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नीयत के खेल में खोटे भी खरे लगते हैं-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं


मुट्ठी में अगर आता सुख तो हम कई किलो भर लेते,

खरीदे गये सामान से मिलता मजा तो ढेर घर में भर लेते।

कहें दीपक बापू सोए तो आलस चले तो थकान ने घेरा

रोज पैदा होती नयी चाहत पर कामयाबी से मन भरता नहीं

वरना हम उम्मीदों का भारी बोझ अपने कंधे पर धर लेते।

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टकटकी लगाये हम उनकी नज़रों में आने का इंतजार करते हैं,

वह उदासीन हैं फिर भी हम उस यार पर मरते हैं।

कहें दीपक बापू कोई हमदर्द बने यह चाहत नहीं हमारी

दिल से घुटते लोग सीना तानते पर तन्हाई से डरते है।ं

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रिश्ते बनते जरूर कुदरत से मगर निभाये मतलब से जाते हैं,

कहीं काम से दाम मिलते कहंी दाम से काम बनाये जाते हैं।

नीयत के खेल में खोटे लोग भी खरे सिक्के जैसे सजते

वफा की चाहत में बदहवास लोग शिकार बनाये जाते हैं।

कहें दीपक बापू दिल के सौदागर जिस्मफरोशी नहीं करते

मोहब्बत के जाल में कमजोर दिमाग लोग फंसाये जाते हैं।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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