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धूल ने क्लर्क को सिखाया-हिंदी शायरी


बहुत दिन बाद ऑफिस में

आये कर्मचारी ने पुराना

कपडा उठाया और

टेबल-कुर्सी और अलमारी पर

धूल हटाने के लिए बरसाया

धूल को भी ग़ुस्सा आया

और वह उसकी आंखों में घुस गयी

क्लर्क चिल्लाया तो धूल ने कहा

‘धूल ने कहा हर जगह प्रेम से

कपडा फिराते हुए मुझे हटाओ

मैं खुद जमीन पर आ जाऊंगी

मुझे इंसानों जैसा मत समझो

कि हर अनाचार झेल जाऊंगी

इस तरह हमले का मैंने हमेशा

प्रतिकार किया है

बडों-बडों के दांत खट्टे किये हैं

जब भी कोई मेरे सामने आया ‘
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

माया के खेल तो बनते-बिगड़ते हैं


गरीब का जीना क्या मरना क्या
अमीर का जीतना क्या हारना क्या
इस जीवन को सहज भाव से वही
बिता पाते हैं
जो इन प्रश्नों से दूर
रह जाते हैं

जिन्दगी एक खेल की तरह है
इसे खिलाड़ी की तरह जियो
दूसरे की रोशनी उधार लेकर
अपने घर के अँधेरे दूर करने की
कोशिश मत करना
अपना कुँआ खुद खोदकर पानी पियो
भौतिक साधनों के अभाव पर
अपने अन्दर इतनी पीडा मत पालो कि
हर पल तुम्हारा ख़ून जलता रहे
ऐसे लोग हंसी के पात्र बन जाते हैं

देखो इस धरती और आकाश की ओर
तुम्हारी साँसों के लिए बहती हवा
बादलों से गिरता पानी
सूर्य बिखेरता अपने ऊर्जा
और अन्न प्रदान करती यह धरती
क्या यह दौलत कम है
जिन्दा रहने के लिए
माया के खेल तो
बनते है बिगड़ते हैं
उसमें हार-जीत पर क्या रोना
दृष्टा बनकर इस ज्ञान और सत्य के
साथ जीते हैं जो लोग
वही मरने से पहले
हमेशा जिन्दा रह पाते हैं
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बोतल का जिन्न और शब्द


मस्तिष्क से विचारों और अंतर्द्वंद्वों
बीच हाथों से रचे जाते शब्द
मेरे मन की पीडा हर जाते हैं
सोचता हूँ
अब आराम से बैठ पाऊँगा
पर ऐसा होता नहीं
पीडाओं के झुंड अपने साथ शब्दों को लेकर
एक-एक कर फिर मस्तिष्क में
तेजी से चलते आते हैं

कई बार सोचता हूँ
लिखना बंद कर दूं
विचारों और अंतर्द्वंदों से
किनारा कर लूं
बोतल से निकलते जिन्न से
फिर दोस्ती कर लूं
मदहोशी में रहना सीख लूं
पर जब गुजरे पल याद आते हैं
पीडा और बढ़ा देते हैं
फिर शब्दों के झुंड चले आते हैं
मेरे हाथ जिन्न की बोतल से दूर
फिर लिखने के लिए बढ जाते हैं

मैं जितना दूर जाना चाहूँ
अपने शब्दों से
उनके पढने वाले
मुझे याद दिलाने चले आते हैं
कहते हैं वह तुम्हारे शब्द
हमारी पीडा हर जाते हैं
क्योंकि वह सत्य के निकट
नजर आते हैं

मैं नहीं जानता कि
यह सच है या झूठ
बस इतना पता है कि
वह मेरी पीडा को हर ले जाते हैं
जब तक नहीं निकलते
मन को बहुत सताते हैं

लिखते बहुत हैं
अपने लिखे शब्द से पूजते भी बहुत हैं
अपनी नहीं बल्कि परपीडा पर
निरर्थक और अपठनीय लिखकर
स्तुति भी बहुत पाते हैं
पर लेखक की खुद की
पीडा से निकले शब्द
मेरी दृष्टि में साफ नजर आते हैं

पढने को तरसता हैं मन मेरा
पर सुन्दर कागज पर
रंग-बिरंगी स्याही से सजे शब्द
मेरे पठन-पाठन की क्षुधा को
तृप्त नहीं कर पाते हैं
सोचता हूँ कि
क्या लोगों की पीडा कम हो गयी है
पर देखता हूँ अपने आसपास तो
लगता है कि अब लिखते अब वह हैं
जिनके पास आज के युग के
सारे साधन है और वह
संवेंदनहीन होकर दूसरों की पीडा
अपने शब्दों को सजाते हैं
इसीलिये दिल को छू नहीं पाते हैं

हृदय में अच्छा न पढ़ पाने की पीडा
लिखने से दूर कर देती है
सोचता हूँ अपने शब्द-लेखन से
कहीं दूर हो जाऊं
बिना पढे मैं कब तक लिखता जाऊं
पर शब्द और बोतल में बंद जिन्न के
बीच मैं खङा होकर सोचता हूँ
मुझे किसी एक रास्ते पर तो जाना होगा
और शब्द हैं कि झुंड के झुंड
पीडाओं को साथ लिए चले आते हैं
मुझे अपने साथ खींच ले जाते हैं
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