Tag Archives: अध्यात्म

सामवेद के आधार पर सन्देश-हर मनुष्य प्रतिदिन युद्ध करता है


           श्रीमद्भागवत गीता के आलोचक उसे युद्ध से उपजा मानकर उसे तिरस्कार करते हैं पर शायद वह नहीं जानते कि आधुनिक सभ्यता में भी युद्ध एक व्यवसाय है जिसे कर्म की तरह किया जाता है। सारे देश अपने यहां व्यवसायिक सेना रखते हैं ताकि समय आने पर देश की रक्षा कर सकें।

         भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के समय श्री अर्जुन से कहा था कि अभी तू युद्ध छोड़ देगा पर बाद में तेरा स्वभाव इसके लिये फिर विवश करेगा। अर्जुन एक योद्धा थे और उनका नित्य कर्म ही युद्ध करना था। जब श्रीकृष्ण उसे युद्ध करने का उपदेश दे रहे थे तो एक तरह से वह कर्मप्रेरणा थी। मूलतः योद्धा को क्षत्रिय माना जाता है। इसे यूं भी कहें कि योद्धा होना ही क्षत्रिय होना है। इसलिये श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म प्रेरणा दी है यह अलग बात है कि युद्ध करना उसका स्वाभाविक कर्म था। श्रीमद्भागवत में कृष्ण यह भी कहते हैं कि अपने स्वाभाविक कर्म में लगा कोई भी व्यक्ति हो-कर्म के अनुसार क्षत्रिय, ब्राह्मण वैश्य और शुद्र का विभाजन माना जाता है-मेरी भक्ति कर सकता है। इस तरह श्रीमद्भागवत गीता को केवल युद्ध का प्रेरक मानना गलत है बल्कि उसके अध्ययन से तो अपने कर्म के प्रति रुचि पैदा होती है। इसी गीता में अकुशल और कुशल श्रम के अंतर को मानना भी अज्ञान कहा गया है। आजकल हम देखते हैं कि नौकरी के पीछे भाग रहे युवक अकुशल श्रम को हेय मानते हैं।

सामवेद में कहा गया है कि

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अभि विश्वानि काव्या

‘‘सारे सुकर्म कर।’

दिवे दिवे वाजं सस्निः।

‘‘प्रतिदिन तुम युद्ध करते हो।’’

मो षु ब्रह्मेव तन्द्रर्भवो।

‘‘आत्मज्ञानी बनकर कभी आलसी मत बनना।’’

             मनुष्य अपनी देह पालन के लिये कर्म करता है जो युद्ध का ही रूप है। हम आजकल सामान्य बातचीत में यह बात मानते भी हैं कि अब मनुष्य का जीवन पहले की बनस्पित अधिक संघर्षमय हो गया है। जबकि हमारे वेदों के अनुसार तो हमेशा ही मनुष्य का जीवन युद्धमय रहा है। जब हम भारतीय अध्यात्म में वर्णित युद्ध विषयक संदर्भों का उदाहरण लेते हैं तो यह भी देखना चाहिए कि उन युद्धों को तत्कालीन कर्मप्रेरणा के कारण किया गया था। इतना ही नहीं इन युद्धों को जीतने वाले महान नायकों ने अपने युद्ध कर्म का नैतिक आधार भी प्रस्तुत किया था। वह इनको जीतने पर राजकीय सुविधायें भोगने में व्यस्त नहीं हुए वरन् उसके बाद समाज हित के लिये काम करते रहे।

      संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर

writer and editor-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’, Gwalior

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विज्ञापन में महाबहस-हिंदी व्यंग्य कविता


कुछ लोग हर विषय पर बोलेंगे,

फिर अपने प्रचार की तराजु में

अपनी इज्जत का वजन तोलेंगे।

कहें दीपक बापू

हर जगह छाये हैं वह चेहरे

बाज़ार के सौदागरों से लेकर दाम,

प्रचारकों के साथी होकर करते काम,

अपने लफ्जों की कीमत लेकर ही

हर बार अपना मुंह खोलेंगे,

नाम वाले हो या बदनाम

पर्दे पर विज्ञापनों के बीच 

महाबहस के लिये

सामान जुटायेंगे वही लोग

जो पहले मशहुर होकर

शौहरत के लिये इधर उधर डोलेंगे।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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अपने जीवन में दृष्टा भाव से जीयें तो अलग ही मज़ा आता है प्रस्तुत है इस पर यह वीडियो चर्चा


हम अगर अपने जीवन में दृष्ट भाव से जीयें तो अलग ही मज़ा आता है प्रस्तुत है इस पर यह वीडियो चर्चा|

गुलामी अब भी चालू है-हिन्दी हास्य व्यंग्य


             ब्रिटेन के राजघराने की उनके देश में ही इतनी इज्जत नहीं है जितना हमारे देश के प्रचार माध्यम देते हैं। आधुनिक लोकतंत्र का जनक ब्रिटेन बहुत पहले ही राजशाही से मुक्ति पा चुका है पर उसने अपने पुराने प्रतीक राजघराने को पालने पोसने का काम अभी तक किया है। यह प्रतीक अत्यंत बूढ़ा है और शायद ही कोई ब्रिटेन वासी दुबारा राजशाही को देखना चाहेगा। इधर हमारे समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में सक्रिय बौद्धिक वर्ग इस राजघराने का पागलनपन की हद तक दीवाना है। ब्रिटेन के राजघराने के लोग मुफ्त के खाने पर पलने वाले लोग है। कोई धंधा वह करते नहीं और राजकाज की कोई प्रत्यक्ष उन पर कोई जिम्मेदारी नहीं है तो यही कहना चाहिए कि वह एक मुफ्त खोर घराना है। इसी राजघराने ने दुनियां को लूटकर अपने देश केा समृद्ध बनाया और शायद इसी कारण ही उसे ब्रिटेनवासी ढो रहे हैं। इसी राजघराने ने हमारे देश को भी लूटा है यह नहीं भूलना चाहिए।
               कायदा तो यह है कि देश को आज़ादी और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने वाले हमारे प्रचारकगण इस राजघराने के प्रति नफरत का प्रसारण करें पर यहां तो उनके बेकार और नकारा राजकुमारों के प्रेम प्रसंग और शादियों की चर्चा इस तरह की जाती है कि हम अभी भी उनके गुलाम हैं। खासतौर से हिन्दी समाचार चैनल और समाचार पत्र अब उबाऊ हो गये हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हिन्दी समाचार चैनल अपने विज्ञापनदाताओं के गुलाम हैं। इनके विज्ञापनदाता अपने देश से अधिक विदेशियों पर भरोसा करते हैं। यही कारण है कि कुछ लोगों के बारे में तो यह कहा जाता है कि वह यहां से पैसा बैगों में भरकर विदेश जमा करने के लिये ले जाते हैं। हैरानी होती है यह सब देखकर। अपने देश के सरकारी बैंक आज भी जनता के भरोसा रखते हैं पर हमारे देश के सेठ साहुकार विदेशों में पैसा रखने के लिये धक्के खा रहे हैं।
बहरहाल भारतीय सेठों का पांव भारत में पर आंख और हृदय ब्रिटेन और अमेरिका की तरफ लगा रहता है। कई लोगों को देखकर तो संशय होता है कि वह भारत के ही हैं या पिछले दरवाजे से भारतीय होने का दर्जा पा गये। अमेरिका की फिल्म अभिनेत्री को जुकाम होता है तो उसकी खबर भी यहां सनसनी बन जाती है। प्रचार माध्यमों के प्रबंधक यह दावा करते हैं कि जैसा लोग चाहते हैं वैसा ही वह दिखा रहे हैं पर वह इस बात को नही जानते कि उनको दिखाने पर ही लोग देख रहे हैं। उसका उन पर प्रभाव होता है। वह समाज में फिल्म वालों की तरह सपने बेच रहे हैं। विशिष्ट लोग की आम बातों को विशिष्ट बताने वाले उनके प्रसारण का लोगों के दिमाग पर गहरा असर होता है। ऐसा लगता है कि समाज में से पैसा निकालने की विधा में महारत हासिल कर चुके हमारे बौद्धिक व्यवसायी किसी नये सृजन की बजाय केवल परंपरागत रूप से विशिष्ट लोगों की राह पर चलने के लिये विवश कर रहे हैं।
                 यह भी लगता है कि सेठ लोगों की देह हिन्दुस्तानी है पर दिल अमेरिका या ब्रिटेन का है। उनको लगता है कि अमेरिका, ब्रिटेन या फ्रांस उनके अपने देश हैं और उनकी तर्फ से वहां केवल धन वसूली करने के लिये पैदा हुए हैं। अगर यह सच नहीं है तो फिर विदेशी बैंकों में भारी मात्रा में भारत से पैसा कैसे जमा हो रहा है? सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक शिखर पुरुषों को विदेश बहुत भाता है और राष्ट्रीय स्तर की बात छोड़िये स्थानीय स्तर के शिखर पुरुष बहाने निकालकर विदेशों का दौरा करते हैं।
प्रचार प्रबंधकों को लगता है कि जिस तरह पश्चिमी देशों में भारत की गरीबी, अंधविश्वास तथा जातिवादपर आधारित कहानियां पसंद की जाती हैं उसी तरह भारत के लोगों को पश्चिम के आकर्षण पर आधारित विषय बहुत लुभाते हैं। यही कारण है कि ब्रिटेन के बुढ़ा चुके राजघराने की परंपरा के वारिसों की कहानियां यहां सुनाई जाती हैं।
                 बहरहाल ऐसा लगता है कि हिन्दी समाचार चैनल बहुत कम खर्च पर अधिक और महंगे विज्ञापन प्रसारित कर रहे हैं। इन समाचार चैनलों के पास मौलिक तथा स्वरचित कार्यक्रम तो नाम को भी नहीं। स्थिति यह है कि सारे समाचार चैनल आत्मप्रचार करते हुए अधिक से अधिक समाचार देने की गारंटी प्रसारित करते हैं। मतलब उनको मालुम है कि लोग यह समझ गये हैं कि समाचार चैनलों का प्रबंधन कहीं न कहीं विज्ञापनदाताओं के प्रचार के लिये हैं न कि समाचारों के लिये। आखिर समाचार चैनलों को समाचार की गारंटी वाली बात कहनी क्यों पड़ी रही है? मतलब साफ है कि वह जानते हैं कि उनके प्रसारणों में बहुत समय से समाचार कम प्रचार अधिक रहा है इसलिये लोग उनसे छिटक रहे हैं या फिर वह समाचार प्रसारित ही कब करते हैं इसलिये लोगांें को यह बताना जरूरी है कि कभी कभी यह काम भी करते हैं। विशिष्ट लोगों की शादियों, जन्मदिन, पुण्यतिथियों तथा अर्थियों के प्रसारण को समाचार नहीं कहते। इनका प्रसारण शुद्ध रूप से चमचागिरी है जिसे अपने विज्ञापनदाताओं को प्रसन्न करने के लिये किया जाता है न कि लोगों के रुझान को ध्यान में रखा जाता है।
                  शाही शादी जैसे शब्द हमारे देश के अंग्रेजी के देशी गुलामों के मुख से ही निकल सकते हैं भले ही वह अपने को बौद्धिक रूप से आज़ाद होने का दावा करते हों।
                 बहरहाल जिस तरह के प्रसारण अब हो रहे हैं उसकी वजह से हम जैसे लोग अब समाचार चैनलों से विरक्त हो रहे हैं। अगर किसी दिन घर में किसी समाचार चैनल को नहीं देखा और ऐसी आदत हो गयी तो यकीनन हम भूल जायेंगे कि हिन्दी में समाचार चैनल भी हैं। जैसे आज हम अखबार खोलते हैं तो उसका मुख पृष्ठ देखने की बजाय सीधे संपादकीय या स्थानीय समाचारों के पृष्ठ पर चले जाते हैं क्योंकि हमें पता है कि प्रथम प्रष्ठ पर क्रिकेट, फिल्म या किसी विशिष्ट व्यक्ति का प्रचार होगा। वह भी पहली रात टीवी पर देखे गये समाचारों जैसा ही होगा। समाचार पत्र अब पुरानी नीति पर चल रहे हैं। उनको पता नहीं कि उनके मुख पृष्ठ के समाचार छपने से पहले ही बासी हो जाते हैं। हिन्दी समाचार चैनलों को भी शायद पता नहीं उनके प्रसारण भी बासी हो जाते हैं क्योंकि वही समाचार अनेक चैनलों पर प्रसारित होता है जो वह कर रहे होते हैं। एक ही प्रसारण सारा दिन होता है। शादियों और जन्मदिनों का सीधा प्रसारण पहले और बाद तक होता है।
कितने मेहमान आने वाले हैं, कितने आ रहे हैं, कितनी जगहों से आ रहे हैं। फिर कब जा रहे हैं, कहां जा रहे हैं जैसे जुमले सुने जा सकते हैं। संवाददाता इस तरह बोल रहे होते हैं जैसे आकाश से बिजली गिरने का सीधा प्रसारण कर रहे हों। वैसे ही टीवी अब लोकप्रियता खो रहा है। लोग मोबाइल और कंप्यूटर की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। खालीपीली की टीआरपी चलती रहे तो कौन देखने वाला है।

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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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बाज़ार जो बुलवाए-हिंदी व्यंग्य चिंत्तन


            यह हैरानी की बात है कि दिल्ली में एक युवती के साथ सामुहिक दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या की घटना के बाद जहां सारे देश में आक्रोश फैला वहीं अनेक लोगों को अपना नाम चमकाने के लिये बहसें करने के साथ ही बयान देने का अवसर मिला।  बाज़ार के सौदागरों के उत्पाद बिकवाने वाले प्रचार माध्यमों ने इस अवसर पर खूब नाटकबाजी की।  कहने को तो प्रचार माध्यमों में प्रस्तोता और बहसकर्ता शोकाकुल थे पर कहीं न कहीं जहां विज्ञापनों के माध्यम से कमाई हो रही थी तो विवादस्पद बयानों के माध्यम से अनेक लोगों को चमकाया जा रहा था।
           इस मामले में एक ऐसे गायक कलाकार  का नाम सामने आया जिसका नाम आम लोगों में तब तक प्रचलित नहीं था। उस गायक कलाकार के गीत में महिलाओं को लेकर कोई अभद्र टिप्पणी थी।  संभव है देश के कुछ युवा लोग उसका नाम जानते हों पर पर सामान्य रूप से वह इतना प्रसिद्ध नहीं था।  प्रचार माध्यम उसके पीछे हाय हाय करके पड़ गये। बाद में उस गायक कलाकार ने दावा किया कि वह गीता उसका गाया हुआ ही नहीं है।  यह मामला थम गया पर उस गायक कलाकार का नाम तब तक सारा देश जान गया।  क्या इसमें कोई व्यवसायिक चालाकी थी, यह कहना कठिन है।
      प्रचार माध्यमों ने पीड़िता का नाम गुप्त रखने की कानूनी बाध्यता जमकर बखानी।  यह सही है कि दैहिक जबरदस्ती की शिकार का नाम नहीं दिया जाना चाहिये पर यह शर्त इसलिये डाली गयी है ताकि उसे भविष्य में सामाजिक अपमान का सामना न करना पड़े।  जिसका देहावसान हो गया हो उसके लिये फिर मान अपमान का प्रश्न ही कहां रह जाता है?  हां, उसके माता पिता के लिये थोड़ा परेशानी का कारण होता है पर दिल्ली में दरिंदों की शिकार उस बच्ची का नाम उसके पिता ने ही उजागर कर दिया है। इंटरनेट पर ट्विटर पर आई एक मेल में एक अखबार की चर्चा है जिसमें उसके पिता का बयान भी है।  हम नाम नहीं लिखते क्योंकि हमारा उद्देश्य किसी घटना में समाज के उन पहलुओं पर विचार करना होता है जिन्हें लोग अनदेखा कर देते हैं-नाम अगर सार्वजनिक हुआ हो तो भी नहीं लिखते।
      इधर हम देख रहे हैं कि सामूहिक दुष्कर्म पर अनेक लोग बयानबाजी कर रहे हैं।  हमें अफसोस होता है यह देखकर कि वह बच्ची तो अपने दुर्भाग्य का शिकार हो गयी पर उसे विषय बनाकर लोग जाने क्या क्या कर रहे हैं।  हमने पहले भी यह कहा था कि यह घटना आम घटनाओं से अलग है। कहीं न कहीं इसमें राज्य प्रबंध का दोष है। अब तो यह भी मानने है कि समाज का भी इसमें कम दोष नहीं। लड़की के साथ जो लड़का था वह बच गया और उसके जो बयान आये हैं वह दूसरा पक्ष भी रख रहे हैं।  वह उसे दुर्भाग्यशाली बच्ची ने दरिंदों की क्रुरता तो झेली ही सज्जनों की उपेक्षा को भी झेला।  लड़की साथ वाले लड़के के अनुसार वह घायलवास्था में  सड़क पर पड़े आते जाते लोगों से मदद की याचना करता रहा पर लोग देखकर जाते रहे।  दुर्जनों की सक्रियता और सज्जनों की निष्क्रियता दोनों को उन दोनों ने जो रूप देखा वह हैरान करने वाला है।  उनकी उपेक्षा करने वाले मनुष्य थे कोई गाय या भैंस नहीं।
          इस  पर एक वाक्य याद आ रहा है। हमें पता नहीं किसी फिल्म में था या कहीं पढ़ा है।  इसमें एक धर्म विशेष को लेकर कहा गया कि ‘………धर्म हमें या तो आतंकवादी बनाता है या फिर बेबस’!
    यह वाकया देखकर हमें लग रहा है कि नाम से पहचाने जाने वाले सारे धर्मो की स्थिति यही है।  जहां तक भारतीय अध्यात्म का प्रश्न है वह पवित्र आचरण तथा अच्छे व्यवहार को ही धर्म मानता है।  श्रीमद्भागवत गीता में धर्म का कोई नाम नहीं बल्कि आचरण से उसे जोड़ा गया है।  कष्टकारक बात यह है कि श्रीमद्भागवत गीता को पढ़ने  का दावा करने वाले लोग यह मानते है कि वह महाज्ञानी हो गये और फिर वह उसकी व्याख्या मनमाने तरीके से करते हैं। उससे भी ज्यादा हैरान यह बात करती है कि जिन लोगों का यह दावा कि वह भारतीय धर्मो की समझ रखते हैं वही ऐसी बातें करते हैं जिनका सिर पैर नहीं होता।
    सामूहिक दुष्कर्म की घटना में वास्तविक रूप से क्या हुआ, यह तो वह लड़का भी एकदम पूरी तरह से नहीं बता सकता जो उस समय लड़की के साथ था।  अपने ऊपर वार होने की वजह से वह घायल होकर अपनी सुधबुध खो बैठा था  हालांकि पूरे हादसे के समय वह उस पीड़ा झेल रहा था। ऐसे में यह कहना कि उस लड़की को यह करना चाहिये था यह वह करना चाहिए था यह हास्यास्पद है।  इस घटना के परिप्रेक्ष्य में संपूर्ण समाज की स्थिति में देखना भी ठीक नहीं है।  जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा के आधार पर अपराध और पीड़ित को देखने वाले केवल दुर्भाग्यशाली पीड़िता के नाम के साथ अन्याय कर रहे हैं।  यह सच है कि मनुष्य एक शक्तिशाली जीव है पर भाग्य का अपना रूप है।  एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर जो लोग टिप्पणी कर रहे हैं उनका मुख्य उद्देश्य पर्दे पर अपना चेहरा और कागजों पर नाम चमकते देखने के अलावा कुछ नहीं है।  उनको ऐसा लगता है कि अगर हमने इस पर कुछ नहीं बोला तो प्रचार युद्ध में हम अपने प्रतिद्वंद्वियों से  पिछड़ जायेंगे।  फिर हम प्रचार माध्यमों की तरफ देखते हैं कि अगर उनके पास सनसनी पूर्ण समाचार और विवादास्पद बहसें नहीं होंगी तो उनके विज्ञापन का समय कैसे पास होगा।  बाज़ार के पास प्रचार है तो बोलने वाले बुत भी हैं। यह बुत अपना मुख प्रचार के भोंपुओं की तरफ हमेशा किये खड़े रहते हैं, मानो कह रहे हों कि ‘बोल बाज़ार।’
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप
ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh
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सामाजिक हैं हम लोग-हिंदी कविता


हादसों पर मोमबत्तियां जलाकर

मातम मनाओ

बच्चों को यह सिखा दिया,

सामाजिक है हम लोग

सारे संसार को दिखा दिया।

कहें दीपक बापू

सड़क पर कराहता कोई घायल,

नहीं सुनता कोई चीख

डरते हैं सभी कोई मदद की न मांगे भीख,

मुंह फेर जाते हैं देखने वाले,

लगाकर अपनी सोच पर ताले,

ज़माने पर लगता है मतलबपरस्ती का आरोप

रौशनी से चकाचौंध सड़क पर

यूं मोमबत्तियां जलाकर

जख्मों से हमदर्दी जता रहे है,

सर्दी में अपने शरीर को सता रहे हैं,

रोने में हम भी नहीं किसी से कम

दुनियां को यह बता दिया,

न हल्दी लगे न फिटकरी

रंग आयेगा चोखा

यह नयी पीढ़ी को अच्छी तरह सिखा दिया।

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लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

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राम और रावण के बीच युद्ध अवश्यंभावी था-आज दशहरा पर हिन्दी लेख (ram aur rawan ke beech yuddha avashyambhavi tha-hindi lekh on today dashahara)


         आज पूरे देश में दशहरे का त्यौहार मनाया जा रहा है। जिस दिन भगवान श्रीराम जी ने रावण का वध किया उसी दिन को ‘दशहरा पर्व के रूप में मनाया जाता है। पर्व मनाना और उससे निकले संदेश को समझना अलग अलग विषय हैं। ऐसे अवसर पर अपने इष्ट का स्मरण कर उनके चरित्र का स्मरण करने से पर्व मनाने में मजा आता है। देखा यह गया है की धार्मिक चित्तक समाज के सदस्यों को समाज समय पर एकत्रित होकर आध्यात्मिक चित्तन के लिए पर्वों जैसे अवसरों का निर्माण करते हैं बाज़ार उसे उत्सव जैसा बनाकर उपभोग की वस्तुएं बेचने का मार्ग बना लेता है, इस कारण ही चित्तन की बजाय उल्लास मनाने की प्रवृति पैदा होती है।
क्या राम और रावण के बीच केवल सीता की मुक्ति के लिये हुआ था? इस प्रश्न का उत्तर एक प्रतिप्रश्न है कि क्या अगर रावण सीता का अपहरण नहीं करता तो उनके बीच युद्ध नहीं होता?
         अगर तत्कालीन स्थितियों का अध्ययन करें तो यह युद्ध अवश्यंभावी था और रावण ने सीता का अपहरण इसी कारण किया कि भगवान श्रीराम अगर सामान्य मनुष्य हैं तो पहले तो सीता जी को ढूंढ ही न पायेंगे और उनके विरह में अपने प्राण त्याग देंगे। यदि पता लग भी गया और उनको वापस लाने के युद्ध करने लंका तक आये तो उन्हें मार दिया जायेगा। अगर भगवान हैं तो भी उनकी आजमायश हो जायेगी।
         जब भगवान राम लंका तक पहुंच गये तब रावण को आभास हो गया था कि भगवान श्री राम असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी हैं पर तब वह उनसे समझौता करने की स्थिति में वह नहीं रहा था क्योंकि श्री हनुमान जी ने लंका दहन के समय उसके पुत्र अक्षयकुमार का वध कर दिया था। यह पीड़ा उसे शेष जीवन सहजता ने नहीं बिताने देती। ऐसे में युद्ध तो अवश्यंभावी था।
       अगर रावण श्रीसीता का अपहरण नहीं भी करता तो भी अपनी बनवास अवधि बिताने के लियें दक्षिण दिशा की ओर बढ़ रहे श्रीराम जी से उसका युद्ध होना ही था। आखिर यह युद्ध क्यों होना था? इसे जरा आज के संदर्भ में देखें तो पता चलेगा कि अब फिर वैसे ही हालत निमित हो गये हैं हालांकि अब कोई न रावण जैसा ताकतवर दुष्ट है न ही भगवान श्रीराम जैसा शक्तिशाली और पराक्रमी।
          दरअसल रावण भगवान शिव का भक्त था और उसे अनेक प्रकार वरदान मिले जिससे वह अजेय हो गया। अपने अहंकार में न वह केवल भगवान शिव को भूल गया बल्कि अन्य ऋषियों, मुनियों, और तपस्वियों की दिनचर्या में बाधा डालने लगा था। वह उनके यज्ञ और हवन कुंडों को नष्ट कर देता और परमात्मा के किसी अन्य स्वरूप का स्मरण नहीं करने पर मार डालता। इसके लिये उसने बकायदा अपने सेवक नियुक्त कर रखे थे जिनका वध भगवान श्री राम के हाथ से सीता हरण के पूर्व ही हो गया था।
         भगवान श्रीराम को रावण की पूजा पद्धति से कोई बैर नहीं था। वह तो भगवान शिव जी भी आराधना करते थे। वह दूसरे की पूजा पद्धति को हेय और इष्ट को निकृष्ट कहने की रावण प्रवृत्ति के विरुद्ध थे। भगवान श्रीराम की महानता देखिये उन्होंने रावण के शव को उसकी परंपराओं के अनुसार ही अंतिम संस्कार की अनुमति दी। कहने का तात्पर्य यह है कि अपना धर्म-उस समय धर्म का कोई नाम नहीं था इसलिये पूजा पद्धति भी कह सकते हैं-दूसरे पर लादने के विरुद्ध थे और यही कारण है कि उन्होंने अपने संदेशों में किसी खास पूजा पद्धति की बात नहीं कही है। इसके विरुद्ध अहंकारी रावण दूसरों की पूजा पद्धति में न केवल विघ्न डालता वरन् आश्रम और मंदिर भी तोड़ डालता था। श्री विश्वामित्र अपने यज्ञ और हवन में उसके अनुचरों की उद्दंडता को रोकने के लिये श्रीराम को दशरथ जी से मांग लाये थे और उसी दिन ये ही राम रावण का युद्ध शुरु हो गया था।
       रावण लोभ, लालच और दबाव के जरिये दूसरों पर अपना धर्म-पूजा पद्धति-लादना चाहता था। उसने दूसरी मान्यताएं मानने वाले समाजों की स्त्रियों का अपहरण कर उनको अपने राजमहल में जबरन रखा। उन पर लोभ, लालच, डर और मोह का जाल डालकर उनको अपने वश में किया ताकि दूसरा समाज तिरस्कृत हो। उसने श्रीसीता जी को भी साधारण स्त्री समझ लिया जो उसके आकर्षण में फंस सकती थी और यही गलती उसे ले डूबी पर इसका यह भी एक पक्ष भी है कि अन्य मान्यताओं के लोगों का वह जिस तरह विरोध कर रहा था अंततः उसे एक दिन श्रीराम जी समक्ष युद्ध करने जाना ही था।
         आज हम देखें तो हालत वैसे ही हैं। हमारे दर्शन के अनुसार अध्यात्मिक दर्शन ही धर्म हैं पर उसका कोई नाम नहीं है जबकि अन्य धर्मों में कर्मकांडों को भी उसके साथ जोड़ा जाता है। धर्म का अर्थ कोई विस्तृत नहीं है। निष्काम भाव से कर्म करना, निष्प्रयोजन दया करना, समस्त जीवों के प्रति समान भाव रखते हुए अपने इष्ट का ही स्मरण करना उसका एक रूप है। अन्य धर्मों में उससे मानने की अनेक शर्तें हैं और यह पहनने, ओढ़ने, नाम रखने और अभिवादन के तरीकों पर भी लागू होती हैं।
         इतिहास में हम देखें तो हमारे देश में किसी धर्म का नाम लेकर युद्ध नहीं हुआ बल्कि उसके तत्वों की स्थापना का प्रयास हुआ। धर्म के अनुसार ही राजनीति होना चाहिये पर राजनीतिक शक्ति सहारे धर्म चलाना गलत है। आज हो यह रहा है कि लालच, लोभ, मोह, और दबाव डालकर लोगों को न केवल अपना इष्ट बल्कि नाम तक बदलवा दिया जाता है। पूजा पद्धति बदलवा दी जाती है। यह सब अज्ञान और मोह के कारण होता है। इस तरह कौन खुश रह पाता है?
       चाणक्य और कबीर भी यही कहते हैं कि अपना इष्ट या वर्ग बदलने से आदमी तनाव में जीता है। हमने भी देखा है कि अनेक लोग अपना नाम, इष्ट और वर्ग बदल जाते हैं पर फिर भी उसकी चर्चा करते है जबकि होना चाहिये कि वह फिर अपने नाम, इष्ट और वर्ग की बात तक न करें। कहने को तो वह यह कहते हैं कि यह सब बदलाव की वजह से उनको धन, सफलता और सम्मान मिला पर भौतिक उपलब्धियों से भला कोई खुश रह सकता है?

       दशहरे के इस पावन पर्व पर हमें अपने इष्ट भगवान श्रीराम का स्मरण करते हुए उनके चरित्र पर भी विचार करना चाहिए तभी पर्व मनाने का मजा है। इस अवसर पर हम अपने पाठकों, ब्लाग मित्रों और सहृदय सज्जनों के बधाई देते हैं।यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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संत कबीरदास के दोहे-भगवान के साथ चतुराई मत करो


सिहों के लेहैंड नहीं, हंसों की नहीं पांत
लालों की नहीं बोरियां, साथ चलै न जमात

संत शिरोमणि कबीर दास जी के कथन के अनुसार सिंहों के झुंड बनाकर नहीं चलते और हंस कभी कतार में नहीं खड़े होते। हीरों को कोई कभी बोरी में नहीं भरता। उसी तरह जो सच्चे भक्त हैं वह कभी को समूह लेकर अपने साथ नहीं चलते।

चतुराई हरि ना मिलै, ए बातां की बात
एक निस प्रेही निराधार का गाहक गोपीनाथ

कबीरदास जी का कथन है कि चतुराई से परमात्मा को प्राप्त करने की बात तो व्यर्थ है। जो भक्त उनको निस्पृह और निराधार भाव से स्मरण करता है उसी को गोपीनाथ के दर्शन होते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-लोगों ने तीर्थ स्थानों को एक तरह से पर्यटन मान लिया है। प्रसिद्ध स्थानों पर लोग छुट्टियां बिताने जाते हैं और कहते हैं कि दर्शन करने जा रहे हैं। परिणाम यह है कि वहां पंक्तियां लग जाती हैंं। कई स्थानों ंपर तो पहले दर्शन कराने के लिये बाकायदा शुल्क तय है। दर्शन के नाम पर लोग समूह बनाकर घर से ऐसे निकलते हैं जैसे कहीं पार्टी में जा रहे हों। धर्म के नाम पर यह पाखंड हास्याप्रद है। जिनके हृदय में वास्तव में भक्ति का भाव है वह कभी इस तरह के दिखावे में नहीं पड़ते।
वह न तो इस समूहों में जाते हैं और न कतारों के खड़े होना उनको पसंद होता है। जहां तहां वह भगवान के दर्शन कर लेते हैं क्योंकि उनके मन में तो उसके प्रति निष्काम भक्ति का भाव होता है।

सच तो यह है कि मन में भक्ति भाव किसी को दिखाने का विषय नहीं हैं। हालत यह है कि प्रसिद्ध तीर्थ स्थानों पर किसी सच्चे भक्त का मन जाने की इच्छा भी करे तो उसे इन समूहों में जाना या पंक्ति में खड़े होना पसंद नहीं होता। अनेक स्थानों पर पंक्ति के नाम पर पूर्व दर्शन कराने का जो प्रावधान हुआ है वह एक तरह से पाखंड है और जहां माया के सहारे भक्ति होती हो वहां तो जाना ही अपने आपको धोखा देना है। इस तरह के ढोंग ने ही धर्म को बदनाम किया है और लोग उसे स्वयं ही प्रश्रय दे रहे हैं। सच तो यह है कि निरंकार की निष्काम उपासना ही भक्ति का सच्चा स्वरूप है और उसी से ही परमात्मा के अस्तित्व का आभास किया जा सकता है। पैसा खर्च कर चतुराई से दर्शन करने वालों को कोई लाभ नहीं होता।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

पुत्तापर्ती के सत्य साईं बाबा का निधन और भक्तों में शोक-हिन्दी लेख (death of sathya sai baba in puttaparthi shock for his bhakt-hindi lekh)


         पुट्टपर्थी के सत्य साईं बाबा के का निधन हो गया है। हम परमपिता परमात्मा से प्रार्थना करते हैं कि वह उनके भक्तों को यह दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें। इसमें कोई संदेह नहीं है कि तमाम विवादों के बावजूद उन्होंने भारत में अपने ढेर सारे भक्त बनाये।
       वैसे देखा जाये तो सत्य साईं बाबा समय समय पर चर्चा में आते रहे पर उनको पूरे भारत मे लोकसंत के रूप में कभी नहीं देखा गया। हम यहां संतों की व्यवसायिक गतिविधियों से अलग हटकर बात कर रहे हैं। इस समय बाबा रामदेव, आसाराम बापू, श्रीश्रीरविशंकर तथा मोरारीबापू जैसे अनेक संत हैं जो लोकसंत माने जाते हैं। लोकसंत की कोई परिभाषा तो नहीं है पर जिनके पास लोग पहुंचते हैं तो वह भी उनके पास पहुंचते हैं उनको ही लोकसंत माना जाता है। उनके पास भी आश्रम होते हैं पर वह उनकी पहचान नहीं होते। उनका लोगों में जाकर प्रवचन करना, उनको दीक्षा देना तथा उनके साथ उठना बैठना ही उनको लोकसंत बना देता है। उसी तरह हमारे देश में कुछ अकादमिक संत भी होते हैं। जो केवल अपने पंथ का निर्माण करते हैं या फिर किसी चलते हुए पंथ के सर्वेसर्वा बन जाते हैं। उनका लक्ष्य अपने पंथ के लोगों से ही संपर्क बनाये रखना होता है। इन सबसे अलग पुट्टापर्थी के   सत्य साईं बाबा की छवि चमत्कारी महापुरुष की रही है।
             उनके बारे में इतनी व्यापक चर्चा 1975 के बाद अब सुनने को मिली जब वह बीमार होकर अस्तपाल में पहुंचे। इससे पूर्व 1975 में तत्कालीन लोकप्रिय अखबार ‘ब्लिटज्’ में उनके चमत्कारों को लेकर धारावाहिक रूप से कई सप्ताह तक लिखा गया था। उसके संपादक आर. के. करंजिया उस समय आक्रामक पत्रकार माने जाते थे और उनके लेखन की धार काफी तेज थी। उन्होंने अपनी कलम से सत्य साईं बाबा के इस दावे को भी चुनौती दी कि वह शिर्डी के साईं बाबा का अवतार हैं। उनके चमत्कारों को हाथ की सफाई कहकर उनकी खिल्ली उड़ाई। आजकल की हालत को देखते हुए तो लगता है कि ब्लिट्ज का यह दुष्प्रचार ‘फिक्स प्रचार’ रहा होगा क्योंकि वहीं से ही सत्य साईं को अधिक प्रसिद्धि मिली और उनके भक्तों की संख्या बढ़ती गयी। इसके बाद सत्य साईं बाबा एक बार फिर चर्चा में तब आये जब उनके हाथ से एक भक्त को भभूत देने का दृश्य कैमरे में कैद हो गया। दरअसल उन्होंने वह मौजूद जनसमुदाय को यह दिखाया था वह भभूत हवा में हाथ ं लहराने से अपने आप आई है पर कैमरा बता रहा था कि उन्होंने वह उन्होंने पीछे खड़े अपने शिष्य से हाथ में ली है।
            उसके बाद से सत्य साईं बाबा कभी चर्चा में नहीं आये। अब जब वह अस्पताल में भर्ती हुए तो फिर चर्चाओं का बाज़ार गर्म हो गया। पता चला कि उनके पास चालीस हज़ार करोड़ की संपत्ति है। इसमें पुटटपर्थी में उनके बनाये गये अस्पताल, विद्यालय तथा अन्य जनउपयोगी संस्थान शामिल हैं। उन्हें विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक प्रमुख भी कहा जा सकता है क्योंकि उनके आश्रम 163 देशों में बताये गये हैं। इतनी बड़ी संपत्ति का स्वामी आज के बाज़ार के संपर्क में न हो यह संभव नहीं है। कहीं न कहीं आज के आर्थिक साम्राज्यों के वह अप्रत्यक्ष स्वामी रहे होंगी। उनका प्रत्यक्ष आर्थिक साम्राज्य भी कम नहीं है। यही कारण है कि उनके अस्पताल जाते ही आज के बाज़ार के प्रचार माध्यमों ने उनका गुणगान प्रारंभ कर दिया। इतना ही नहीं अब पता चला कि भारतीय बाज़ार का सबसे कीमती खेल क्रिकेट से जुड़े दो महानायक भी उनके शिष्य हैं। क्रिकेट के कथित भगवान का जन्म दिन सत्य साईं बाबा के अवसान के दिन पड़ा है सो वह नहीं मना रहा क्योकि उसके अध्यात्मिक गुरु ने अपनी देह त्याग दी है। हम भी मानते हैं कि उसके लिये यह दिन दुःखद है और भगवान उसे सहने की शक्ति प्रदान करे।
              85 वर्ष तक शांतिपूर्ण जीवन बिताने वाले सत्य साईं ने अपनी लीलाऐं की और फिर देह त्याग दी। भारत के अध्यात्मिक ज्ञानियों के लिये इतना ही कहानी ठीक है पर जब उनकी संपत्ति को लेकर तमाम बातें होती हैं तो चर्चा इधर से उधर निकल ही जाती है। बताया गया है कि उनके आश्रम 163 देशों में है तो ऐसा लगता है कि वह यकीनन वह महान आत्मा थे। इस दुनियां में कम से साठ देश हैं जो राजनीतिक रूप से गैर हिन्दू धर्म मानने वाले हैं और जहां किसी हिन्दू आश्रम का खुलना संभव नहीं है। संख्या देखते हुए लगता है कि वह उन देशों में भी होंगे। ऐसे में श्रीसत्य साईं बाबा का वहां आश्रम होना चमत्कार से कम नहीं है।
              सत्य सांई बाबा को भी शिर्डी के साईं बाबा की तरह चमत्कारी माना जाता है। जहां तक हमारी जानकारी है प्रारंभिक दौर में उनका दावा तो उन्हीं का अवतार होने का था पता नहीं कब वह भगवान के अवतार के रूप में बदल गया। सत्य साईं बाबा को लोकसंत न मानने के पीछे अध्यात्मिक ज्ञानियों के लिये कठिन इसलिये भी रहा क्योंकि उनके साथ चमत्कारी बाबा का विशेषण जुड़ा होना भी था जो कि तत्वज्ञान की दृष्टि से अज्ञान का प्रमाण माना जाता है।
           भारतीय अध्यात्म के अनुसार इस धरती पर हर घटना चमत्कारी है या बिल्कुल नहीं है। कहने का मतलब है कि यहां सभी कार्य चमत्कार से भरे हुए हैं या फिर उनमें कोई चमत्कार नहीं है। आप बताईये क्या गेंहूं, चावल, दाल या सब्जियों का पैदा होना चमत्कारी नहीं है। जिस समय बीज बोया जाता है उसके कुछ समय वह अपने बृहद रूप से प्रकट होता है। जीव का पैदा होना भी क्या चमत्कार से कम है? कांटों में चुभन और फूलों में सुगंध होना क्या चमत्कार नहीं  है? भारतीय अध्यात्म की सबसे बड़ी खोज ध्यान है। अगर कोई मनुष्य अपना आज्ञा चक्र चमका ले तो उसके लिये हर चीज सामान्य हो जाती है। आधुनिक चिकित्सक बताते हैं कि मधुमेह और हृदय रोग का कारण मनुष्य के अंदर मौजूद मानसिक तनाव है। इसक मतलब अगर मानसिक तनाव न हो तो अनेक तरह के विकार से मुक्त रहा जा सके। ऐसे में अगर कोई व्यक्ति जीवन से परेशान है और अचानक ही कोई चीज उसके दिमाग में आकर विश्वास पैदा करे तो उसका रवैया बदल देती है। कभी सोया आज्ञा चक्र अचानक चल पड़ता है। यही कारण है कि हमारे यहां मूर्तिपूजा की परंपरा प्रारंभ हुई क्योंकि निरंकार को धारण करना सामान्य लोगों के लिये कठिन है। जेब में किसी भगवान की मूर्ति रख ली। मन में यह विश्वास हो गया कि अब हम अकेले नहीं है और अब सारे काम होंगे। यह आत्मविश्वास अनेक तरह के कार्यों की सिद्धि के लिये एक बहुत बड़ी दवा है। ऐसे में कोई काम होने पर मूर्ति का गुणगान करें पर आध्यात्मिक ज्ञानी जानते हैं कि यह आदमी के अंदर आये आत्मविश्वास का नतीजा है। यही कारण है कि भारतीय अध्यात्मिक से थोड़ा ही ज्ञान प्राप्त करने वाले अनेक संत दूसरों के आत्मविश्वास का स्तोत्र बन जाते हैं। यह अलग बात है कि हमारे देश की समस्यायें हमेशा जटिल रही हैं इसलिये जिसका काम न हो वह इधर से उधर संतों की दरबार में चमत्कार की आस में भटकता है।
            बहरहाल इतना तय है कि सत्य साईं बाबा की जीवन यात्रा अनोखी रही। अध्यात्मिक ज्ञानी उनमें कोई दोष नहीं देखते क्योंकि वह जानते हैं कि इस संसार में आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु तथा ज्ञानी भक्त हर हालत में रहेंगे। ऐसे में आर्ती और अर्थार्थी भाव भक्तों के लिये ऐसे महापुरुषों का भगवान के रूप में रहना हमारे समाज के लिये जरूरी है। यह अलग बात है कि सांसरिक काम समय के आने पर स्वतः सिद्ध होते हैं पर अगर इसका श्रेय किसी भगवान के पास जाता है तो बुराई क्या है?
         हमारी तरफ से सत्यसाईं बाबा को हार्दिक श्रद्धांजलि।
चलते चलते
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             एक लड़की का अपने प्रेमी से झगड़ा हो गया। वह गुस्से में रेल की पटरी की तरफ आत्महत्या करने के लिये चल दी। वह चली जा रही थी उसकी सहेली ने उसे देख लिया। दरअसल उसने कभी सहेली का पेन लिया पर वापस नहीं किया था। सहेली दूर थी। उसे उम्मीद नहीं थी वह लड़की उसकी बात सुनेगी पर उसने आवाज दी। लड़की के कानों में अपने नाम का आखरी अक्षर पहुंचा। उसे लगा कि उसे कोई बुला रहा है। वह रुकना नहीं चाहती थी क्योंकि उसने कहीं पढ़ा था कि आत्महत्या करने के लिए तत्पर आदमी को उस समय सैकिंड के एक हजार हिस्से से कम समय के लिये कोई नवीन विचार आ आये तो वह इरादा बदल देता है। उधर सहेली ने भी सोचा कि क्यों उसे आवाज देकर अपना गला खराब करे। फिर कभी मांग लूंगी।
        मगर उस लड़की ने पीछे मुड़कर देखा तो वह सहेली पीछे आ रही थी। सहेली ने उसे अपनी तरफ मुख करते देखा तो हाथ हिलाकर रोका। पास आकर बोली-‘उस दिन तू ने मेरे से पेन लिया वह वापस कर!’
            लड़की ने कहा‘-वह तो घर पर है, अभी तो मैं आत्महत्या करने जा रही हूं। कल वापस करूंगी।’
         सहेली ने कहा-‘पहले मेरा पेन वापस कर। पता नहीं आत्महत्या करने के बाद वापस करेगी कि नहीं।’
            लड़की गुस्सा हो गयी और बोली-‘चल मेरे घर तो तेरा पेन पहले वापस करती हूं। फिर आत्महत्या करूंगी और तुझे भी देखूंगी।’
             दोनों घर पहुंची। लड़की ने पेन दी तो सहेली ने पूछा-‘तू जा कहां रही थी।’
            लड़की ने कहा-‘आत्महत्या करने!
              सहेली हतप्रभ होकर उसकी तरफ देखने लगी। फिर बोली-‘पागल हो गयी है। आत्महत्या करने जा रही है। अपने प्रेमी को क्या भगवान समझ रखा है? अरे यह नहीं तो वह सही, वह नहीं तो और सही! भई, मैं तो कभी आत्महत्या करने से रही। मेरा ख्याल है तू भी रुक जा! यह जिंदगी रोज नहीं मिलती।’
          लड़की ने अपनी सहेली को गले लगा लिया और कहा-‘अब तू मुझे क्या रोक रही है। अरी, तू ने तो मुझे रोक लिया। यकीन कर रास्ते में मुझे पुकारने के लिये तेरी आवाज मेरे लिये नई जिंदगी बन गयी है।’
         सहेली ने कहा-‘ पर तू इतना दूर थी कि आवाज देने का मन नहीं था!’
         लड़की ने कहा-’मेरे कानों में भी मेरे नाम का अंतिम अक्षर आया था। वही मुझे यहां लौटा लाया। सच कहती हूं कि तू ने पुकार कर मुझे बचा लिया।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior

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भगवान श्रीराम और कृष्ण ने जन्म से नहीं कर्म से भगवत्स्वरूप प्राप्त किया-हिन्दी लेख (bhagwan shir ram and shri krishna-hindi article)


अगर रावण ने भगवान राम की भार्या श्रीसीता का अपहरण न किया होता तो क्या दोनों के बीच युद्ध होता? कुछ लोग इस बात की ना हामी भरें पर जिन्होंने बाल्मीकि रामायण को पढ़ा है वह इस बात को मानते हैं कि राम रावण का युद्ध तो उसी दिन तय हो गया था जब ऋषि विश्वमित्र की यज्ञ की रक्षा के लिये भगवान श्री राम ने मारीचि और सुबाहु से युद्ध किया। सुबाहु इसमें मारा गया और मारीचि तीर खाकर उड़ता हुआ दूर जाकर गिरा था और बाद के मृग का वेश बनाकर उसने रावण की सीता हरण प्रसंग में सहायता की थी।
भारतीय दर्शन के पात्रों पर लिखने वाले एक उपन्यासकार कैकयी को चतुर राजनेता और भद्र महिला बताया है। शायद यह बात सच भी हो क्योंकि मारीचि और सुबाहु से युद्ध के बाद शायद कैकयी ने यह अनुभव किया था कि अब रावण कभी भी अयोध्या पर हमला कर सकता है। दूसरा रावण उस समय एक आतंक था और कैकयी ने अनुभव किया श्रीराम ही उसका वध करें इसलिये उसे उनको बनवास भेजने की योजना बनाई। ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि मंथरा की मति देवताओं ने ही भ्रमित करवाई थी क्योंकि श्रीराम उस समय के महान धनुर्धर थे और रावण को ही मार सकते थे। ऐसे में श्रीराम का वहां रहना ठीक नहीं है यह सोचकर ही कैकयी ने उनको बनवाय दिया-ऐसा उपन्यासकार का मानना है। दूसरा यह भी कि रावण के हमले से अयोध्या की रक्षा करने के प्रयास में पराक्रमी श्री राम का कौशल प्रभावित हो सकता यह संभावना भी थी। फिर जब उनके हाथ से रावण का वध संभव है कि तो क्यों न उनको वही भेज दिया जाये। संभवत कैकयी को यह अनुमान नहीं रहा होगा कि श्रीसीता का वह अपहरण करेगा मगर उस समय की राजनीिितक हालत ऐसे थे कि रणनीतिकार रावण के पतन के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार थे। वैसे भी रावण ने श्रीराम को अपने यहां लाकर उनको मारने की योजना के तहत ही सीता जी का अपहरण किया था।
वन प्रवास के दौरान जब श्रीराम अगस्त्य ऋषि के यहां गये तो वहां इं्रद पहले से ही विराजमान थे और उनको आता देखकर तुरंत चले गयंे। दरअसल वह राम रावण के संभावित युद्ध के बारे में बातीचत करने आये थे। ऋषि अगस्तय ने वहां श्रीराम को अलौकिक हथियार दिये जो बाद में रावण के युद्ध के समय काम आये। कहा जाता है कि वानरों की उत्पति भी भगवान श्री राम की सहायतार्थ देवताओं की कृपा से हुई थी। इस तरह राम के विवाह से लेकर रावण वध तक अदृश्य राजनीतिक श्ािक्तयां भगवान श्रीराम का संचालन करती रहीं। वह सब जानते थे पर अपना धर्म समझकर आगे बढ़ते रहे।
आज जब हम देश के राजनीतिक स्थिति को देखते हैं तो केवल दृश्यव्य चरित्रों को देखते हैं और अदृश्यव्य ताकतों पर नज़र नहीं जाती। ऐसे में हमारे आराध्य भगवान श्री राम और श्रीकृष्ण के जीवन को व्यापक ढंग से देखने वाले इस बात को समझ पाते हैं कि किस तरह रामायण और श्रीगीता के अध्यात्म पक्ष को अनदेखा किया जाता है जो कि हमारे धर्म का सबसे मज़बूत पक्ष है।
हम थोड़ा श्रीकृष्ण जी के चरित्र का भी अवलोकन करें। मथुरा के कारावास में जन्म और वृंदावन में पलने वाले श्रीकृष्ण जी के जीवन का सवौच्च आकर्षक रूप महाभारत में दिखाई देता है जहां उन्होंने कुशल सारथी की तरह अपने मित्र अर्जुन के साथ ही उनके रथ का भी संचालन किया। भगवान श्रीराम की तरह स्वयं उन्होंने युद्ध नहीं किया बल्कि सारथि बनकर पूरे युद्ध को निर्णायक स्थिति में फंसाया। हम महाभारत का अध्ययन करें तो इस बात का पता लगता है कि अनेक तत्कालीन बुद्धिमान लोगों को यह लगने लगा था कि अंततः कौरवों तथा पांडवों में कभी न कभी युद्ध जरूर होगा। भगवान श्रीकृष्ण इस बात को जानते थे इसलिये कभी दोनों के बीच वैमनस्य कम करने का प्रयास न कर पांडवों की सहायता की । दरअसल कुछ लोग मानते हैं कि महाभारत युद्ध की की नींव कौरवों और पांडवों में जन्म के कारण पड़ी है पर यह सच नहीं है। महाभारत की नींव तो द्रोपदी के विवाह के समय ही पड़ गयी थी जब अपने स्वयंवर में द्रोपदी ने सूतपुत्र कर्ण का वरण करने से इंकार किया था फिर विवाह बाद कुंती के वचन की खातिर उसे पांच भाईयों की पत्नी बनना पड़ा। द्रोपदी श्रीकृष्ण की भक्त थी और वे शायद इसे कभी स्वीकार नहीं कर पाये कि एक क्षत्राणी मां है तो उसका वचन धर्म की प्रतीक बन गया और दूसरी पत्नी है तो उसे वस्तु मानकर उस पर वह वचन धर्म की तरह थोपा गया। मां के रूप में कुंती पूज्यनीय है तो क्या द्रोपदी पत्नी के रूप में तिरस्काणीय है? जब भगवान श्रीकृष्ण युद्ध से पहले बातचीत करने दुर्योधन के महल में जा रहे थे तब द्रोपदी ने उनसे यही आग्रह किया कि किसी भी तरह यह युद्ध होना चाहिए।
श्रीकृष्ण उस समय मुस्कराये थे। अधर्म और धर्म के बीच की लकीर का वह अंतर जानते थे और वह धर्म की स्थापना के लिये अवतरित हुए थे। उनके लिये पांडवों और कौरव दोनों ही निर्मित मात्र थे जिनके बीच यह युद्ध अनिवार्य था। वह न कौरवों के शत्रु थे न पांडवों के मित्र! वह केवल धर्म के मित्र थे और भक्तों के आश्रय दाता थे। अपनी भक्त द्रोपदी के अपमान का बदला लेने में उनके धर्म स्थापना का मूल छिपा हुआ था। जिसे उन्होंने श्रीमद्भागवत गीता का संदेश स्थापित कर प्राप्त किया।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण जी का चरित्र जनमानस में हमेशा ही प्रभावी रहा है शायद इसी कारण ही संवेदनाओं के आधार पर काम करने वाले उनके नाम की आड़ अवश्य लेते हैं। ऐसा करते हुए वह केवल आस्था की बातें करते हैं पर ज्ञान पक्ष को भुला देते है-सच तो यह है कि ऐसा वह जानबुझकर करते हैं क्योंकि ज्ञानी आदमी को बहलाया नहीं जा सकता। उसके ज्ञान चक्षु हमेशा खुले रहते हैं और वह सभी में परमात्मा का स्वरूप देखता है पर संवदेनशीलता का दोहन करने वाले सीमित जगहों पर आस्था का स्वरूप स्थापित करते हैं। पहले तो पेशेवर संतों की बात करें जो भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की बाललीलाओं के आसपास ही अपनी बात रखते हें। इससे महिलाओं का कोमल मन बहुत प्रसन्न हो जाता है और वह अपने बाल बच्चों में भी ऐसे ही स्वरूप की कामना करती हैं तो पुरुष भी तन्मय हो जाते हैं। धनुर्धर । श्री राम और सारथी श्रीकृष्ण के जन्म तथा बाललीलाओं में तल्लीन रहने वालों को उनके संघर्ष तथा उपलब्धियों में रुचि अधिक नहीं दिखती।
अब तो भक्तों का ध्यान लीलाओं से अधिक जन्म स्थानों पर केंद्रित किया जा रहा है। अयोध्या में भगवान राम की जन्मभूमि और मथुरा में श्रीकृष्ण का जन्मस्थान विवादों के घेरे में है। बरसों तक नहीं सुना था पर अब बरसों से सुन भी रहे हैं। सच क्या है पता नहीं? कभी कभी तो लगता है देश की धार्मिक आस्थाओं के दोहन के लिये यह सब हो रहा है तो कभी लगता है कि वाकई कोई बात होगी। ऐसे में हम जैसे आम भक्त और लेखक अपनी कोई भूमिका नहीं देख पाते खासतौर से जब जब श्रीमद्भागवत गीता की तरफ ध्यान जाता है। श्रीगीता में जन्म से अधिक निष्काम कर्म को मान्यता दी गयी है। भगवान श्रीराम ने रावण के युद्ध के समय केवल उसे मारने का ही लक्ष्य किया था तब वह इतना एकाग्र थे कि वहां पर अपने प्रिय भ्राता भरत को भी मदद के लिये याद नहीं किया। लक्ष्मण ने भी अपनी तरह आक्रामक रहने वाले शत्रुध्न को को एक आवाज तक नहीं दीं। इससे भी यह लगता है कि दोनों भाई यह समझ गये थे कि अयोध्या पर संकट न आये इसलिये ही रावण वध के प्रसंग में उनको लिप्त होना ही है। उसी तरह भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता संदेश मेें अपने श्रीमुख से किसी का नाम तक नहीं लिया। उस श्री राधा का भी नहीं जिसके साथ उनका नाम प्रेम प्रतीक में रूप में लिया जाता है। उस सुदामा का भी स्मरण नहीं किया जिनके साथ उनकी मित्रता सर्वोपरि मानी जाती है। पिता वासुदेव और देवकी के लिये भी एक शब्द नहीं कहा। स्पष्टतः वह इस संसार के रहस्य को उद्घाटित करते रहे जो बनता बिगड़ता रहता है और जहां जन्म स्थान तथा दैहिक संबंध परिवर्तित होते रहते हैं। अपने जन्मस्थानों या शहर से भी कोई सद्भाव भी दोनों ने नहीं दिखाया। सच तो यह है कि भगवान श्रीराम के लिये पूरा संसार ही अयोध्या तो श्रीकृष्ण के लिये यह द्वारका रहा। इस चर्चा को मतलब किसी विवाद पर निष्कर्ष देना नहीं है बल्कि यह एक सत्संग चर्चा है। लोग विवादों को उठायें उनको कोई रोक नहीं सकता। वह लोग अज्ञानी हैं या आस्था से उनका कोई लेना देना नहीं है यह कहना भी अहंकार की श्रेणी में आता है। अलबत्ता एक अध्यात्मिक लेखक के रूप में अपने जैसे लोगों के लिये कुछ लिखने का मन हुआ तो लिख दिया। आखिर यह कैसे संभव है कि जब सारे देश में चर्चा चल रही है उस पर लिखा न जाये। एक बात याद रखने वाली है कि भगवान श्रीराम और कृष्ण अपने जन्म की वजह से नहीं कर्म की वज़ह से भगवत्स्वरूप प्राप्त कर सके यह नहीं भूलना चाहिए।
जय श्रीराम जय श्रीकृष्ण

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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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मनु स्मृति दर्शन-संगीत का आनंद लेकर सोयें (manu smriti-sangeet ka anand)


आजकल रेडियो या टेप में संगीत सुनने की बजाय टीवी और वीडियो पर उसका आनंद उठाने का प्रयास किया जा रहा है। सच तो यह है कि टीवी में हम आंख तथा कान दोनों को सक्रिय रखते हैं इसलिये मजा उठाने से अधिक कष्ट मिलता है। संगीत सुनने का आनंद तो केवल कानों से ही है। वैसे शायद यही वजह है कि टीवी पर हर शो में फिल्मी गानों को पृष्ठभूमि में जोड़कर दृश्य को जानदार बनाने का प्रयास किया जा रहा है। किसी धारावाहिक में अगर पात्र गुस्से में बोल रहा है तो भयानक संगीत का शोर जोड़कर उसे दमदार बनाने का प्रयास शायद इसलिये ही किया जाता है कि आजकल का अभिनय करने वाले पात्रों को न तो कला से मतलब है न उनमें योग्यता है। बहरहाल संगीत मानव मन की कमजोरी है और जहां तक मनोरंजन मिले वहां तक सुनना चाहिये। अति तो सभी जगह वर्जित है।
तत्र भुक्तपर पुनः किंचित्तूर्यघोषैः प्रहर्षितः।
संविशेत्तु यथाकालमुत्तिष्ठेच्च गतक्लमः।
हिन्दी में भावार्थ-
भोजन करने के बाद गीत संगीत का आनंद उठाना चाहिये। उसके बाद ही शयन के लिये प्रस्थान करना उचित है।
एतद् विधानमातिष्ठेदरोगः पृथिवीपतिः।
अस्वस्थः सर्वमेत्त्ु भृत्येषु विनियोजयेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
स्वस्थ होने पर अपने सारे काम स्वयं ही करना चाहिये। अगर शरीर में व्याधि हो तो फिर अपना काम विश्वस्त सेवकों को सौंपकर विश्राम भी किया जा सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-एक तरफ मनुस्मृति में प्रमाद से बचने का सुझाव आता है तो दूसरी जगह भोजन के बाद गीत संगीत सुनने की राय मिलती है। इसमें कहीं विरोधाभास नहीं समझा जा सकता। दरअसल मनुष्य की दिनचर्या को चार भागों में बांटा गया है। प्रातः धर्म, दोपहर अर्थ, सायं काम या मनोरंजन तथा रात्रि मोक्ष या निद्रा के लिये। जिस तरह आजकल चारों पहर मनोरंजन की प्रवृत्ति का निर्माण हो गया है उसे देखते हुए मनृस्मृति के संदेशों का महत्व अब समझ में आने लगा है।
आजकल रेडियो, टीवी तथा अन्य मनोंरजन के साधनों पर चौबीस घंटे का सुख उपलब्ध है। लोग पूरा दिन मनोरंजन करते हैं पर फिर भी मन नहीं भरता। इसका कारण यह है कि मनोंरजन से मन को लाभ मिले कैसे जब उसे कोई विश्राम ही नहीं मिलता। जब कोई मनुष्य प्रातः धर्म का निर्वहन तथा दोपहर अर्थ का अर्जन ( यहां आशय अपने रोजगार से संबंधित कार्य संपन्न करने से हैं) करता है वही सायं भोजन और मनोरंजन का पूर्ण लाभ उठा पाता है। उसे ही रात्रि को नींद अच्छी आती है और वह मोक्ष प्राप्त करता है।
शाम को भोजन करने के बाद गीत संगीत सुनना चाहिये। अलबत्ता टीवी देखने से कोई लाभ नहीं है क्योंकि उसमें आंखें ही थकती हैं और दिमाग को कोई राहत नहीं मिलती। इसलिये टेप रिकार्ड या रेडियो पर गाने सुनने का अलग मजा है। वैसे भी देखा जाये तो आजकल अधिकर टीवी चैनल फिल्मों पर गीत संगीत बजाकर ही गाने प्रस्तुत किये जाते हैं-चाहे उनके हास्य शो हों या कथित वास्तविक संगीत प्रतियोगितायें फिल्मी धुनों से सराबोर होती हैं। देश के व्यवसायिक मनोरंजनक प्रबंधक जानते हैं कि गीत संगीत मनुष्य के लिये मनोरंजन का एक बहुत बड़ा स्त्रोत हैं इसलिये वह उसकी आड़ में अपने पंसदीदा व्यक्तित्वों को थोपते हैं। प्रसंगवश अभी क्रिकेट में भी चौका या छक्का लगने पर नृत्यांगना के नृत्य संगीत के साथ प्रस्तुत किये जाते हैं। स्पष्टतः यह मानव मन की कमजोरी का लाभ उठाने का प्रयास है।
टीवी पर इस तरह के कार्यक्रम देखने से अच्छा है सीधे ही गाने सुने जायें। अलबत्ता यह भोजन करने के बाद कुछ देर तक ठीक रहता है। अर्थशास्त्र के उपयोगिता के नियम के अनुसार हर वस्तु की प्रथम इकाई से जो लाभ होता है वह दूसरी से नहीं होता। एक समय ऐसा आता है कि लाभ की मात्रा शून्य हो जाती है। अतः जबरदस्ती बहुत समय तक मनोरंजन करने का कोई लाभ नहीं है। सीमित मात्रा में गीत संगीत सुनना कोई बुरी बात नहीं है-मनोरंजन को विलासिता न बनने दें।
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सहज तथा असहज योग-हिन्दी लेख(sahaj yog aur asahaj yog-hindi lekh)


धार्मिक विषयों पर अच्छी या बुरी चर्चायें अब इस लेखक पर प्रभाव नहीं डालती। इसका कारण यह है कि हमें लगता है कि श्रीगीता से पृथक होकर कोई भी ज्ञान चर्चा पूर्णता की तरफ जा ही नहीं सकती। दूसरा यह कि लोग श्रीमद्भागवतगीता को पढ़े बिना ही समझते हैं-मतलब यह है कि किसी के मुखार बिंद से सुन लिया और वही सत्य मान लिया। जबकि वास्तविकता यह है जैसे जैसे यह लेखक श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन कर रहा है उससे लगता है कि केवल भाषा के शब्द तथा व्याकरण का ही ज्ञान होना पर्याप्त नहीं बल्कि अपने अंदर यह संकल्प होना भी आवश्यक है कि यह पुस्तक एकमेव ज्ञान विज्ञान की पुस्तक है जिससे भक्ति और जिज्ञासा से पढ़कर ही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
अनेक लोगों ने श्रीगीता का अध्ययन इस उददृेश्य से किया है कि उसे पढ़कर अपना ज्ञान दूसरे लोगों को बेच सकें और समाज भी उन्हें एक संत मान लेता है जबकि सच यह है कि वह स्वयं ही नहीं जानते कि उस स्वर्णिक ज्ञान का मोल क्या है?
कहते हैं कि कोई भी आदमी अपने परिवार के किसी भी सदस्य को श्रीगीता पढ़ने का उपदेश नहीं   देता कि कहीं वह वैरागी न हो जाये। सच यही है कि आदमी उससे वैरागी होता है पर कर्म से पलायन नहीं करता। अलबत्ता जैसे जैसे ज्ञान चक्षु खुलते जाते हैं वह अकेला होता चला जाता है। इसलिये कहीं बड़ी सभा या बैठक में वह दूसरों की आदर्शवादी बातों से प्रभावित नहीं होता क्योंकि बहुत जल्दी उसे वहां पाखंड की अनुभूति हो जाती है।
इस समय देश में धर्म, जाति, वर्ण तथा अर्थ के आधार पर अनेक समूहों के बीच संघर्ष चल रहे हैं। उस पर बहसें केवल हास्यास्पद और समय बिताने का मार्ग ही लगती हैं यही कारण है कि संगठित प्रचार माध्यम उसे भुना रहे हैं। कभी कभी तो लगता है कि समाज के मानसिक तथा वैचारिक अंतद्वंद्व प्रचार माध्यमो में बिकने वाले विषय बन गये हैं।
एक मजे की बात यह है कि हिन्दू धर्म की रक्षा के नाम पर जितना नाटक इस देश में चलता रहा है उसके लिये लोगों का अज्ञान ही जिम्मेदार है। श्रीमद्भागवत गीता को लेकर एक बात आश्चर्य में डालती है कि वह कौन महान विभूतियां रही होंगी जिन्होंने महाभारत ग्रंथ से श्रीगीता को अलग कर प्रस्तुत करने का प्रयास किया। उनके इस प्रयास ने न केवल भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को एक महान स्त्रोत प्रदान किया वरन् उसे विश्व में एकमेव ज्ञान विज्ञान का ग्रंथ बना दिया। अगर यह महाभारत से पृथक नहीं किया जाता तो शायद इसकी मान्यता इतनी नहीं रह जाती।

भारतीय धर्म के आलोचकों की बात सुनकर अनेक बुद्धिजीवी उत्तेजित होकर अपनी आस्था पर प्रहार के विरुद्ध झंडा तो उठा लेते हैं पर श्रीगीता के ज्ञान के अभाव में कोई तर्क उनको नहीं सूझता। शायद वह नहीं जानते कि इस संसार में मनुष्य मन के-आदमी चलता है अपने मन की गति और चाल से ही है, यह सभी जानते हैं- चलने के दो ही मार्ग है। एक तो श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित सहज योज दूसरा है उससे पृथक असहज योग। आशय यह है कि योग तो हर इंसान करता ही है पर ज्ञान सहज योग तो अज्ञानी असहज योग में तत्पर होते हैं। जहां असंतोष, हिंसा, लालच, ईर्ष्या, लोभ तथा भेदभाव की प्रवृत्ति है वहां असहजता का भाव तनाव का अंधेरा फैलाता है और जहां संतोष, प्रेंम तथा समदर्शिता का भाव है वहां आनंद की रौशनी फैलती है। तय बात है कि इस संसार में अंधेरा पसंद लोगों की संख्या ज्यादा है जो उधार की रौशनी चाहते हैं जबकि ज्ञानी कम ही है जो अपने ज्ञान के प्रकाश में ही आनंद की अनुभूति करते हैं। दूसरी बात यह कि गुण ही गुणों को बरतते हैं यह वैज्ञानिक सूत्र है जिसके प्रतिकुल संसार की गतिविधियां तो हो ही नहीं सकती। रसायनों के अधिक प्रयोग से खान पान तथा रहन सहन में विषैले तत्वों का समावेश हो रहा है ऐसे में यह संभव नहीं है कि अमृत ज्ञान की चाहत सभी में हो। कहीं कहीं तो ऐसा भी होता है कि ज्ञान की बात करें तो पागल समझ लिये जाते हैं। शायद यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता का ज्ञान केवल अपने भक्तों में ही करने का उपदेश दिया है। इसलिये भारतीय धर्म के आलोचकों को निरुतर करने के लिये श्रीगीता के संदेश का उपयोग  करना भी कुछ विद्वानों को अच्छा नहीं लगता। बहरहाल यह अंतिम सत्य है कि विज्ञान तथा ज्ञान की एकमेव पुस्तक श्रीगीता का अध्ययन अपने आप में बहुत दिलचस्प तथा ज्ञान वर्द्धक है।
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हिन्दू धर्म संदेश-पैसा कमाने से कभी फुर्सत नहीं मिल सकती


किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला।
या तु वेश्येव सा मान्या पथिकैरपि भुज्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
उस संपत्ति से क्या लाभ जो केवल घर की अपने ही उपयोग में आती हो। जिसका पथिक तथा अन्य लोग उपयोग करें वही संपत्ति श्रेष्ठ है।
धनेषु जीवतिव्येषु स्त्रीषु चाहारकर्मसु।
अतृप्तः प्राणिनः सर्वे याता यास्यन्ति यान्ति च।।
हिन्दी में भावार्थ-
धन और भोजन के सेवन तथा स्त्री के विषयों में लिप्त रहकर भी अनेक मनुष्य अतृप्त रह गए, रह जाते हैं और रह जायेंगे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य के लोभ की सीमा अनंत है। वह जितना ही धन संपदा के पीछे जाता है उतना ही वह एक तरह से दूर हो जाती हैं। किसी को सौ रुपया मिला तो वह हजार चाहता है, हजार मिला तो लाख चाहता है और लाख मिलने पर करोड़ की कामना करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि दौलत की यह दौड़ कभी समाप्त नहीं होती। आदमी का मन मरते दम तक अतृप्त रहता है। जितनी ही वह संपत्ति प्राप्त करता है उससे ज्यादा पाने की भावना उसके मन में जाग्रत होने लगती है।
आखिर अधिकतर लोग संपत्ति का कितना उपयोग कर पाते हैं। सच तो यह है कि अनेक लोग जीवन में जितना कमाते हैं उतना उपभोग नहीं कर पाते। उनके बाद उसका उपयोग उनके परिजन करते हैं। बहुत कम लोग हैं जो सार्वजनिक हित के लिये दान आदि कर समाज हित का काम करते हैं। ऐसे ही लोग सम्मान पाते हैं। जिन लोगों की अकूल संपत्ति केवल अपने उपयोग के लिये है तो उसका महत्व ही क्या है? संपत्ति तो वह अच्छी है जिसे समाज के अन्य लोग भी उपयोग कर सके। जब समाज किसी की संपत्ति का उपयोग करता है तो उसको याद भी करता है।  इसके बावजूद इंसान संचय करने में लगा रहता है और भक्ति तथा ज्ञान से परे हो जाता है।

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‘सहज योग’ से दूर भागता है आधुनिक बाजार-हिन्दी लेख (modern bazar and sahajyog-hindi satire)


उन वरिष्ठ ब्लोगर महोदय ने अपनी टिप्पणी में उस ब्लाग का लिंक रखकर अपने सतर्क निगाहों का परिचय देकर अच्छा किया पर यह लेखक उस पाठ को पहले ही पढ़ चुका था और फिर आगे दो बार यह देखने के लिये भी जाना ही था कि उस पर टिप्पणियां कैसी हैं? हां, यहां अंतर्जाल पर कई बार पाठों पर विद्वतापूर्ण टिप्पणियां भी पढ़ने को मिल जाती हैं जिनका आगे उस विषय पर मार्गदर्शन प्राप्त होता है। वैसे यह पाठ लेखक नहीं पढ़ता तो भी यह सब लिखने वाला था जो लिख रहा है। वह यह कि आधुनिक बाजार मनुष्य में असहजता का भाव पैदा अधिक से अधिक कमाना चाहता है और उसके लिये उसने बकायदा ऐसा प्रचारतंत्र बना रखा है जो चिल्ला चिल्लाकर उसे वस्तुऐं खरीदने के लिये प्रेरित करता है, फिल्म देखने के लिये घर से निकालता है और क्रिकेट मैच में अपने महानायको के प्रत्यक्ष दर्शन करने के लिये दौड़ लगवाता है। इस बाजार का असली शत्रु है भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का वह ‘सहज योग’ का भाव-चारों वेदों के सारतत्व के साथ इसका श्रीमद्भागवत में बहुत सरलता से उल्लेख किया गया है-यह बात समझने की है और उसके लिये हर इंसान को अपने विवेक का उपयोग करना पड़ता है। केवल बुद्धि से काम नहंी चल पाता जो केवल शब्दों के अर्थ तक ही सीमित रहती है-उसका भाव समझने के लिये मनुष्य को अपने अंदर संकल्प और धैर्य धारण करना पड़ता है तभी उसके विवेक चक्षु खुलते हैं।
दरअसल भारतीय योग और अध्यात्म पर अनुकूल और प्रतिकूल लिखने वाले बहुत हैं पर उसे पढ़ता कौन कितना है यह समझ में नहीं आता। समर्थकों ने भी कुछ अच्छे विचार दिमाग में रख लिये हैं और वही उसे नारे बनाकर प्रस्तुत करते हैं। आलोचकों की स्थिति तो बदतर और दयनीय है जिनके पास पूरे भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से दो तीन श्लोक या दोहे हैं-जिनको समाज अब स्वयं ही अप्रसांगिक मानता है-जिनको नारे की तरह रटकर सुनाते हैं। समर्थक तो फिर भी प्रशंसा के पात्र हैं कि वह पढ़ते तो रहते हैं पर आलोचक पढ़ी पढ़ाई बातों की विवेचनाओं को ही अपना आधार बनाकर चलते हैं। जिन किताबों की चर्चा करते हैं उनको पढ़ना तो दूर वह देखना तक पसंद नहीं करते, पर विचार व्यक्त करने में नहीं चूकते।
उन वरिष्ठ ब्लोगर महोदय द्वारा सुझाये गये ब्लाग का पाठ यकीनन एक विद्वान द्वारा ही लिखा गया था। उनका अपना दृष्टिकोण हो सकता है मगर उसमें असहमति की भारी गुंजायश छोड़ी गयी। योग को रोग बताते हुए लिखे गये उस पाठ में महर्षि विवेकानंद पर भी प्रतिकूल लिखा गया। उस पाठ में योग के बारे में लिखी गयी बातों ने इस बात के लिये बाध्य किया कि पतंजलि येाग दर्शन की किताबों को पलट कर देखा जाये। कहीं भी रसायनों के मिश्रण से औषधि बनाने की बात सामने नहीं आयी। कैवल्यपाद-4 में एक श्लोक मिला
जन्मोषधिमन्त्रतपः समाधिजाः सिद्धयः।।9।।
इसका हिन्दी में भावार्थ है कि ‘जन्म, ओषधि मंत्र, तप, और समाधि, इस तरह पांच तरह की सिद्धियां होती हैं।
जब पतंजलि साहित्य खोलें तो कुछ न कुछ ऐसा मिल ही जाता है जो दिलचस्प होता ही है। दरअसल हमने आज एक पाठ अन्य भी पढ़ा था जिसमें कथित वैलंटाईन ऋषि और हमारे महर्षि मनु के बीच तुलनात्मक अध्ययन भारतीय जाति व्यवस्था पर आक्षेप किये गये। तय बात है कि मनु को जन्म पर आधारित व्यवस्था का निर्माता माना जाता है पर पतंजलि योग दर्शन में यह दिलचस्प श्लोक मिला जो कि इस बात का प्रमाण है कि हमारी जाति व्यवस्था का आधार कर्म और व्यवहार रहा है।
जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात्।
इसका हिन्दी भावार्थ यह है कि ‘एक जाति से दूसरी जाति में जाने का रूप प्रकृति पूर्ण होने से होता है। महर्षि विश्वामित्र ने तप से ही ब्रह्म्णत्व प्राप्त किया था। दरअसल ब्राह्म्णत्व का अर्थ है समाज का आपने ज्ञान से श्रेष्ठता प्रमाणित कर समाज मार्ग दर्शन करना और यह कार्य तो कोई भी कर सकता है।
इसका आशय यह है कि अगर कोई मनुष्य योग साधना, मंत्र और तप से चाहे तो अपनी प्रकृतियां पूर्ण कर उच्च और प्रतिष्ठित पद पर स्थापित हो सकता है और जन्म के आधार पर ही सभी कुछ होना जरूरी नहीं है। यह अलग बात है कि लोग जन्म और ओषधियों के सहारे भी श्रेष्ठता हासिल कुछ लोग प्राप्त कर लेते हैं। जन्म का सभी जानते है पर ओषधियों की बात आयी तो आपने देखा होगा कि अनेक खेल प्रतियोगिताओं में उनके सेवन से अनेक लोग स्वर्ण पदक प्राप्त करते हैं-यह अलग बात है कि इनमें कुछ प्रतिबंधित होती हैं कुछ नहीं।
याद रखिये हमारे देश में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिनका जन्म कथित उच्च जातियों में नहंी हुआ पर अपने कर्म के आधार पर उन्होंने ऐसी प्रतिष्ठा प्राप्त की पूरा समाज आज उनको याद करता है। असली बात यह है कि योग साधना एक प्राकृतिक क्रिया है। योगासनों की तुलना सुबह सैर करने या जिम जाने से करना अपने अज्ञान का प्रमाण है। जहां तक लाभ होने वाली बात है तो इस लेखक के इस पाठ का हर शब्द उसी योगसाधना के शिखर से प्रवाहित है। अगर इनका प्रभाव कम है तो उसके पीछे इस लेखक के संकल्प की कमी हो सकती है पर अगर वह अधिक प्रभावी है तो उसका पूरा श्रेय योगसाधना को जाना चाहिये। यह अलग बात है कि अगर आर्थिक रूप से ही लाभ को तोला जाना है तो यकीनन उसके लिये इस लेखक का अकुशल प्रबंधन जिम्मेदार है जो ब्लाग लिखने से एक पैसा नहीं मिलता पर जिस तरह भारतीय अध्यात्म का संदेश फैल रहा है वह योग साधना का ही परिणाम है। यह पाठ आत्म प्रचार के लिये नहीं लिखा बल्कि यह बताने के लिये लिखा है कि जब सात वर्ष पूर्व इस लेखक ने योग साधना प्रारंभ की थी तब उसके जीवन का यह दूसरा दौर था यानि कम से इस लेखक को तो योग साधना का लाभ मिला है-किसी को नहीं मिला इस बात का तो खंडन हो ही गया।
अब करें बाजार और उसके प्रचारतंत्र की बात! यह वही बात है कि अगर वरिष्ठ ब्लोगर महोदय ने वह लिंक नहीं देते तो भी यह लिखा ही जाना था। विदेशियों को क्या देश के ही बड़े बड़े धनाढ्यों को यह नहीं सुहाता।
पहले यह लेखक भी संगठित प्रचार माध्यमों और अंतर्जाल लेखकों के प्रभाव में आकर बाबाओं की अर्जित संपत्तियों पर अपनी नाखुशी लिखता था पर अब जैसे जैसे नवधनाढ्य लोगों की पोल सामने आ रही है-इसका श्रेय भी आधुनिक प्रचारतंत्र को ही है जो बाजार का रक्षक है पर समय पास करने के लिये उसे ऐसी पोल लानी पड़ती है-वैसे लगता है कि बाबा भला क्या बुरा कर रहे हैं? उनका कमाया पैसा रहता तो समाज के बीच में ही है। वह कोई ठगी या भ्रष्टाचार तो नहीं करते! युवक युवतियों को आधुनिकता के नाम अनैतिक संबंधों के लिये प्रेरित तो नहीं करते। केवल शादी के नाम पर अंतर्जातीय विवाहों पर खुश होने वाले विद्वान इस बात पर चिंतन नहीं करते कि उसके बाद घर भी चलाना पड़ता है जिसकी समझ युवक युवतियों को होना चाहिये। साथ ही यह भी परिवार चलाने के लिये समाज की जरूरत होती है इसे भुलाना सच्चाई से मुंह फेरना है। भारतीय संत इस बात को समझते हैं इसलिये ही निरंतर आध्यात्मिक ज्योति जगाते रहते हैं।
पिछले अनेक अवसरों पर आसाराम बापू, बाबा रामदेव तथा सुधांशु महाराज पर अनेक आक्षेप किये जाते रहे। यह लेखक इन तीनों में किसी का शिष्य नहीं है पर उसे हैरानी हुई जब आसाराम बापू पर तो तंत्र मंत्र का आरोप लगा दिया-इतनी समझ उन लोगों में नहीं है कि आसाराम बापू उस समाज में पैदा हुए जो अध्यात्म के प्रति समर्पित है पर तंत्रमंत्र की बात से कोसों दूर रहता है। यह सही है कि अनेक लोग धर्म के नाम पर ढोंग कर रहे हैं पर इतनी ऊंचाई बिना तप, अध्ययन और ज्ञान के नहीं मिलती।
योग साधना का अभ्यास जितना करेंगे उतनी ही सिद्धियां आयेंगी और उससे आप स्वयं क्या आपके आसपास के लोगों पर भी उसका अच्छा प्रभाव पड़ेगा-मुख्य बात यह है कि आपकी नीयत कैसी है, यह आपको देखना होगा।
दरअसल बाजार और उसका प्रचारतंत्र परेशान है। वह वैलेंटाईन को बेचना चाहता है क्योंकि नवाधनाढ्यों के पास नयी चीजें खरीदने का शौक उसी से ही बढ़ता है और आधुनिक बाजार उसका निर्माता है। महाशिवरात्रि पर कोई ऐसी चीज नहीं बिकती जिसका विज्ञापन मिलता हो। यही हालत क्रिसमस और नववर्ष पर भी होती है क्योंकि गुड़ी पड़वा और मकर सक्रांति तो परंपरागत बाजार का व्यापार है जिसे विज्ञापन करने की आवश्यकता नहीं होती।
दरअसल बाबा रामदेव, आसाराम बापू या सुधांशु महाराज के कार्यक्रमों में एक बहुत बड़ा जनसमुदाय होता है और आधुनिक बाजार के स्वामी और प्रचार प्रबंधक यह देखकर परेशान हो जाते हैं कि उनके बिना यह सब कैसे हो रहा है? दूसरा वहां से अपने लिये ग्राहक ढूंढना चाहते हैं। उनका गुस्सा तब अधिक बढ़ जाता है जब वहां युवक युवतियों का भी समूह देखते हैं क्योंकि उनको लगता है कि यह तो उनको दोहन स्त्रोत हैं, भला वहां क्यों जा रहे हैं।
अनेक संकीर्ण मानसिकता के बुद्धिजीवी उनके प्रवचन कार्यक्रमों में दलित, पिछडे, और अगड़े का भेदभाव छोड़कर जाते हुए लोगों को सहन नहीं कर पाते। उनको लगता है कि इससे तो उनका प्रभाव खत्म हो रहा है। उससे ज्यादा गुस्सा उनको तब आता है जब गैर हिन्दू भी उनसे जुड़ते हैं। उनकी चिंतायें स्वाभाविक हैं और उनको रोकने का हमारा लक्ष्य भी नहीं है। ऋषि प्रसाद, अखंड ज्योति और कल्याण पत्रिकाओं को बिकना अगर बंद हो जाये तो हिन्दी का आधुनिक प्रकाशन अधिक अमीर हो जायेगा। जब देश की हालतें देखते हैं तो अन्य बुद्धिजीवियों की तरह हम भी चिंतित होते हैं पर जब इन संतों और उनके भक्तों की उपस्थिति देखते हैं तो दिल को संतोष भी होता है पर दूसरे असंतुष्ट होकर उनको भी निशाना बनाते हैं। शेष फिर कभी।

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बुरे आदमी से संगत सांप पालने से अधिक दुःखदायी-हिन्दी संदेश


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नीति विशारद चाणक्य महाराज का कहना है कि
क्षान्तिश्चत्कवचेन किं किमनिरभिः क्रोधीऽस्ति चेद्दिहिनां ज्ञातिश्चयेदनलेन किं यदि सहृदद्दिव्यौषधं किं फलम्।
किं सर्पैयीदे दुर्जनाः किमु धनैर्विद्याऽनवद्या चदि व्रीडा चेत्किमुभूषणै सुकविता यद्यपि राज्येन किम्।।
हिंदी में भावार्थ-
यदि क्षमा हो तो किसी कवच की आवश्यकता नहीं है। यदि मन में क्रोध है तो फिर किसी शत्रु की क्या आवश्यकता? यदि मंत्र है तो औषधियो की आवश्यकता नहीं है। यदि अपने दुष्ट की संगत कर ली तो सांप की क्या कर लेगा? विद्या है तो धन की मदद की आवश्यकता नहीं। यदि लज्जा है तो अन्य आभूषण की आवश्यकता नहीं है।
वर्तमान में संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- ध्यान दें तो भर्तृहरि महाराज ने पूरा जीवन सहजता से व्यतीत करने वाला दर्शन प्रस्तुत किया है। अगर आदमी विनम्र हो और दूसरे के अपराधों को क्षमा करे तो उसे कहीं से खतरा नहीं रहता। जैसा कि हम देख रहे हैं कि आजकल अस्त्र शस्त्र रखने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। इसका कारण यह है कि लोगों का विश्वास अपने ऊपर से उठ गया है। अपने छोटे छोटे विवादों के बड़े हमले में परिवर्तित होने का भय उनको रहता है इसलिये ही लोग हथियार रखते हैं। उनको यह भी विश्वास है कि वह किसी को क्षमा नहीं करते इसलिये उनके क्रोध या हिंसा का शिकार कभी भी उन पर हमला कर सकता है। जिन लोगों में क्षमा का भाव है वह किसी प्रकार की आशंका से रहित होकर जीवन व्यतीत करते हैं। क्षमा का भाव होता है तो क्रोध का भाव स्वतः ही दूर रहता है। ऐसे में अन्य कोई शत्रु नहीं होता जिससे आशंकित होकर हम अपनी सुरक्षा करें।

उसी तरह अपनी संगत का भी ध्यान रखना चाहिये। जिनकी सामाजिक छबि खराब है उनसे दूर रहें इसी में अपना हित समझें। वैसे आजकल तो हो यह रहा है कि लोग दादा और गुंडा टाईप के लोगों से मित्रता करने में अपनी इज्जत समझते हैं मगर सच तो यह है कि ऐसे लोग उसी व्यक्ति को तकलीफ देते हैं जो उनको जानता है। इसके अलावा अपने दोस्तों से रुतवे के बदल अच्छी खासी कीमत भी वसूल करते हैं भले ही उनका कोई काम नहीं करते हों पर भविष्य में सहयोग का विश्वास दिलाते हैं। देखा यह गया है कि दुष्ट लोगों की संगत हमेशा ही दुःखदायी होती है।
अपनी देह को स्वस्थ रखने के लिये प्रतिदिन योग साधना के साथ अगर मंत्र जाप करें तो फिर आप औषधियों के नाम जानने का भी प्रयास न करें। राह चलते हुए फाईव स्टार टाईप के अस्पताल देखकर भी आपको यह ख्याल नहीं आयेगा कि कभी आपको वहां आना है।
जहां तक हो सके अच्छी बातों का अध्ययन और श्रवण करें ताकि समय पड़ने पर आप अपनी रक्षा कर सकें। याद रखिये जीवन में रक्षा के लिये ज्ञान सेनापति का काम करता है। अगर आपके पास धन अल्प मात्रा में है और ज्ञान अधिक मात्रा में तो निश्चिंत रहिये। ज्ञान की शक्ति के सहारे दूसरों की चालाकी, धूर्तता तथा लालच देकर फंसाने की योजनाओं से बचा जा सकता है। अगर ज्ञान न हो तो दूसरे लोग हम पर शासन करने लगते हैं।
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