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कागज़ पर कलम से जूते न सजाओ-व्यंग्य कविता


अपनी कलम से कागज पर
काली स्याही से जूता शब्द
बार बार इस तरह न सजाओ
कि आकाश से झुंड के झुंड बरसने लगे।
इस नीली छतरी के नीचे
तुम्हारा सिर भी घूमता है
कभी वह उस पर न चमकने लगे।

सभी भी नासिका में दो सुराख है
जहां से अच्छी हवाओं के साथ
बुरी के आने के अंदेशे भी बहुत है
जूतों की दुर्गंध से
अपनी कलम को इतना न नहलाओ
कि उसकी आदत ही हो जाये
उसे सूंघने की
और तुम्हारा दिल सुगंध को तरसने लगे

इज्जत वही है जो बीच बाजार नहीं बिकती
घर की बात घर में रहे
चाहे इंसान जितन दर्द सहे
कमीज के नीचे बनियान फटी नहीं दिखती
अपने जूते के अंदर फटे मौजे
छिपा सकते हो तभी तक
जब तक पंगत में खाने नहीं बैठे
नजर पड़ जाती है जमाने की
तब अपनी ही आंखों में अपनी बेइज्जती दिखती
दूसरे पर उड़ते जूते देख
कभी न इतराओ
दौलत और शौहरत के साथी ही
आबरु का पहिया भी घूमता है
दुनियां की पहिये की तरह
दूसरे के बेआबरु होने पर हंसने वालों
जूते पांव तले ही सुहाते हैं
दूसरे की तरफ फैंकें जूते पर
हंसने की कोशिश मत करो
भला जूते कहां आदमी की पहचान कर पाते हैं
किसी के पांव के जूते बढ़ सकते हैं
तुम्हारी तरफ भी
क्या गुजरेगी तुम पर
जब जमाने भर के लोग मचलने लगे।

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