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चाणक्य नीति:बुद्धिमान व्यक्ति की पहचान


  1. जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।
  2. समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं। मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।
  3. जब तक बारिश नहीं आती कोयल नहीं गाती, वह समयानुकूल स्वर निकालती है। पशु-पक्षी समय के अनुसार अपने क्रियाएँ करते हैं और जो मनुष्य समय का ध्यान नहीं रखते वह पसु-पक्षियों से भी गए गुजरे हैं। उसी कवि की शोभा और उपयोगिता होती है जो समयानुकूल होता है। बेमौसम राग अलापना जग हँसाई कराना है।

खाली समय परनिंदा में नहीं सत्संग बिताएँ


प्रात: हम जब नींद से उठते हैं तो हमारा ध्यान कल गुजरी बातों पर जाता है या पूरे दिन की योजना बनाने का विचार दिमाग में आता है। इस तरह जो हमने नींद से उर्जा अर्जित की होती है वह मिनट में समाप्त हो जाती है। इतना ही नहीं जा द्द्र्ता हमारे मस्तिषक में विश्राम की वजह से आयी होती है वह भी समाप्त हो जाती है।
हम अपनी उसी दुनिया में घूमने का आदी होते हैं जो हमने देखी होती है। अपनी तरफ से न तो कुश नया सोचते हैं न ही किसी नये सुख के कल्पना करते हैं। न ही कभी नये दोस्त बनाने का विचार आता है न ही कोइ नयी कल्पना करने का इरादा बनाते हैं। धीरे हमारे अंदर एक बौध्दिक ठहराव आने लगता है और हम बोरियत महसूस करने लगते हैं। हमारे मस्तिष्क में जड़ता का भाव आने लगता है। हम यह भूल जाते हैं कि हमारी देह की पूरी शक्ति मस्तिष्क में होती है और जैसे वह कमजोर होने लगता है हम न केवल स्वभाव से वर्ण देह से भी रुग्ण होते जाते हैं। हम ऎसी सिथ्ती में आते जाते हैं जहां अपना जीवन बोझिल लगाने लगता है- तब हम ऎसी हरकतें करने लगते हैं जो तकलीफ कम करने की बजाय बदती है। हमें जब कम खाना चाहिऐ तब ज्यादा खाने लगते हैं और जब जितना खाना चाहिऐ उससे कम खाते हैं। जो नहीं खाना चाहिऐ उसे खाते हैं और जो खाना चाहिऐ वह हमें पसंद नहीं आता। जो हजम नही होता वह खाने का मन करता है और जिससे पेट पचा नही सकता उसे जानते हुए भी केवल स्वाद के लिए खाते हैं।

मतलब हमारा अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण कम होते होते समाप्त हो जाता हिया। मानव को अन्या जीवों से सर्वश्रेष्ठ केवल उसकी बुध्दी की वजह से माना जाता है और जब हम उस पर से नियंत्रण खो बैठे तो हम स्वयं को मानव केवल देह से कह सकते हैं बाकी तो हमारे सारे कर्म पशु-पक्षियों की तरह सवाल अपने पेट भरने तक सीमित रह जाते हैं। इतना हे नही हमारे अन्दर मौजूद अंहकार यह जताता है कि हम दुनिया के सबसे बध्दिमान व्यक्ति हैं और हम उल्टी सीधी हरकतें करते रहते हैं। इसका पता हमें तब तक नहीं चलता जब तक हम किसी ज्ञानी आदमी से नहीं मिला करते। अपने आसपास जो लोग हैं वह भी अपनी तरह होते हैं तो जब उन्हें अपने को देखना नहीं आता वह दूसरों के व्यक्तित्व का अवलोकन क्या करेगा । यहां तो हर कोई अपनी बात चीख और चिल्ला कर कह रहा है कोई किसी की सुन कहॉ रहा है जो दुसरे की सुनाकर अपनी बात कह सके। सबके अपने दर्द हैं कोई भला दुसरे का हमदर्द कैसे बन सकता है। हमें अपने बारे में ज्ञानियों के बीच ही बैठकर ही जन सकते हैं कि हम कितने पानी में हैं। ज्ञानी एक एक व्यक्ति पकड़ कर नहीं बताते कि तुझमें यह गुण है या यह अवगुण है। वह एक फ्रेम बताते हैं कि इस प्रकार आदमी में गुण होना चाहिऐ और कैसा अवगुण है जिससे उसे दूर रहना चाहिऐ । अब पूछेंगे कि ऐसे ज्ञानी कहॉ मिलेंगे तो इसमें सोचने वाली बात नहीं है। जब हमें कोइ समन खरीदना होता है तो उसका ज्ञान हमें हाल हो जाता है पर देखिए इतनी जरा सी बात हमें पूछनी पड़ती है कि ज्ञानी कहाँ मिलेगा। ज्ञानियों के मिलने का स्थान है सत्संग। हमारे देश की बरसों पराने है सत्संग । हमारे पूर्वजों ने पहले ही यह जान लिया था कि सत्संग के बिना आदमी का काम चल जाये यह संभव नहीं है। इसीलिये उन्होने ऎसी जगहों का निर्माण कराया जहाँ आदमी दुनियां जहाँ की बातें छोडकर कवल भगवन में मन लगाने के लिए मिल सके । यह परम्परा आज भी चल रही है। अब थोडा रुप बदल गया है। अब दुनिया ने तरक्की की है और टीवी पर घर बैठे-बैठे ही सत्संग नसीब होता है फिर भी लोग सत्संगों में बहार जाती हैं क्योंकि घर पर सत्संग तो मिलता है और ज्ञानी भी मिलता है पर सत्संगी कोइ नही मिलता। अगर कोइ ज्ञानी जरूरी है तो साथ में सत्संगी भी जरूरी है । सत्संग का मतलब कवल सुनना ही नहीं है वरन गुनना भी है और वह तभी सम्भव है जब हमें कोइ सत्संग मिले
लोग कहते हैं कि सत्संग तो कवल बुदापे में ही करना चाहिऐ । में उसका उलटा ही देखता हूँ जिन्होंने युवास्था में सत्संग नहीं किया बुदापे में उनका मन सत्संग की तरफ जाता ही नहीं है। सत्संग में तो वह या तो इसीलिये जाते हैं कि घर पर बहुएँ बैठी हैं भला क्या बैठकर अपने घर पर अपनी भद्द पित्वाऊँ । या वह दुनियां वालों को यह दिखाने जाते हैं कि हम अब हम धार्मिक हो गए हैं अब हमारी दुनियादार्र में दिलचस्पी नही है। । सत्संग में भी जाकर उन्हें चेन नही पड़ता वहां भी वह निंदा और पर्निन्द्दा करने वालों को ढूंढते हैं या वहां सोते हैं। मतलब यह है कि युवावस्था में ही अपना ध्यान भगवन भक्ती में लगाना चाहिऐ ।

सेवक से स्वामी भक्ती से भगवान:श्री हनुमान


श्री हनुमानजी के भक्तों की कमी नहीं है। जो भगवान् श्री राम का भक्त है वही श्री हनुमान का भी है। हनुमान जयंती की शुभकामनाएँ ।
आज हनुमान जयंती है। हनुमान जी में हªदय से भक्तिभाव रखने वाले लोग उनकेप्रभाव को जानते है। हनुमान जी के चरित्र को आज के संदर्भों में देखें तो ऐसा लगता है कि उनमें भक्तिभाव रखने के साथ उनके चरित्र की भी चर्चा करना चाहिए। श्री हनुमान जी के चरित्र के मूल में मु-हजये उनका भगवान श्रीराम के प्रति ‘सेवाभाव‘ और ‘भक्ति भाव’’ और श्री सुग्रीव के प्रति मैत्रीभाव सदैव मु-हजये आकर्षित करता रहा है। मैं जब उनका स्मरण करता हूं तो ‘सेवक से स्वामी’और ‘भक्त से भगवान’ बनने वाले एक इष्ट की तस्वीर मेरे मस्तिष्क में उभरती है। यह तस्वीर मेरे मस्तिष्क में इस तरह स्थापित है कि जब मैं प्रति मंगलवार जब मंदिर जाता हूं तो उनकी वहां स्थापित तस्वीर से अधिक मेरे हªदय में स्थापित तस्वीर मु-हजये आकर्षित किये रहती है और मु-हजये लगता है वही मेरे सामने है।वर्तमान में जब मै समाज की हालत देखता हूं तो लगता है कि हनुमान जी चरित्र के मूल गुणों की भी व्याख्या करना चाहिए। आजकल लोग सेवक की बजाय स्वामी बनने के लिये आतुर रहते है और जिनके हाथ में वैभव का भंडार है वह भगवान बनकर अपने लिये भक्तों को खरीदना चाहते है। हनुमान जी का राम और सुग्रीव के प्रति जो समर्पण था वह सत्य और धर्म की वजह से था-न कि उसके पीछे उनका कोई स्वार्थ था। श्री राम मर्यादा पुरुषोतम थे ओर किसी भी स्थिति में उन्होंने धर्म से मूंह नहीं मोड़ा था। सुग्रीव ने हर स्थिति में श्रीराम को सहायता का आश्वासन दिया था। जब राजपाट मिल गया और वह वैभव और व्यसनों के मायाजाल में फंसकर अपना मूल कर्तव्य भुला दिया तब एक हनुमान ही थे जो उन्हें लगातार सम-हजयाते रहे कि उन्हें अपने कर्तव्य का स्मरण करना चाहिए। श्रीसुग्रीव ने उनकी बात मान ली और उन्हे तैयार होने का आदेश दिया। इसी बीच कुपित लक्ष्मण जब उनके महल में दाखिल हो गये तो सबसे पहले हनुमानजी ने ही उन्हें सम-हजयाया था। श्रीलक्ष्मण जी उनकी बात सुनकर ही शांत हुए थे। इस प्रसंग में यह स्मष्ट होता है कि श्रीहनुमान जी न वरन् समय, देशकाल तथा राज्य की परिस्थितियों का ज्ञान रखते थेबल्कि उनहे राजनीति का भी अच्छा ज्ञान था। किष्किंधा में सुग्रीव के बाद श्री हनुमान जी को ही सम्मान प्राप्त था। यह उनके बाहूबल के साथ उनके बुद्धिमान होनेका भी प्रमाण था।जब सीता जी की खोज में सब वानर थक गये तब उनके नेता अंगद का धीरज टूट गया और वह आमरण अनशन पर बैठ गये। श्री हनुमान ने तब विचार किया कि इस तरह तो अंगद संभवतः सुग्रीव का राज्य छीन लेंगे-कारण वानरों में कष्ट सहने की क्षमता वैसे ही कम होती है, और जब भूख से यह लोग बिलबिलाऐंगे ओर उनको परिवार की याद आयेगी तो वह उग्र हो जायेंगे और सुग्रीव का भय इनमें समाप्त हो जायेगा। तब वह अंगद को आगे कर उनसे लड़ने को भी तैयार हो जायेंगे।विचार करते हुए श्रीहनुमान जी ने वहां सब वानरों को पृथक-पृथक सम-हजया कर अंगद से अलग कर दिया और फिर उन्हें सम-हजयाने लगे कि यह वानर आपका लंबे समय तक साथ देने वाले नहीं है पर इससे आप सुग्रीव को जरूर नाराज कर लेंगे। उनकी बात का अंगद पर प्रभाव हुआ और वह अपना अभियान आगे जारी रखने को तैयार हुए। इस प्रसंग से श्रीहनुमान जी के रणनीतिक चातुर्य और बौद्धिक कौशल की जो अनूठी मिसाल मिलती है वह विरले ही चरित्रों में होती है।उनका एक गुण जिसनेउनके चरित्र को भगवान पद पर प्रतिष्ठित किया वह हैअहंकार रहित होना। इतने शक्तिशाली और बुद्धिमान होत हुए भी किसी को हानि पहुंचाना या अपमानित करने जैसा कार्य उन्होंने कभी नहीं किया। वह अपनी शक्ति का स्मरण तक नहीं करते थे। जब लंका जाने का प्रश्न आया तो सब घबड़ा गये तब जाम्बवान ने जब श्रीहनुमान को अपनी शक्ति का स्मरण कराकर इस कार्य के लिये प्रेरित किया तब वह तैयार हो गये। जरा हम आजकल लोगों को देखों थोड़ा धन, छोटा पद, और छोटी सफलता में ही मतमस्त हो जाते है। उन्हें श्रीहनुमान जी यह सीखना चाहिए कि शक्ति का प्रदर्शन दूसरों का दिखाने के लिये वरन् उनके हित के लिये करना चाहिए।मैंने श्रीहनुमान जी के चरित्र की जो चर्चा की उसे हर कोई जानता है। मेरा मानना चाहिए कि चर्चा फिर भी होती रहना चाहिए। जब हम किसी के अच्छे गुणों की चर्चा करते हैतो वह धीरे धीरे हम में भी स्थापित हो जाते है और हम कभी किसी के बुराईयों की चचा करते हैं तो वह भी हमारे अंदर आ जाती है। इसीलिये सार्थक चर्चा जिन्हें मैं सत्संग का ही रूप मानता हूं करते रहना चहिए।।

सौम्यता, सहजता, सरलता और समभाव का प्रतीक हैं भगवान श्रीराम


यह लेख मैने पिछले वर्ष रामनवमी पर कृतिदेव में लिखा था और इसका शीर्षक यूनिकोड में था। उस समय मेरा नारद पर कोई ब्लाग नहीं था पर वहां के सक्रिय ब्लागर -जिनका काम हिंदी के ब्लागरों को ढूंढना था- मेरे शीर्षक तो पढ़ पा रहे थे पर बाकी उनके पढ़ने में नहीं आ रहा था। मेरे बहुत सारे ऐसे लेखों पर बाद में अनेक ब्लागरों ने कहा था कि मैं उनको यूनिकोड में लाऊं पर बड़े लेख होने के कारण ऐसा नहीं कर सका। अब चूंकि कृतिदेव का यूनिकोड मिल गया है तो अपने ऐसे लेख प्रस्तुत कर रहा हूं।

आज पूरे देश में रामनवमी का त्यौहार मनाया जा रहा है। राम हमारे देश के लोगों के हृदय के नायक है। यह स्वाभाविक ही है कि लोग राम का नाम सुनते ही प्रफुल्लित हो उठते हैं। राम की महिमा यह कि जिस रूप में उन्हें माना जाये उसी रूप में आपके हृदय में स्थित हो जाते है। राम उनके भी जो उनको माने और राम उनके भी जो उन्हें भजें और वह उनके भी हैं जो उन्हें अपने हृदय में धारण करें।
मैं बचपन से भगवान विष्णू की उपासना करता आया हू। स्वाभाविक रूप से भगवान श्री राम के प्रति भक्तिभाव है। इसका एक कारण यह भी रहा है कि मैं मूर्ति तो भगवान विष्णू की रखता हूं पाठ बाल्मीकी रामायण का करता हूं। कुल मिलाकर भगवान विष्णू ही मेरे हृदय में राम की तरह स्थित हैं। मतलब यह मेरे लिये भगवान राम ही भगवान विष्णू है। यह समभाव की प्रवृति मुझे भगवान राम के चरित्र से मिलती है।
भगवान राम के प्रति केवल भारत में ही बल्कि विश्व में भी उनकी अनुयायियों की भारी संख्या है। मतलब यह कि भगवान श्रीराम का चरित्र केवल देश की सीमाओं में नहीे सुना और सुनाया जाता है वरन् देश के बाहर भी उनके प्रति लोगों के मन में भारी श्रद्धा है। जब मै आज भारत के अंदर चल रहे हालातेों पर नजर डालता हूं तो लगता है लोग केवल नाम के लिये ही राम को जप रहे है। भगवान राम के चरित्र की व्याख्यायें बहुत लोग कर रहे है पर केवल लोगों में फौरी तौर पर भक्ति भाव जगाकर अपनी हित साधने तक ही उनकी कोशिश रहती है। मैं अक्सर जब परेशानी या तनाव में होता हूं तो उनका स्मरण करता हूं।
यकीन मानिए भगवान राम के मंदिर में जाकर कोई वस्तू या कार्यसिद्ध की मांग नहीं करता वरन् वह मेरे मन और बुद्धि में बने रहें इसीलिये उनके समक्ष नतमस्तक होता हूं। जब संकट में उन्हें याद करता हूं तो केवल इसीलिये कि मेरा घैर्य, आस्था और विश्वास बना रहे यही इच्छा मेरी होती है। थोड़ी देर बाद मुझे महसूस होता है कि वह शक्ति प्रदान कर रहे है।
भगवान श्रीराम का चरित्र कभी किसी अविश्वास और अकर्मणता का प्रेरक नहीं हो सकता। जो केवल इस उद्देश्य से भगवान राम को पूजते हैं कि उन पर कोई संकट न आये और उनके सारे कार्य सिद्ध हो जायें-वह राम का चरित्र न तो समझते है न उन्हें कभी अपने विश्वास को प्रमाणित करने का अवसर मिल पाता है।
भगवान श्री राम की कथा पढ़ना और सुनना अच्छी बात है पर उन्हें अपने हृदय में धारण कर ही जीवन में आनंद ले पाते है। ऐसे विरले ही होते है। भगवान राम के चरित्र में जो सौम्यता, सहजता, सहृदयता, समभाव और सदाशयता है वह विरले ही चरित्रों में मिल पाती है। यही कारण है कि भारत की सीमाओं के बाहर भी उनका चरित्र पढ़ा और सुना जाता है। अगर मनुष्य के रूप में की गयी उनकी लीलाओं का चर्चा की जाये तो वह कभी विचलित नहीं हुए। कैकयी द्वारा बनवास, सीताजी के हरण और रावण के साथ युद्ध में श्रीलक्ष्मण जी के बेहोश होने के समय उन्होंने जिस दृढ़ता का परिचय दिया वह विरलों में ही देखने को मिलती है। रावण के साथ युद्ध में एक ऐसा समय भी आया जब सभी राक्षसों को ऐसा लगा रहा था कि भगवान राम ही उनके साथ युद्ध कर रहे है। वह घबड़ा कर इधर उधर भाग रहे थे जहां जाते उन्हें राम देखते। मतलब यह कि राम केवल उनके ही नहीं है जो उनके पूजते बल्कि उनके भी है जो उन्हें नहीं पूजते-नहीं तो आखिर अपने शत्रूओं को दर्शन क्यों देते? यह उनके समभाव का प्रतीक है। क्या हम उन्हें मानने वाले ऐसा समभाव दिखा पाते है। कतई नहीं। यकीनन हमेें अब आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या केवल भगवान श्रीराम की मूर्ति लगाकर उनके प्रति दिखावे की आस्था प्रकट करना ही काफी है। हमें उनके पूर्ण स्वरूप का स्मरण कर उसे अपने मन और बुद्धि में स्थापित करना चाहिए। याद रहे मनुष्य की पहचान उसकी बुद्धि से है। अगर आप अपनी बुद्धि में अपने इष्ट को स्थापित करेंगे तो धीरे धीरे उन जैसे होते जायेंगे। एक विद्वान का मानना है कि मूर्ति पूजा का प्रत्यक्ष रूप से लाभ कुछ नहीं होता पर उसका यह फायदा जरूर होता है आदमी जब भगवान की पूजा करता है तो उसके हृदय में उनके गुणों का एक स्वरूप स्थापित होता है जो आगे चलकर उसका स्थायी हिस्सा बन जाता है। शर्त यही है वह आदमी उस समय किसी अन्य भाव का स्थान न दे।
इस दुनिया में हमेशा मूर्तिपूजा का विरोध करने वालों की संख्या ज्यादा रही है। दरअसल वह इससे होने वाले मनोवैज्ञानिक फायदों को नहीं जानते। प्रत्यक्ष रूप से तो इसका फायदा नही होता दिखता पर अप्रत्यक्ष रूप से जो व्यक्ति में शांति और दृढ़मा आती है उसको किसी पैमाने से मापना कठिन है। मुख्य बात है अपने अंदर भाव उत्पन्न करना। आखिर कोई भी व्यक्ति काम करता है तो उसके पीछे उसके विचार, संकल्प और निश्चयों के साथ ही चलता है। जब उनमें दोष है तो किसी सार्थक कार्य के संपन्न होने की आशा करना ही व्यर्थ है। अब लोग किसी और को तो नहीं अपने आपको धोखा देते है। मंदिरों में जाकर वह भगवान के सामने नतमस्तक तो होते है पर स्वरूप के अंतर्मन में ध्यान करने की कला में कितने दक्ष है यह तो वही जाने। अलबत्ता सबसे बड़ी बात राम की भक्ति के साथ उन्हें मन और बुद्धि में धारण भी जरूरी है। मूर्तियां तो उनका वह स्वरूप है जो आखों से ग्रहण करने के लिए स्थापित किया जाता है ताकि उसे हम अपने अंतर्मन में ले जा सके।
भगवान राम का चरित्र कभी न भुलाये जाने वाला चरित्र है। उनके प्रति अपार श्रद्धा के साथ उनके संदेशों पर चलने की जरूरत भी है। उन्होंने नैतिक आचरण, समभाव, सहजता और सरल दृष्टिकोण से जीवन जीने का जो तरीका प्रचारित किया उस पर चलने की जरूरत है। हमें समूह नहीं एक व्यक्ति के रूप में यह विचार करना चाहिए कि क्या हम उनके द्वारा निर्मित पथ पर चले रहे है या नहीं। दूसरा व्यक्ति क्या कर रहा है यह हमें नहीं सोचना चाहिए। भगवान श्रीराम को अपने हृदय में धारण करन चाहिए जिससे केवल न हम स्वयं बल्कि समाज को भी संकट से उबारने की शक्ति अर्जित कर सकें।