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क्रिकेट में कमा कौन नहीं रहा है?


भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्द के भूतपूर्व अध्यक्ष श्री आई। एस। बिंद्रा ने कपिल देव पर आई। सी। एल। को पैसे के उद्देश्य से बनाने का आरोप लगाया। आजकल ऐक बात मजेदार बात यह है कि जिसे देखो वही पैसे कमाने में लगा हुआ है, पर बात नैतिकता की बात करता है। शायद यह हमारी मानसिकता है कि हम त्याग को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं पर चाह्ते हैं कि दूसरे ऐसा करे ताकि हम उसकी पूजा करें-ताकि हम स्वयं माया ऐकत्रित करते रहें और समाज में अपना लौकिक सम्मान बनाये रखें। स्वयं तो लोग पैसा बनाते हैं पर कोई दूसरा करे तो सत्संग करने की सलाह देने लगते हैं.

मैं तो यह जानना चाहता हूं कि पैसे कौन नहीं चाह्ता है, यहां त्यागी कौन है।अगर कपिल देव ने अपनी संस्था पैसे कमाने के लिये बनाई है तो उसमें बुराई क्या है? और क्या कपिल देव ही केवल पैसा कमाएंगे? उनके साथ क्या जो लोग होंगे वह पैसे नहीं कमाएंगे? शायद बिंद्रा साह्ब को पता नहीं कि कई प्रतिभाशाली क्रिकेट खिलाडी धनाभाव के कारण आत्महत्या कर चुके हैं। वह कह रहे हैं कि कपिल देव देश में क्रिकेट के विकास का बहाना कर रहे हैं। वैसे देखा जाये तो देश में क्रिकेट ने जो ऊंचाई प्राप्त की है उसका पूरा श्रेय कपिल देव को ही जाता है। अगर १९८३ में अगर वह विश्व कप जीतने में अपना योगदान नहीं देते तो शायद इस देश में यह खेल लोकप्रिय भी नहीं होता। उसके बाद ही भारत में ऐकदिवसीय लोकप्रिय हुआ और उससे साथ ही जो खिलाडी उसमे ज्यादा सफ़ल बने उनहें हीरो का दर्जा मिला और साथ में मिले ढेर सारे विज्ञापन और पैसा और समाज में फ़िल्मी हीरो जैसा सम्मान। यही कारण है कि उसके बाद जो भी नवयुवक इस खेल की तरफ़ आकर्षित हुए वह इसलिये कि उनहें इसमें अपना चमकदार भविष्य दिखा। ऐक मजेदार बात यह है कि क्रिकेट का आकर्षण जैसे ही बढता गया वैसे ही फ़िल्मों में काम करने के लिये घर से भागने वाले लोगों की संख्या कम होती गयी क्योंकि क्रिकेट में भी उतना गलैमर आ गया जितना फ़िल्मों में था।ऐसा केवल इसमें खिलाडियों को मिलने वाले पैसे के कारण हुआ। अब यह पूरी तरह ऐक व्यवसाय बन चुका है।

अगर कोई कहता है कि हम क्रिकेट के साथ नियमित रूप से सत्संग के कारण ही जुडे हैं तो सरासर झूठ बोल रहा है-चाहे वह खिलाडी हो या किसी संस्था का पदाधिकारी। फ़र्क केवल इतना होता है कि कुछ लोग अपने कमाने के साथ इस बात का भी ध्यान रखते हैं कि दूसरे को भी कमाने का अवसर दिया जाये और अपने व्यवसाय में नैतिक सिद्धांतों का भी पालन किया जाये और कुछ लोग ऐसे होते हैं कि उनका उद्देश्य केवल अपने लिये माया जुटाना होता है और किसी नैतिक नियम को मानने की बात तो वह सोचते भी नहीं। समाज में ऐसे ही लोगों के संख्या ज्यादा है।जिस तरह पिछ्ले कई वर्षौं से भारतीय क्रिकेट टीम का चयन हुआ है उससे नवयुवक खिलाडियों में यह बात घर कर गयी है कि उसमें उनको आसानी से जगह नहीं मिल सकती।

इंग्लैंड गयी टीम का खेल देखकर तो यह साफ़ लगता है कि कई खिलाडी उसमें अपनी जगह व्यवसायिक कारणौं से बनाये हुये है। मैं हमेशा कहता हूं कि अगर किसी क्रिकेट खिलाडी कि फ़िटनेस देखनी है तो उससे क्षेत्ररक्षण और विकेटों के बीच दौड में देखना चाहिये। जहां तक बोलिंग और बैटिंग का सवाल है तो आपने देखा होगा कि कई जगह बडी उमर के लोग भी शौक और दिखावे के लिये मैचों का आयोजन करते हैं और उसमें बोलिंग और बैटिंग आसानी से कर लेते हैं पर फ़ील्डिंग और रन लेते समय उनकी दौड पर लोग हंसते है। आप मेरी इस बात पर हंसेंगे पर मेरा कहना यह है कि हमारे इस विशाल देश में लाखों युवक क्रिकेट खेल रहे हैं और रणजी ट्राफ़ी तथा अन्य राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में खेल रहे हैं ऐसा संभव नहीं है कि उनमें कोई प्रतिभा नहीं है पर उनको मौका नहीं दिया जा रहा है। इंग्लैंड गयी टीम क्षेत्ररक्षण और रन लेने में बहुत कमजोर सबित हुई है जो कि १९८३ के विश्व कप में भारत की जीत के सबसे मजबूत पक्ष थे।

देश में युवा बल्लेबाज और गेंदबाजों की कमी नहीं है और क्षेत्ररक्षण और रन लेने की शक्ति और हौंसला युवा खिलाडियों में ही संभव है। अगर साफ़ कहूं तो अच्छी गेंदबाजी और बल्लेबाजी तो कोयी भी युवा क्रिकेट खिलाडी कर लेगा पर तेजी से रन लेना और दूसरे के शाट मारने पर उस गेंद के पीछे दौडना हर किसी के बूते का नहीं है।भारत में प्रतिभाशाली खिलाडियों की कमी नही है पर क्रिकेट के व्यवसाय से जुडे लोग केवल यही चाह्ते हैं कि वह सब उनके घर आकर प्रतिभा दिखायें तभी उन पर कृपा दृष्टि दिखायें।

कपिल देव कमायेंगे इसमें कोयी शक नही है पर मेरी जो इच्छा है कि वह देश के युवाओं में ही नये हीरो ढूंढें। शायद वह यही करने वाले भी हैं। अगर वह इन्हीं पुराने खिलाडियों में अपने लिये नयी टीम का सपना देख रहे हैं तो शायद उन्हें निराशा ही हाथ लगेगी-क्योंकि अत: यह क्रिकेट ऐक शो बिजिनेस बन चुका है उसमें अब नए चेहरे ही लोगों में अपनी छबि बना सकते हैं।। मेरा तो सीधा कहना है कि कपिल देव न केवल खुद कमायें बल्कि छोटे शहरों और आर्थिक दृष्टि से गरीब परिवारों के प्रतिभाशाली युवा खिलाडियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चमका दें तो वह स्वयं भी सुपर हीरो कहलायेंगे-हीरो तो वह अब भी हैं क्योंकि १९८३ के बाद से भारत ने क्रिकेट में कोई विश्व कप नही जीता है। मैं कोई कपिल देव से कोई धर्मादा खाता खोलने की अपेक्षा नहीं कर रहा हूं क्योंकि क्रिकेट कोई दान पर चलने वाला खेल अब रहा भी नहीं है। विशेष रूप से कंपनियों के विज्ञापनों से होने वाले आय पर चलने वाले खेल में कम से कम इतनी व्यवसायिक भावना तो दिखानी चाहिये के खेलो, जीतो और कमाओ, न कि क्योंकि कमा रहे हो इसलिये खेलते रहो, टीम में बने रहो। यह ऐक गैर व्यवसायिक रवैया है यही कारण है कि दुनियां की किसी भी टीम से ज्यादा कमाने खिलाडी मैदान में फ़िसड्डी साबित हो रहे हैं। दुनियां में किसी भी देश में कोई भी ऐसी टीम खिलाडी बता दीजिये जो ज्यादा कमाते हैं और हारते भी हैं। मतलब साफ है कि क्रिकेट में कहीं भी किसी ने धर्मादा खाता नहीं खोल रखा है और यह संभव भी नहीं है। अत: कपिल देव को ऐसे आरोपों की परवाह भी नहीं करना चाहिऐ।

यकीन और हिम्मत से डटे रहो


समझौता ग़मों से कर लो
दोस्ती नगमों से कर लो
महफ़िलों में जाकर
इज्जत की उम्मीद छोड़ दो
जहां सब सज-धज के आएं
वहां तुम्हें देखने की किसे फुर्सत है
सभी बोलें कम अपने लबादे
ज्यादा दिखाएँ
सोचें कुछ और
बोलें कुछ और
सुनकर अनुसना कर सकें तो
सबसे बतियाएं
अगर कोई अपने शब्दों से
घाव कर दे
तो उसका इलाज अपनी
तसल्ली और यकीन की
मरहमों से कर लो
कहैं दीपक बापू
अपनी शान दिखाने के चक्कर
तुम कभी न पडना
दूसरों की चमक में
अपने को अंधा न करना
जिनके चेहरे पर जितनी रोशनी है
उतना ही उनके मन में है अँधेरा
तुम अपने यकीन और हिम्मत के
साथ सबके सामने डटे रहो
किसी और में कुछ भी न ढूँढो
साथ अपने हमदमों को कर लो
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नारद का मोह न छोड़ें, पर दूसरी चौपालों पर भी जाएँ


पिछले तीन दिनों से नारद की फीड में गड़बड़ चल रही है पर इसके बावजूद लोग एक दुसरे को पढ़ रहे हैं और कमेन्ट भी दे रहे हैं, यह एक अच्छा संकेत है। कुछ लोगों ने परेशानी अनुभव की जिनमें मैं स्वयं भी शामिल हूँ पर कुछ नये एग्रीगेटरों के आने से अब नारद पर निर्भरता कम होगी और लिखने पढने वाले अब अपना काम चला सकते हैं।
नारद पर लिखे एक लेख में मैंने लिखा था कि ऐसे मंच और भी बनेंगे पर इतनी जल्दी यह सब होगा इसकी आशा मुझे नही थी। इसके बावजूद मुझे लग रहा है कि कुछ लोगों का या जानकारी नहीं है या फिर नारद के प्रति मोह है कि वह किसी और के बारे में नहीं सोच रहे है। नारद के प्रति मोह खत्म नहीं हो सकता यह बात मैं जानता हूँ क्योंकि में अपने सब मित्रों को दूसरी चौपालों पर देख रहा था और बीच-बीच में नारद पर भी जाता था कि कहीं चालू तो नहीं हो गया। कुछ लोगों ने तो निराशा में अपनी पोस्ट भी डाली और वह भी दूसरी चौपालों पर दिख रही थी और मैं सोच था कि क्या उसके रचनाकार को पता है कि उसकी रचना पढी जा रही है?
बहरहाल मुझे यह अच्छा लगा और मेरा विचार है कि नारद के ठीकठाक होते हुए भी हमें इन दूसरी चौपालों पर चहल-पहल करने की आदत डालनी चाहिए। पिछले दो तीन दिन से मैंने जितनी कमेन्ट डालीं है उन्ही चौपालों में डाली हैं। जिनके निज पत्रक वर्ड प्रेस पर हैं उन्हें तो वियुज से पता लग जाता है जिनके केवल ब्लागस्पाट पर हैं उन सबको शायद इसकी जानकारी नहीं होगी कि उनको दूसरी चौपालों पर भी देखा जा रहा है। मैंने इन चौपालों पर जाकर देखा उन्होने नारद से कई चीजें सीखकर उसमें काफी सुधार किया है। मैं देख रहा हूँ कुछ लोग जानते हैं पर सब इसे जानते हैं इसमें मुझे शक है क्योंकि अगर वर्डप्रैस के ब्लोग पर वियुज नहीं होते तो मुझे पता ही नहीं लगता। खैर! मैं अपने जैसे अल्प ज्ञानी लोगों को बता दूं कि लोग लोग ब्लोगवाणी, चिट्ठा जगत और हिंदी ब्लोग कॉम के बारे में लिखते तो हैं पर सरल भाषा में कोई नहीं बता रहा कि यह क्या है?
यह नारद जैसी चौपालें हैं जो आपके ब्लोग को लिंक कर चुकी हैं और उनकी साज़-सज्जा बहुत अच्छी है सबसे बडी बात इण्टरनेट पर हिंदी को फलती-फूलती देखने का हमारा भाव है उसकी तरफ इसे कदम माना जाना चाहिए। निरपेक्ष भाव से उन लोगों के परिश्रम की प्रशंसा करना चाहिए-और अपनी चहल -पहल वहाँ भी करना चाहिऐ क्योंकि हम सब वहां जाकर एक दुसरे को पढेंगे तो संपर्क सतत बना रहेगा। नारद के मित्र वहां भी है और मेरे लिए दो ही चीजें महत्वपूर्ण हैं मेरा लेखन। और मेरे मित्र मैंने इसी ब्लोग पर उन चौपालों के झंडे-डंडे लगा दिए हैं ताकि एक नहीं तो दूसरी जगह जा सकूं, बिना पढे मैं लिख सकूं यह मेरे लिए संभव नहीं है।
कुछ जानकर लोग कहेंगे यह क्या कचडा लिख दिया पर मैं बता दूं कि भारत एक व्यापक देश है सभी कंप्युटर के जानकार और अंगरेजी पढे लोग लेखक नहीं हैं उसी तरह सारे लेखक भी कंप्युटर और अंगरेजी के विशेषज्ञ नहीं हो सकते -अगर कंप्यूटर पर लिखने की कोई ऎसी शर्त होती तो मुझे आप लोग यहां पढ़ नही सकते थे।
यह तो थी तकनीकी रुप से अपने जैसे अल्प ज्ञानियों से अपनी बात! अब मैं अपने जैसे फ्लॉप निज-पत्रक लेखकों (ब्लोगार्स ) को भी यही कहूँगा कि नारद के बाद वहां भी चहल कदमी अवश्य करें । नारद के और वर्डप्रैस के हिट वहाँ नही चल सकते -उन्होने अधिक और नियमित पोस्ट लिखने वालों की सूची अलग जारी कर रखी है -आप अपने वियुज कितने भी जुटाये वहाँ हिट नियमित और अधिक लेखन से ही संभव है। वहाँ की सूची में आपको पता चल जाएगा कि कौन कितने पानी में हैं। मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता पर कभी कभी यह लगता है लोगों ने लेखन को मजाक बना लिया है। मैंने कई ऐसे लेखक देखे हैं जो निरपेक्ष भाव से अच्छी रचनाएं दे रहे हैं पर कभी कभी उन्हें लगता है कि उनकी उपेक्षा जा रही है-ऐसे लेखको को वहाँ लगेगा कि वहाँ उन्हें सही प्रस्तुत किया जा रहा है। उनकी हिट दिखाने का तरीका बहुत सही है।
आखरी बात एग्रीगेटरों से समय आ गया है कि वह जो आचार संहिता बनाएं हुये हैं तो उस पर चलें भी-जिन नियमों को बना रहे हैं उन्हें न स्वयं तोड़े न किसी को तोड़ने दें। आपस में प्रतिस्पर्धी नही पूरक बनें क्योंकि अभी सफर बहुत लंबा है । किसी लेखक के साथ पक्षपात न करें । सभी के प्रति समान दृष्टिकोण रखें-चाहे कोई उन्हें पसन्द हो या न हो। साथ ही आचरण और मान मर्यादा का उल्लंघन न हो यह उनकी जिम्मेदारी है । वह यह कहकर नहीं बच सकते कि हम किस-किस पर निगाह रखेंगें । और हाँ आलोचनाओं से उन्हें घबडाना चाहिए। जब आप सार्वजनिक काम करते हैं तो आपको जहाँ प्रशंसा मिलती है तो आलोचना झेलने के लिए भी तैयार रहना चाहिऐ।
जिस तरह में एग्रीगेट्रों से कह रहा हूँ वैसे ही मैं लेखकों से भी कह रहा हूँ कि वह भी सभी के प्रति समान दृष्टिकोण रखें और सभी चौपालों पर आवक-जावक करें। नारद का मोह हमारे मन से खत्म नहीं हो सकता पर उस पर दबाव खत्म करने के लिए यह जरूरी है। इससे एक तो आपके अन्दर ज्यादा से ज्यादा लिखने की इच्छा पैदा होगी और स्वत: अच्छी रचनाएं बाहर आयेंगी और दूसरा हमारे पास इतना समय ही नहीं रहेगा कि हिट और फ्लॉप का लेखा-जोखा रख सकें। अब हिट और फ्लॉप का मुकाबला रचना के स्तर और संख्या के आधार पर होने वाला है । मैं छुपाऊंगा नहीं आज यह रचना मैं अपनी संख्या बढाने के लिए ही लिख रहा हूँ-क्योंकि एक चौपाल पर संख्या के आधार पर रेटिंग हो रही है।

आख़िर चीन ने जनसंख्या नीति बदली!


चीन सरकार ने अपने जनसँख्या नीति में बदलाव करते हुए अब शहरी क्षेत्रो में लोगों के ले लिए बच्चों के जन्म की सीमा एक से बढ़ाकर दो करने का निर्णय लिया है-पहले शहरी क्षेत्रों में एक तथा ग्रामीण क्षेत्रों में दो बच्चे पैदा करने की छूट थी।
चीन की तथाकथित विकसित तथा शक्तिशाली राष्ट्र की छबि से प्रभावित लोग उसकी जनसँख्या नीति के प्रशंसक रहे हैं, उनके लिए इसमें संदेश है पर वह शायद ही कोई इसे समझ पाए -क्योंकि तानाशाही के तले दबी वहाँ की जनता की आवाज विदेशों कें कभी नहीं पहुंची और वहां की सरकार ने जो प्रचार विश्व भर में कर रखा है उसके प्रतिवाद में कोई तथ्य बाहर निकलना मुश्किल है।
भारत में तो स्थिति और भी ज्यादा विचित्र है। चीन के समर्थक तो ठीक उसके विरोधी भी उसकी प्रगति का लोहा मानते हैं। हालंकि चीन के तथाकथित विकास और शक्तिशाली होने के दावे को कई विशेषज्ञ उंगली उठाते हैं पर उनके पास तथ्य कम अनुमान ज्यादा होते हैं। एक दिलचस्प बात यह है अपने विकास के दावे चीनी खुद कभी नहीं करते नजर आते जितने अन्य देश के लोग करते हैं। चीन में अभी भी जनसँख्या में कोई कमी नहीं आयी है उस पर सरकार के इस बदलाव से यह संकेत तो मिल गया है कि सरकार के समाज की जबरन जनसँख्या रोकने के कुछ ऐसे दुष्परिणाम जरूर हुए हैं जिसकी जानकारी बाहर के देशों को नहीं है।
चीनी रिश्तों के नाम तक भूलने लगे थे
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बहुत समय पहले मैं एक पत्रिका में पढा था कि चीन लोग तो अपनी पुरानी पहचान खोते जा रहे हैं और वहां कई लडकिया ऎसी हैं जो भाई का मतलब भी नही जानती तो कई ऐसे लड़के भी हैं जो बहिन का मतलब भी नहीं जानते। ताऊ-ताई, चाचा-चाची,मामा-मामी, फूफा-फूफी और अन्य रिश्तों का नाम तक भूल चुके हैं। दुनिया भर के गरीबों और मजदूरों को अमीर बनाने के नाम पर वहाँ सांस्कृतिक क्रान्ति करने वाले लोगों ने वहाँ की पुरानी संस्कृति को नष्ट कर ही कर डाला-जो कि भारतीय
संस्कृति से मिलती-जुलती थी । धर्म को अफीम बताते हुए उन्होने समूचे चीन में धन -संपति के अंबार लगाने का सपना दिखाकर वहाँ अपना राज्य कायम कर लिया-साथ ही बोलने और कहने की आजादी भी छीन ली।
फिर शुरू हुआ चीन में एक ऐसा दौर कि वहाँ लिखने-पढने की आजादी मांगने वाले को सरेआम मार दिया गया या जेल में सड़ा दिया गया। एक अमेरिकी विशेषज्ञ का कहना है कि चीन एक बंद गुफा की तरह है वहां क्या है कोई नहीं कह सकता-क्योंकि क्षेत्रफल की दृष्टि से अति विशाल चीन में केवल कुछ ही भागों में विदेशियों को जाने के अनुमति है, और सरकार की व्यवस्था ऎसी है कि आप आम आदमी से मिल नहीं पायेंगे और मिलेंगे तो वह इतना सहमा रहता है कि वह अपनी सरकार की भाषा ही बोलता है। इतना ही नहीं बल्कि चीन से बाहर भी आये चीनी अपनी बात कहने से कतराते हैं-क्योंकि उनमें कहीं न कहीं अकेलेपन का बोध होता है जो शायद वहाँ की जनसँख्या नीति का परिणाम भी हो सकता है।
चीन के आर्थिक विकास पर भी कई लोग उंगली उठाते हैं-उनका कहना है कि वहाँ के जो भी आंकडे हैं वह सरकारी है और उनकी प्रमाणिकता संदिग्ध है। सामजिक विशेषज्ञ भी उसकी इस बात को चुनौती देते हैं कि वहां कोई जातिवाद नहीं बचा है-कुछ का कहना है इस तानाशाही में कुछ खास समुदायों के लोगों को अपना वर्चस्व जमाने का अवसर मिल गया और वहां अब भी कहीं कहीं जातीय तनाव की स्थिति बन जाती है। एक बात पर सभी एकमत है कि एक बच्चे की जनसँख्या की नीति ने वहाँ के समाज को खोखला किया ! वजह साफ है कि व्यक्ति से परिवार, परिवार से रिश्तेदार और और रिश्तेदार से समाज के जो बनने का क्रम है उसमे रिश्तेदार की कडी कमजोर हो गयी थी और एशियाई देशों में सबसे सशक्त समाजों वाला चीन अपनी पहचान खो बैठा।
उनकी सरकार तो यह मानती है कि आदमी को बस रोटी, कपड़ा और मकान चाहिऐ और वह यह भूल गयी की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसके मन में अन्य लोगों से जुड़ने की प्रवृति होती है- यही कारण है आर्थिक रुप से तथाकथित शक्तिशाली राष्ट्र के नागरिकों के चेहरे पर जो हंसी दिखती हैं वह खोखली साबित होने लगी है। वहां के किसी वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, लेखक, अभिनेता, या समाज सेवा में नाम कमाने वाले किसी व्यक्ति का नाम कभी भी चर्चा का विषय नहीं बना। वहाँ के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का नाम ही चर्चा में आता है।
शायद चीन की नयी पीढ़ी में बगावत के कोई ऐसे तत्व मौजूद हैं जिसे अलग दिशा में मोड़ने के यह कदम उठाया गया या वाकई चीन के लोगों की मनोदशा में अपने समाज के कमजोर पड़ने की कोई असहनीय पीडा है जिसे दूर करने के लिए यह कदम उठाया गया है यह तो अलग से अध्ययन का विषय है जो पूरी जानकारी मिलने पर ही चर्चा योग्य होगा। यकीन मानिए जबरन जनसँख्या रोकने के दुष्परिणाम उससे ज्यादा बुरे हुए होंगे जितना लोग अनुमान करते हैं वरना वहाँ की सरकार जो नागरिकों की स्वतन्त्रता के अधिकार की विरोधी है कभी इतना बड़ा निर्णय नहीं लेती।

ब्लोग को लिंक करें पर नाम भी तो दें


जिन लोगों ने मेरे निज-पत्रक (ब्लोग) अपने निज पत्रकों पर संबद्ध (लिंक) किये हैं उन्हें मैं अपने हृदय से धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ, और वह आगे भी ऐसा करेंगे ऎसी आशा करता हूँ। मैंने अपनी यह बात पहले हे इसलिये कह दीं क्योंकि लोगों को यह न लगे कि जिस विषय पर मैं लिख रहा हूँ उसका केवल मेरे से ही संबंध है।

मैं यहां निज-पत्रकों (ब्लोग )को संबद्ध (लिंक) करने के मामले में कुछ ऎसी मर्यादाओं का पालन करना चाहता हूँ जो कि एक लेखक के लिए होना चाहिए। मैंने देखा है लेखक दुसरे के ब्लोग को लिंक तो कर रहे हैं पर उसका केवल शीर्षक भर ही लेते हैं-ऐसे में अगर पाठक उस शीर्षक पर क्लिक न करे तो उस पता ही न लगे कि वह किस लेखक या ब्लोग से संबद्ध है- ऐसे में लिंक करने वाले को ही कमेन्ट देकर ही वह अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। अगर लिंक करने वाले ब्लोग पर लगे कमेन्ट को देखे और संबद्ध (लिंकित) ब्लोग के वियुज की संख्या देखे तो कहीं तारतम्य नहीं बैठता और कभी तो ब्लोग पर लगे कमेन्ट से ही पता लगता है उस लेखक का भी ब्लोग वहां है। ऐसा भी हुआ है कि मैं उस ब्लोग से एक बार लॉट आया और फिर देखने गया तो पता लगा कि वहां अपना परचम भी फहरा रहा है।

इसे शिकायत नहीं समझना क्योंकि यहां हम सब साथी हैं और कई बातें हमारे मन में आती हैं और कहने के लिए समय नहीं होता और जब कहने का समय होता है तो ध्यान नहीं रहता। मैं पत्रकार जगत में भी रह चूका हूँ और कई बार दूसरी जगह से सामग्री उठाकर प्रकाशित करने का प्रचलन है “साभार” के साथ। क्या ब्लोग को लिंक करने वाले ब्लोग का नाम नहीं डाल सकते-चिट्ठा चर्चा में मैंने ब्लोग के साथ अपने ब्लोग के नाम को भी प्रयोग करते देखा है।पिछले दिनों मेरा माउस खराब था और मैंने अपने नारद पर अपन्जीकृत ब्लोग को पंजीकृत ब्लोग से लिंक कर काम चलाया था-इसमें परेशानी नहीं होना चाहिए।

मुझे लिंक करने वाले मेरे मित्र हैं पर यह एक सामूहिक चर्चा का विषय है-यह निजी विषय होता तो में ईमेल के जरिये भी अपनी बात कह सकता था पर यहाँ तो सब एक दुसरे के मित्र है और हो सकता है किसी के मन में यह बात हो कह नहीं पा रहा हो। फिर सार्वजनिक रुप से चर्चा में मनमुटाव की गुंजाइश नहीं होती।एक बात और हो सकता है कि उस ब्लोग पर कोई ऐसे पाठक भी आते हौं जो किसी ब्लोग को पढना पसन्द करते हैं और शीर्षक को- जो रचना की पहचान होता है,लेखक या ब्लोग की नहीं – और उसे देखकर वापस लॉट जाते हौं। आपके ब्लोग पर लिंकित ब्लोग का लेखक भले भी आपका मित्र हो और वह ऐसा नहीं समझे पर पाठक यह सोच सकता है कि आप एक चालाक रचनाकार है।

नाम की भूख सब में होती है और आप अपने मित्रों को अपने ब्लोग पर प्रदान करें तो क्या हर्ज है? और किसी में न हो मुझमें तो है। साहित्य से मुझे कोई नामा नहीं मिला और जो लिखा है नाम के लिए ही तो लिखा है। रोटी की भूख के इलाज के लिए तो गोली बन गयी है पर नाम की भूख के इलाज के लिए तो कोई गोली ही नहीं बन सकती। और फिर जो लोग लिंकित कर रहे हैं तो उन्हें भी तो इसी तरह की भूख लगती है तभी तो लिंक कर रहे है। खैर यह तो थी मजाक की बात!

मैं यह लेखक की तरह नहीं बल्कि एक पाठक की तरह कह रहा हूँ मुझे पता नहीं क्यों ऐसे ब्लोग बिना कोट के हैंगर की तरह लटके लगते हैं। कभी-कभी तो लगता है कि किसी ऐसे दरजी की दुकान में पहुंच गये हैं जिसके यहाँ खाली हैंगर लटके पडे हैं और इसके पास कोई काम ही नहीं है। मैंने पत्रकार के रुप में कई जगह से सामग्री ली थी नाम और धन्यवाद सहित।

मैंने अपनी बात कह दीं – इस बात को अन्यथा न ले। अकेले मेरे ब्लोग लिंक नहीं होते , हाँ मेरे मन में विचार आया तो कह दिया। फिर लोग कहते हैं कि लिंक करने से लोगों में सदभाव बढेगा पर रचना के शीर्षक आपके मित्र की पहचान नहीं हो सकते जबकि उसके ब्लोग या उसका नाम ही उसके व्यक्तित्व का प्रतीक होता है। मेरा विचार पसंद नहीं हो तो भी आप लोग मेरे ब्लोग मेरे नाम के बिना भी लिंक कर सकते हैं। इस विषय पर मेरा आग्रह बस इतना है कि चर्चा चाहे कर लें पर विवाद नहीं खड़ा करना-अगर पसन्द आये तो कुछ तारीफ तो कर ही देना ताकि हमें भी लगे कि हम भी अच्छा सोच लेते हैं।
एक प्रयोग में यहाँ कर लेता हूँ
आईने में बदहवास दीपक बापू
(दीपक बापू कहिन् से साभार )
कहें दीपक बापू हम फ्लॉप रहने के लिए भी तैयार
(दीपक बापू कहिन् से साभार )
नए और फ्लॉप लेखक हिट्स से विचलित न हौं
(दीपक बापू कहिन् से साभार )

लेखक की रचना का समाज से सरोकार होना चाहिऐ


(गतांक से आगे )

मैं बचपन से अपने धर्म ग्रंथ पढता आ रहा हूँ, और उनमें मेरी दिलचस्पी सदैव बनी रहती है। इसका कारण यह है कि उनमें विशाल ज्ञान भण्डार है और जिसने उन्हें एक बार पढा उसे और कुछ पढना रास नहीं आएगा, शायद यही कारण है भारत के लोग लेखकों का सम्मान नहीं करते क्योंकि उनके पास आला दर्जे के रचनाकारों की रचनाएं उपलब्ध हैं जिनका नियमित, अध्ययन, श्रवण और मनन करने के अवसर उनके पास आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। पढे लिखे हैं तो खुद ही पढ़ लेते हैं और नहीं हैं तो भी तमाम तरह के संतजन उन्हें सुनाने के लिए मिल जाते हैं और आजकल तो धार्मिक चैनलों ने घर से बाहर जाने के अवसर भी समाप्त कर दिए हैं।

ऐसे में नये लेखकों के लिए जगह तभी बच पाती है कि जब वह नये संदर्भों को बेहतर ढंग से उपयोग करे। शायद यही कारण है कि कुछ लेखक विदेशी लेखको और रचनाकारों को देश में स्थापित करने का प्रयास करते हैं कि लोग उनसे अपने पुराने ग्रंधों की चर्चा न करें। जॉर्ज बर्नाड शा, शेक्सपियर, कार्ल मार्क्स, लेनिन और चर्चिल के बयां यहां सुनाये जाते हैं जबकि हमारे देश के धर्म ग्रंथों में जीवन की जो सच्चाईयां वर्णित हैं वह ज्यादा प्रमाणिक हैं कम से कम इस देश की भौगोलिक, मौसम और सामाजिक परिवेश को देखते हुए तो यही कहा जा सकता है । मैंने टालस्ताय, चेखोव , जार्ज बर्नाड शा और शेक्सपियर को पढा है और उनकी रचनाएं अच्छी भी हैं पर मैं उन्हें अपने देश के संदर्भ नहीं देख पाता हूँ क्योंकि कितना भी कह लें हमारा भारतीय समाज की हालत और मूल स्वभाव बाहर के देशों से अलग है।

भारत को विश्व का आध्यात्मिक गुरू केवल कहने के लिए नहीं कहा जाता है बल्कि यह एक प्रामाणिक सच्चाई है। हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथ और उसके बाद के रचनाकार भी जीवन और प्रकृति के सत्य के निकट लिखते रहे न कि उनमे कोई कल्पना गडी। हिंदी भाषा के स्वर्णिम काल-जिसे भक्ति काल भी कहा जाता-में जो रचनाएं हुईं वह उन्हीं प्राचीनतम रहस्यों को नवीन रुप देतीं है जिन्हें संस्कृत भाषा की क्लिष्टता के कारण लोग भूलते जा रहे थे। इस काल -खण्ड के रचनाकारों ने हमारे प्राचीनतम ज्ञान को नवीन संदर्भों में प्रस्तुत कर देश को एक नयी दिशा दीं, जिस पर देश अभी तक तक चल रहा है – आज तक वह रचनाये लोगों के दिलो-दिमाग में इस तरह छायी हुईं हैं जैसे कि कल ही लिखीं या रची गयी हौं।

सीधा आशय यह है लेखक वही है जो सामाजिक सरोकारों से जुड़कर लिखे। ऐसा करने पर ही लेखक कहला सकता है। लिखने को तो आजकल हर कोई कुछ-न-कुछ लिखता है पर सभी लेखक तो नहीं हो जाते। आजकल देश में शिक्षित लोगों की संख्या प्राचीन समय के मुकाबले ज्यादा है और कागज पर सभी को कहीं न कहीं लिखना ही पड़ता है। लोग अपने रिश्तेदारों को पत्र लिखते हैं , छात्र अपने अध्ययन के लिए नोट्स बनाते हैं और निजी तथा शासकीय कामकाज में अनेक लोगों को पत्र लिखने पड़ते हैं। कुछ लोग तो पत्र लिखने में इतना महारथ हासिल कर लेते हैं कि लोग उनसे ही पत्र लिखवाने के लिए आते हैं पर उन्हें लेखक नहीं कहा जा सकता क्योंकि उनके लेखन का सरोकार निजी आधार हैं न कि सामाजिक।

जो लेखक विचारधारा से प्रभावित होकर लिखते हैं उनकी रचनाएं दायरों में क़ैद होकर रह जाती हैं। वह केवल उन्हीं लोगों को प्रभावित कर सकती हैं जिन्हें उस विचारधारा से सरोकार है। पत्रकारिता के मेरे गुरू ने मुझे पत्रकारों की तीन प्रकार बताये थे और कहा था कि चूंकि तुम लेखक भी हो तो उन्हीं भी इन तीन प्रकारों
में विभक्त कर सकते हो। उन्होने जो तीन प्रकार बताये थे वह इस प्रकार हैं।

  1. खबर फरोश-जो किसी अख़बार में इसीलिये काम करने के लिए आते हैं जिन्हें केवल ख़बरों की दुनिया से जुडे रहना हैं, और उन्हें इससे कोई मतलब नहीं रहता कि अखबार के संगठन का क्या रुप है?
  2. ख़्याल फरोश- ऐसे लोग जो अपने ख़्याल की वजह से किसी अखबार में काम करते हैं जहाँ उन्हें उसके अनुसार करने का अवसर मिलता है।
  3. खाना फरोश- कुछ लोग इसीलिये अखबार में काम करते हैं ताकि उनका रोजगार चलता रहे। उनके अनुसार अब ऐसे ही लोगों की संख्या ज्यादा है।

लेखक में उन्होने खबर फरोश की जगह कलम या लफ्ज़ फरोश रखने को कहा बाकी दो वैसे के वैसे ही बताये। उन्होने बताया था कि पहले वह ख़बर फरोश थे और अब खाना फरोश हो गये हैं। उन्होने मुझे यह साफ बता दिया था कि अखबार में मुझे अधिक समय तक काम नहीं मिल पायेगा और लेखन भी मुझे अपने बूते करना होगा। उन्होने कहा था-“तुम्हारा लिखना बहुत अच्छा है पर बाजार में बिकने लायक नहीं”

उन्होने कहा था कि तुम तो कलम फरोश हो वही रहोगे-साथ ही उन्होने कहा था कि खबर फरोश और कलम फरोश लोगों के पास नये प्रयोग की गुंजाईश हमेशा ज्यादा होती है । वह बहुत अच्छे ढंग से खबर लिखते थे पर अपने को लेखक मानने से इनकार करते थे उनका यही कहना था कि मेरे लिखने का समाज से कोई सरोकार नहीं है जबकि लेखक की रचना का किसी न किसी तरह से समाज से सरोकार होना चाहिऐ। (क्रमश:)

लेखक को अपने रचनाकर्म से ही प्रतिबद्ध होना चाहिऐ


एक लेखक को अपनी रचनाओं के साथ अपनी भावनाओं को जोड़कर आगे बढ़ना चाहिऐ पर तब का जब तक वह उस पूरा न कर ले- उसके पश्चात उसे वहां से त जाना चाहिए और उसके मूल्याकन का दायित्व पाठकों पर छोड़ देना चाहिए। एक पाठक को भी कभी लेखक से यह सवाल नहीं करना चाहिए कि क्या वह जजबात अभी भी उसके अन्दर हैं जो रचना के समय थे।

मैं जब कोई रचना लिखता हूँ तो पूरी तरह उसमें डूबने का प्रयास ही नहीं करता क्योंकि मुझे लिखना है यह भाव इस कद्र मेरे अन्दर आ जाता है कि मुझे इसके लिए कोई अधिक विचार नहीं करना पड़ता। अपने विचारों के क्रम को बग़ैर देखे आगे जाने देता हूँ जहाँ मैं उसे जुड़ने का प्रयास करता हूँ रचना गड़बड़ा जाती है। लिखने के लिए ही प्रतिबद्धता के चलते ही मुझे कभी कोई ठिकाना नहीं मिला, क्योंकि जब एक लेखक के रुप में अपने लिए कोई समूह या वर्ग ढूँढेंगे तो वह आप पर अपने हिसाब से अपनी शर्तों पर लिखने के लिए दबाव डालेगा- और तब अपना मौलिक चिन्तन और मनन खो बैठेंगे। आधुनिक हिंदी साहित्य में प्रेमचंद, सूर्यकांत त्रिपाठी’निराला’, जय शंकर प्रसाद और रामधारी सिंह दिनकर के बात यदि कोई लब्ध प्रतिष्ठत लेखक नहीं हुआ तो उसका कारण यही है कि बाद के काल में लेखक की लेखन से कम उससे होने वाली उपलब्धि पर ज्यादा दृष्टि अधिक रही है। श्रीलाल शुक्ल, हरिशंकर परसाईं, और शरद जोशी जैसे चन्द लेखक ही हैं जो बाद के काल में अपनी छबि बना सके।

लेखक का काम है लिखना! अपनी रचना को साहित्यक ढंग से पाठको के समक्ष प्रस्तुत करना न कि एक समाचार के रुप में प्रस्तुत करना। गरीब की वेदना, अमीर का तनाव और मध्य वर्ग के भावनात्मक संघर्ष पर उसका दृष्टिकोण एक समान रहना चाहिऐ, उसे इस बात से कोई मतलब नहीं रखना चाहिए कि उसके लिखने की किस पर क्या प्रतिक्रिया होगी। उसे केवल इस बात पर ध्यान देना चाहिऐ कि उसका पाठक कोई भी हो सकता है और किसी भी वर्ग का। महिला भी हो सकते है और पुरुष भी , बच्चा भी हो सकता है और बूढा भी , अधिक शिक्षित भी हो सकता है और कब भी। पिछले कई सालों में प्रतिबद्ध लेखन के वजह से लेखकों के कई वर्ग बने जिसने सुरुचिपूर्ण और सार्थक लेखन के प्रवाह को अवरुद्ध किया और पाठक अच्छी रचनाओं को तरस गये और इसी कारण लोग आज भी अच्छी रचनाओं को ढूँढ रहे हैं। प्रतिबद्ध लेखन से कभी भी अच्छी रचनाओं की उम्मीद नहीं की जाना चाहिए। कुछ लोग केवल गरीबी के बारे में लिखकर अपनी छबि चमकते रहे तो कुछ लोग अमीरों के छत्रछाया में विकास के बारे में लिखकर पाने लिए सुविधाये जुटाते रहे, अपनी रचनाओं में जज्बातों को भरने में उनकी नाकामी ने पाठकों को अच्छी रचनाओं से महरूम कर दिया।

प्रसिद्ध लेखक तो बहुत हैं पर उनकी रचनाएँ कितनी प्रसिद्ध हैं यह सभी जानते हैं। लिखा बहुत जा रहा है पर पढने लायक कितना है और कितना सामयिक है और कितना है और कितना दीर्घ प्रभावी यह हम सभी जानते हैं। पत्रकार और लेखक में अन्तर ही नहीं समझते। पत्रकार अपने समाचारों में जबरन जज्बात भरने का प्रयास करते हैं तो लेखक अपनी रचनाओं को समाचार के रुप में प्रस्तुत करते हैं । सभी लोग कहते हैं कि हिंदी में अच्छे लेखकों की कमी है पर यह कोई नहीं कहता कि वास्तव में लेखकों को संरक्षण देने वालों की कमी है। जिनमे उन्हें संरक्षण देने की क्षमता है वह उनका उपयोग एक मुनीम की रुप में करना चाहते हैं। समाचारपत्र-पत्रिकाएँ आजकल पुराने रचनाकारों को छापकर वाह -वाही लूट रहे क्योंकि उन्हें कुछ रकम देना नहीं पड़ती। केवल यही बात नहीं है बल्कि वह यह भी नहीं चाहते कि कोई नया लेखक उनके वजह से प्रतिष्ठित हो जाये, इसीलिये प्रतिष्ठित लोगों को ही लेखक पेश कर रहे हैं। मैं स्वयं अच्छी रचनाओं के लिए तरसता हूँ क्योंकि अगर आप अच्छा लिखना चाहते हैं तो अच्छा पढ़ें भी-ऎसी मेरी मान्यता है । जब मुझे अच्छा पढने को नहीं मिलता तो मैं अपनी ही धर्म ग्रंथों को पढना शुरू कर देता हूँ तो मुझे लगता है कि उनकी विषय सामग्री आज भी सामयिक है। उनमें मुझे एक बात साफ लगती है कि उनके रचनाकार केवल अपनी रचनाओं के लिए ही प्रतिबद्ध थे। (क्रमश:)

अपनों से बढती दूरी का दर्द


आजकल जिसे देखो अपने लोगों-यानी अपने रिश्तेदारों , परिचितों, मित्रों और परिवार -पर यकीन नहीं करता । हालत यह है जो भाई बहिन साथ-साथ पलते हैं उनको भी एक दुसरे पर विश्वास तभी तक रहता है जब तक एक ही छत के नीचे हैं और घर से बाहर होने या विवाह होने पर सब कुछ बदल जाता है और रिश्ते बस नाम भर के रह जाते है।

हम अपने देश की संस्कृति और संस्कारों पर गर्व करते हैं वह उन्हीं पारिवारिक और सामाजिक संबंधों पर करते हैं जो अब एक तरह से अपना आभा मंडल खो चुके हैं या खोते जा रहे हैं । कोई अपनी तकलीफों को बयान नहीं कर पाता पर अपनों से बदती भावनात्मक दूरी का दर्द सभी को है। जब फोन जैसी सुविधाएं नहीं थी तब लोग बरसों तक एक दुसरे से बातचीत नहीं कर पाते थे तब लोगों में भावनात्मक लगाव और विश्वास अधिक हुआ करता था पर जब संबंध रखने और बातचीत करने के नए और तीव्रतर साधन उपलब्ध हो गये हैं तो लोगों में आपसी लगाव और विश्वास इस क़दर कम हो गया है कि रोज मोबाइल पर बातचीत करने वाले लोग भी एक- दुसरे पर विश्वास करते हैं -ऎसी आशा नहीं की जा सकती। परिवहन के साधन जब धीमे और उबाऊ थे तब लोग एक-दुसरे के पास बड़ी श्रध्दा, प्रेम और मन में उमंगता का भाव लेकर जाते थे और आज जब अति तीव्रगामी साधन उपलब्ध हो गये हैं लोगों का एक-दुसरे का यहाँ जाना मात्र ओपचारिकता भर रह गयी है-शादी विवाह के अवसर पर लोग बहुत उत्साह से शामिल होते थे पर बदलते समय ने इसे एक मजबूरी बना दिया है , आख़िर ऐसा क्या हुआ कि यह सब बदल गया और समाज जो कभी अपने श्रेष्ठता का दंभ भरता था आज एकदम खोखला हो गया – यहाँ हम इस बात को नहीं भूल सकते कि हम भी किसी न किसी के अपने है और जब हम अपनों पर कोई आक्षेप करते हैं तो वह हम स्वयं पर भी कर रहे हैं ।

हम यहां किसी पर आक्षेप नहीं करना चाहते बल्कि ईमानदारी से उन परिस्थतियों का अवलोकन करना चाहते हैं कि अपना आख़िर अपने से दूर क्यों हो गया और अब उसे कैसे पास रख कर विश्वसनीय बनाया जा सकता है ।

जब आधुनिक साधन और व्यवस्था नहीं थी तब व्यक्ति की व्यक्ति पर निर्भरता अधिक थी इसीलिये संपर्क बनाए रखना न एक बाध्यता बल्कि एक सामाजिक जरूरत भी थी । पहले घर में होने वाले कार्यक्रमों के लिए कामकाज के लिए लोगों की जरूरत होती थी और उस समय नाते-रिश्तेदार और आस-पड़ोस के लोग ख़ूब सहयोग करते थे और अब नवीनतम सुख-सुविधाओं और सेवाओं की बाजार में उपलब्धता ने आदमी को आत्मनिर्भर बना दिया और अब वह पैसा खर्च कर अपने काम करा लेता है। शादी के अवसर पर रिश्तेदार पन्द्रह-पन्द्रह दिन पहले पहुंचते थे ताकि काम में सहयोग किया जा सके। लडकी की शादी में रिश्तेदार बारात के स्वागत के लिए जीजान लगा देते थे। अब इस काम के लिए हलवाई बरात के स्वागत का भी ठेका लेने लगे हैं और जिनके पास पैसा है वह होटलों की सेवाएं लेते हैं जहाँ वेटर स्वागत का काम करते हैं।
अब तो शादी ब्याह में यह पता ही नहीं लगता कि लडकी के रिश्तेदार कौन हैं और लड़के के कौन? कुल मिलाकर आदमी का आदमी में स्वार्थ अब कम हो गया है । यहां किसी प्रकार के अध्यात्म की बात करना ठीक नहीं होगी। कुछ लोग कहेंगे कि ऐसे संबंधो का क्या मतलब जिसमें स्वार्थ हौं , तो पहले यह समझना होगा कि दैहिक स्वार्थ ही दो देहों के संबंध मजबूत रखते हैं -और हम इस तथ्य को तर्क की कसौटी पर नही कसेंगे तो किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचेंगे और बात अधूरी रह जायेगी ।कुल मिलाकर बात यह कि घरेलू कर्यकर्मों में अपने लोगों की भागेदारी अब नाम मात्र की रह गयी है और इस कारण लोगों में आत्मीयता के भाव में कमी आ गयी है और रिश्ते निभाये नहीं बल्कि घसीटे जा रहे हैं अब भाई में भात्रत्व , मित्र में मैत्री, और सहयोगी में सहकारिता का भाव ढूँढना बेमानी लगता है। कहीं कहीं विपरीत स्थति भी है कि लोग अपनों से ही हानि की आशंका से भी त्रस्त हैं। इस घोर अविश्वास और हानि कि भावना ने आदमी को बौद्धिक रुप से खोखला कर दिया जहां निराशा, मानसिक तनाव और अकेलेपन की भयानक अनुभूति के साथ जीता है ।

हमारा किसी में काम नही पडेगा यह बात जहाँ आत्मविश्वास देती है वहीं हममें किसी का काम नहीं पडेगा यह उसे बुरी तरह तोड़ती भी है । अकेले होने पर इतना भय नहीं होता जितना परिवार और रिश्तेदारों के होते अकेलेपन का होता है ।हम किसी दुसरे व्यक्ति या समाज को सुधारने की बात करें उससे कुछ होने वाला नहीं है बल्कि हमें अपनी मानसिकता सुधारने की बात करना चाहिऐ , भले ही कम छोटा क्यां न हो हमें अपनों से उसके लिए कहना चाहिए क्योंकि हम जरा अपने अन्दर झाँकें कोई हमेंकिसी खास अवसर पर कोई काम कहता है तो हम खुश होते हैं या नहीं। मतलब यह कि दूसरों के स्वार्थ भी सिध्द करो और अपने भी स्वार्थ उसमे जानबूझकर फसाओ ताकि रिश्तो की निरन्तरता बनी रहे ।

कविवर रहीम कहते हैं –

“आवत काज रहीम काहिन् , गाढ़े बंधू सनहे
जीर होत न पेड ज्यों, थमे बरेह

विपत्ति के समय अपने घनिष्ठ बंधुओं का स्नेह काम आता है । जैसे पेड सा पराने होने पर उसकी लकड़ी के गट्ठे की मोटी रस्सी पेड को थाम लेती है और पेड की डालियों से निकलने वाली शाखाएं जमीन में जा बड़ा पकड लेती हैं।हमें अपनों में अपना स्नेह और प्रेम बनाए रखना चाहिए क्योंकि इससे हमारा ही आत्मविश्वास बढता है । वह लोग क्या सोचते और करते हैं यह उनका काम है।

कविवर रहीम यह भी कहते हैं कि

“दुर्दिन परे रही कहिन्न , भूलत: सब पहिचानी
सोच नही वित हानि को, जो न होय हित हानि”

जीवन में बुरे दिन आने पर सब लोग भी पहचानना भी भूल जाते हैं। ऐसे समय में यदि अपने मित्र तथा सगे संबंधी न भुलाएँ तो धन की हानि का विचार मन को इतनी पीडा नहीं पहुँचाता।

रहीम ने आज से कई बरस पहले भी ऎसी हालतों का सामना किया तभी अपने लोगों की उपेक्षा का भाव झेलने का दर्द वह व्यक्त कर पाए। अपने लोगों की सहायता के लिए हमें हमेशा तैयार रहना चाहिए पर उनसे कोई आशा नहीं करना चाहिऐ तभी स्वयं बेचारगी के भाव से मुक्त हो पायेंगे जो अपनों से दूर होने केकारण हमारे अन्दर उत्पन्न होता है।

मोबाइल है पर टाक टाईम नहीं


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मित्रों, रिश्तेदारों और सहयोगियों के कहने पर हमने मोबाइल जरूर खरीद लिया, पर अब हमें लगता है कि लोगों ने हमें नया छात्र समझकर ख़ूब रैगिंग ले ली। ९९९ में लाईफ टाईम इन कमिंग और २५० के टाक टाईम की सिम हमने डलवायी और अब हमारा टाक टाईम केवल २१ रुपये का रह गया। इसमें आश्चर्य की क्या बात? आप सवाल उठाएँगे ?

जवाब यह कि हमने उसका उपयोग किसी खास काम के लिए नहीं किया क्योंकि लोगों के मिस काल फेस करते-करते ही पूरा टाक टाईम खत्म हो गया।हुआ यह कि हमने अपना नंबर उन सबको दे दिया जिनको हमारी और जिन्हें हमारी आवश्यकता होती थी पर सबने मिलकर ऐसा खेल खेला कि अब हम यह सोच रहे हैं कि नया टाक टाइम् अब लायें ही नहीं । लोग अपने काम तक की बात के लिए भी मिस काल देते हैं और उन्हें संकोच नहीं होता यह कहते हुए कि हमारे इसमें टाक टाईम नहीं है।

जिसे देखो वही मिस कल दे रहा है और हम फोन करके पूछते तो जवाब मिलता है हमने तो यों ही मिस काल दीं थी कि अगर बात करनी हो तो काल लगा लो । या कहेंगे कि हमारे इसमें टाक टाइम् ज्यादा नहीं है तो सोचा तुम्हें मिस काल दे दें तो तुम्हीं बात कर लोगे । घर पर रिश्तेदारों के बच्चे आये और उन्हें अपने माता-पिता से बात करनी थी तो हमसे फोन लेकर लगाने लगे ।

हमने कहा-“मिस काल लगा दो , तुम्हारे माँ-पिता स्वयं ही बात कर लेंगे “।

बच्चे बोले -” हमारे मोबाइल में टाक टाईम नहीं है ।”

हमने कहा-“पापा से कहों कि टाक टाईम डलवा लें । भाई ऐसा मोबाइल किस काम का जिसमें तक टाईम नहीं हो ।”

बच्चे बोले -“पापा कहते हैं कि अब मैं नहीं टाक टाईम नहीं डलवाऊंगा क्योंकि तुम लोग फ़ालतू बात ज्यादा करते हो।”

हमने उनको बात करने कि इजाजत दे दीं और हमारा बीस रूपये का टाक टाईम खत्म हो गया। हमारे घर से कई ऐसे रिश्तेदारों ने फोन किये जो हमें केवल मिस काल करते थे। हम उनसे कहते कि भई तुम अपने घर मिस काल ही लगाओ तो बस एक ही जवाब है कि उसमें टाक टाईम नहीं है । उस दिन तो हद हो गयी हमारे एक ऐसे अजीज रिश्तेदार ने फोन किया जिसे हम यह कह ही नहीं सकते कि तुमने मिस काल क्यों दीं, सीधे काल क्यों नहीं की ।

उनके मिस कल हमने उन्हें फोन किया तो वह बोले-“हम तो हैं गरीब आदमी , मोबाइल में केवल इतना ही टाक टाईम डलवाया है कि लोगों को मिस काल कर सकूं। “

वह सरासर झूठ बोल रहे थे पर रिश्ता ऐसा था कि हम कह नहीं सकते थे कि भाई बिना टाक टाईम का यह कैसा मोबाईल चला रहे हो , और फिर तुम्हारा काम था हम क्यों पैसा खर्च करे।

हालांकि हमने अब मिस कालों का जवाब देना ही बंद कर दिया है। अगर कोई घंटी चलकर बंद हो जाती है तो फिर हम नंबर भी नही पढ़ते कि किसने किया था सीधे डीलिट कर देते हैं । ऐसे मोबाइल वालों से क्या बात करना जिनके पास टाक टाईम नहीं है ।

मीडिया की सजगता से भक्तों में चेतना आयेगी


अभी एक चैनल द्वारा सात बाबाओं के कमीशन लेकर काले धन को सफ़ेद करने के पर्दाफ़ाश का जो प्रसारण हुआ उस पर देश के प्रचार माध्यमों के एक बहुत बडे वर्ग ने न केवल चुप्पी साध ली वरन खबरे तक प्रसारित नहीं की । जब वूल्मर हत्याकांड पर ब्रिटेन का कोई अखबार या टीवी चैनल कोई खबर चाहे वह महत्वहीन क्यों न हो उस पर झपट लेते हैं पर देश में एक टीवी चैनल द्वारा प्रसारित इतनी बड़ी खबर की अनदेखी इस देश मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाती है। अक्सर कई बार ऐसे मौक़े आते हैं जब कोई इन टीवी चैनल वालों वालों से कहता है आप अपनी जिम्मेदारी समझिये तो कहते हैं कि “खबर देना हमारा सामाजिक तथा व्यवसायिक दायित्व है”।क्या देश के समस्त प्रचार माध्यमों का यह दायित्व नहीं था कि वह इस खबर के फुटेज अपने चैनलों पर दिखाते , जब वह किसी विदेशी खबर और वह भी विदेशी चैनल पर प्रसारित होता है उसके फुटेज यहां दिखाए जा सकते हैं तो देशी चैनल से भला एलर्जी क्यों? यह ठीक है कि यह उनका प्रतिद्वंदी चैनल है तो इतना कर ही सकते थे कि नाम लिए बिना खबर का सार ही बता देते। खबर देकर थोडा उस पर अपने प्रसारण इस तरह करते कि जैसे वह उनकी खबर लगे-या फिर लोगों को यह न लगे कि उनकी नहीं है। चलिये उनकी मजबूरी को समझते हैं पर प्रकाशन जगत ने भी इस खबर के साथ ऐसा ही व्यवहार किया। कल और आज दोनों दिन यह खबर मेरे द्वारा देखे गये अखबारों में देखने को नहीं मिली-कुछ अखबार छुट्टी के कारण में देख नहीं पाया पर मुझे लगता है इसे कम महत्व दिया गया है । मैंने अपने शहर के एक ऐसे अखबार में यह खबर देखी जिसमें मुझे इसकी आशा बिल्कुल नहीं कर सकता था, और जो इसका प्रमाण भी था कि आस्थावान लोग इस खबर से विचलित होने वाले नहीं है।कल उपरोक्त टीवी चैनल द्वारा तीन अन्य बाबाओं का भी पर्दाफाश किया गया। बार बार उनका यह कहना कि करोड़ों भक्तों को ठगा गया या उनकी भावनाओं से खिलवाड़ किया गया मुझे अतिशयोक्ति लग रही थी। किसी संत या बाबा से विश्वास हटना किसी सच्चे भक्त की आस्था को कम नहीं कर सकता। लोग इन बाबाओं के प्रवचन कार्यक्रमों में जाते हैं और उनका लाभ भी उठाते हैं पर जानते हैं यह भक्ती जगाने वाले माध्यम हैं न कि भगवान हैं, और ज्ञान जो देते हैं वह कोई उनका अपना नहीं है वरन वह तो वैसे भी धरम ग्रंथों में है। हमने देखा हैंकि कई ऐसे लोग भी वहां जाते हैं जो सोचते हैं भक्ती और ज्ञान प्राप्त करने के अलावा समय भी अच्छा पास हो जाएगा। इन बाबाओं के रहन सहन और दैनिक क्रियाकलापों में बस वह भक्त रूचि रखते हैं जो इनसे कोई भौतिक या अन्य सांसरिक लाभ प्रत्यक्ष रुप से लेना चाहते हैं और उनकी संख्या नगण्य होती है। जो लोग इस खबर पर हिंदू धर्म पर किसी प्रकार का आक्षेप समझ रहे है उनसे मैं सहमत नहीं हूँ क्योंकि इन तथाकथित संतो में कोई हिंदू धरम का स्तम्भ होना तो दूर एक ईंट तक नहीं है। हमारे धरम में समय समय पर अनेक महापुरुषों ने इस धरती पर उत्पन्न होकर अपने करम और यश से अपना योगदान दिया पर फिर भी हमारी भक्ती व्यक्ति परक नहीं बल्कि विचार परक और निष्काम भाव से परिपूर्ण रही है ।मैं आशा करता हूँ कि लोग अब और जागरूक होंगे तथा इन बाबाओं से बचने के लिए उनेमें चेतना उत्पन्न होगी। इन तथाकथित बाबाओं के बौद्धिक चातुर्य और वाक्पटुता के जाल में आसानी से फंस जाता है। खासतौर से महिलाएं इनके प्रभाव में इस तरह आती हैं वह अपने घर के पुरुष सदस्यों को इन बाबाओं के सेवा और शरण लेने ले लिए प्ररित करती हैं या दवाव डालती हैं। इनके वजह से कई घरों में क्लेश भी होते हमने देखा है । मीडिया को चाहिए कि ऐसे बाबाओं को बेनकाब कर अपने सामाजिक दायित्व को पूरा करने के लिए प्रयास करता रहे। मैं स्वयं आस्थावान हूँ पर अंधविश्वास से मुझे परहेज है। मेरा मनाना है हमारा धर्म शाश्वत सत्य पर आधारित है जिसमें अंधविश्वास का कोई स्थान नहीं है। एक भक्त के रुप में मुझे इस बात की चिन्ता नहीं हैं कि किस बाबा या संत को बेनकाब किया गया है।

महायोगी की आलोचना से आत्मविश्लेषण करैं


भारत में आजकल एक फैशन हो गया है कि अगर आपको सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करनी हो तो हिंदू धर्म या उससे जुडे किसी संत पर आक्षेप कर आसानी से प्राप्त की जा सकती है। मुझे ऐसे लोगों से कोई शिक़ायत नहीं है न उनसे कहने या उन्हें समझाने की जरूरत है। अभी कुछ दिनों से बाबा रामदेव पर लोग प्रतिकूल टिप्पणी कर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की होड़ में लगे है । इस समय वह भारत में ही नहीं वरन पूरे विश्व में लोकप्रिय हो रहे हैं ,और मुझे नहीं लगता कि आजादी के बाद कोई व्यक्ति इतनी लोकप्रियता हासिल कर सका हो। सूचना तकनीकी में हम विश्व में उंचे स्थान पर हैं पर वहां किसी व्यक्ति विशेष को यह सम्मान नहीं प्राप्त हो सका है। बाबा रामदेव ने हिंदूं धर्म से योगासन, प्राणायाम, और ध्यान की जो विद्या भारत में लुप्त हो चुकी थी उसे एक बार फिर सम्मानजनक स्थान दिलाया है, उससे कई लोगों के मन में कुंठा उत्पन्न हो गयी है और वह योजनापूर्वक उन्हें बदनाम आकर रहे हैं।
पहले यह मैं स्पष्ट कर दूं कि मैंने आज से चार वर्ष पूर्व जब योग साधना प्रारंभ की थी तब बाबा रामदेव का नाम भी नही सुना था। भारतीय योग संस्थान के निशुल्क शिविर में योग करते हुए लगभग डेढ़ वर्ष बाद मैंने उनका नाम सूना था। आज जब मुझसे कोई पूछता है “क्या तुम बाबा रामदेव वाला योग करते हो?
मैं उनसे कहता हूँ -“हाँ, तुम भी किया करो ।
कहने का तात्पर्य यह है इस समय योग का मतलब ही बाबा रामदेव के योग से हो गया है। मुझे इस पर कोई आपत्ति भी नहीं है क्योंकि मैं ह्रदय से चाहता हूँ कि योग का प्रचार और प्रसार बढ़े । मैं बाबा रामदेव का भक्त या शिष्य भी नहीं हूँ फिर भी लोगों को यह सलाह देने में मुझे कोई झिझक नहीं होती कि वह उनके कार्यक्रमों को देखकर योग सीखें और उसका लाभ उठाएं । इसमें मेरा कोई निजी फायदा नहीं है पर मुझे यह संतुष्टि होती है कि मैं जिन लोगों से योग सीखा हूँ वह गुरू जैसे दिखने वाले लोग नहीं है पर उन्होने गुरूद्क्षिना में इसके प्रचार के लिए काम करने को कहा था। बाबा रामदेव का समर्थन करने के पीछे केवल योग के प्रति मेरी निष्ठा ही नहीं है बल्कि यह सोच भी है कि योग सिखाना भी कोई आसान काम नहीं -योग शिक्षा वैसे ही भारत में ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाई है और इसे विषय के रुप में स्कूलों में शामिल करने का बहुत विरोध हो रहा है ऐसे में लार्ड मैकाले की शिक्षा से स्वयं को विद्धान की पदवी से अलंकृत कर स्वयंभू तो योग के नाम से बौखला जाते हैं, और उनके उलुलजुलुल बयानों को मीडिया में स्थान भी मिलता है। कुछ दिन पहले बाबा रामदेव के शिविर में एक बीमार व्यक्ति की मौत हो गयी थी तो मीडिया ने इस तरह प्रचारित करने का प्रयास किया जैसे वह योग्साध्ना से मरा हो, जबकि उसकी बिमारी उसे इस हाल में लाई थी। उस समय एक सवाल उठा था कि अंगरेजी पध्दति से सुसज्जित अस्पतालों में जब कई मरीज आपरेशन टेबल पर ही मर जाते हैं तो क्या इतनी चीख पुकार मचती है और कोई उन्हें बंद करने की बात करता है। ट्रकों, कारों, और मोटर सायाकिलों की टक्कर में सैंकड़ों लोग मर जाते हैं तो कोई यह कहता है इन्हें बंद कर दो? और इन वाहनों से निकलने वाले धुएँ ने हमारे पर्यावरण को इस क़दर प्रदूषित किया है जिससे लोगों में सांस की बीमारियाँ बढ गयी है तो क्या कोई यह कहने वाला है कि विदेशों से पैट्रोल का आयत बंद कर दो?
बाबा रामदेव ने हिंदूं धर्म से जुडी इस विधा को पुन: शिखर पर पहुंचाया है इसके लिए उन्हें साधुवाद देने की बजाय उनके कृत्य में छिद्र ढूँढने का प्रयास करने वाले लोग उनकी योग शिक्षा की बजाय उनके वक्तव्यों को तोड़ मरोड़ कर उसे इस तरह पेश करते हैं कि उसकी आलोचना के जा सके। जहाँ तक योग साधना से होने वाले लाभों का सवाल है तो उसे वही समझ सकता है जिसने योगासन, प्राणायाम , ध्यान और मत्रोच्चार किया हो। शरीर की बीमारी तो पता चलती है पर मानसिक और वैचारिक बीमारी का व्यक्ति को स्वयं ही पता नहीं रहता और योग उन्हें भी ठीक कर देता है। जहां तक उनकी फार्मेसी में निर्मित दवाओं पर सवाल उठाने का मामला है बाबा रामदेव कई बार कह चुके हैं वह बीमारियों के इलाज में दवा को द्वितीय वरीयता देते हैं, और जहाँ तक हो सके रोग को योग साधना से दूर कराने का प्रयास करते हैं। फिर भी कोई न कोई उनकी दवाए उठाकर लाता है और लगता है अपनी विद्वता दिखाने। आज तक कोई किसी अंगरेजी दवा का सैम्पल उठाकर नहीं लाया कि उसमे कितने साईट इफेक्ट होते हैं। इस देश में कितने लोग अंगरेजी बिमारिओं से मरे यह जानने की कोशिश किसी ने नहीं की।
अब रहा उनके द्वारा हिंदू धर्म के प्रचार का सवाल तो यह केवल उनसे ही क्यों पूछा जा रहा है? क्या अन्य धर्म के लोग अपने धर्म का प्रचार नहीं कर रहे हैं। मैं केवल बाबा रामदेव ही नहीं अन्य हिंदू संतों की भी बात करता हूँ । जो लोग उन पर सवाल उठाते हैं वह पहले अपना आत्म विश्लेषण करें तो उन्हें अपने अन्दर ढ़ेर सारे दोष दिखाई देंगे। दो या तीन घंटे तक अपने सामने बैठे भक्तो और श्रोताओं को-वह भी बीस से तीस हज़ार की संख्या में -प्रभावित करना कोई आसान काम नहीं है। यह बिना योग साधना, श्री मद्भागवत का अध्ययन और इश्वर भक्ती के साथ कडी तपस्या और परिश्रम के बिना संभव नहीं है । उनकी आलोचना केवल वही व्यक्ति कर सकता है जो उन जैसा हो। इसके अलावा उनसे यह भी निवेदन है कि आलोचना से पहले कुछ दिन तक योग साधना भी करके देख लें ।

आकाश में धरती:फिर स्वर्ग और नरक कहॉ है?


वैज्ञानिकों ने आसमान एक धरती का अस्तित्त्व खोज निकाला है, उनके दावों पर अगर गम्भीरता से विचार करें तो अविश्वास का कोई कारण मुझे तो नज़र नहीं आता । अमेरिकी वैज्ञानिकों की खोज पर कभी किसी ने उंगली नहीं उठायी और शायद वही हैं जो आज भी अपने देश का सिर पूरे विश्व में उठाएँ हुए हैं। जब मैं आकाश की तरफ देखता था तो मुझे यह विश्वास होता था कि कहीं न कहीं आकाश में जीवन जरूर होगा, इसके पीछ तर्क थोडा हल्की तरह का अवश्य देता था पर किसी आदमी को समझाने के लिए वह ठीक ही है। वह यह कि हमारे पास एक से ज्यादा स्थानों पर जमीन होती है तो क्या हम उसको निरुप्योगी छोड़ देते हैं , एक जगह मकान में रहते हैं और दूसरी जगह पलट मिल जाये तो या तो उसे बेचे देते हैं या उस पर मकान बनवाकर उसे किराए पर उठा देते हैं, तो जिस परमात्मा ने यह इतना बड़ा ब्रह्माण्ड रचा है क्या वह इस धरती पर जीवन को स्थापित कर बाकी जगह खाली छोड़ सकता है। हमारे लिए जो सौरमंडल है उसमे किसी पर जीवन होगा इसमें मुझे संदेह रहता है, कारण ? मैं धरती को एक बड़ी इमारत की तरह मानता जिसमे खिड़की, रौश्नादन और पानी की टंकी तथा अन्य सुरक्षा कवच की तरह अनेक ग्रह और उपग्रह स्थापित हैं । हाँ, इसकी छतें दिन और रात में बदलती हैं-दिन में सूर्य अपने तेज से और रात को चंद्रमा अपनी शीतलता से जीवन का संचालन करते हैं । जब मैंने आकाश पर धरती के अस्तित्व की खबर देखी, सुनीं और पढी तो एक रोमांच का अनुभव किया क्योंकि बचपन से आकाश की तरफ देखते हुए कहीं न कहीं मेरे दिमाग में यह विचार जरूर आता है कि वहां भी ऐसा ही जीवन होगा। दुनियां में कोई भी ऐसा वृतांत सुनाने को नहीं मिलता कि आकाश में कोई जीवन है। हाँ, देवताओं के आकाश में विचारने की पुष्टि होती है और फिर इन्सान के लिए स्वर्ग-नरक या कहें जन्नत-जहन्नुम जैसे कल्पित स्थान आकाश की स्थिति को ध्यान में रखकर ही गडे गए हैं ताकी आदमी आकाश के बारे में ज्यादा सोचे नहीं- क्योंकि वह अगर आकाश के बारे में सोचेगा तो उसे तथाकथित बुध्दिजीवियों के भ्रमजाल में फंसने का समय ही कहाँ मिलेगा। हमारे धर्म ग्रंथों में आकाश वानियाँ होने तथा देवताओं के धरती पर आने की घटनाओं का वर्णन तो मिलता है पर हमारे जैसा खिन और भी जीवन है ऎसी कोई जानकारी मेरे नजरों के सामने नही आयी है । विश्व के अनेक किताबों में आकाश से प्रथ्वी का जिक्र मिलता है और वहां से धरती पर विमान आने और लोगों के उतरने की अनेक घटनाएँ हैं पर जैसा जीवन यहां है ऐसा कहीं और भी है ऐसा स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। बहरहाल मेरे हिसाब से यह सबसे नवीनतम खोज है जिसने मुझे बहुत प्रभावित किया है। जहाँ तक जीवन के मूल तत्वों का प्रशन है भारतीय दर्शन और पशिचम के विज्ञान में कोई अंतर नहीं है। जीवन के लिए जलवायु का होना जरूरी है और जिस धरती की खोज की गयी है उस पर वैसी ही जलवायु है जैसी यहां पायी जाती है।यह संभावना कम ही है कि उस धरती के लोगों से कोई हमारा जल्दी संपर्क होने वाला है। अगर हो सकता है तो तभी जब वहां हमसे ज्यादा प्र्गातिवान लोग हौं , क्योंकि हमारी वैज्ञानिक क्षमता अभी उन तक अपना संदेश पहुंचाने की नहीं है। पर एक बात जो कहने में मुझे कोई झिझक नहीं है यह कि अगर उस धरती के लोगों से संपर्क हो गया तो यहां ऐसे कईं भ्रम और विचारधाराएँ अपना अस्तित्व खो बैठेंगी जो बरसों से पीढी -दर-पीढी हमारे मस्तिष्क पर स्थापित रही हैं और उनकी आड़ में तमाम लोग अपने परिवार के लिए राज्यीय, आर्थिक, और धार्मिक सत्ता जुटाते रहे हैं। एक अनजाने भय जो कहीं आकाश में स्थित नहीं है उसका भय दिखाकर सामान्य आदमी को दिखाकर उसका सामाजिक, आर्थिक, बौध्दिक और राजनीतिक शौषण किया जाता रहा है और ऐसा करने वाले आकाश से ही अपनी शक्ति प्राप्त करने का दावा करते हैं। जब आदमी को यह विश्वास हो जाएगा कि आकाश में भी हमारे जैसे गरीब और बीमार लोग रहेते हैं वह स्वर्ग और नरक के अतार्किक सपनों और दुसप्नों से मुक्त हो जाएगा। अभी तक उसे यह बताया जाता है कि आकाश में स्वर्ग है जहां तमाम तरह की भौतिक सुविधाएं फ्री में मिल जाती हैं अगर वह अपने तथाकथित पथप्रदर्शक की बात मान ले तो! अगर नहीं मानेगा तो उसे नरक का भय दिखाया जाता है। अगर यह संपर्क हो गया तो सभी धर्मों के कर्म कांडों -जो स्वर्ग में भिजवाने की गारंटी देते हैं-पर पलीता लग जाएगा। क्योंकि आदमी अपने पथ प्रदर्शकों से पूछेगा के आकाश में भी धरती है तो यह स्वर्ग और नरक कहॉ है?यकीनन वह इसका जवाब नहीं दे पाएंगे और उनके द्वारा बरसों से बुना गया भ्रमजाल टूट जाएगा ।