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क्या पैबंद की तरह नहीं लगेंगे प्रतिबंध-आलेख hindi article on sach ka samna


पहले सविता भाभी नाम की वेबसाईट पर प्रतिबंध लगा और अब सच का सामना नाम के एक धारावाहिक पर प्रतिबंध की मांग को लेकर अभियान चल रहा है। प्रतिबंधों के औचित्य या अनौचित्य पर सवाल उठाना बेकार है क्योंकि उन पर विचार करने वाले बहुत हैं। हमारा उद्देश्य तो इन पर प्रतिबंध के समर्थक लेखक और बुद्धिजीवियों से यह पूछना है कि यह प्रतिबंध नाम का पैबंद कहां कहां लगाने की मांग करेंगे। समाज को नैतिकतवादी बनाने के साथ आस्थावान तथा संस्कारवान बनाने के लिये प्रतिबद्ध यह बुद्धिजीवी अब यौन सामग्री से भरपूर वेबसाईटों और उत्तेजित करने वाले धारावाहिकों से जिस तरह खौफ खा रहे उससे ऐसा लगता है कि देश में अब एक तरह का वैचारिक संकट पैदा हो गया है। इधर अंतर्जाल पर उत्तेजित करने वाली वेबसाईटें और ब्लाग भी कम नहीं है और क्या सभी पर प्रतिबंध लगाना संभव है?
इस लेखक को एक विद्वान मित्र ने एक किस्सा सुनाया था-वह अंतर्जाल पर सक्रिय है और जरूरत पड़ी तो उसका नाम भी बता देंगे और उससे इस विषय पर लिखने का आग्रह भी करेंगे। किस्सा आचार्य रजनीश का था जिनको बाद में ओशो के नाम से जाना जाने लगा है। वह एक बार इंग्लैंड की यात्रा पर जा रहे थे और वहां उनके आगमन का विरोध इसी आधार पर हो रहा था वह वहां की संस्कृति को पथभ्रष्ट कर देंगे। आचार्य रजनीश वायुयान में थे तो उनके शिष्य ने उनको बताया कि उन पर उनके ब्रिटेन प्रवेश पर रोक लग सकती है।
तब आचार्य ने जवाब दिया था कि ‘जिस देश की संस्कृति इतनी कमजोर है कि वह एक आदमी के वहां पांव रखने से ढह जायेगी वह चलेगी कितने दिन?’
यह पता नहीं कि वह प्रतिबंध लगा कि नहीं या वह वहां उतरे कि नहीं पर उनका उपरोक्त कथन इस लेखक के मन में घर कर गया। वैसे यह तो सही है कि पश्चिमी राष्ट्रों में उनका जमकर विरोध हो रहा था। उस पश्चिम में जो कि अपने खुलेपन के कारण जाना जाता है वह अधिक खुलेपन की उनकी विचारधारा से घबड़ाया रहता था। अक्सर भारतीय संस्कृति और संस्कारों के दब्बू मानने वाले आधुनिक विचारक इसे नोट करें कि पश्चिम से भी अधिक खुली विचाराधारा वाले भी इसी देश में पैदा होते हैं। आचार्य रजनीश को अपने जीवनकाल में ही इस देश में काफी विरोध का सामना करना पड़ा। अब भी उनकी अध्यात्मिक गुरु के रूप में मान्यता नहीं है पर सच बात तो यह है कि वह भारतीय अध्यात्म का पूरा ज्ञान रखते थे। उनका अध्ययन व्यापक था। वह भारतीय योग के उस घ्यान विज्ञान के प्रचारक थे जिसे यहां के लोगों की सबसे बड़ी शक्ति माना जाता है। इस ज्ञान का मुख्य स्त्रोत श्रीगीता ही है जो कि आदमी को दृष्टा भाव से जीवन का आनंद उठाने का संदेश देती है।
हम कुछ देर इसी दृष्टा भाव से देखें तो यह बात समझ में आयेगी कि आधा समाज मनोरंजन के लिये उस हर कार्यक्रमों, किताबों और वेबसाईटों की तरफ भाग रहा है जिसमें उसे मजा आये। यह उसका अधिकार है। हालांकि वह उसका परिणाम नहीं जानता। जिस तरह हम जो खाते हैं उसका प्रभाव उस चीज के स्वभाव के अनुसार हमारे शरीर पर होता है वैसे ही देखी और सुनी हुई बातों का प्रभाव भी हम पर होता है। हमारी इंद्रियां जिन विषयों के संपर्क में आती हैं वैसे ही वह उनका स्वभाव भी हो जाता है। अगर हम विष पीयेंगे तो पूरा शरीर नष्ट हो जायेगा उसी तरह कुछ विषय भी विष की तरह होते हैं। हम एक वस्त्र पहने ठीक ठाक ढंग से दिख रहे एक व्यक्ति को देख लें तो अच्छा लगता है वहीं अगर राह पर चल रहे किसी विक्षिप्त व्यक्ति को गंदे कपड़े या निर्वस्त्र देख लें तो मन खराब हो जाता है। यह प्रत्यक्ष प्रभाव दिखता है पर कुछ प्रभाव देर बाद होते हैं जो हमारा मानसिक संतुलन खराब करते हैं। यह बात उस आधे समाज को समझाना चाहिये जो इन प्रतिबंध समर्थकों की भीड़ में शामिल है।

दरअसल सच का सामना ने कई तरह से इस देश के बौद्धिक समाज की पोल खोलकर रखदी है। देश के धार्मिक, आर्थिक तथा साामजिक शिखरों पर बैठे वर्तमान कथित महापुरुषों की चाटुकारिता करने का आदी बौद्धिक वर्ग अपने को असहज स्थिति में अनुभव कर रहा है। यह चाटुकारिता वह दो तरह से करता है एक तो वह उनकी प्रशंसा में गुणगान करता है या फिर उनके सुझाये विषयों पर लिखकर पाठकों के समक्ष रखता है। समाज के संरक्षक और बुद्धिजीवियों को हमेशा यह भ्रम रहा है कि समाज उनकी बताई राह पर चलता है। अगर कोई ऐसा विषय जो उनके लिये असहज या समझ से परे है तो वह उसका विरोध इसलिये करते हैं कि समाज उनकी शक्ति की सीमा से बाहर जा रहा है। सीधी बात कहें तो समाज के शिखर पुरुषों और उनके मातहत बुद्धिजीवियों को अपने खास होने का अहंकार है और उनको पता ही नहीं कि आम आदमी उनको पढ़ता, सुनता और देखता जरूर है पर वह उनको महापुरुषों और विद्वानों की श्रेणी में नहीं रखता।
सच का सामना कार्यक्रम कोई खास प्रभावी नजर नहीं आ रहा। ऐसा लगता है कि झूठमूठ की प्रायोजित चर्चा है। फिर भी इस कार्यक्रम को दो चार साल तक दर्शक मिल जायेंगे। कौन बनेगा करोड़पति की तर्ज और धुन पर होने के बावजूद यह वैसी लोकप्रियता शायद ही अर्जित कर पाये। अलबत्ता विवादों ने भी इसकी दर्शक संख्या में बढ़ोतरी की होगी ऐसा लगता है। इस प्रचार के दो तरीके हैं-एक तो प्रशंसात्मक दूसरा है नकारात्मक। लगता है अंतर्जाल और टीवी चैनलों पर इसे अजमाया जा रहा है।
इससे अलग बात यह है कि अंतर्जाल पर अगर देखा जाये तो अश्लीलता से अधिक बदतमीजी वाली वेबसाईटें देखने को मिल रही हैं। अनेक ब्लाग वेबसाईट तो देखते ही मन खराब हो जाता है। गाली गलौच से भरे वह ब्लाग लेखक जानते ही नहीं यौन साहित्य सभ्यता से भी लिखा जाता है। यौन भावना का संबंध मन से होता है। अभद्र शब्द पढ़ने का मजा खराब करते हैं। फिर यौन क्रियाओं को जितना व्यंजना विधा में लिखा जाये उतना ही उनके पाठक मजा ले सकते हैं।

इसके साथ ही हम यह भी अपने पाठकों को बता दें कि वह इतना पागल न बने। यौन का विषय कोई हमारी देह से अलग नहीं है। खाना बहुत अच्छा लगता है पर हम में से कितने लोग खाना बनाने वाले सीरियल देखते हैं? इसलिये बेहतर है कि वह सात्विक विषयों पर ही अपना ध्यान केंद्रित करें। सच का सामना जैसा कार्यक्रम देखकर अपनी बुद्धि विषाक्त न करें। इससे अच्छा तो कामेडी धारावाहिक देखें जिनको एक दो चैनल चला रहे हैं। हल्की फुल्की कामेडी वाले यह सीरियल दिल और दिमाग को ताजगी देते हैं।
इधर हम अंतर्जाल पर जो हालत देख रहे हैं उससे देखकर एक प्रश्न बार बार आता है कि आखिर कहां कहां किस पर प्रतिबंध लगाये जायेंगे। इसमें देश के साथ ही अप्रवासी और विदेशी लोग वेबसाईटें और ब्लाग बनाये बैठे हैं। समाज को बचाने के लिये सभी बुद्धिजीवियों को एक अभियान छेड़ना चाहिये। देश के धनपति लोगों को उन बुद्धिजीवियों की सहायता करना चाहिये। सच बात तो यह है कि अंतर्जाल के सात्विक उपयोग से सभी को दीर्घकालीन फायदा है और यह तामसिक विषयों से अधिक समय तक नहीं हो सकता। इस तरह के प्रतिबंध एक पैबंद की तरह लगते जायेंगे पर कोई नतीजा नहीं निकलेगा। दरअसल हम जिस युवा वर्ग की आस्था और संस्कार डांवाडोल होने की बात कर रहे हैं वह मध्यम वर्ग का और शिक्षित है। उसे समझाया जाये तो समझाया जायेगा। जहां तक पूरे समाज का सवाल है तो निम्न मध्यम और निम्न वर्ग अपनी बौद्धिक क्षमता के अनुसार अपने वैचारिक खजाने के साथ ही आस्था और संस्कारों की रक्षा कर लेता है। इस कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगे या नहीं यह हमारी चर्चा का विषय नहीं है क्योंकि अपने देश की अध्यात्मिक शक्ति कोई कम नहीं है-यह इस लेखक का यकीन है। इन प्रतिबंधों को पैबंद इसलिये कहना पड़ा क्योंकि निजीकरण और उदारीकरण का जो मतलब हमने निकाला है उससे जो व्यवस्था बनी है वह व्यापार को अंध स्वतंत्रता देने की पोषक है। अब यही व्यवस्था एक समस्या बनती नजर आ रही है। सवाल यह है कि यह प्रतिबंध इसी व्यवस्था को बचाने के लिये पैंबंद की तरह नहीं लगेंगे? जो लोग इन विवादों को दृष्टा की तरह देख रहे हैं उनके लिये तो प्रतिबंध लगें तो भी ठीक न लगे भी तो उनको इसकी परवाह नहीं होगी। अलबत्ता बुद्धिजीवियों और लेखकों का अंतद्वंद्व भी सच का सामना ही करा रहा है जो कि कम मनोरंजक नहीं है। वैसे सुनने में आ रहा है कि सच का सामना वालों को प्रतियोगी नहीं मिल पा रहे जो कि इसी समाज की दृढ़ता का प्रतीक हैं।
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दूसरे के तय वैचारिक नक्शे पर चर्चा घर सजाते हैं-आलेख


बिना धन के कहीं भी आतंकवाद का अभियान चल ही नहीं सकता और वह केवल धनाढ़यों से ही आता है। आतंकवाद एक व्यापार की तरह संचालित है और इसका कहीं न कहीं किसी को आर्थिक लाभ होता है। आतंकवाद को अपराधी शास्त्र से अलग रखकर बहस करने वाले जालबूझकर ऐसा करते हैं क्योंकि तब उनको जाति,भाषा,वर्ण,क्षेत्र और संस्कारों की अलग अलग व्याख्या करते हैं और अगर वह ऐसा नहीं करेंगे फिर एकता का औपचारिक संदेश देने का अवसर नहीं मिलेगा और वह आम आदमी के मन में अपनी रचात्मकता की छबि नहीं बना पायेंगें

कोई भी अपराध केवल तीन कारणों से होता है-जड़,जोरू और जमीन। आधुनिक विद्वानों ने आतंकवाद को अपराध से अलग अपनी सुविधा के लिये मान लिया है क्योंकि इससे उनको बहसें करने में सुविधा होती है। एक तरह से वह अपराध की श्रेणियां बना रहे हैं-सामान्य और विशेष। जिसमें जाति,भाषा,धर्म या मानवीय संवेदनाओंं से संबंधित विषय जोड़कर बहस नहीं की जा सकती है वह सामान्य अपराध है। जिसमें मानवीय संवेदनाओं से जुड़े विषय पर बहस हो सकती है वह विशेष अपराध की श्रेणी में आतेे हैं। देश के विद्वनों, लेखकों और पत्रकारों में इतना बड़ा भ्रम हैं यह जानकार अब आश्चर्र्य नहीं होता क्योंकि आजकल प्रचार माध्यम इतने सशक्त और गतिशील हो गये हैं कि उनके साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संपर्क निरंतर बना रहता है। निरंतर देखते हुए यह अनुभव होने लगा कि प्रचार माध्यमों का लक्ष्य केवल समाचार देना या परिचर्चा करने तक ही सीमित नहीं है बल्कि हर पल अपने अस्तित्व का अहसास कराना भी है।
हत्या,चोरी,मारपीट डकैती या हिंसा जैसे अपराघ भले ही जघन्य हों अगर मानवीय संवदेनाओं से जुड़े विषय-जाति,धर्म,भाषा,वर्ण,लिंग या क्षेत्र से-जुड़े नहीं हैं तो प्रचार माध्यमों के लिये वह समाचार और चर्चा का विषय नहीं हैं। अगर सामान्य मारपीट का मामला भी हो और समूह में बंटे मानवीय संवदेनाओं से जुड़े होने के कारण सामूहिक रूप से प्रचारित किया जा सकता है तो उसे प्रचार माध्यमों में अति सक्रिय लोग हाथोंहाथ उठा लेते हैं। चिल्ला चिल्लाकर दर्शकों और पाठकों की संवदेनाओं को उबारने लगते हैं। उनकी इस चाल में कितने लोग आते हैं यह अलग विषय है पर सामान्य लोग इस बात को समझ गये हैं कि यह भी एक व्यवसायिक खेल है।

यह प्रचार माध्यमों की व्यवसायिक मजबूरियां हैं। उनको भी दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि मानवीय संवेदनाओं को दोहन करने के लिये ऐसे प्रयास सदियों से हो रहे हैं। यही कारण है कि अध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण भारतीय ज्ञान की अनदेखी तो वह लोग भी करते हैं जो उसे मानते हैं। अध्यात्मिक ज्ञान की जगह धर्म के रूप में सार्वजनिक कर्मकांडों के महत्व का प्रतिपादन बाजार नेे ही किया है। कहीं यह कर्मकांड शक्ति के रूप में एक समूह अपने साथ रखने के लिये बनाये गये लगते हैं। मुख्य बात यह है कि हमें ऐसे जाल में नहीं फंसना और इसलिये इस बात को समझ लेना चाहिये कि अपराध तो अपराध होता है। हां, दूसरे को हानि पहुंचाने की मात्रा को लेकर उसका पैमाना तय किया जा सकता है पर उसके साथ कोई अन्य विषय जोड़ना बेवकूफी के अलावा कुछ नहीं है। जैसे चोरी, और मारपीट की घटना डकैती या हत्या जैसी गंभीर नहीं हो सकती पर डकैती या हत्या को किसी धर्म, भाषा,जाति और लिंग से जोड़ने के अर्थ यह है कि हमारी दिलचस्पी अपराध से घृणा में कम उस पर बहस मेें अधिक है।
बाजार और प्रचार का खेल है उसे रोकने की बात करना भी ठीक नहीं है मगर आम आदमी को यह संदेश देना जरूर आवश्यक लगता है कि वह किसी भी प्रकार के अपराध में जातीय,भाषा,धर्म,वर्ण,लिंग और क्षेत्रीय संवेदनाएं न जोड़े-अपराध चाहे उनके प्रति हो या दूसरे के प्रति उसके प्रति घृणा का भाव रखें पर अपराधी की जाति,भाषा,धर्म,वर्ण,लिंग और क्षेत्रीय आधार को अपने हृदय और मस्तिष्क में नहीं रखें।

एक बात हैरान करने वाली है वह यह कि यह विद्वान लोग विदेश से देश में आये आतंकियों के जघन्य हमले और देश के ही कुछ कट्टरपंथी लोगों द्वारा गयी किसी एक स्थान पर सामान्य मारपीट की घटना में को एक समान धरातल पर रखते हुए उसमें जिस तरह बहस कर रहे हैं उससे नहीं लगता कि वह गंभीर है भले ही अपने कार्यक्रम की प्रस्तुति या आलेख लिखते समय वह ऐसा प्रदर्शित करते हों। इस बात पर दुःख कम हंसी अधिक आती है। मुख्य बात की तरफ कहीं कोई नहीं आता कि आखिर इसके भौतिक लाभ किसको और कैसे हैं-यानि जड़ जोरु और जमीन की दृष्टि से कौन लाभान्वित है। बजाय इसके वह मानवीय संवेदनाओं से विषय लेकर उस पर बहस करते हैं।

आतंकवाद विश्व में इसलिये फैल रहा है कि कहीं न कहीं विश्व मेें उनको राज्य के रूप में सामरिक और नैतिक समर्थन मिल जाता है। कहीं राज्य खुलकर सामरिक समर्थन दे रहे हैं तो कही उनके अपराधों से मूंह फेरकर उनको समर्थन दिया जा रहा है। एक होकर आतंकवाद से लड़ने की बात तो केवल दिखावा है। जिस तरह अपने देश में बंटा हुआ समाज है वैसे ही विश्व में भी है। हमारे यहां सक्रिय आतंकवादी पाकिस्तान और बंग्लादेश से पनाह और सहायता पाते हैं और विश्व के बाकी देश इस मामले में खामोश हो जाते हैं। वह तो अपने यहां फैले आतंकवाद को ही वास्तविक आतंकवाद मानते हैंं। वैसे ऐसी बहसें तो वहां भी होती हैं कि कौनसा धर्म आतंकवादी है और कौनसा नहीं या किसी धर्म के मानने वाले सभी आतंकवादी नहीं होते। यह सब बातें कहने की आवश्यकता नहीं हैं पर लोगों को व्यस्त रखने के लिये कही जातीं हैं। इससे प्रचार माध्यमों को अपने यहां कार्यक्रम बनाने और उससे अपना प्रचार पाने का अवसर मिलता है। आतंकवाद से लाभ का मुख्य मुद्दा परिचर्चाओं से गायब हो जाता है और वहां यहां तो आतंकवादी संगठनों की पैतरेबाजी की चर्चा होती है या फिर धार्मिक,जाति,भाषा, और लिंग के आधार बढि़या और लोगों को अच्छे लगने वाले विचारों की। आतंकवादियों के आर्थिक स्त्रोतों और उनसे जुड़ी बड़ी हस्तियों से ध्यान हटाने का यह भी एक प्रयास होता है क्योंकि वह प्रचार माध्यमों के लिये अन्य कारणों से बिकने वाले चेहरे भी होते हैं।

प्रसंगवश अमेरिका के नये राष्ट्रपति को भी यहां के प्रचार माध्यमों ने अपना लाड़ला बना दिया जैसे कि वह हमारे देश का आतंकवाद भी मिटा डालेंगे। भारत से अमेरिका की मित्रता स्वाभाविक कारणों से है और वहां के किसी भी राष्ट्रपति से यह आशा करना कि वह उसके लिये कुछ करेंगे निरर्थक बात है। यहां यह भी याद रखने लायक है कि ओबामा ने भारत के अंतरिक्ष में चंद्रयान भेजने पर चिंता जताई थी। शायद उनको मालुम हो गया होगा कि वहां से जो फिल्में उसने भेजीं हैं वह इस विश्व को पहली बार मिली हैं और अभी तक अमेरिकी वैज्ञानिक भी उसे प्राप्त नहीं कर सके थे। बहरहाल आतंकवादियों की पैंतरे बाजी पर चर्चा करते हुए विद्वान बुद्धिजीवी और लेखक जिस तरह मानवीय संवेदनाओं से जुड़े विषय पैंतरे के रूप में आजमाते हैं वह इस बात को दर्शाता है कि वह भी अपने आर्थिक लाभ और छबि में निरंतरता बनाये रखने के लिये एक प्रयास होता है। वह बनी बनायी लकीर पर चलना चाहते हैं और उनके पास अपना कोई मौलिक और नया चिंतन नहीं है। वह दूसरे के द्वारा तय किये गये वैचारिक नक्शे पर ही अपने चर्चा घर सजाते हैं।
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यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
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