थी कि आशियान देशों के घोषणा पत्र में भारत और चीन ने भी हस्ताक्षर किये गये जिसमें सदस्य देशों की वर्तमान सीमाओं में बदलाव को स्वीकार न करने की बात कही गयी थी। पता नहीं बाद में इस पर कोई जानकारी नहीं आई जबकि उसके बाद पाकिस्तान भारत पर आरोप लगाता रहा है कि भारत उसे आशियान का सदस्य नहीं बनने दे रहा है। आशियान ग्रुप में भारत और चीन के साथ सोवियत संघ भी है और पश्चिमी देश उसकी गतिविधियों को बहुत सतर्कता से देखते हैं। वहां चीन भारत के साथ अपने संबंध बेहतर रखता है जिसकी वजह उसकी आर्थिक और राजनीतिक बाध्यताऐं भी हो सकती हैं। यह संबंध ऐसे हैं कि भारत की इच्छा के विरुद्ध पाकिस्तान को उसमें शामिल करने की चीन ने कभी पहल नहीं की।
अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी से दुश्मनी लेकर आज कोई भी देश चैन से नहीं बैठ सकता चाहे वह चीन ही क्यों न हो? कुछ अखबारों में 1962 के भारत-चीन युद्ध का इतिहास भी हमने पढ़ा है जिसमें बताया गया कि चीन अंदर तक घुस आया था पर अमेरिकी दबाव में वह बहुत पीछे हट गया था हालांकि तब भी वह एक बहुत बड़े इलाके पर काबिज रहा। इसका आशय यह है कि कहीं न कहीं चीन भी अंतर्राष्ट्रीय दबाव के आगे घुटने टेक सकता है। आज की परिस्थिति में वह एक भी इंच जमीन पर अपना कब्जा नहीं जमा सकता। इसका कारण यह है कि जल, थल, और नभ क्षेत्र में भारतीय सेना चीन से कमतर मानी जाती है पर इतनी नहीं कि चीन उसे रसगुल्ले की तरह खा जाये। वियतनाम में पिट चुका चीन अब इतना साहस नहीं कर सकता कि भारत पर हमला करे। उस युद्ध में चीन की विश्व बिरादरी में बहुत किरकिरी हुई थी। फिर अपने अंतरिक्ष विज्ञान के कारण भारत उसके लिये कोई आसान लक्ष्य नहीं रह गया जिसकी बदौलत भारत विश्व में अपने मित्र बना रहा है।
इस अंतरिक्ष क्षमता की वजह से अमेरिका हमेशा विजेता बनता रहा है यह अलग बात है कि अपनी रणनीतिक गलतियों से जमीनी लड़ाई में फंस जाता है। चीन को पता है कि ऐसी गलतियां किसी भी देश की ताकत कम देती हैं। चीन न केवल अंतरिक्ष विज्ञान में भारत से पीछे हैं बल्कि कंप्यूटर साफ्टवेयर में भी उसकी भारत पर निर्भरता है। हमारे देश के प्रतिभाशाली युवाओं का माद्दा सभी मानते हैं। अपनी जनता में अपनी छबि बनाये रखने के लिये चीन के प्रचार माध्यम भले ही भारत की बुराई करते हैं पर भारत की ताकत को कमतर आंकन की गलती वहां के रणनीतिकार कभी नहीं करेंगे।

इसका सारा श्रेय भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को तो जाता ही है साथ ही निजी क्षेत्र के साफ्टवेयर इंजीनियों को भी इसके लिये प्रशंसा करना चाहिये जिन्होंने पूरे विश्व में अपना लोहा मनवा लिया है। इस अवसर पर इसरो के वैज्ञानिकों को हार्दिक बधाई और चंद्रयान-2 के भविष्य में सफल प्रक्षेपण के लिये शुभकामनायें।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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चंद्रयान-1 के प्रक्षेपण पर ओबामा का चिंतित होना स्वाभाविक-संपादकीय


अमेरिका में राष्ट्रपति के उम्मीदवार श्री ओबामा ने भारत के चंद्रयान भेजने पर चिंता जाहिर की और इसे अपने नासा संस्थान के लिये चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि वह विजय प्राप्त कर नासा की प्रगति के लिये काम करेंगे। यह खबर दो दिन पुरानी है पर आज नयी खबर यह पढ़ने को मिली कि अमेरिका का चैदहवां बैंक दिवालिया हो गया। अमेरिका अभी तक आतंकवाद से परेशान था पर आर्थिक मंदी भी उसके लिये संकट बन गयी है ऐसे में भारत का चंद्रयान भेजने का दर्द वह उस तरह व्यक्त नहीं की जैसे कर सकता था।

कुछ लोगों को ओबामा साहब की यह चिंता कोई अधिक महत्वपूर्ण नहीं लगती होगी पर जिन लोगों ने खबरे पढ़ते हुए अपनी जिंदगी गुजार दी वह इस बात को बहुत महत्व दे रहे हैं यह अलग बात है कि उनके दिल की बात लिखने वाला कोई बुद्धिजीवी नहीं है। सच तो यह है कि आर्थिक विशेषज्ञ स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि वर्तमान मंदी से उबरने के लिये अमेरिका को कम से कम पांच वर्ष लग जायेंगे। अमेरिकी सरकार अपने यहां की मंदी से जूझ रही है और उसे इसके लिये बहुत कुछ करना है।
भारतीय बुद्धिजीवी इस समय आंतकवाद को लेकर इस बहस में उलझे है कि कौनसा भाषाई,धार्मिक या वैचारिक समूह अच्छा है और कौन खराब। उन्हें यह सब दिखाई नहीं दे रहा कि जिस अमेरिका की उदारीकरण की वह प्रशंसा करते थे वहां की सरकार आखिर अब अपना धन क्यों लगा रही है? इधर भारत के सार्वजनिक बैंक सुरक्षित हैं तो यहां को लेकर आर्थिक विशेषज्ञ चिंतित नहीं हैंं।

कहा जाता था कि भारत की सरकार की नियंत्रित प्रणाली के कारण विकास नहीं हो पा रहा है पर चंद्रयान-1 क प्रक्षेपण से यह स्पष्ट हो गया है कि यह केवल एक भ्रांत धारणा थी। इसने भारत की प्रतिष्ठा में चार चांद लगा दिये और उसकी बढ़ती वैज्ञानिक शक्ति से इस बात की संभावना बन रही है कि विश्व के अनेक गरीब और विकासशील राष्ट्र भारत की तरफ झुक सकते हैं ताकि उन्हें अपने लिये सस्ते में तकनीकी मदद मिल सके। देने को तो अमेरिका भी ऐसी सहायता देता है पर न केवल पूरा पैसा वसूल करता है बल्कि अपनी अनेक ऐसी शर्तें भी मनवाता है जो किसी सार्वभौमिक राष्ट्र के लिये तकलीफदेह होती हैं। अमेरिका के अलावा अन्य विकसित राष्ट्र भी अब भारत को बराबरी का दर्जा दे सकते हैं-इसके लिये संयुक्त राष्ट्रसंघ में स्थाई सीट होने की जरूरत अब कम ही लोग मानते हैंंं।

भारत ने नियंत्रित प्रणाली होते आर्थिक विकास किया और साथ विज्ञान में भी वह स्थान प्राप्त कर लिया जो अभी चीन के लिये भी थोड़ा दूर है-हालांकि वह भी जल्द ही अपना चंद्रयान अंतरिक्ष में भेजने वाला है। ऐसे में अमेरिका के लिये उस क्षेत्र में चुनौती मिल रही है जिस पर उसका एकाधिकार था। निजी क्षेत्र की हमेशा वकालत करने वाले भारत के बुद्धिजीवी यह सोचकर हैरान होंगे कि कुछ लोगों ने वहां दबे स्वर मेें भारत की तरह मिश्रित अर्थ व्यवस्था अपनाने की आवाज उठाई है। मिश्रित अर्थव्यवस्था का अगर संक्षिप्त मतलब यह है कि जनहित के कुछ व्यवसाय और सेवायें सीधे सरकार के नियंत्रण में रहें ताकि उससे देश की आम जनता के जनजीवन को कभी पटरी से न उतारा जा सके। भारत में वैसे अधिकतर लोग इसी तरह की अर्थव्यवस्था के ही समर्थक हैं, पर सरकार की नियंत्रण की सीमाओं पर क्षेत्रों की संख्या पर मतभेद रहे हैं। हालांकि कुछ बुद्धिजीवी इसके कड़े विरोधी है और यह तय बात है कि वह पूंजीपतियों के लिये लिखने और पढ़ने वाले हैं।

बहरहाल भारत के बुद्धिजीवियों को अब यह समझ लेना चाहिये कि तमाम तरह के विवादों के बावजूद भारत अब विश्व महाशक्ति बनने की तरफ बढ़ रहा है और इस समय इस पर पर विराजमान अमेरिका और अन्य पश्चिमी राष्ट्र अपनी अर्थव्यवस्थाओं को लेकर जूझ रहे हैं। वैसे भारत के विश्व में सर्वशक्तिमान होने की बात का पहले भी अनेक लोग मखौल उड़ाते रहे हैं पर जिस तरह अमेरिका की मंदी ने वहां के हालात बिगाड़े हैं उससे ऐसा लगता है कि तमाम तरह के परिवर्तन इस विश्व में आ सकते हैं। अधिकतर लोगों को लगता है कि अमेरिका केवल हथियारों की वजह से ताकतवर है पर यह केवल अद्र्धसत्य है। अमेरिका के शक्तिशाली होने का कारण यह भी है कि अंतरिक्ष तकनीकी पर एकाधिकार होने के कारण अनेक देश उस निर्भर हैं और यही कारण है कि अपनी पूंजी भी वहीं लगाते हैं। यही कारण है कि अमेरिकी बैंक निजी होते हुए भी बहुत सारी पूंजी अर्जित कर लेते थे।

अब जिस तरह वहां बैंक दिवालिया हो रहे हैं उससे अमेरिका की साख पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है क्योंकि अमेरिका सरकार कब तक इन बैंकों को बचायेगी। इसके विपरीत भारतीय बैंकों पर सरकार का नियंत्रण है। हालांकि भारत में भी निजी बैंक अस्तित्व में आ गये हैं पर इस मंदी के कारण उनकी अभी कोई बृहद भूमिका नहीं है। यही कारण है कि भारत के आर्थिक विशेषज्ञ यहां की अर्थव्यवस्था को चिंतित नहीं है। अमेरिका में आर्थिक मंदी का प्रकोप है और ऐसे में अगर भारत से तकनीकी, विज्ञान और अंतरिक्ष के क्षेत्र में चुनौती मिलने वाली खबर मिलती है तो उस पर श्री ओबामा का चिंतित होना स्वाभाविक है।
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