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इस ब्लाग/पत्रिका को 8वीं वरीयता मिलना सामुदायिक प्रयासों का परिणाम-संपादकीय (editorial on ranking 8)


इस ब्लाग के साईड बार में जो एलेक्सा का प्रमाणपत्र लगा है उसे कहीं से कोई चुनौती नहीं मिली। यह दुनियां की आठवीं वरीयता प्राप्त ब्लाग/पत्रिका है-इस पर अब बहस की गुंजायश नहीं है। इसलिये अब इस पर अब भविष्य में अधिक गंभीरता से लिखने का प्रयास किया जायेगा। अभी तक यह लेखक केवल यही सोचकर चलता आ रहा था कि हिंदी में लिख रहे हैं इसलिये किसी अच्छे मुकाम पर पहुंचने की संभावना नहीं है पर जैसे ही यह ब्लाग/पत्रिका आठवीं वरीयता प्राप्त कर गया इसने नई संभावनाओं के संकेत दिये। हम उस पर इस ब्लाग पर चर्चा अब नहीं करेंगे।
सबसे पहले तो हम आभारी हैं निर्मला कपिला जी, विवेक सिंह जी, काजल कुमार जी, और संगीता पुरी जी के जिन्होंने दूसरे ब्लाग पर टिप्पणी देकर इस संपादकीय की रूपरेखा को बदल दिया। दरअसल इस लेखक के मन में इनकी टिप्पणियां देखकर यह विचार आया कि हिंदी ब्लाग जगत एकल प्रयासों से सफल नहीं हो सकता। यहां सफलता की पहली शर्त यह है कि आप बेहतर और स्वाभाविक रूप से लिखने का प्रयास करें और दूसरी यह है कि आप दूसरो का लिखा पढ़े और स्वयं भी उन पर टिप्पणियां करें। इसका लाभ आपके ब्लाग को भी मिलता है।
अनंत शब्दयोग ब्लाग/पत्रिका का विश्व स्तर पर आठवीं वरीयता में पहुंचना कोई एकल प्रयास नहीं है न अकेले इस ब्लाग पर लिखे पाठों का परिणाम है। इसके सहयोगी ब्लाग चिंतन, शब्दलेख सारथी, अंतर्जाल पत्रिका तथा अन्य ब्लाग/पत्रिकाओं के समर्थन का भी परिणाम है। आपके ब्लाग से दूसरी जगह से पाठक आते और जाते हैं यह ब्लाग के अंक बढ़ाता है। सच बात तो यह है कि अनंत शब्दयोग एक सामुदायिक ब्लाग होने के कारण आठवीं वरीयता में पहंुचा है क्योंकि इसके ईमेल से अन्य ब्लाग भी जुड़े हैं। इसमें हिंदी दिखाने वाले चारों फोरमों नारद, चिट्ठाजगत,ब्लागवाणी तथा हिंदी ब्लाग्स का भी योगदान है। सर्च इंजिनों में कई जगह यह फोरम केवल ब्लाग की वजह से ही पहुंचकर वह उसे वहां पाठक भी दिलवाते हैं। वैसे अब इस ब्लाग पर नियमित रूप से लिखा जायेगा क्योंकि इसके साथ ही इस ब्लाग लेखक की आगे की संभावनायें भी जुड़ी हुई हैं। इसके साथ ही इस ब्लाग पर अब अन्य ब्लाग मित्रों के भी लिंक भी बढ़ाये जायेंगे। इस अवसर पर सभी मित्रों और पाठकों का आभार व्यक्त करते हुए शुभकामनायें।
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यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
1.दीपक भारतदीप का चिंतन
2.दीपक भारतदीप की हिंदी-पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका

विश्व में आठवीं वरीयता प्राप्त यह हिंदी ब्लाग/पत्रिका!


यह एलेक्सा की चूक भी हो सकती है और सच भी कि इस ब्लाग को विश्व में आठवीं वरीयता प्राप्त है। पिछले सप्ताह यह सातवें नंबर पर था। इस समय यह विकिपीडिया के पीछे है। इसके लेखक ने ऐलेक्सा की टाॅप साईटस देखी तो वहां blogger.com रहा हैं और जब वहां क्लिक करते हैं तो ब्लाग खाता खोलने वाला ब्लाग सामने आ जाता है। एक बार इस लेखक ने टाप साईटस के लिये प्रयास किया तो एक जगह यह पता लगा कि भुगतान करने पर ही दसों साईटस का पता दिया जायेगा। इसका आशय यह है कि इन साईट में भी अन्य साईट छिपी हुई हैं। वहां क्लिक करने के बाद एक ईमेल भी आया कि शायद आप प्रक्रिया पूरी नहीं कर सके इसलिये दोबारा कर सकते हैं इसका आशय यह है कि यह ‘अनंत शब्दयोग’ चूंकि ब्लागर काम के अंतर्गत हैं इसलिये उसे सीधे नहीं दिखा रहे हैं-क्योंकि इससे उनको कोई लाभ नहीं होगा।

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बहरहाल उन्होंने हमें अनंत शब्दयोग का लिंक उठाने से नहीं रोका। हम तो यही मानकर चल रहे हैं कि यह सही होगा अगर गलत भी हुआ तो परवाह किसे है पर यह तो इतिहास में दर्ज हो गया कि एक हिंदी ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’ को 12 जुलाई 2009 रविवार के दिन विश्व में आठवीं वरीयता प्राप्त थी। अभी तक अनेक लेखक किसी हिंदी ब्लाग के एक लाख से नीचे आने पर ही खुश हो जाते हैं ऐसे में सभी हिंदी ब्लाग लेखकों को यह सोचकर खुशी होना चाहिये कि उनके बीच में ही सक्रिय ब्लाग विश्व की आठवीं वरीयता पा रहा है। जो बात इतिहास में दर्ज हो गयी तो हो गयी। क्रिकेट के खेल में अंपायर की भूमिका सभी जानते हैं कि एक बार स्टंप के बाहर जाती हुई गेंद पर उसने बल्लेबाज को एल.बी.डब्लयू. दे दिया तो दे ही दिया। यह ब्लाग विकिपीडिया के बाद आठवें नंबर पर रहा तो इसे अब कोई बदल नहीं सकता। अब यह ब्लाग हमेशा वहां बना रहेगा यह कहना कठिन है पर अब लेखक सोच रहा है कि क्यों न इस पर थोड़ा अधिक ध्यान दिया जाये और इसकी वरीयता ऊपर लायी जाये। यहां यह भी याद रखें कि हमें यह जानकारी दूसरी वेबसाईट से मिली थी तब हमने प्रयास कर देखा तो पाया कि इसको आठवी वरीयता प्राप्त होने की बात सच थी।
इस लेखक के बीस अन्य ब्लाग भी है-इसके अलावा दो जब्त हुए भी पड़े हैं-और उनमें सबसे अधिक वरीयता वर्डप्रेस के ब्लाग हिंदी पत्रिका को है जो कि 22 लाख के आसपास है। बहरहाल इस ब्लाग का इतना ऊंचा पहुंचने से खुश होने की जरूरत नहीं है। कल को यह गिरा तो अफसोस भी होगा। वैसे हमने गंभीरता से इधर उधर देखा तो लगा कि इन रैक देने वाली वेबसाईटों मेें कुछ ऐसा है जो अभी तक भारत में कोई नहीं समझ सका। फिर जो व्यूज बताने वाली वेबसाईटें हमने लगा रखी है वह सभी व्यूज बता पाती हैं यह भी दावे से नहीं कहा जा सकता। बहरहाल देखते हैं आगे क्या होता है? वैसे कल हम एक लेख लिखकर यह आशा कर रहे थे कि कोई इसमें हमारी चूक बतायेगा पर यह नहीं हुआ। वैसे कोई हमें यह कहे कि हम गलती कर रहे हैं तो भी अफसोस नहीं खुशी होगी क्योंकि हमें अपना फ्लाप होना मंजूर है पर भ्रम में जीना नहीं। हम तो स्वयं ही धर्म, जाति, भाषा, और क्षेत्र के नाम पर समूह बनाकर भ्रम मेें जीते लोगों को यही संदेश देते हैं कि यह सब भ्रम है तब भला स्वयं कैसे यह मान सकते हैं कि सफलता के भ्रम में जियें। अगर यह सच भी हो तो भी हम लिखते रहेंगे क्योंकि अपनी सफलता पर इतराना आगे नाकामी को दावत देना है। हां, यह सच है कि अगर सफल हो गये तो हमारी बात को आधिकारिक माना जायेगा। खैर, आगे आगे देखिये होता है क्या? अगर यह स्थिति अगले कुछ दिन तक रहती है और इस सफलता को प्रमाणिक मान लिया जाता है तो कुछ तथ्य ऐसे भी हैं जो इस ब्लाग को आठवी वरीयता प्राप्त होने को सच मानते हैं और हम इन पर तभी लिखेंगे जब स्वयं संतुष्ट हो जायेंगे। संतुष्ट नहीं है इसलिये तो किसी को धन्यवाद तक ज्ञापित नहीं कर रहे। वैसे साईडबार में ऐलेक्सा से उठाया प्रमाणपत्र भी लगा दिया है। जिसे देखना हो देख ले। बस, यार कुछ उल्टा पुल्टा हो जाये तो हंसना नहीं क्योंकि हम तो वही लिख रहे हैं जो देख रहे हैं।
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यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
1.दीपक भारतदीप का चिंतन
2.दीपक भारतदीप की हिंदी-पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका

इस ब्लाग की ऐलेक्सा में ट्रैफिक रैकिंग 8 हो सकती है?


यह दिलचस्प भी और अविश्वसनीय भी। अक्सर ब्लाग लेखक अपने ब्लाग के लिये ऐलेक्सा का प्रमाण देते हैं। इस लेखक ने भी वहां कई बार देखा है तो उसके ब्लाग हमेशा पिछड़े रहते हैं। मगर यह सबसे पुराना ब्लाग है ‘अनंत शब्दयोग’ जिसके बारे में एलेक्सा हमेशा कहता है कि इसके लिये डाटा उपलब्ध नहीं है। लेखक ने भी मान लिया कि उस पर बहुत लिखा जाता है इसलिये उसकी स्थिति यही हो सकती है। मगर ‘दीपक भारतदीप’ के नाम से सर्च करते हुए इस ब्लाग पर नजर पड़ी। वह वल्र्ड डोमेज से जुड़ा हुआ था। वहां खोलने पर पता लगा कि एलेक्सा में इसकी ट्रेफिक रैकिंग आठ है। लिंक 9 नंबर भी दिया था। जब एलेक्सा पर देखा गया तो फिर वही पुराना जवाब दिया गया।
बहरहाल हम यहां लिंक दे रहे हैं।

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ऐसा लगता है कि एलेक्सा बहुत ऊंची रैकिंग देता नहीं है या हम से ही कोई गलती हो गयी है। अलबत्ता हिंदी के ब्लाग लेखक लिखते हैं कि एक लाख की संख्या से अगर कोई नीचे हिंदी ब्लाग हो तो उसे भी अच्छा माना जाना चाहिये मगर यह तो दो अंकों से भी कम है। हम यहां दो लिंक दे रहे हैं। सुधि पाठक और ब्लाग लेखक इसे चेक करें। लेखक का यह दावा कतई नहीं है कि यह हिंदी का सबसे लोकप्रिय ब्लाग है क्योंकि इस अंतर्जाल की माया ही कुछ ऐसी है कि समझ में तो हमारे भी नहीं आती। बहरहाल यह आंकड़ा दिलचस्प है और इसे हम अपने मित्रों से ही बांट रहे हैं पर इस पर अभिभूत कतई नहीं है। अगर गलती हो जाये तो मजाक न बनायें यही अपेक्षा है। अगर यह सही है तो फिर लिखने लायक बहुत कुछ हमारे पास है वह भी लिख देंगे। नहीं तो यह पाठ यहां नहीं रहने देंगे। अपनी बेवकूफी कौन जगजाहिर करता है। यहां यह भी बता दें कि अभी हाल ही में एक पौर्न बेवसाईट को प्रतिबंधित किया गया था उसकी भी हमने एलेक्सा वाली रैकिंग एक जगह लिखी देखी थी 1124। ऐसे में इस ब्लाग की रैकिंग हमें चौंका सकती है।
http://www.urltrends.com/viewtrend.php?url=http%3A%2F%2Fanantraj.blogspot.com
वैसे हम उस ब्लाग शब्दलेख सारथी की भी जानकारी दे रहे हैं जिससे हम सबसे अधिक हिट समझते हैं पर ऐलेक्सा में उसकी रैकिंग 81,50,877 है और दोनों ही वेबसाईट उसे प्रमाणित कर रही है। एक सवाल यह भी है कि क्या ऐलेक्सा उच्च रैकिंग वाले ब्लाग की जानकारी स्वयं कोई नहीं देता और दूसरों को कैसे जाती हैं। बहरहाल विस्तृत जानकारी मिल जाये तो आगे कुछ लिखे।
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बजट सत्य-हास्य व्यंग्य (hindi vyangya on budget)


उन्होंने जैसे ही दोपहर में बजट देखने के लिये टीवी खोला वैसे ही पत्नी बोली-‘सुनते हो जी! कल तुमने दो हजार रुपये दिये थे सभी खर्च हो गये। अब कुछ पैसे और दो क्योंकि अभी डिस्क कनेक्शन वाला आने वाला होगा। कुछ देर पहले आया तो मैंने कहा कि बाद में आना।’
उन्होंने कहा-‘अरे, अब तो बैंक से पैसे निकालने पड़ेंगे। अभी तो मेरी जेब में पैसा नहीं है। अभी तो टीवी परबजट सुन लूं।’
पत्नी ने कहा-‘इस बजट की बजाय तुम अपने घर का ख्याल करो। अभी डिस्क कनेक्शन वाले के साथ धोबी भी आने वाला है। मुन्ना के स्कूल जाकर फीस जमा भी करनी है। आज आखिरी तारीख है।’
वह टीवी बंदकर बाहर निकल पड़े। सोचा पान वाले के यहां टीवी चल रहा है तो वहां पहुंच गये। दूसरे लोग भी जमा थे। पान वाले ने कहा-‘बाबूजी इस बार आपका उधार नहीं आया। क्या बात है?’
उन्होंने कहा-‘दे दूंगा। अभी जरा बजट तो सुन लूं। घर पर लाईट नहीं थी। अपना पर्स वहीं छोड़ आया।’
उनकी बात सुनते ही पान वाला खी खी कर हंस पड़ा-‘बाबूजी, आप हमारे बजट की भी ध्यान रखा करो।’
दूसरे लोग भी उनकी तरफ घूरकर देखने लगे जैसे कि वह कोई अजूबा हों।
वह अपना अपमान नही सह सके और यह कहकर चल दिये कि‘-अभी पर्स लाकर तुमको पैसा देता हूं।’
वहां से चले तो किराने वाले के यहां भी टीवी चल रहा था। वह वहां पहुंचे तो उनको देखते ही बोला-‘बाबूजी, अच्छा हुआ आप आ गये। मुझे पैसे की जरूरत थी अभी थोक दुकान वाला अपने सामान का पैसा लेने आता होगा। आप चुका दें तो बड़ा अहसान होगा।’
उन्होंने कहा-‘अभी तो पैसे नहीं लाया। बजट सुनकर चला जाऊंगा।’
किराने वाले ने कहा-‘बाबूजी अभी तो टीवी पर बजट आने में टाईम है। अभी घर जाकर ले आईये तो मेरा काम बन जायेगा।’
वहां भी दूसरे लोग खड़े थे। इसलिये तत्काल ‘अभी लाया’ कहकर वह वहां से खिसक लिये।
फिर वह चाय के होटल की दुकान पर पहुंचे। वहां चाय वाला बोला-‘बाबूजी, क्या बात इतने दिन बाद आये। न आपने चाय पी न पुराना पैसा दिया। कहीं बाहर गये थे क्या?’
दरअसल अब उसकी चाय में मजा नहीं आ रहा था इसलिये उन्होंने दो महीने से उसके यहां चाय पीना बंद कर दिया था। फिर इधर डाक्टर ने भी अधिक चाय पीने से मना कर दिया था। चाय पीना बंद की तो पैसा देना भी भूल गये।
वह बोले-यार, अभी तो पैसा नहीं लाया। हां, बजट सुनकर वापस घर जाकर पर्स लेकर तुम्हारा पैसा दे जाऊंगा।’
चाय वाला खी खी कर हंस पड़ा। एक अन्य सज्जन भी वहां बजट सुनने वहां बैठे थे उन्होंने कहा-‘आईये बैठ जाईये। जनाब! पुराना शौक इसलिये छूटता नहीं इसलिये बजट सुनने के लिये घर से बाहर ही आना पड़ता है। घर पर बैठो तो वहां इस बजट की बजाय घर के बजट को सुनना पड़ता है।’
यह कटु सत्य था जो कि सभी के लिये असहनीय होता है। अब तो उनका बजट सुनने का शौक हवा हो गया था। वह वहां से ‘अभी लाया’ कहकर निकल पड़े। जब तक बजट टीवी पर चलता रहा वह सड़क पर घूमते रहे और भी यह बजट तो कभी वह बजट उनके दिमाग में घूमता रहा।
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भूख भला कभी किसी की मिटी है-हिंदी शायरी (hindi shayri)
गरीब के घर पैदा होने पर
आयु पूरी होने से पहले मर नहीं जाते।
अमीर घर में लेकर जन्म
कोई सोने की रोटी नहीं खाते।
लेकर बड़े घरों से उधर का नजरिया
देख रहे हैं इस रंग बिरंगी दुनियां को
फिर कमजोर की शिकायत क्यों करने आते।
कपड़े मैले हो सकते हैं
हाथ में पकड़े थैले फटे हो सकते हैं
जरूरतों जितना सामान हो तो ठीक
सामान जितनी जरूरतें क्यों नहीं रख पाते।
अपनी झौंपड़ी मे रहते हुए
महलों के सुख यूं ही बड़े नजर आते।
गलतफहमियों में जिंदगी अमीर की भी रहती
गरीब भी कोई सच्चाई के साथ नहीं आते।
भूख भला कभी किसी की मिटी है
जो उसे मिटाने के सपने दिखाये जाते
जिसमें गरीब भी बह जाते।
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‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

पितृ दिवस पर नारियों की सहानुभुति-हास्य व्यंग्य


नारी स्वतंत्रता समिति की बैठक आनन फानन में बुलाई गयी। अध्यक्षा का फोन मिलते ही कार्यसमिति की चारों सदस्य उनके घर बैठक करने पहुंच गयी। चारों को देखकर अध्यक्षा बहुत खुश हो गयी और बोली-‘इसे कहते हैं सक्रिय समाज सेवा! एक फोन पर ही कार्यसमिति की चारों सदस्यायें पहुंच गयी।’
एक ने कहा-‘क्या बात है? आपने अचानक यह बैठक कैसे बुलाई। मैं तो आटा गूंथ रही थी। जैसे ही आपका मोबाइल पर संदेश मिला चली आयी। जब से इस समिति की कार्यसमिति मैं आयी हूं तब से हमेशा ही बैठक में आने को तैयार रहती हूं। बताईये काम क्या है?’
अध्यक्षा ने कहा-‘हां आपकी प्रतिबद्धता तो दिख रही है। आपने अपने हाथ तक नहीं धोये। आटे से सने हुए हैं, पर कोई बात नहीं। दरअसल आज मुझे इंटरनेट पर पता लगा कि आज ‘पितृ दिवस’ है। इसलिये सोचा क्यों न आज पुरुषों के लिये कोई सहानुभूति वाला प्रस्ताव पास किया जाये।’
यह सुनते ही दूसरी महिला नाराज हो गयी और वह अपने हाथ में पकड़ा हुआ बेलन लहराते हुए बोली-‘कर लो बात! पिछले पांच साल से पुरुष प्रधान समाज के विरुद्ध कितने मोर्चे निकलवाये। बयान दिलवाये। अब यह सफेद झंडा किसलिये दिखायें। इससे तो हमारी समिति का पूरा एजेंडा बदल जायेगा। आपकी संगत करते हुए इतना तो अहसास हो गया है कि जो संगठन अपने मूल मुद्दे से हट जाता है उसकी फिल्म ही पिट जाती है।’
अध्यक्षा ने उससे पूछा-‘क्या तुम रोटी बेलने की तैयारी कर रही थी।’
उसने कहा -‘हां, पर आप चिंता मत करिये यह बेलन आपको मारने वाली नहीं हूं। इसके टूटने का खतरा है। कल ही अपने पड़ौसी के लड़के चिंटू की बाल छत पर आयी मैंने उस गेंद को गुस्से में दूर उड़ाने के लिये बेलन मारा तो वह टूट गया। अब यह पुराना अकेला बेलन है जो मैं आपको मारकर उसके टूटने का जोखिम नहीं उठा सकती। वैसे आपके प्रस्ताव पर मुझे गुस्सा तो खूब आ रहा है।’
अध्यक्षा ने कहा-‘देखो! जरा विचार करो। आजकल वह समय नहीं है कि रूढ़ता से काम चले। अपनी समिति के लिये चंदा अब कम होता जा रहा है इसलिये कुछ धनीमानी लोगों को अपने ‘स्त्री पुरुष समान भाव’ से प्रभावित करना है। फिर 364 दिन तो हम पुरुषों पर बरसते हैं। यहां तक वैलंटाईन डे और मित्र दिवस जो कि उनके बिना नहीं मनते तब भी उन्हीं पर निशाना साधते हैं। एक दिन उनको दे दिया तो क्या बात है? मुद्दों के साथ अपने आर्थिक हित भी देखने पड़ते हैं। अच्छा तुम बताओ? क्या तुम अपने बच्चों के पिता से प्यार नहीं करती?’
तीसरी महिला-जो फोन के वक्त अपने बेटे की निकर पर प्र्रेस कर रही थी-उसे लहराते हुए बोली-‘बिल्कुल नहीं! आपने समझाया है न! प्यार दिखाना पर करना नहीं। बस! प्यार का दिखावा करती हैं। वैसे यह निकर सफेद है पर हमसे यह आशा मत करिये कि ‘पितृ दिवस’ पर इसे फहरा दूंगी। पहले तो यह बताईये कि इस पितृ दिवस पर पुरुषों के लिए हमदर्दी वाला प्रस्ताव पास करने का विचार यह आपके दिमाग में आया कैसे?’
अध्यक्षा ने कहा-‘ पहली बात तो यह है कि तुम मेरे सामने ही मेरे संदेश को उल्टा किये दे रही हो। मैंने कहा है कि अपने बच्चों के पिता से प्यार करो पर दिखाओ नहीं। दूसरी बात यह कि आजकल हमारी गुरुमाता इंटरनेट पर भी अपने विचार लिखती हैं। उन्होंने ही आज उस पर लिखा था ‘पितृ दिवस पर सभी पुरुषों के साथ हमदर्दी’। सो मैंने भी विचार किया कि आज हम एक प्रस्ताव पास करेंगे।’
चौथी महिला चीख पड़ी। उसके हाथ मे कलम और पेन थी वह गुस्सा होते हुए बोली-‘आज आप यह क्या बात कर रही हैं। आपकी बताई राह पर चलते हुए मैंने एक वकील साहब के यहां इसलिये नौकरी की ताकि उनके सहारे अपने आसपास पीड़ित महिलाओं की कानूनी सहायता कर सकूं। देखिये यह एक पति के खिलाफ नोटिस बना रही थी।’
अध्यक्षा ने एकदम चौंकते हुए कहा-‘अरे, क्या बात कर रही हो। पति तो एक ही होता है? उसे नोटिस क्यों थमा रही हो? मेरे हिसाब से तुम्हारा पति गऊ है।’
‘‘उंह…उंह….मैं अपने पति को बहुत प्यार करती हूं पर आपके कहे अनुसार दिखाती नहीं हूं। पर वह गऊ नहीं है। हां, यह नोटिस एक पीड़ित महिला के पति के लिये बना रही हूं।’चौथी महिला ने हंसते हुए कहा-‘खाना बनाते समय कई बार जब मेरे रोटी पकाते वक्त पीछे से बेलन दिखाते है और जब सामने देखती हूं तो रख देते है। मेरे बेटे ने एक बार उनकी अनुपस्थिति में बताया।’
अध्यक्षा ने कहा-‘पहले तो तुम रोटी पकाती थी न?’
चौथी वाली ने कहा-‘आपकी शिष्या बनने के बाद यह काम छोड़ दिया है। मेरे पति सुबह खाना बनाने और बच्चों को स्कूल भेजने के बाद काम पर जाते हैं और मैं सारा दिन समाज सेवा में आराम से बिताती हूं। आपने जो राह दिखाई उसी पर चलने में आनंद है पर यह आप आज क्या लेकर बैठ गयीं। हमें यह मंजूर नहीं है। अब अगर सफेद झंडे दिखाये तो मुझे रोटी पकानी पड़ेगी। नहीं बाबा! न! आप आज यह भूल जाईये। 364 दिन मुट्ठी कसी रही तो ठीक ही है। एक दिन ढीली कर ली तो फिर अगले 364 दिन तक बंद रखना कठिन होगा।’
अध्यक्षा ने कहा-‘तुम अपने घर पर यह मत बताना।’
पहली वाली ने कहा-‘पर अखबार में तो आप यह सब खबरें छपवा देंगी। हमारे पति लोग पढ़ लेंगे तो सब पोल खुल जायेगी।’
अध्यक्षा ने पूछा-‘कैसी नारी स्वतंत्रता सेनानी हो? क्या पति से छिपकर आती हो?’
दूसरी वाली ने कहा-‘नहीं! उनको पता तो सब है पर अड़ौस पड़ौस में ऐसे बताते हैं कि पतियों से छिपकर बाहर जाते हैं। अरे, भई इसी तरह तो हम बाकी महिलाओं को यह बात कह सकते हैं कि हम कितनी पीड़ित हैं और उनको अपने ही घरों में विद्रोह की प्रेरणा दे सकते हैं। अपना घर तो सलामत ही रखना है।’
अध्यक्षा ने कहा-‘भई, इसी कारण कह रही हूं कि आज पुरुषों के लिये संवेदना वाला प्रस्ताव करो। ताकि उनमें कुछ लोग हमारी मदद करने को तैयार हो जायें। यह सोचकर कि 364 दिन तो काले झंडे दिखाती हैं कम से कम एक दिन तो है जिस दिन हमारे साथ संवेदनाऐं दिखा रही हैं।’
तीसरी वाली ने अपनी हाथ में पकड़े सफेद नेकर फैंक दी और बोली-‘नहीं, हम आपकी बात से सहमत नहीं हैं।’
चौथी वाली ने कहा-‘आपके कहने पर इतना हो सकता है कि यह नोटिस आज नहीं कल बना दूंगी पर आप मुझसे किसी ऐसे प्रस्ताव पर समर्थन की आशा न करें।’
अध्यक्षा ने कहा-‘अच्छा समर्थन न करो। कम से कम कम एक प्रस्ताव तो लिखकर दो ताकि अखबार में प्रकाशित करने के लिये भेज सकूं। तुम्हें पता है कि मुझे केवल गुस्से में ही लिखना आता है प्रेम से नहीं।’
चौथी वाली महिला तैयार नहीं थी। इसी बातचीत के चलते हुए एक बुजुर्ग आदमी ने अध्यक्षा के घर में प्रवेश किया। वह उसके यहां काम करने वाली लड़की का पिता था। अध्यक्षा ने उसे देखकर अपने यह काम करने वाली लड़की को पुकारा और कहा-‘बेटी जल्दी काम खत्म करो। तुम्हारे पिताजी लेने आये हैं।’
वह लड़की बाहर आयी और बोली-‘मैडम मैंने सारा खत्म कर दिया है। बस, आप चाय की पतीली उतार कर आप स्वयं और इन मेहमानों को भी चाय पिला देना।’
लड़की के पिता ने कहा-‘बेटी, तुम सभी को चाय पानी पिलाकर आओ। मैं बाहर बैठा इंतजार करता हूं। आधे घंटे में कुछ बिगड़ नहीं जायेगा।’
लड़की ने कहा-‘बापू, आप भी तो मजदूरी कर थक गये होगे। घर देर हो जायेगी।’
लड़की के पिता ने कहा-‘कोई बात नहीं।
वह बाहर चला गया। लड़की चाय लेकर आयी। अध्यक्षा ने कहा-‘तुम एक कप खुद भी ले लो और पिताजी को भी बाहर जाकर दो।’
लड़की ने कहा-‘मैं तो किचन में चाय पीने के बाद कप धोकर ही बाहर जाऊंगी। मेरे बापू शायद ही यहां चाय पियें। इसलिये उनको कहना ठीक नहीं है। वह मुझसे कह चुके हैं कि किसी भी मालिक के घर लेने आंऊ तो मुझे पानी या चाय के लिये मत पूछा करो।’
लड़की और उसके पिताजी चले गये। उस समिति की सबसे तेजतर्रार सदस्या च ौथी महिला ने बहुत धीमी आवाज में अध्यक्षा से कहा-‘आप कागज दीजिये तो उस पर प्रस्ताव लिख दूं।’
फिर वह बुदबुदायी-‘पिता क्या कम तकलीफ उठाता है।’
ऐसा कहकर वह छत की तरफ आंखें कर देखने लगी। तीसरी वाली महिला ने वह सफेद निकर अपने हाथ में ले ली। दूसरी वाली महिला ने अपना बेलन पीछे छिप लिया और पहली वाली ग्लास लेकर अपना हाथ धोने लगी।
नोट-यह एक काल्पनिक व्यंग्य रचना है। इसका किसी व्यक्ति या घटना से कोई लेना देना नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा। यह लेखक किसी भी नारी स्वतंत्रता समिति का नाम नहीं जानता है न उसकी सदस्या से मिला है।
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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
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2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

जीन के गुण ही तो गुण में बरतते हैं-चिंत्तन आलेख


पश्चिमी विज्ञान मानव शरीर में स्थित जीन के आधार पर अपने विश्लेषण प्रस्तुत करता है जबकि यही विश्लेषण भारतीय दर्शन ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं‘ के आधार पर करता है। पश्चिमी विश्लेषण मनुष्य के स्वभाव में उन जीनों के प्रभाव का वर्णन करते हैं जबकि भारतीय दर्शन उनको गुणों का परिणाम कहकर प्रतिपादित करता है।
मनुष्य की पहचान उसका मन है और देह में स्थित होने के कारण उसमें विद्यमान गुण या जीन से प्रभावित होता है इसमें संशय नहीं हैं। जब शरीर में कोई भीषण विकार या पीड़ा उत्पन्न होती है तब मन कहीं नहीं भाग पाता। उस समय केवल उससे मुक्ति की अपेक्षा के अलावा वह कोई विचार नहीं। करता। मन में विचार आते हैं कि ‘अमुक पीड़ा दूर हो जाये तो फिर मैं एसा कुछ नहीं करूंगा जिससे यह रोग फिर मुझे घेरे।’
कभी अपने आप तो कभी दवा से वह ठीक हो जाता है पर फिर उसका मन सब भूल जाता है। व्यसन करने वाले लोग इस बात को बहुत अच्छी तरह जानते हैं। जब अपने व्यसन की वजह से भारी तकलीफ में होते हैं तब सोचते हैं कि अब इसका प्रभाव कम हो तो फिर नहीं करेंगे।’

ऐसा होता नहीं है। व्यसन कर प्रभाव कम हाते े ही वह फिर उसी राह पर चलते हैं। अपने ज्ञान के आधार पर मै यह कह सकता हूं कि‘शुरूआत में व्यसन आदमी किसी संगत के प्रभाव में आकर करता है फिर वही चीज-शराब और तंबाकू-मनुष्य के शरीर में अपना गुण या जीन स्थापित कर लेती है और आदमी उसका आदी हो जाता है। याद रहे वह गुण व्यसन करने से पहले उस आदमी में नहीं होता।

पश्चिमी विज्ञान कहता है कि आदमी में प्रेम, घृणा, आत्महत्या, चिढ़चिढ़ेपन तथा अन्य क्रियाओं के जीन होते हैं पर वह यह नहीं बताता कि वह जीन बनते कैंसे हैं? भारतीय दर्शन उसको स्पष्ट करता है कि मनुष्य में सारे गुण खाने-पीने के साथ ही दूसरों की संगत से भी आते हैं। मेरा मानना है कि मनुष्य सांसें लेता और छोड़ता है और उससे उसके पास बैठा आदमी प्रभावित होता है। हां, याद आता है कि पश्चिम के विज्ञानी भी कहते हैं कि सिगरेट पीने वाले अपने से अधिक दूसरे का धुंआ छोड़कर हानि पहुंचाते हैं। इसका अर्थ यह है कि विकार वायु के द्वारा भी आदमी में आते हैं। अगर आप किसी शराबी के पास बैठेंगे और चाहे कितनी भी सात्विक प्रवृत्ति के हों और उसकी बातें लगातार सुन रहे हैं तो उसकी कही बेकार की बातें कहीं न कहीं आपके मन पर आती ही है जो आपका मन वितृष्णा से भर देती है। इसके विपरीत अगर आप किसी संत के प्रवचन-भले ही वह रटकर देता हो-सुनते हैं तो आपके मन में एक अजीब शांति हो जाती है। अगर आप नियमित रूप से किसी ऐसे व्यक्ति से मिलें जिसे आप ठीक नहीं समझते तो ऐसा लगेगा कि वह आपके तनाव का कारण बन रहा है। कहने का तात्पर्य यह है कि पांच तत्वों-प्रथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु- से बनी यह देह इनके साथ सतत संपर्क में रहती है और उनके परिवर्तनों से प्रभावित होती है और इसके साथ ही उसमें मौजूद मन, बुद्धि और अहंकार की प्रकृति भी प्रभावित होती है। इन परिवर्तनों से मनुष्य की देह में जीन या गुणों का निर्माण और विसर्जन होता है और वह उसका प्रदर्शन वह बाहर व्यवहार से कराते हैं।
पश्चिम के विद्वान इन जीन को लेकर विश्लेषण करते हुए उनके उपचार के लिए अनुसंधान करते हैं। अनेक तरह के आकर्षक तर्क और सुसज्तित प्रयोगशालाओं से निकले निष्कर्ष पूरे विश्व में चर्चा का विषय बनते हैं और भारतीय अध्यात्म को पूरी तरह नकार चुके हमारे देश के विद्वान अखबार, टीवी चैनलो, रेडियो और किताबों उनका प्रचार कर यहां ख्याति अर्जित करते हैं। हां, लोग सवाल करेंगे कि भारतीय अध्यात्म में भला इसका इलाज क्या है?

हमारा अध्यात्म कहता है लोग तीन तरह के होते हैं सात्विक, राजस और तामस। यहां उनके बारे में विस्तार से चर्चा करना ठीक नहीं लगता पर जैसा आदमी होगा वैसा ही उसका भोजन और कर्म होगा। वैसे ही उसके अंदर गुणों का निर्माण होगा।

श्रीगीता के सातवों अध्याय के (श्लोक आठ) अनुसार आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले तथा जो स्वभाव से ही मन को प्रिय हो ऐसा भोजन सात्विक को प्रिय होते हैं।

नौवें श्लोक के अनुसार कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक, दुःख, चिंता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार राजस पुरुष को प्रिय होते हैं।


दसवें श्लोक के अनुसार -अधपका, रसरहित, दुर्गंधयुक्त, बासी और उच्छिष्ट तथा अपवित्र है वह भोजन तामस को प्रिय होता है।

पश्चिम के स्वास्थ्य विज्ञान के अनुसार देह की अधिकतर बीमारियां पेट के कारण ही होती हैं। यही विज्ञान यह भी कहता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है। हमारा अध्यात्म और दर्शन भी यही कहता है कि गुण ही गुण को बरतते है। इसके बावजूद पश्चिमी विज्ञान और भारतीय अध्यात्म में मौलिक अंतर है। पश्चिमी विज्ञान शरीर और मन को प्रथक मानकर अलग अलग विश्लेषण करता है। वह मनुष्य की समस्त क्रियाओं यथा उठना, बैठना, चलना और कामक्रीडा आदि को अलग अलग कर उसकी व्याख्या करता है। इसके विपरीत भारतीय अध्यात्म या दर्शन मनुष्य को एक इकाई मानता है और उसके अंदर मौजूद गुणों के प्रभाव का अध्ययन करता है। अगर योग की भाषा के कहें तो सारा खेल ‘मस्तिष्क में स्थित ‘आज्ञा चक्र’ का है। पश्चिमी विज्ञान भी यह तो मानता है कि मानसिक तनाव की वजह से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं और वह उनका इलाज भी ढूंढता है पर जिन मानसिक विकारों से वह उत्पन्न होते हैं और मनुष्य की देह में अस्तित्वहीन रहें ऐसा इलाज उसके पास नहीं है।

भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान केवल धर्म प्रवचन के लिऐ नहीं है वह जीवन की वास्तविकताओं पर आधारित है। यह मनुष्य के देह और मन में स्थित विकारों को दूर करने के लिए केवल शब्दिक संदेश नहीं देता बल्कि योगासन, प्राणायम और ध्यान के द्वारा उनको दूर करने का उपाय भी बताता है। अध्यात्म यानि हमारी देह में प्राणवान जीव आत्मा और उससे जानने की क्रिया है ज्ञान। अन्य विचाराधारायें आदमी को प्रेम, परोपकार और दया करने के का संदेश देती हैं पर वह देह में आये कैसे यह केवल भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान ही बताता हैं। अगर सुबह उठकर योगासन, प्राणायम, और ध्यान किया जाये तो देह में वह जीन या गुण स्वयं ही आते है जिनसे आदमी प्रेम, परोपकार और दया करने लगता है। देह और मन के विकार को निकाले बिना आदमी को सही राह पर चलने का उपदेश ऐसा ही है जैसे पंचर ट्यूब में हवा भरना।
अगर कोई आदमी बीमार होता है तो डाक्टर कहते हैं कि चिकनाई रहित हल्का भोजन करो जबकि भारतीय दर्शन कहता है कि चिकना, रसयुक्त स्थिर भोजन ही सात्विक है। इसका अर्थ यह है कि डाक्टर जिनको यह भोजन मना कर रहा है उनमें विकार ही इस सात्विक भोजन के कारण है। ऐसा भोजन करने के लिये परिश्रम करना जरूरी है पर आजकल धनी लोग इसे करते नहीं है। श्रीगीता कहती है कि अकुशल श्रम से सात्विक लोग परहेज नहीं करते। आजकल के लोग अकुशल श्रम करने में संकोच करते हैं और यही कारण है कि लोगों में आत्म्विश्वास की कमी होती जा रही है और ऐसे जीन या दुर्गुण उसमें स्वतः आ जाते हैं जो उसे झूठे प्रेम,पुत्यकार की भावना से उपकार और कपटपूर्ण दया में लिप्त कर देते हैं। कुल मिलाकर पश्चिमी विज्ञान की खोज जीन चलते हैं जबकि भारतीय दशैन की खोज ‘गुण ही गुण बरतते हैं। वैसे देखा जाये तो देश में जितनी अधिक पुस्तकें पश्चिमी ज्ञान से संबंधित है भारत के पुरातन ज्ञान उसके अनुपात में कम है पर वह वास्तविकता पर आधारित हैं। संत कबीर दास जी के अनुसार अधिक पुस्तकें पढ़ने से आदमी भ्रमित हो जाता है और शायद यही कारण है कि लोग भ्रमित होकर ही अपना जीवन गुजार रहे हैं। इस विषय पर इसी ब्लाग पर मै फिर कभी लिखूंगा क्योंकि यह आलेख लिखते समय दो बार लाईट जा चुकी है और मेरा क्रम बीच में टूटा हुआ था इसलिये हो सकता है कि विषयांतर हुआ हो पर उस दौरान भी मैं इसी विषय पर सोचता रहा था। बहुत सारे विचार है जो आगे लिखूंगा।

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रहीम दास के दोहे:स्वार्थ के कारण हुआ प्रेम घटता जाता है


कविवर रहीम कहते हैं कि
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वहै प्रीति नहिं रीति वह, नहीं पाछिलो हेत
घटत घटत रहिमन घटै, ज्यों कर लीन्हे रेत

स्वाभाविक रूप से जो प्रेम होता है उसकी कोई रीति नहीं होती। स्वार्थ की वजह से हुआ प्रेम तो धीरे धीरे घटते हुए समाप्त हो जाता है। जब आदमी के स्वार्थ पूरे हो जाते हैं जब उसका प्रेम ऐसे ही घटता है जैसे रेत हाथ से फिसलती है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जीवन में कई ऐसे लोग आते हैं जिनका साथ हमें बहुत अच्छा लगता है और हम से प्रेम समझ बैठते हैं। फिर वह बिछड़ जाते हैं तो उनकी याद आती है और फिर एकदम बिसर जाते हैं। उनकी जगह दूसरे लोग ले लेत हैं। यह प्रेमी की ऐसी रीति है जो देह के साथ आती है। यह अलग बात है कि इसमें बहकर कई लोग अपना जीवन दूसरे को सौंप कर उसे तबाह कर लेते हैं।

सच्चा प्रेम तो परमात्मा के नाम से ही हो सकता है। आजकल के फिल्मी कहानियों में जो प्रेम दिखाया जाता है वह केवल देह के आकर्षण तक ही सीमित है। फिर कई सूफी गाने भी इस तरह प्रस्तुत किये जाते हैं कि परमात्मा और प्रेमी एक जैसा प्रस्तुत हो जाये। सूफी संस्कृति की आड़ में हाड़मांस के नष्ट होने वाली देह में दिल लगाने के लिये यह संस्कृति बाजार ने बनाई है। अनेक युवक युवतियां इसमें बह जाते हैं और उनको लगता हैकि बस यही प्रेम परमात्मा का रूप है।

सच तो यह है परमात्मा को प्रेम करने वाली तो कोई रीति नहीं है। उसका ध्यान और स्मरण कर मन के विकार दूर किये जायें तभी पता लगता है कि प्रेम क्या है? यह दैहिक प्रेम तो केवल एक आकर्षण है जबकि परमात्मा के प्रति ही प्रेम सच्चा है क्योंकि हम उससे अलग हुई आत्मा है।

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मस्त राम……………की हिप हुर्र हुर्र


अपने कुछ ब्लाग/पत्रिका का नामकरण हमने मस्तराम के नाम पर आज कर ही दिया। आज होली का पर्व है और एक लेखक के नाते ऐसा समय हमारे लिये अकेले चिंतन करने का होता है। पिछले दो वर्षों से हम अंतर्जाल पर जूझ रहें पर अभी तक फ्लाप बने हुए हैं। हिंदी के सभी ब्लाग जबरदस्त हिट पाते जा रहे हैं और हम है कि ताकते रह जाते हैं।

यह बात यह ठीक है जो हिट हैं वह हमसे अच्छा और प्रासंगिक लिखते हैं पर और एक लेखक मन इस बात को कहां मानता है कि हम खराब लिखते हैं। इधर हमसे पुराने ब्लाग नित नयी बातें सामने रखकर विचलित कर देते हैं तो फिर दिमाग में आता है कि कोई ऐसी रणनीति बनाओ कि खुद भी हिट हो जायें। बहुत दिन से संकोच हो रहा था पर आज सारा संकोच त्याग कर अपने उन ब्लाग/पत्रिकाओं में अपने नाम के आगे मस्तराम शब्द जोड़ ही दिया जिन पर पहले लिखकर हटा लिया था।

दरअसल हुआ यूं कि पुराने ब्लाग लेखकों ने अपने पाठों में बताया कि इंटरनेट पर हिंदी विषयों के शब्द गूगल के सर्च इंजिनों में बहुत कम ढूंढे जाते जाते हैं-आशय यह है कि चाहे रोमन लिपि में हो या देवनागरी लिपि में लोग इंटरनेट पर हिंदी पढ़ने के बहुत कम इच्छुक हैं। वैसे हमने स्वयं सर्च इंजिनों के ट्रैंड में जाकर यह बात पहले भी देखी थी और उसी आधार पर अपनी रणनीति बनाते रहे पर सफलता नहीं मिली। कल फिर गूगल के सर्च इंजिन ट्रैंड को देखा तो यथावत स्थिति दिखाई दी। वैसे हमने यह तो पहले ही देख लिया था कि मस्त राम शब्द की वजह से पाठक अधिक ही मिलते हैं। अपने एक ब्लाग पर हमने अपने नाम के आगे मस्त राम लिखकर छोड़ दिया तो देखा कि एक महीने तक नहीं लिखने पर भी वहां पाठक अच्छी संख्या में आते हैं और वह अपने अधिक पाठकों की संख्या के कीर्तिमान को स्वयं ही ध्वस्त करता जाता है जबकि सामान्य ब्लाग तरसते लगते हैं। हमारा यह ब्लाग बिना किसी फोरम की सहायता के ही 6500 से अधिक पाठक जुटा चुका है। एक अन्य ब्लाग भी तीन हजार के पास पहुंच गया था पर वहां से जैसे ही मस्तराम शब्द हटाया वह अपने पाठक खो बैठा।

ऐसे में सोचा कि जिन ब्लाग पर हमने ‘मस्त राम’ जोड़कर पाठक जुटाये और फिर हटा लिया तो क्यों न उनको पुराना ही रूप दिया जाये? एक मजे की बात यह है कि हमने मस्त राम का शब्द उपयोग किसी उद्देश्य को लेकर नहीं किया था। हमारी नानी हमको इसी नाम से पुकारती थी। जब ब्लाग@पत्रिका बनाना प्रारंभ किया तो बस ऐसे ही यह नाम उपयोग में लिया। बाद में समय के साथ अनेक अनुभव हुए तब पता लगा कि उत्तर प्रदेश में यह नाम अधिक लोकप्रिय रहा है और धीरे धीरे पूरे देश में फैल रहा है।
इस होली पर बैठे ठाले यह ख्याल आया कि क्यों न हम साल भर तक अपनी स्वर्गीय नानी द्वारा प्रदत्त प्यार का नाम मस्त राम का प्रयोग करते रहेंगे। वैसे वर्डप्रेस के हमारे अनेक ब्लाग स्वतः ही पाठक जुटा रहे हैं पर संख्या स्थिर हैं।

हमने अनेक शब्दों का प्रयोग करके देखा तो भारी निराशा हाथ लगी पर साथ में आशा की किरण जाग्रत हुई। लोगों का भगवान राम के प्रति लगाव है और सर्च इंजिनों में रोमन में उनका नाम लिखकर तलाश होती रहती है। जिन टैगों का हम उपयोग करते हैं उनका कोई ग्राफ नहीं मिला। तय बात है कि उनकी संख्या अधिक नहीं है। जहां तक मस्त राम का सवाल है तो हमारे सामान्य ब्लाग@पत्रिका में जो टैग मस्त राम के नाम पर है वहां भी पाठक पहुंचते हैं।
फिल्मी हीरोईनों के नाम पर सर्च इंजिनों में भारत के इंटरनेट सुविधाभोगी भीड़ लगाये हुए हैं। हैरानी होती है यह देखकर! टीवी, रेडियो और अखबारों में उनके नाम और फोटो देखकर भी उनका मन नहीं भरता। कहते हैं कि परंपरागत प्रचार माध्यमों से ऊबकर भारत के लोग इंटरनेट की तरफ आकर्षित हो रहे हैं पर उनका यह रवैया इस बात को दर्शाता कि उनकी मानसिकता में बदलाव केवल साधन तक ही सीमित है साध्य के स्वरूप में बदलाव में उनकी रुचि नहीं हैं। अब इसके कारणों में जाना चाहिये। इसका कारण यह है कि हिंदी में मौलिक, स्वतंत्र और नया लिखने वाले सीमित संख्या में है। अभी तक लोग या तो दूसरों की बाहर लिखी रचनायें यहां लिख रहे हैं या अनुवाद प्रस्तुत कर अपना ब्लाग सजाते हैं। अगर मौलिक लेखक है तो शायद वह इतना रुचिकर नहीं है जितना होना चाहिये। इसका कारण यह भी है कि अंतर्जाल पर दूसरे के लिखे की नकल चुरा लिये जाने का पूरा खतरा है दूसरा यह कि मौलिक लेखक के हाथ से लिखने और टाईप करने में स्वाभाविक रूप से अंतर आ जाता है। ऐसे में आम पाठकों की कमी से मनोबल बढ़ता नहीं है इसलिये बड़ी रचनायें लिखना समय खराब करना लगता है। जब यह पता लगता है कि हिंदी में नगण्य पाठक है तो ऐसे ब्लाग लेखक निराश हो ही जाते जिनके लिये यहां न नाम है न नामा। इतना ही नहीं कुछ वेबसाइटें तो ऐसी हैं जो ब्लाग लेखकों के टैग और श्रेणियों के सहारे सर्च इंजिनों में स्वयं को स्थापित कर रही हैं। हिंदी के चार फोरमों के लिये तो कोई शिकायत नहीं की जा सकती पर कुछ वेबसाईटें इस तरह व्यवहार कर रहीं हैं जैसे कि ब्लाग लेखक उनके लिये कच्चा माल हैं। यह सही है कि उनकी वजह से भी बहुत सारे पाठक आ रहे हैं पर सवाल यह है कि इससे ब्लाग लेखक को क्या लाभ है?

यह सच है कि अंतर्जाल पर हिंदी की लेखन यात्रा शैशवकाल में है। लिखने वाले भी कम है तो पढ़ने वाले भी कम। ऐसे में ब्लाग लेखक के लिये यह भी एक रास्ता है कि वह अपने लिखने के साथ ऐसे भी मार्ग तलाशे जहां उसे पाठक अधिक मिल सकें। यही सोचकर हमने होली के अवसर पर यही सोचा कि अब अपनी नानी द्वारा प्रदत्त नाम का भी क्यों न नियमित रूप से उपयोग करके देखें जिसकों लेकर अभी तक गंभीर नहीं थे। इस होली पर बोलो मस्त राम………………………………की हिप हुर्र हुर्र।

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‘नुक्ताचीनी साहब जो कहें सो ठीक’-हास्य व्यंग्य


भरी दोपहर में दीपक बापू अपनी साइकिल पर चले जा रहे थे कि अचानक चैन उतर गयी। दीपक बापू साइकिल के चैन उतरना ऐसे ही अशुभ मानते थे जैसे रात में उल्लू का बोलना। फिर भी उन्होंने अपने दिल को समझाया कोई बात नहीं ‘अभी चैन चढ़ाकर दौड़ाते हैं’।
वह साइकिल से उतरे। दो दिन पहले ही उन्होंने साइकिय में तेल डलवाया था और चैन अभी उसमें नहाई हुई थी। वह उसे चढ़ाने लगे तो उनके हाथ काले होते चले गये।
चैन चढ़ाकर उन्होंने इधर उधर देखा कि कहीं उनकी यह दुर्दशा देखने वाला कोई कवि या लेखक तो नहंी है जो इस पर लिख सके। पहले दाएं तरफ देखा। लोगों में किसी का ध्यान उनकी तरफ नहीं था। तसल्ली हो गयी पर जैसे ही बायें तरफ मूंह किया तो होठों से निकल पड़ा-‘एक नहीं दो संकट एक साथ आ गये।’

फंदेबाज और नुक्ताचीनी साहब अपनी मोटर साइकिलों पर बैठकर कहीं जा रहे थे और फंदेबाज ने दीपक बापू को देख लिया। उसने नुक्ताचीनी साहब को इशारा किया। दोनों गाड़ी मोड़कर उनके सामने आ गये। दीपक बापू अपनी साइकिल की चैन चढ़ाने से उखड़ी सांसों को राहत दे नहीं पाये थे कि दोनों संकट उनके सामने आ गये।

फंदेबाज तो वह शख्स था जिसने उनकी कलम की धार ऐसी बिगाड़ी थी कि कविता लिखते तो बेतुकी हो जाती, व्यंग्य रोता हुआ बनता और चिंतन एक चुटकुले की तरह लगने लगता।

दीपक बापू बहुत समय पहले नुक्ताचीनी साहब के यहां एक बार गये थे तो वहां अच्छा कवि और लेखक न बनने की शाप लेकर लौटे । वैसे नुक्ताचीनी उम्र में दीपक बापू से सात आठ साल बड़े थे और उनका रुतवा भी था। हुआ यूं कि नुक्ताचीनी साहब का एक मित्र दीपक बापू से कोई शायरी लिखवा गया। उसने दीपक बापू को बताया कि एक शायर की प्रेमिका का दिल अपहृत करना है और इसके लिये काई शायरी जरूरी है। वह भी दीपक बापू से आयु में बड़ा था इसलिये उन्होंने आदर पूर्वक एक छंटाक भर शायरी उसे लिख कर दे दी। वह असल में नुक्ताचीनी साहब का प्रतिद्वंद्वी था और प्रेम त्रिकोण में उनको पराजित करना चाहता था। दीपक बापू ने एक पर्ची लिखकर दी फिर वह उसे भूल गये, मगर नुक्ताचीनी साहब ने जो दर्द उस शायरी से झेला तो फिर वह इंतजार करने लगे कि कभी तो वह शिकार आयेगा अपने लेखक और कवि होने का प्रमाण पत्र मांगने। आखिर शहर भर के अनेक लेखक उनको सलाम बजाते थे। यह अलग बात है कि जिन्होंने उनकी शरण ली वह नुक्ताचीनी साहब की सलाहों का बोझ नहीं उठा सके और लिखना ही छोड़ गये।

जब दीपक बापू आधिकारिक रूप से लेखक और कवि बनने को तैयार हुए यानि अपनी रचनायें इधर उधर भेजने का विचार किया तो किसी ने सलाह दी कि पहले अपनी रचनायें नुक्ताचीनी साहब को दिखा दो।

वह बिचारे अपनी साइकिल पर फाइल दबाये नुक्ताचीनी साहब के घर पहुंचे। तब तक उनका विवाह भी हो गया था पर पुराना दिल का घाव अभी भरा नहीं था। दीपक बापू को देखते ही वह बोले-‘आओ, महाराथी मैं तुम्हारा कितने दिनोंे से इंंतजार कर रहा हूं। तुम वही आदमी हो न! जिसने मेरे उस दोस्त रूपी दुश्मन को वह शायरी लिखकर दी थी जिसने मेरी प्रेयसी का दिल चुरा लिया।’

दीपक बापू तो हक्का बक्का रह गये। फिर दबे स्वर में बोले-‘साहब, वह तो आपका मित्र था। मुझे तो पता ही नहीं। आप दोनों मेरे से बड़े थे। भला मैं क्या जानता था। मैंने तो उसे बस एक छंंटाक भर शायरी लिखकर कर दी थी। मुझे क्या पता वह उसका उपयोग कैसे करने वाला था। अब तो आपसे क्षमा याचना करता हूं। आप तो मेरी इन नवीनतम रचनाओं पर अपनी दृष्टि डालिये। अपनी सलाह दीजिये ताकि इनको कहीं भेज सकूं।’

नुक्ताचीनी साहब बोले-‘बेतुकी शायरियां लिखते हो यह मैं जानता हूं। छंटाक भर की उस शायरी ने मेरे को जो टनों का प्रहार किया उसे मैं भूल नहीं सकता। लाओ! अपनी यह नवीनतम रचानायें दिखाओ! क्या लिखा है?’

दीपक बापू ने बड़ी प्रसन्नता के साथ पूरी की पूरी फाइल उनके सामने रख दी। उन्होंने सरसरी तौर से उनको देखा और फिर जोर से पूरी फाइल उड़ा दी। सभी कागज हवा में उड़ गये और जमीन पर ऐसे ही गिरे जैसे कभी नुक्ताचीनी साहब के दिल टुकड़ होकर कोई यहां तो कोई वहां गिरा था। उन्होंने कुटिलता से मुस्कराते हुए कहा-‘बेकार हैं सब। दूसरा जाकर लिख लाओ। कवितायेंे बेतुकी हैं। व्यंग्य रुलाने वाले हैं और चिंतन तो ऐसा लगता है कि जैसे कोई गमगीन चुटकुला हो। तुम कभी भी कवि और लेखक नहीं बन सकते। मेरे विचार से तुम कहीं क्लर्क बन जाओ। वहां भी पत्र वगैरह लिखने का काम नहीं करना क्योंकि तुम्हारी भाषा लचर है।’

दीपक बापू अपने कागज समेटने में लग चुके थे। वह बोले-‘नुक्ताचीनी साहब आप जो कहैं सो ठीक, पर अच्छे होने का वरदान या बुरे होने का शाप तो दे सकते हैं पर लेखक और कवि न बन पाने की बात कहने का हक आपको नहीं है। हम बुरे रहे या अच्छे लेखक और कवि तो रहेंगे। जहां तक प्रभाव का सवाल है तो वह छंटाक भर की शायरी जो काम कर गयी। उसे तो आप जानते हैं।

यह बात सुनते ही नुक्ताचीनी साहब चिल्ला पड़े-‘गेट आउट फ्राम हियर (यहां से चले जाओ)।’
दीपक बापू वहां से हाथ एक हाथ में फाइल और दूसरे हाथ में साइकिल लेकर वहां से ऐसे फरार हुए कि नुक्ताचीनी साहब के घर से बहुत दूर चलने पर उनको याद आया कि साइकिल पर चढ़कर चला भी जाता है।

कई बार नुक्ताचीनी साहब रास्ते पर दिखाई देते पर दीपक बापू कन्नी काट जाते या रास्ता बदल देते। कहीं किसी दुकान पर दिखते तो वहां चीज खरीदना होती तब भी वहां नहीं जाते।

आज फंदेबाज उन्हीं नुक्ताचीनी साहब को लेकर उनके समक्ष प्रस्तुत हो रहा थां दीपक बापू यह नहीं समझ पा रहे थे कि उनके इन दोनों प्रकार के संकट का आपसे में लिंक कैसे हुआ!

फंदेबाज बोला-‘अच्छा ही हुआ यहां तुम मिल गये। बड़ी मुश्किल से इन नुक्ताचीनी साहब से मुलाकात का समय मिला। यह बहुत बड़े साहित्यक सिद्ध हैं। इनकी राय लेकर अनेक लोग बड़े लेखक और कवि बन गये हैं ऐसा मैंने सुना था। मैं साइबर कैफे में अंतर्जाल पर तुम्हारी पत्रिकायें दिखाने जा रहा था। उस पर यह अपनी राय देंगे। मैं चाहता हूं कि तुम्हारे ऊपर लगा फ्लाप लेखक का लेबल हट जाये और हिट बन जाओ। इसलिये इनको साथ ले जा रहा हूं कि शायद यह कोई नया विचार दें ताकि तुम हिट हो जाओ।

इससे पहले ही कि दीपक बापू कुछ कहते नुक्ताचीनी साहब उनके पास पहुंच गये और बोले-‘तो वह तू है। जिसकी इंटरनेट पर पत्रिकायें हैं और यह मुझे दिखाने ले जा रहा था। तू ने अभी तक लिखना बंद नहीं किया और अब मुझे शराब की बोतल और नमकीन का पैकेट भिजवाकर अपनी अंतर्जाल पत्रिकाओं के बारे में बताकर अपनी बात जंचाना चाहता है। अब सौदा किया है तो चल देख लेते हैं तेरी उन आकाशीय करतूतों को।’

दीपक बापू ने हाथ जोड़ते हुए कहा-‘अब छोडि़ये भी नुक्ताचीनी साहब। यह मेरा दोस्त तो नादान हैं। भला आप ही बताइये बेतुकी कवितायें, रोते हुए व्यंग्य और चुटकुले नुमा िचंतन लिखकर भला कोई कहीं हिट हो सकता है। यह तो पगला गया है ओर दूसरो की तरह हमको भी हिट देखना चाहता है ताकि दोस्तों और रिश्तेदारों मेंें हमसे दोस्ती का रौब जमा सके।’

नुक्ताचीनी साहब ने कहा-‘तो तू अब अंतर्जाल की पत्रिकायें दिखाने में डर रहा है। तुझे लग रहा है कि हम तेरी लिखी रचनाओं का बखिया उधेड़ देंगे।’
दीपक बापू बोले-‘नहीं आप तो बड़े दयालू आदमी है। वैसे मेरी सभी रचनायें बिना बखिया की हैं इसलिये उधेड़ने का सवाल ही नहीं हैं।’
नुक्ताचीनी साहब ने कहा-‘यह तेरी टोपी,धोती और कुर्ते पर काले दाग क्यों हैं। शायद साइकिल की चैन ठीक कर रहा था। अरे तेरे को शर्म नहीं आती। हम जैसे बड़े आदमी को चला रहा हैं। चल अपनी अंतर्जाल पत्रिकायें दिखा। यह तुझे पसीना क्यों आ रहा है? हम देखेंगे तेरी बेतुकी कवितायें, रोते व्यंग्य और चुटकुले नुमा चिंतन।’
इस पर फंदेबाज उखड़ गया और बोला-‘लगता है आप मेरे इस दोस्त को पहले से ही जानते हैंं पर आप इनके पसीने का मजाक न उड़ायें। वैसे मैंने आपको शराब की बोतल और नमकीन का पैकेट इसके फ्लाप होने के कारणों को बताने के लिये नहीं बल्कि हिट होने के लिये राय देने के लिये किया है। आप इस तरह बात नहीं कर सकते। आपकी मोटर साइकिल में पैट्रोल भी भरवाया है।’

दीपक बापू ने फंदेबाज से कहा-‘चुप कर! तू जानता नहीं कितने बड़े आदमी से बात कर रहा है। एक बात समझ नुक्ताचीनी साहब जो कहें सो ठीक!’

फिर वह नुक्ताचीनी साहब से बोले-‘आप अभी चले जाईये। शराब की बोतल और नमकीन का पैकेट भी भला कोई चीज है किसी दिन मैं आपके घर आकर और भी सामान लाऊंगा। आप तो मेरे प्रेरणा स्त्रोत है। पहले थोड़ा अच्छा लिख लूं। फिर अपनी अंतर्जाल पत्रिकायें आपको दिखाऊंगा।’

नुक्ताचीनी साहब बोले-‘यकीन नहीं होता कि तुम कभी अच्छा लिखा पाओगे। पर अभी जाता हूं और तुम्हारा इंतजार करूंगा।’

उनके जाने के बाद फंदेबाज बोला-‘तुमने मेरा कम से कम पांच सौ रुपये का नुक्सान करा दिया।’

दीपक बापू बोले-‘यह बरसों से खाली बैठा है। लिखता कुछ नहीं है पर अपनी राय से कई लोगों का लिखवाना बंद कर चुका है। अगर कहीं इसने अंतर्जाल पर पत्रिकायें देखते हुए कहीं लिखना सीख लिया तो समझ लो कि अपना लिखना गया तो तेल लेने। अपने पुराने लिखे पर ही सफाई देते हुए पूरी जिंदगी निकल जायेगी। समझे!

वहां से फंदेबाज भी चला गया। दीपक बापू काले धब्बे की अपनी टोपी से ही अपने को हवा लेने लगे। वहां पास में ही एक चाय के ठेले के पास गये और वहां छांव में रखी बैंच पर बैठ कर हुक्म लड़के से कहा-‘एक कट चाय अभी ले आओ। दूसरी थोड़ी देर बाद लाना। डबल टैंशन झेला है और डबल कट बिना नहीं उतरेगा।’

फिर वह सोचने लगे कि आखिर उनसे यह किसने कहा था कि साइकिल की चैन का उतरना वैसे ही अशुभ है जैसे रात में उल्लू का घर की छत पर बोलना।’
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किसी की भक्ति भी होती है सनसनीखेज खबर- हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)


जहां तक मेरी जानकारी है खबर में यही था कि अमेरिका में राष्ट्रपति पद उम्मीदवार ओबामा अपनी जेब में रखने वाले पर्स में कुछ पवित्र प्रतीक रखते हैं और उसमें सभवतः हनुमान जी की मूर्ति भी है, पर इसकी पुष्टि नहीं हो पायी है।
यह खबर देश के प्रमुख समाचार माध्यम ऐसे प्रकाशित कर रहे हैं जैसे कि कोई उनके हाथ कोई खास खबर लग गयी है और देश का कोई खास लाभ होने वाला है। यहां यह स्पष्ट कर दूं कि जिस अखबार में मैंने यह खबर पढ़ी उसमें साफ लिखा था कि ‘इसकी पुष्टि नहंी हो पायी।‘

जिस तरह इस खबर का प्रचार हो रहा है उससे लगता है कि अगर इसकी पुष्टि हो जाये तो फिर ओबामा की तस्वीरों की यहां पूजा होने लगेगी। जब पुष्टि नहीं हो पायी है तब यह शीर्षक आ रहे हैं ‘हनुमान भक्त ओबामा’, ओबामा करते हैं हनुमान जी में विश्वास’ तथा ‘हनुमान जी की मूति ओबामा के पर्स में’ आदि आदि। एक खबर जिसकी पुष्टि नहीं हो पायी उसे जबरिया सनसनीखेज और संवेदनशीन बनाने का प्रयास। यह कोई पहला प्रयास नहीं है।
अगर मान लीजिये ओबामा हनुमान जी में विश्वास रखते भी हैं तो क्या खास बात है? और नहीं भी करें तो क्या? वैसे हम कहते हैं कि भगवान श्रीराम और हनुमान जी हिंदूओं के आराध्यदेव हैं पर इसका एक दूसरा रूप भी है कि विश्व में जितने भी भगवान के अवतार या उनके संदेश वाहक हुए हैं इन्हीं प्रचार माध्यमों से सभी जगह प्रचार हुआ है और उनके व्यक्तित्व और कृतित्व में जो आकर्षण है उससे कोई भी प्रभावित हो सकता है। भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण और हनुमान के चरित्र विश्व भर में प्रचारित हैं और कोई भी उनका भक्त हो सकता है। श्रीरामायण और श्रीगीता पर शोध करने में कोई विदेशी या अन्य धर्म के लोग भी पीछे नहीं है।

ओबामा हनुमान जी भक्त हैं पर इस देश में असंख्य लोग उनके भक्त हैं। मैं हर शनिवार और मंगलवार को मंदिर अवश्य जाता हूं और वहां इतनी भीड़ होती है कि लगता है कि अपने स्वामी भगवान श्रीराम से अधिक उनके सेवक के भक्त अधिक हैं। कई जगह भगवान के श्रीमुख से कहा भी गया है कि मुझसे बड़ा तो मेरा सेवक और भक्त है-हनुमान जी के चरित्र को देखकर यह प्रमाणित भी होता है। भगवान श्रीराम की पूजा अर्चना के लिए कोई दिन नियत हमारे नीति निर्धारकों ने तय नहीं किया इसलिये उनके मंदिरों में लोग रोज आते जाते हैं और किसी खास पर्व के दिन पर ही उनके मंदिरों में भीड़ होती है और उस दिन भी हनुमान के भक्त ही अधिक आते हैं। यानि भारत के लोगों में हृदय में भगवान श्रीराम और हनुमान जी के लिये एक समान श्रद्धा है और उनकी कृपा भी है। फिर ओबामा को लेकर ऐसा प्रचार क्यों?

लोगों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश बेकार है कि देखो हमारे भगवान सब जगह पूजे जा रहे हैं इसलिये फिक्र की बात नहीं है अभी किसी दूसरे देश में किसी पर की है कभी हम पर भी करेंगे। इस प्रचार तो वही प्रभावित होंगे कि जिनको मालुम ही नहीं भक्ति होती क्या है? भक्ति कभी प्रचार और दिखावे के लिये नहीं होती। इतना शोर मच रहा है कि जैसे ओबामा ने पर्स में हनुमान जी मूर्ति रख ली तो अब यह प्रमाणित हो गया है कि हनुमान जी वाकई कृपा करते हैं। मगर इस प्रमाण की भी क्या आवश्यकता इस देश में है? यहां ऐसे एक नहीं हजारों लोग मिल जायेंगे जो बतायेंगे कि किस तरह हनुमान जी की भक्ति से उनको लाभ होते हैं। जिन लोगों में भक्ति भाव नहीं आ सकता उनके लिये यह प्रमाण भी काम नहीं करेगा। भगवान श्रीराम के निष्काम भाव से सेवा करते हुए श्री हनुमान जी ने उनके बराबर दर्जा प्राप्त कर लिया-जहां भगवान श्रीराम का मंदिर होगा वहां हनुमान जी की मूर्ति अधिकतर होती है पर हनुमान जी मंदिर में भगवान श्रीराम की मूर्ति हो यह आवश्यक नहीं है- पर ओबामा उनकी तस्वीर पर्स में रखकर क्या बनने वाले हैं। पांच साल अधिक से अधिक दस साल अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के अलावा उनके पास कोई उपलब्धि नहीं रहने वाली है। तात्कालिक रूप से यह उपलब्धि अधिक लगती है पर इतिहास की दृष्टि से कोई अधिक नहीं है। अमेरिका के कई राष्ट्रपति हुए हैं जिनके नाम हमें अब याद भी नहीं रहते। फिर अगर उनके हाथ सफलता हाथ लगती है तो वह किसकी कृपा से लगी मानी जायेगी। जहां तक मेरी जानकारी है तीन अलग-अलग प्रतीकों की बात की जा रही है जिनमें एक हनुमान जी की मूर्ति भी है। फिर यह प्रचार क्यों?

भारत सत्य का प्रतीक है और अमेरिका माया का। माया जब विस्तार रूप लेती है तो मायावी लोग सत्य के सहारे उसे स्थापित करने का प्रयास करते हैं। जिनके पास इस समय माया है उनको अमेरिका बहुत भाता है इसलिये वहां की हर खबर यहां प्रमुखता से छपती है। अगर वह धार्मिक संवेदनशीलता उत्पन्न करने वाली हो तो फिर कहना ही क्या? एक बात बता दूं कि इस बारे में मैंने एक ही अखबार पढ़ा है और उसमें इसकी पुष्टि न करने वाली बात लिखी हुई। तब संदेह होता है कि यह सच है कि नहीं। और है भी तो मेरा सवाल यह है कि इसमें खास क्या है? क्या हनुमान जी की भक्ति करने वाले मुझ जैसे लोगों को किसी क्रे प्रमाण या विश्वास के सहारे की आवश्यकता है?

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शैतान कभी मर नहीं सकता-हास्य व्यंग्य


शैतान कभी इस जहां में मर ही नहीं सकता। वजह! उसके मरने से फरिश्तों की कदर कम हो जायेगी। इसलिये जिसे अपने के फरिश्ता साबित करना होता है वह अपने लिये पहले एक शैतान जुटाता है। अगर कोई कालोनी का फरिश्ता बनना चाहता है तो पहले वह दूसरी कालोनी की जांच करेगा। वहां किसी व्यक्ति का-जिससे लोग डरते हैं- उसका भय अपनी कालोनी में पैदा करेगा। साथ ही बतायेगा कि वह उस पर नियंत्रण रख सकता है। शहर का फरिश्ता बनने वाला दूसरे शहर का और प्रदेश का है तो दूसरे प्रदेश का शैतान अपने लिये चुनता है। यह मजाक नहीं है। आप और हम सब यही करते हैं।

घर में किसी चीज की कमी है और अपने पास उसके लिये लाने का कोई उपाय नहीं है तो परिवार के सदस्यों को समझाने के लिये यह भी एक रास्ता है कि किसी ऐसे शैतान को खड़ा कर दो जिससे वह डर जायें। सबसे बड़ा शैतान हो सकता है वह जो हमारा रोजगार छीन सकता है। परिवार के लोग अधिक कमाने का दबाव डालें तो उनको बताओं कि उधर एक एसा आदमी है जिससे मूंह फेरा तो वह वर्तमान रोजगार भी तबाह कर देगा। नौकरी कर रहे हो तो बास का और निजी व्यवसाय कर रहे हों तो पड़ौसी व्यवसायी का भय पैदा करो। उनको समझाओं कि ‘अगर अधिक कमाने के चक्कर में पड़े तो इधर उधर दौड़ना पड़ा तो इस रोजी से भी जायेंगे। यह काल्पनिक शैतान हमको बचाता है।
नौकरी करने वालों के लिये तो आजकल वैसे भी बहुत तनाव हैं। एक तो लोग अब अपने काम के लिये झगड़ने लगे हैं दूसरी तरफ मीडिया स्टिंग आपरेशन करता है ऐसे में उपरी कमाई सोच समझ कर करनी पड़ती है। फिर सभी जगह उपरी कमाई नहीं होती। ऐसे में परिवार के लोग कहते हैं‘देखो वह भी नौकरी कर रहा है और तुम भी! उसके पास घर में सारा सामान है। तुम हो कि पूरा घर ही फटीचर घूम रहा है।
ऐसे में जबरदस्ती ईमानदारी का जीवन गुजार रहे नौकरपेशा आदमी को अपनी सफाई में यह बताना पड़ता है कि उससे कोई शैतान नाराज चल रहा है जो उसको ईमानदारी वाली जगह पर काम करना पड़ रहा है। जब कोई फरिश्ता आयेगा तब हो सकता है कि कमाई वाली जगह पर उसकी पोस्टिंग हो जायेगी।’
खिलाड़ी हारते हैं तो कभी मैदान को तो कभी मौसम को शैतान बताते हैं। किसी की फिल्म पिटती है तो वह दर्शकों की कम बुद्धि को शैताना मानता है जिसकी वजह से फिल्म उनको समझ में नहीं आयी। टीवी वालों को तो आजकल हर दिन किसी शैतान की जरूरत पड़ती है। पहले बाप को बेटी का कत्ल करने वाला शैतान बताते हैं। महीने भर बाद वह जब निर्दोष बाहर आता है तब उसे फरिश्ता बताते हैं। यानि अगर उसे पहले शैतान नहीं बनाते तो फिर दिखाने के लिये फरिश्ता आता कहां से? जादू, तंत्र और मंत्र वाले तो शैतान का रूप दिखाकर ही अपना धंध चलाते हैं। ‘अरे, अमुक व्यक्ति बीमारी में मर गया उस पर किसी शैतान का साया पड़ा था। किसी ने उस पर जादू कर दिया था।’‘उसका कोई काम नहीं बनता उस पर किसी ने जादू कर दिया है!’यही हाल सभी का है। अगर आपको कहीं अपने समूह में इमेज बनानी है तो किसी दूसरे समूह का भय पैदा कर दो और ऐसी हालत पैदा कर दो कि आपकी अनुपस्थिति बहुत खले और लोग भयभीत हो कि दूसरा समूह पूरा का पूरा या उसके लोग उन पर हमला न कर दें।’
अगर कहीं पेड़ लगाने के लिये चार लोग एकत्रित करना चाहो तो नहीं आयेंगे पर उनको सूचना दो कि अमुक संकट है और अगर नहीं मिले भविष्य में विकट हो जायेगता तो चार क्या चालीस चले आयेंगे। अपनी नाकामी और नकारापन छिपाने के लिये शैतान एक चादर का काम करता है। आप भले ही किसी व्यक्ति को प्यार करते हैं। उसके साथ उठते बैैठते हैं। पेैसे का लेनदेन करते हैं पर अगर वह आपके परिवार में आता जाता नहीं है मगर समय आने पर आप उसे अपने परिवार में शैतान बना सकते हैं कि उसने मेरा काम बिगाड़ दिया। इतिहास उठाकर देख लीजिये जितने भी पूज्यनीय लोग हुए हैं सबके सामने कोई शैतान था। अगर वह शैतान नहीं होता तो क्या वह पूज्यनीय बनते। वैसे इतिहास में सब सच है इस पर यकीन नहीं होता क्योंकि आज के आधुनिक युग में जब सब कुछ पास ही दिखता है तब भी लिखने वाले कुछ का कुछ लिख जाते हैं और उनकी समझ पर तरस आता है तब लगता है कि पहले भी लिखने वाले तो ऐसे ही रहे होंगे।
एक कवि लगातार फ्लाप हो रहा था। जब वह कविता करता तो कोई ताली नहीं बजाता। कई बार तो उसे कवि सम्मेलनों में बुलाया तक नहीं जाता। तब उसने चार चेले तैयार किये और एक कवि सम्मेलन में अपने काव्य पाठ के दौरान उसने अपने ऊपर ही सड़े अंडे और टमाटर फिंकवा दिये। बाद में उसने यह खबर अखबार में छपवाई जिसमें उसके द्वारा शरीर में खून का आखिरी कतरा होने तक कविता लिखने की शपथ भी शामिल थी । हो गया वह हिट। उसके वही चेले चपाटे भी उससे पुरस्कृत होते रहे।
जिन लड़कों को जुआ आदि खेलने की आदत होती है वह इस मामले में बहुत उस्ताद होते हैं। पैसे घर से चोरी कर सट्टा और जुआ में बरबाद करते हैं पर जब उसका अवसर नहीं मिलता या घर वाले चैकस हो जाते हैं तब वह घर पर आकर वह बताते हैं कि अमुक आदमी से कर्ज लिया है अगर नहीं चुकाया तो वह मार डालेंगे। उससे भी काम न बने तो चार मित्र ही कर्जदार बनाकर घर बुलवा लेंगे जो जान से मारने की धमकी दे जायेंगे। ऐसे में मां तो एक लाचार औरत होती है जो अपने लाल को पैसे निकाल कर देती है। जुआरी लोग तो एक तरह से हमेशा ही भले बने रहते हैं। उनका व्यवहार भी इतना अच्छा होता है कि लोग कहते हैं‘आदमी ठीक है एक तरह से फरिश्ता है, बस जुआ की आदत है।’
जुआरी हमेशा अपने लिये पैसे जुटाने के लिये शैतान का इंतजाम किये रहते हैं पर दिखाई देते हैं। उनका शैतान भी दिखाई देता है पर वह होता नहीं उनके अपने ही फरिश्ते मित्र होते हैं। आशय यह है कि शैतान अस्तित्व में होता नहीं है पर दिखाना पड़ता है। अगर आपको परिवार, समाज या अपने समूह में शासन करना है तो हमेशा कोई शैतान उसके सामने खड़ा करो। यह समस्या के रूप में भी हो सकता है और व्यक्ति के रूप में भी। समस्या न हो तो खड़ी करो और उसे ही शैतान जैसा ताकतवर बना दो। शैतान तो बिना देह का जीव है कहीं भी प्रकट कर लो। किसी भी भेष में शैतान हो वह आपके काम का है पर याद रखो कोई और खड़ा करे तो उसकी बातों में न आओ। यकीन करो इस दुनियां में शैतान है ही नहीं बल्कि वह आदमी के अंदर ही है जिसे शातिर लोग समय के हिसाब से बनाते और बिगाड़ते रहते हैं।
एक आदमी ने अपने सोफे के किनारे ही चाय का कप पीकर रखा और वह उसके हाथ से गिर गया। वह उठ कर दूसरी जगह बैठ गया पत्नी आयी तो उसने पूछा-‘यह कप कैसे टूटा?’उसी समय उस आदमी को एक चूहा दिखाई दिया। उसने उसकी तरफ इशारा करते हुए कहा-‘उसने तोड़ा!’पत्नी ने कहा-‘आजकल चूहे भी बहुत परेशान करने लगे हैं। देखो कितना ताकतवर है उसकी टक्कर उसे कम गिर गया। चूहा है कि उसके रूप में शेतान?
वह चूहा बहुत मोटा था इसलिये उसकी पत्नी को लगा कि हो सकता है कि उसने गिराया हो और आदमी अपने मन में सर्वशक्तिमान का शुक्रिया अदा कर रहा कि उसने समय पर एक शैतान-भले ही चूहे के रूप में-भेज दिया।’याद रखो कोई दूसरा व्यक्ति भी आपको शैतान बना सकता है। इसलिये सतर्क रहो। किसी प्रकार के वाद-विवाद में मत पड़ो। कम से कम ऐसी हरकत मत करो जिससे दूसरा आपको शैतान साबित करे। वैसे जीवन में दृढ़निश्चयी और स्पष्टवादी लोगों को कोई शैतान नहीं गढ़ना चाहिए, पर कोई अवसर दे तो उसे छोड़ना भी नहीं चाहिए। जैसे कोई आपको अनावश्यक रूप से अपमानित करे या काम बिगाड़े और आपको व्यापक जनसमर्थन मिल रहा हो तो उस आदमी के विरुद्ध अभियान छेड़ दो ताकि लोगों की दृष्टि में आपकी फरिश्ते की छबि बन जाये। सर्वतशक्तिमान की कृपा से फरिश्ते तो यहां कई मनुष्य बन ही जाते हैं पर शैतान इंसान का ही ईजाद किया हुआ है इसलिये वह बहुत चमकदार या भयावह हो सकता है पर ताकतवर नहीं। जो लोग नकारा, मतलबी और धोखेबाज हैं वही शैतान को खड़ा करते हैं क्योंकि अच्छे काम कर लोगों के दिल जीतने की उनकी औकात नहीं होती।
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गरीबों का नाम बहुत बड़ा, दर्शन होता है छोटा-हास्य व्यंग्य


एक टीवी चैनल पर प्याज के बढती कीमतों पर लोगों के इन्टरव्यू आ रहे थे, और चूंकि उसमें सारा फोकस मुंबई और दिल्ली पर था इसलिये वहाँ के उच्च और मध्यम वर्ग के लोगों से बातचीत की जा रही थी। प्याज की बढती कीमतें देश के लोगों के लिए और खास तौर से अति गरीब वर्ग के लिए चिंता और परेशानी का विषय है इसमें कोई संदेह नहीं है पर जिस तरह उसका रोना उसके ऊंचे वर्ग के लोग रोते हैं वह थोडा अव्यवाहारिक और कृत्रिम लगता है। उच्च और मध्यम वर्ग के लोग यही कह रहे थे किश्प्याज जो पहले आठ से दस रूपये किलो मिल रहा था वह अब पच्चीस रूपये होगा। इसे देश का गरीब आदमी जिसका रोटी का जुगाड़ तो बड़ी मुशिकल से होता है और वह बिचारा प्याज से रोटी खाकर गुजारा करता है, उसका काम कैसे चलेगाश्?

अब सवाल है कि क्या वह लोग प्याज की कीमतों के बढने से इसलिये परेशान है कि इससे गरीब सहन नहीं कर पा रहे या उन्हें खुद भी परेशानी है? या उन्हें अपने पहनावे से यह लग रहा था कि प्याज की कीमतों के बढने पर उनकी परेशानी पर लोग यकीन नहीं करेंगे इसलिये गरीब का नाम लेकर वह अपने साक्षात्कार को प्रभावी बना रहे थे। हो सकता है कि टीवी पत्रकार ने अपना कार्यक्रम में संवेदना भरने के लिए उनसे ऐसा ही आग्रह किया हो और वह भी अपना चेहरा टीवी पर दिखाने के लिए ऐसा करने को तैयार हो गये हौं। यह मैं इसलिये कह रहा हूँ कि एक बार मैं हनुमान जी के मंदिर गया था और उस समय परीक्षा का समय था। उस समय कुछ भक्त विधार्थी मंदिर के पीछे अपने रोल नंबर की पर्ची या नाम लिखते है ताकि वह पास हो सकें। वहां ऐक टीवी पत्रकार एक छात्रा को समझा रहा थाश्आप बोलना कि हम यहाँ पर्ची इसलिये लगा रहे हैं कि हनुमान जीं हमारी पास होने में मदद करें।श्
उसने और भी समझाया और लडकी ने वैसा ही कैमरे की सामने आकर कहा। वैसे उस छात्र के मन में भी वही बातें होंगी इसमें कोई शक नहीं था पर उसने वही शब्द हूबहू बोले जैसे उससे कहा गया था।

प्याज पर हुए इस कार्यक्रम में जैसे गरीब का नम लिया जा रहा था उससे तो यही लगता था कि यह बस खानापूरी है। मेरे सामने कुछ सवाल खडे हुए थे-
क्या इसके लिए कोई ऐसा गरीब टीवी वालों को नहीं मिलता जो अपनी बात कह सके। केवल उन्हें शहरों में उच्च और मध्यम वर्ग के लोग ही दिखते हैं, और अगर गरीब नहीं दिखते तो यह कैसे पता लगे कि गरीब है भी कि नहीं। जो केवल प्याज से रोटी खाता है उसका पहनावा क्या होगा यह हम समझ सकते हैं तो यह टीवी पत्रकार जो अपने परदे पर आकर्षक वस्त्र पहने लोगों को दिखाने के आदी हो चुके हैं क्या उससे सीधे बात कराने में कतराते हैं जो वाकई गरीब है। उन्हें लगता है कि गरीब के नाम में ही इतनी ही संवेदना है कि लोग भावुक हो जायेंगे तो फिर फटीचर गरीब को कैमरे पर लाने की क्या जरूरत है। जो गरीब है उसे बोलने देना का हक ही क्या है उसके लिए तो बोलने वाले तो बहुत हैं-क्या यही भाव इन लोगों का रह गया है। आजादी के बाद से गरीब का नाम इतना आकर्षक है कि हर कोई उसकी भलाई के नाम पर राजनीति और समाज सेवा के मैदान में आता है पर किसी वास्तविक गरीब के पास न उन्हें जाते न उसे पास आते देखा जाता है। जब कभी पैट्रोल और डीजल की दाम बढ़ाये जाते है तो मिटटी के तेल भाव इसलिये नही बढाए जाते क्योंकि गरीब उससे स्टोव पर खाना पकाते हैं। जब कि यह वास्तविकता है कि गरीबों को तो मिटटी का तेल मिलना ही मुश्किल हो जाता है। देश में ढ़ेर सारी योजनाएं गरीबों के नाम पर चलाई जाती हैं पर गरीबों का कितना भला होता है यह अलग चर्चा का विषय है पर जब आप अपने विषय का सरोकार उससे रख रहे हैं तो फिर उसे सामने भी लाईये। प्याज की कीमतों से कोई मध्यम वर्ग कम परेशान नहीं है और अब तो मेरा मानना है कि मध्यम वर्ग के पास गरीबों से ज्यादा साधन है पर उसका संघर्ष कोई गरीब से कम नहीं है क्योंकि उसको उन साधनों के रखरखाव पर भी उसे व्यय करने में कोई कम परेशानी नहीं होती क्योंकि वह उनके बिना अब रह नहीं सकता और अगर गरीब के पास नहीं है तो उसे उसके बिना जीने की आदत भी है। पर अपने को अमीरों के सामने नीचा न देखना पडे यह वर्ग अपनी तकलीफे छिपाता है और शायद यही वजह है कि ऐक मध्यम वर्ग के व्यक्ति को दूसरे से सहानुभूति नहीं होती और इसलिये गरीब का नाम लेकर वह अपनी समस्या भी कह जाते है और अपनी असलियत भी छिपा जाते हैं। यही वजह है कि टीवी पर गरीबों की समस्या कहने वाले बहुत होते हैं खुद गरीब कम ही दिख पाते हैं। सच तो यह है कि गरीबों के कल्याण के नारे अधिक लगते हैं पर उनके लिये काम कितना होता है यह सभी जानते हैं।

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भृतहरि शतकःसच्चे और खरे मित्र मिलना कठिन


पापान्निवारयति योजयते हिताय
गुह्मं निगूहति गुणान्प्रकटीकरोति।
आपद्गतं च न जहाति ददाति काले
सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः

हिन्दी में भावार्थ- अपने मित्र को अधर्म और पाप से बचाना, उसके हित में संलग्न रहते हुए उसके गुप्त रहस्य किसी अन्य व्यक्ति के सामने प्रकट न करना, विपत्ति काल में भी उसके साथ रहना और आवश्यकता पड़े तो उसकी तन, मन और धन से सहायता करना यही मित्रता का लक्षण है।

संक्षिप्त व्याख्या-अक्सर हम लोग कहते है कि अमुक हमारा मित्र है और यह दावा करते हैं कि समय आने पर वह हमारे काम आयेगा। आजकल यह दावा करना मिथ्या है। देखा जाये तो लोग अपने मित्रों पर इसी विश्वास के कारण संकट में आते हैं। सभी परिचित लोगों को मित्र मानने की प्रवृत्ति संकट का कारण बनती है। कई बार हम लोग अपने गुप्त रहस्य किसी को बिना जांचे-परखे मित्र मानकर बता देते हैं बाद में पता लगता है कि उसका वह रहस्य हजम नहीं हुए और सभी को बताता फिर रहा है। वर्तमान में युवा वर्ग को अपने मित्र ही अधिक भ्रम और अपराध के रास्ते पर ले जाते हैं।

आजकल सच्चे और खरे मित्र मिलना कठिन है इसलिये सोच समझकर ही लोगों को अपना मित्र मानना चाहिए। वैसे कहना तो पड़ता ही है कि‘अमुक हमारा मित्र है’ पर वह उस मित्रता की कसौटी पर वह खरा उतरता है कि नहीं यह भी देख लेना चाहिए। भले जुबान से कहते रहे पर अपने मन में किसी को मित्र मान लेने की बात बिना परखे नहीं धारण करना चाहिए।

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असली पुतलों का खेल-लघुकथा


कठपुतली का खेल दिखाने वाला एक व्यक्ति अपना काम बंद कर स्टेडियम के बाहर मूंगफली का ठेला लगाकर बैठ गया था। बचपन में उसका खेल देखने वाले व्यक्ति ने जब उसे देखा तो पूछा-‘ तुमने कठपुतली का खेल दिखाना बंद कर यह मूंगफली का ठेला लगाना कब से शुरू कर दिया ?’

वह बोला-‘बरसों हो गये। जब से इन असली पुतलों का खेल शूरू हुआ है तब से अब लकड़ी के नकली पुतलों का खेल छोड़कर इधर ही आते हैं। इसलिए मैं भी इधर आ गया।

वह आदमी हंस पड़ा तो उसने कहा-‘‘आप अखबार तो पड़ते होंगे। यह हाड़मांस के असली पुतले भी कोई न तो अपनी बोलते हैं न चाल चलते हैं। इनकी भी डोर किसी नट के हाथ में ही तो है। स्टेडियम में लोग तालियां बजाते हैं पर किसके लिये? जो खेल रहे हैं वह क्या अपने मजे के लिये खेल रहे हैं? नहीं वह पैसा कमाने के लिये खेल रहे हैं। आप फिल्मों में हीरो-हीरोइन के देख लीजिये वह भी तो किसी के कहने पर डायलाग बोलते हैं, नाचते हैं और झगड़े के सीन करते हैं। बड़े लोग जिनके पास किसी के पास जाने की फुर्सत नहीं है इन मैचों और संगीत कार्यक्रमों को देखने आते हैं। भला हमारे खेल को कौन देखता? इसलिये अब मैं स्टेडियम के बाहर आते खिलाडियों, अभिनेताओं और दर्शकों को ऐसे ही देखता हूं जैसे वह मेरे पुतलों को देखते थे।

उस आदमी ने कहा-तो तुम अब खेल देखते हो? वह भी बाहर बैठकर।

वह बोला-‘‘दर्शक तो मैं ही हूं जो इतने सारे पुतलों को देख रहा हूं। बाकी सब तो करतब दिखाने वाले हैं। हां, हमारे खेल में हम दिखते थे पर इनके नट कौन है उनको कोई नहीं देख पाता। यह सब कैमरे का कमाल है।’’
————————————————–

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माफ़ी किस बात की-हिन्दी शायरी

अपनी जिंदगी में कामयाबी पाने का नशा
आदमी के सिर कुछ यूं चढ़ जाता
कि नाकामी झेलने की मनस्थिति में नहीं आता
जजबातों के खेल में
कुछ ऐसा भी होता है
कि जिसकी चाहत दिल में होती
वही पास नहीं आता है
इस जिंदगी के अपने है दस्तूर
अपने दस्तूरों पर चलने वाला
आदमी हमेशा पछताता है
……………………..

अपने वादे से मुकर कर उसने कहा
‘यार माफ करना मैंने तुम्हें धोखा दिया’
हमने कहा
‘माफी किस बात की
भला कब हमने तुम पर यकीन किया’
………………………………………………. .

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आँखें उनको देखने को तरस जाती हैं-हिंदी शायरी


मेरी नाव डुबोने वाले बहुत हैं
पर उनकी याद कभी नहीं आती
मझधार में भंवर के बीच आकर जो
किनारे तक पहुंचा जाते
फिर नजर नहीं आते
ऐसे मित्रों की याद मुझे सताती

घाव करने के लिए इस जहां में बहुत हैं
जो बदन से रिसता लहू देखकर
जोर से मुस्कराते हैं
जिन्होंने घावों को सहलाया
जब तक दूर नहीं हुआ दर्द
अपना साथ निभाया
फिर ऐसे गायब हुए कि दिखाई न दिए
आँखें उनको देखने को तरस जाती हैं

इस जिन्दगी के खेल बहुत हैं
नाखुश लोगों से दूर नहीं जाने देती
जो तसल्ली देते हैं
उनको आँखों से दूर ले जाती है
शायद इसलिए दुनिया रंगरंगीली कहलाती हैं
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