Tag Archives: भारतीय धर्मं

नया साल और नशा-हिन्दी व्यंग्य कविताये(naya sal aur nasha-hindi satire poem


शराब पीते नहीं

मांस खाना आया नहीं

वह अंग्रेजी नये वर्ष का

स्वागत कहां कर पाते हैं।

भारतीय नव संवत् के

आगमन पर पकवान खाकर

प्रसन्न मन होता है

मजेदार मौसम का

आनंद भी उठाते हैं।

कहें दीपक बापू विकास के मद में,

पैसे के बड़े कद में,

ताकत के ऊंचे पद मे

जिनकी आंखें मायावी प्रवाह से

 बहक जाती हैं,

सुबह उगता सूरज

देखते से होते वंचित

रात के अंधेरे को खाती

कृत्रिम रौशनी उनको बहुत भाती है,

प्राचीन पर्वों से

जिनका मन अभी भरा नहीं है,

मस्तिष्क में स्वदेशी का

सपना अभी मरा नहीं है,

अंग्रेजी के नशे से

वही बचकर खड़े रह पाते हैं।

———————

चालाक और क्रूर इंसान के लिये

पूरा ज़माने के

सभी लोग खिलौना है।

कभी खून बहाते

दिल से उसमें नहाते

इंसानियत का प्रश्न

उनके सामने बौना है।

कहें दीपक बापू हथियारों पर

चलती है जिनकी जिंदगी

दया का अर्थ नहीं जानते,

खून और पानी में

अंतर नहीं मानते,

मिलाकर हाथ उनसे

अपना सुकून खोना है।

————————–

—-

 

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सम्मान की चाहत समाज सेवक-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


अपना खून सभी को

प्यारा है

पराया पानी लगता है।

दूसरे के दर्द पर

झूठे आंसु बहाते

या हास्य रस बरसाते

अपने दिल पर लगे भाव जैसा

 नहीं सानी लगता है।

कहें दीपक बापू औपचारिकता से

निभाते हैं लोग संबंध,

नहीं रहती आत्मीयता की सुगंध

भावनाओं की आड़ में

हर कहीं शब्दों का

दानी ही सभी को ठगता है।

———————–

सम्मान पाने के मोह में

संत कवि और समाज सेवक का

वेश लोग बना लेते हैं।

एक से काम बन जाये

दूसरा भी आजमाते

कमजोर दिमाग के होते

मजबूत दिखने के लिये

सिर और मुख पर

केश भी तना लेते हैं।

कहे दीपक बापू प्रचार पाने के लिये

कोई चुटकुले सुनाता,

कोई शायरी गुनगनाता,

पर्दे पर जमे रहने के लिये

हर कोई नया रास्ता बनाता है,

जनहित से वास्ता जताता है,

जरूरत पड़े तो

अपना इलाका देश भी बना लेते हैं।

———————-

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
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चालाक लोगों का शब्दकोष-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


गज़ब हैं वह लोग

चेहरे पर जिनके रहती हंसी

हृदय में घात छिपाते हैं।

स्वार्थ के लिये

पहले हाथ जोड़ते

फिर लात दिखाते हैं।

कहें दीपक बापू भाव भंगिमा

करे देती हैं हमें मंत्रमुग्ध

चालाक लोगों पर

जिनके शब्द कोष में

सहानुभूति के अर्थ नहीं होते,

दर्द हरने का करते व्यापार

दवा की नदी में

पैसे से  हाथ धोते,

अपरे चरित्र लगे खून के छींटों पर

चर्चा करो तो

विरोधी की मात दिखाते हैं।

——————-

एक उड़ते हुए पत्थर से

फूटता सिर किसी का

पूरे शहर में

दंगल शुरु हो जाता है।

शांति के  शत्रु

मौन से रहते बेचैन

जलते घर और कराहते लोग

सपनों में देखना उनको पसंद है

जब उड़ाते हैं नींद ज़माने की

करते अपना हृदय तृप्त

शहर में अमंगल गुरु हो जाता है।

कहें दीपक बापू मनुष्य देह में

पशु भी जन्म लेते हैं

रक्त की धारा बहाने पर रहते आमादा

जब लग जाता दांव उनका

चहकता शहर भी

जगल हो जाता है।

——————-

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

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छद्म नायकों का खेल-हिन्दी कविता


स्वयं पर नहीं आती हंसी जिनको

दूसरों को चिढाकर

परम आंनद पाते  हैं।

स्वयं घर से निकलते

पहनकर धवल कपड़े

दूसरे पर कीचड़ उछालकर

  रुदन मचाते हैं।

जिन्होंने अपना पूरा जीवन

पेशेवर हमदर्द बनकर बिताया

ज़माने के जख्म पर

नारों का नमक वही छिड़क जाते हैं।

बंद सुविधायुक्त कमरों में

विलासिता के साथ गुजारते

 रात के अंधेरे

दिन में चौराहे पर  आकर

वही समाज सुधार के लिये

हल्ला मचाते हैं।

कहें दीपक बापू बचना

ऐसे कागजी नायकों से

नाव डुबाने की कोशिश से पहले

उसे दिखावे के लिये बचाते हैं।

—————–

एक उड़ते हुए पत्थर से

फूटता सिर किसी का

पूरे शहर में

दंगल शुरु हो जाता है।

शांति के  शत्रु

मौन से रहते बेचैन

जलते घर और कराहते लोग

सपनों में देखना उनको पसंद है

जब उड़ाते हैं नींद ज़माने की

करते अपना हृदय तृप्त

शहर में अमंगल गुरु हो जाता है।

कहें दीपक बापू मनुष्य देह में

पशु भी जन्म लेते हैं

रक्त की धारा बहाने पर रहते आमादा

जब लग जाता दांव उनका

चहकता शहर भी

जगल हो जाता है।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

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दिखते गंभीर करते दिखावा-हिन्दी व्यंग्य कविता


अपने मुख से

बड़े बड़े शब्द बोलने वाले

हर कदम पर मिलते हैं वीर।

अपने आसन से उठते तो

पांव कांपते हैं,

इशारे के लिये उठाते हाथ

उनके फेफड़े कांपते हैं,

बोलते तो चीखते लगते

भाषा में नहीं होते

उनके तरकश में व्याकरण के तीर।

कहें दीपक बापू आधुनिक रथो पर

सवार है हजारों समाज सेवक

त्याग के दावे करते,

गरीब को  न मिल जाये

पूरी रोटी

इस ख्याल से भी डरते,

हंसते हैं मन ही मन

दूसरे को दर्द पर

बाहर दिखावा करते जैसे हों गंभीर।

———————

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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काला और गोरा धन-हिन्दी कविता


 धन ने भी कर लिये

अपने दो रूप

काला और सफेद।

पीछे दौड़े हर इंसान

गले लगाता सभी को

राक्षस और देवता का

करता नहीं कभी भेद।

बन गया जो सेठ

कर लेता सभी को मुट्ठी में

नहीं देखता ज़माना

उसके चरित्र में छेद।

कहें दीपक बापू भगवान नाम का

स्मरण बहुत बड़ी कमाई

मानी जाती है,

भक्ति की कीमत भी

धन से ही जानी जाती है,

कोई सफेद कागज पर

काले अक्षर लिखकर कमाता,

कोई सफेद अक्षर पर पर

कालिख पोतकर अपन काम जमाता,

सभी सिक्कों की बरसात के

इंतजार में खड़े हैं,

भर जाये झोली

इसी चाह में अडे हैं,

सुमार्ग से आता नहीं

कुमार्ग से आये धन पर

किसी को नहीं खेद है।

——————-

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

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धन तेेेेरस पर मन का रस बनायें-हिन्दी चिंत्तन लेख


            आज पूरे देश में धनतेरस का पर्व मनाया जा रहा है। भारतीय धर्मों को मानने वाले लोग आज के दिन  दीपावली की पूजा के लिये सामान आदि खरीदते हैं।  इस दिन बाज़ार में भीड़ रहती है तो यह भी सच है कि स्टील, पीतल, सोने तथा अन्य धातुओं से निर्मित सामान भी अन्य दिनों की अपेक्षा अत्यंत महंगे हो जाते है। यही  कारण  है कि वर्ष के किसी भी दिन की अपेक्षा धनतेरस के दिन सामान्य व्यापार में सर्वाधिक आय वाला दिन होता है।  खेरिज व्यापार में सामान्य दिनों की अपेक्षा चार से दस गुना का विक्रय होता है। यह अलग बात है कि दिपावली गुजरते हुए तत्काल मंदी भी आ जाती है।

            समय के साथ महंगाई बढ़ी तो धीमे धीमे धनतेरस के दिन खरीददारी एक औपचारिकता बन कर रह गयी है।  अर्थशास्त्र की दृष्टि से भारत में धन का असमान वितरण एक बहुत भारी समस्या है, यह हमने आज से तीस बरस पहले पढ़ा था।  अर्थशास्त्र के विद्यार्थी को समाज का भी ज्ञान रखना चाहिये और इस आधार पर हम कह सकते हैं कि भले ही हम शहरी क्षेत्रों में धनी लोगों की संख्या बढ़ने का दृश्य देखकर प्रसन्न हों पर सच यह है कि उसके अनुपात में अल्प धनियों की संख्या बढ़ी है।  जहां धातुओं के बड़े सामानों को खरीदने वाले दिखते हैं वहां उनका दाम पूछकर उनसे मुंह फेरने वालों की संख्या ज्यादा होती है। अनेक लोग तो स्टील की टंकी का दाम पूछकर एक चम्मच खरीद कर ही धनतेरस मना लेते हैं। जहां कथित आर्थिक विकास ने अनेक ऐसे लोगों को धनवान बना दिया कि जिनके पास स्टील की कटोरी खरीदने की ताकत नहीं थी अपनी वर्तमान भारी भरकम आये के सामने सोने का कड़ा भी सस्ता लगता है तो वहीं अनेक लोग जो मध्यम वर्ग के थे अब स्वयं को निम्न वर्ग का अनुभव करने लगे हैं। जिनके लिये धनतेरस का दिन औपचारिकता से ही बीतता है।

            इस तरह की चर्चा राजसी विषय है मगर हम  सात्विक दृष्टि से विचार करें तो  इस संसार में सहज जीवन के लिये हृदय में प्रसन्नता होना ही सच्चा सुख है।  धन कितना है, यह महत्वपूर्ण नहीं है हम उसका उपयोग कितना करते हैं यह बात विचारणीय है।  तिजोरियों में पड़ा या बैंक खातों में दर्ज धन मन को प्रसन्न कर सकता है पर उसका उपयोग न करने से वह एक कूड़े के समान है।  दूसरी बात यह कि धन अपने उपयोग के लिये खर्च करने से क्षणिक आनंद मिलता है पर जरूरतमंद की सहायता निष्काम भाव से करने से हृदय में जो उच्च भाव आता है उसका कोई मोल नहीं है।  दूसरी बात यह कि कि धन और पानी एक समान है।  रुके रहे तो सड़ जाते हैं या फिर निकलने का मार्ग बनाते हैं।  धन आता है तो उसके जाने का मार्ग भी बनाते रहना चाहिये वरना वह सड़े हुए पानी की तरह स्वयं के लिये भी कष्टदायक हो जाता है। इंसान जब स्वेच्छा से धन नहीं निकालता तो प्रकृतिक कारण उसे इसके लिये विवश करते हैं कि वह अपनी जेब खोले।

            अपने धन का उपयोग का स्वयं की आवश्यकताओं के लिये सभी करते हैं पर जो दूसरे की आवश्यकता पर उसे देते हैं वह दान या सहायता कहलाता है।  जिन लोगों को धनतेरस के दिन कमाई होती है वह स्वयं के लिये कोई खरीददारी नहीं कर पाते।  मिट्टी के दीपक, फटाखे तथा पूजा का सामान बेचने के लिये फेरी लगाने वाले तो इस प्रयास में रहते हैं कि सामान्य दिनों की अपेंक्षा उनको अधिक मजदूरी मिल जाये तो शायद अपनी अतिरिक्त आवश्यकतायें पूरी हों जायें।  उनकी अपेक्षायें कितनी पूरी होती हैं यह अलग बात है पर निजी क्षेत्र में मजदूरी करने वालों के लिये भी दीपावली का पर्व आशा लेकर आता है।  इस तरह धनतेरस और दीपावली सभी वर्गों के लिये खरीद और बेचने का अवसर समान रूप से ले आता है।

            इस समय मौसम समशीतोष्ण हो जाता है जिससे शीतल हवायें बहते हुए देह और हृदय को प्रसन्न करती हैं। यही तत्व दीपावली को अधिक आनंददायक बना देता है।  हम अपने सभी मित्र ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठकों हार्दिक बधाई। जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

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फेसबुक पर हिंग्लिश के सामने हिन्दी भाषा कितनी टिकेगी-हिन्दी चिंत्तन लेख


            जनसंपर्क, प्रचार तथा लोकप्रियता का जो बाज़ार हिन्दी भाषियों से कमाते हैं उनमें आत्मविश्वास की  भारी कमी है या नित्य चलायमान बने रहने की परंपरा के तहत भाषा से छेड़छाड़ उसके प्रबंधक तथा कार्यकर्ता कर रहे हैं यह कहना कठिन है। हम बात कर रहे हैं फेसबुक पर अभी हाल ही में हिन्दी प्रारूपण में हिंग्लिश शब्द जोड़ने की।  अभी तक हमें दो शब्द दिखाई दिये। एक तो हिन्दी के पुष्टिकरण  की जगह हिंग्लिश  का कंफर्म (conform) दूसरा  मुखपृष्ठ की  जगह होम (home) कर दिया गया है। हमारी दृष्टि से अब समय आ गया है कि हिंग्लिश और हिन्दी वालों को अलग अलग कर देखा जाना चाहिये। कम से कम स्थापित, प्रचलित तथा आदत में जो शब्द आदत में आ गये हैं, उनमें हिन्दी प्रारूपण अपनाने वाले अंतर्जालीय प्रयोक्ताओं का हृदय विदीर्ण करने के लिये ऐसे परिवर्तन नहीं करना चाहिये जो अनावश्यक हों। हमारा मानना है कि फेसबुक पर किये गये ऐसे परिवर्तन एकदम अनावश्यक हैं।

            पहली बात तो हम यह बता दें कि हमने आज तक अपने संपर्क में आये जितने भी युवाओं को फेसबुक पर कार्य करते देखा है वह अंग्रेजी प्रारूप का उपयोग करते हैं।  वह सभी हिंग्लिश वाले हैं। उनमें से कोई भी हिन्दी प्रारूप का उपयोग करना चाहेगा यह हमें लगता नहीं है।  हम जैसे अंग्रेजी से निरक्षर लोग ही फेसबुक का हिन्दी प्रारूप अपनाये हुऐ हैं। देवनागरी हिन्दी में यह सोचते हुए भी लिखना जारी रखे हुए हैं कि इससे व्यापक आधार पर अभिव्यक्ति का आधार नहीं मिलता।  हिंग्लिश वाले हमसे पढ़ेंगे या हम उनको पढ़ायेंगे यह भ्रम हमें नहीं है। हिन्दी दिवस पर हिन्दी प्रयोकताओं को सामान्य समझने वाले अंग्रेजी प्रेमी भाषाई व्यवसायिक विद्वानों के कथित महान विचार सुनने के पश्चात् तो हमें यह भी लगने लगा है कि हिन्दी में हिंग्लिश मिलाने पर प्रतिकूल लिखना भी व्यर्थ है।

            यह पता नहीं है कि फेसबुक पर इस तरह का  परिवर्तन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विद्वान भारतीय सलाहकारों की राय पर हुआ या फिर भारत में स्थित किन्हीं कार्यकर्ताओं या उनके समूह ने ऐसा कर अपनी निरंतर सक्रियता का प्रमाण देकर प्रबंधकों को प्रसन्न करने का प्रयास किया यह कहना कठिन है।  कम से कम हिन्दी भाषियों को प्रयोक्ता की तरह अपने रचना उत्पादों के लिये बाज़ार बनाने वालों को अब हिंग्लिश तथा हिन्दी भाषियों को अलग अलग दृष्टिकोण से देखने का विचार कर ही लेना चाहिये।  उन्हें अब अंग्रेजी रोमन लिपित अंतर्जालीय प्रारूपों में हिन्दी से लोकप्रिय या प्रचलित शब्द रोमन लिपि में लिखना चाहिये।  हिन्दी प्रारूपण का उपयोग केवल हम जैसे अंग्रेजी से अपरिचित लोग ही करते हैं।  उनको ऐसे होम या कंफर्म शब्द अटकते हुए पढ़ने पढ़ते हैं।  स्वर के साथ ही सोच भी तोतली हो जाती है। हिन्दी प्रारूपण एक बार बनाकर उससे मुंह ही फेर लें तो अच्छा है क्योंकि हम जैसे प्रयोक्ता उसी से खुश रहते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

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योग साधना को दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा बनायें-हिन्दी चिंत्तन लेख


            एक योग और सामान्य मनुष्य में क्या अंतर होता है? अनेक लोगों के दिमाग में यह सवाल आता है। इसका कारण यह है कि योगी भी आम मनुष्य की तरह दो आंख, दो कान, दो नासिका, दो हाथ तथा दो पांव भी एक योगी तरह ही  दिखते है कोई नया अंग उसमें नहीं जुड़ता।  वह अपने अंगों का उपयोग भी सामान्य लोगों की तरह करता है।  ऐसे में दोनों अंतर कैसे दिखे? सच यह है कि  योगी और सामान्य मनुष्य में अंतर कार्यशौली, भावों की अभिव्यक्ति के तरीके तथा व्यवहार में दृढ़ता से प्रकट होता है।

            जहां सामान्य मनुष्य बाह्य दबाव में काम करता है वहीं योगी स्वतः संचालित होता है।  कोई आकर्षण या रोमांचित दृश्य सामने उपस्थित होने पर सामान्य मनुष्य की आंखें फटी रह जाती हैं।  किसी मधुर या कटु स्वर से संपर्क होने पर कान विशेष रूप से सक्रिय हो जाते हैं। कहीं सुगंध होने पर नासिका उसे अधिक से अधिक ग्रहण करने के लिये प्रेरित होती है।  बढ़िया खाना मिलने पर जीभ आवश्यकता से अधिक उदरस्थ करने के लिये तत्पर होती है।  इसके विपरीत एक योग साधक या सिद्ध की इंद्रियां आंतरिक नियंत्रण में काम करती हैं।  वह बाहरी दबाव में कभी उत्तजित होकर सक्रिय नहीं होता। जहां सामान्य मनुष्य खुशी पर उत्तेजना और निराशा में अवसाद के वश में होता है वहीं योग साधक दोनों से निवारण का उपाय ध्यान आदि के माध्यम से करता है।

            अनेक योग साधक यह शिकायत करते हैं कि उनकी साधना में बाहरी दबाव से बाधा आती है। जब वह कहीं किसी सामाजिक समारोह में जाते हैं तब सामान्य मनुष्यों के बीच असहजता के वातावरण में उन्हें भी स्वयं को जोड़ना पड़ता है।  ऐसे लोगों को यह समझना चाहिये कि यह स्वाभाविक रूप से होगा। वैसे योग साधकों को श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान और विज्ञान के साथ ही गुण विभाग का अध्ययन नियमित रूप से करना चाहिये। इससे उन्हें इस विश्व के मूल तत्वों को समझने का अवसर मिलेगा। तब  त्रिगुणमयी माया के बंधन में बंधे सामान्य मनुष्य समुदाय के व्यवहार से क्षुब्ध नहीं होंगे।  नियमित अभ्यास से योग साधक धीमे धीमे त्रिगुणमयी माया के प्रभाव से परे होते जाते हैं और उन्हें सामाजिक तथा पारिवारिक परंपराओं का खोखलापन नज़र आने लगता है।  प्रारंभ में यह स्थिति  भयावह लगती है। हृदय कांपने लगता है पर कालांतर में यह अनुभव होता है कि वह इस जीवन में प्रतिदिन एक सपना देखते हैं। कई घटनायें सपने की तरह होती है। घटती हैं तब हम उनमें स्वयं सक्रिय होते हैं पर जब बीत जाती हैं तब उसकी यादें ही साथ रह जाती हैं।

            अपने लोगों से मिलने बिछड़ने की प्रक्रिया से हम अनेक बार गुजरते हैं।  मिलते हैं तो खुशी और बिछड़ते हैं तो दुःख होता है। योग साधक जब श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करें तो वह इस संसार में प्रतिदिन दिखने वाले स्वपन का यथार्थ समझ सकते हैं। यह ज्ञान साधना जीवन को रोमांचित करती है।  यह रोमांच ही जीवन का वास्तविक आंनद है। इसका अनुभव तभी किया जा सकता है जब देह, मन और विचार विकाररहित हों।  ऐसा होने पर मन एक शक्तिशाली व्यक्ति की तरह हमारे साथ होता है तब हम जीवन में एक दृढ़ व्यक्तित्व की छवि के साथ चलते हैं।  यह छवि त्रिगुणमयी माया के बंधन में बंधे सामान्य मनुष्य से योग साधक से अलग करती है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

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गंदगी फैलाने वालों पर आर्थिक दंड लगाना चाहिये-मनुस्मृति के आधार पर हिन्दी चिंत्तन लेख


            हमारे देश में सार्वजनिक स्थानों, मार्गों तथा उद्यानों में भारी गदंगी होने के समाचार आते हैं। अनेक पुराने लोग यह शिकायत करते मिलते हैं जो राजतंत्र के समय शहर के साफ होने की बात कहते हुए आधुनिक लोकतंत्र में व्यवस्था चौपट होने का दावा करते हैं पर सच यह है कि उस समय उपभोग की ऐसी प्रवृत्ति नहीं थी जैसी कि आज है।  लोगों का खान पान अब घर से अधिक बाहर हो गया है।  अंडे, मांस, सिगरेट, शराब, तथा तैयार  खान पान के सामानों का उपभोग बाजारों में धड़ल्ले से होने लगा है जिससे कचरे का भंडार कहीं भी देखा जा सकता है।  ऐसा नहीं है कि बाजारों में ऐसी वस्तुओं का उपभोग बढ़ा हो वरन् लोग घरों में मंगवाकर भी इन्हें सड़क पर ही फेंकते हैं।

            वर्षा ऋतु में पिकनिक मनाने की परंपरा बन गयी है, यह अलग बात है कि यही ऋतु भोजन के पाचन की दृष्टि से संकटमय मानी जाती है।  आजकल पंचसितारा निजी चिकित्सालयों में इसी ऋतु में भीड़ लगती है।  हर जगह कचरा कीचड़ में तब्दील हो जाता है और इससे महत्वपूर्ण जलस्थल तथा उद्यान सामान्य पर्यटकों के सामने बुरे दृश्य लेकर उपस्थित रहते हैं।  कहा जाता है कि प्लास्टिक कभी नष्ट नहीं होती मगर सभी वस्तुओं को इसी में बांधकर उपभोक्ता को दिया जाता है। अनेक शहरों में  इस प्लास्टिक ने सीवर लाईनों को अवरुद्ध करने के साथ ही नदियों और नालों को प्रदूषित कर दिया है।  हमारे यहां पर्वतों तथा नदियों को पूज्यनीय बताया जाता है पर हिमालय और उससे निकलने वाली नदियों पर जाने वाले कथित भक्तों ने किस तरह वहां अपनी उपभोग प्रवृत्तियों से प्रदूषण फैलाया है उस पर अनेक पर्यावरण विशेषज्ञ नाखुशी जताते रहते हैं।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

———–

समुत्सृजेद्राजमार्गे यस्त्वऽमध्यमनापदि।

स द्वौ कार्यापर्णे दद्यादमेध्यं चाशुशेधयत्।।

            हिन्दी में भावार्थ-सार्वजनिक मार्ग पर कूड़ा फेंकने वाले ऐसे नागरिक जो अस्वस्थ न हों उन पर अर्थ दंड देने के साथ ही उसकी सफाई भी करवाना चाहिये।

आपद्गतोऽधवा वृद्धो गर्भिणो बाल एव वा।

परिभाषणमर्हन्ति तच्च शोध्यमिति स्थितिः।।

            हिन्दी में भावार्थ-यदि कोई संकट ग्रस्त, वृद्ध, गर्भवती महिला तथा बालक सड़क पर कचरा फैंके तो उसे धमकाकर सफाई कराना चाहिये।

            हमारे देश में मनस्मृति का विरोध एक बुद्धिमानों का समूह करता है। यह समूह कथित रूप से आम आदमी की आजादी को सर्वोपरि मानता है।  उस लगता है कि मनुस्मृति में जातिवादी व्यवस्था है जबकि सच यह है कि इसमें ऐसे अनेक महत्वपूर्ण संदेश है जो आज के समय भी अत्यंत प्रासांगिक हैं। एक तरफ समाज प्लास्टिक के रंग बिरंगे रूपों में बंधे सामानों को देखकर विकास पर आत्ममुग्ध हो रहा है  जबकि अनेक प्रकार के विषाक्त, मिलावटी तथा सड़े खानपान से जो बीमारियां पैदा हो रही हैं उस पर किसी का ध्यान नहीं है।  उससे अधिक यह महत्वपूर्ण बात है कि अनेक लोग सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ रखने की बजाय वहां कचरा डालकर न केवल अपने लिये वरन् दूसरों को भी कष्ट देते हैं।  इसलिये जागरुक लोगों को इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि वह कचरा उचित स्थान पर डालकर पुण्य का काम करें।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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हिन्दी दिवस सप्ताह और पखवाड़ा-हिन्दी चिंत्तन लेख


            14 सितम्बर हिन्दी दिवस के बाद सरकारी विभागों में हिन्दी पखवाड़ा और हिन्दी सप्ताह प्रारंभ हो जाता है।  यह अलग बात है उस दौरान औपचारिक कार्यक्रम समाचारों में हिन्दी दिवस की अपेक्षा अधिक स्थान नहीं पाते। इस दौरान वाद विवाद प्रतियोगिताओं, सम्मेलनों और सम्मान कार्यक्रमों में वही पुरानी बात दोहराई जाती हैं।  अगर हम हिन्दी के व्यवसायिक बाज़ार को देखें तो उसके पास एक बहुत विशाल जनसमूह है।  वह अपने लिये कमाई के लिये हर क्षेत्र में अपने हिसाब से भाषाई विकास के लिये रणनीति बना सकता है पर उसमें आत्मविश्वास की कमी है।  टीवी चैनल के समाचार, धारावाहिक, फिल्म की पटकथायें और समाचार पत्र पत्रिकाओं की विषय सामग्री में प्रबंधकों की भाषा के प्रति कुंठा ही नहीं वरन् उससे जड़ आमजन समूह के प्रति भारी अविश्वास दिखाई देता है।  यह अविश्वास और विचार हीनता आमजन समूह की मूढ़ता की वजह से नहीं वरन् प्रबंधकों और कार्यकर्ताओं में अपने ही उनके अंदर अपने कर्म से प्रतिबद्धता के अभाव  से ही उपजी होती है।

            हिन्दी पर वही पेशेवर विद्वान इन बहसों में भाग लेने आते हैं जिन्होंने हिंग्लििश या हिंग्रेजी के सहारे प्रतिष्ठा के आकाश को छुआ होता है और उनकी रचनायें मनोंरजन या कथित रूप से सामाजिक चेतना के विषय से जुड़ी होती है। प्रगतिशील, जनवादी तथा अन्य विचाराधाराओं के विद्वानों ने प्रचार जगत तथा उसके संगठनों पर अधिकार कर रखा है इसलिये मौलिक, स्वतंत्र तथा जातीय, धार्मिक, राजनीतिक तथा कला के समूहें से पृथक लेखकों के लिये कहीं कोई स्थान नहीं है।  अब अंतर्जाल ने यह सुविधा दी है तो उसे सामाजिक माध्यम कहकर सीमित किया जा रहा है।  पूंजी, प्रतिष्ठा और प्रचार के शिखर संगठनों के महापुरुष निरंतर यह संदेश देते हैं कि यह सामाजिक प्रचार माध्यम भी उनकी कृपा से ही चल रहा है।  प्रचार माध्यम शिखर पुरुषों के ब्लॉग, ट्विटर और फेसबुक की चर्चा कर आमजन को यह संदेश तो देते हैं कि वह सामाजिक माध्यम को महत्व प्रदान कर रहे हैं पर साथ ही यह भी बता देते हैं कि हर विचारक की औकात उसकी भौतिक शक्ति के अनुसार ही आंकी जायेगी।

            हम जैसे सात वर्ष से अंतर्जाल पर सक्रिय हिन्दी लेखक अगर स्वांत सुखाय न हों तो लिखना ही बंद कर दें। हमारा स्तर अभी तक एक अंतर्जाल प्रयोक्ता से आगे नहीं बढ़ पाया।  दो तीन वर्ष तक हमें निराशा लगी पर जब हमने अध्ययन किया तो पता लगा कि भाषा, जाति, धर्म, अर्थ और समाज सेवा में कामनाओं के साथ राजसी प्रवृत्ति के पुरुषों से अपेक्षा करना व्यर्थ है क्योंकि उनके लक्ष्य कभी पूरे नहीं होते इसलिये हमें प्रतिष्ठित करने का समय उन्हें मिल ही नहीं सकता।  हमने हिन्दी भाषा में अंग्रेजी शब्दों के मिश्रण के प्रतिकूल एक लेख यहां लिखा था।  उस पर ढेर सारी प्रतिक्रिंयायें आयीं। उनमें विरोध तथा समर्थन दोनों ही शामिल था।  इस तरह के मिश्रण के अभियान प्रारंभ होने की जानकारी हमें अंतर्जाल पर ही मिली थी तब ऐसा लगा कि शायद यह एक भ्रम हो पर जल्द ही वह सच सामने आने लगा।  भाषाई रणनीतिकार हिन्दी को रोजगारोन्मुख बनाने के लिये उस राह पर चल पड़े थे जिसकी कल्पना करना हमारे लिये कठिन था।  कहने को यह भाषा के साथ उनकी प्रतिबद्धता थी पर सच उनकी अपनी रचनाओं के सहारे प्रतिष्ठा बनाये रखने के विश्वास का अभाव का प्रमाण था।

            विचारधाराओं से जुड़े ऐसे आकाशीय विद्वान अपनी बात जनमानस में कहने के लिये उतावले रहते हैं। उन्हें अपनी रचना पर तत्काल प्रतिक्रिया चाहिये क्योंकि उससे ही उनकी भौतिक उपलब्धि होती है।  समाज के पढ़े लिखे तबके से ही उनके सरोकार रह गये हैं। उन्हें अल्पशिक्षित, मनोरंजन प्रिय तथा  अध्यात्मिक वृत्ति के लोगों पर प्रभाव डालने का प्रयास करने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि वह उनके प्रतिबद्ध पाठकों से ही संदेश ग्रहण करता है। इसलिये उन्होंने अपने इसी संदेशवाहक तबको संबोधित करते रहने के लिये शब्द योजना बनाई।        हमारे यहां विचाराधाराओं से जुड़े अधिकतर लोग अध्यात्म विषय पर लिखना बेगार मानते हैं क्योंकि यह काम तो उन्होंने पेशेवर धार्मिक विद्वानों की सौंप दिया है।  यही कारण है कि आधुनिक हिन्दी लेखक भारतीय जनमानस की अध्यात्मिक सोच से परे होकर अपनी रचना करते हैं। भारतीय जनमानस में अध्यात्मिक दर्शन कूट कूट कर भरा है इसलिये वह इन लेखकों की रचनाओं को एक सीमा तक ही स्वीकार करता है।  अगर वह मनोरंजक हुई्रं तो लोकप्रियता पाती हैं पर लेखक की छवि कभी अध्यात्मिक नहीं बनती। यही कारण है कि अनेक हिन्दी भाषी लेखक प्रचार के शिखर पर दिखते हैं पर भारतीय जनमानस में उनके लिये वैसा स्थान नहीं है जैसा कि पुराने कवियों और लेखकों का रहा है।

            ऐसे ही लेखक अपनी श्रेष्ठता अपनी भौतिक उपलब्धियों के आधार पर प्रमाणित करने हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह या हिन्दी पखवाड़ा केे मंचों का उपयोग करने को लालायित रहते हैं।  यह बुरा नहीं है पर हिन्दी भाषा पर नियंत्रण करने का भाव उनकी आत्ममुग्धता को ही दर्शाती है। जहां तक भाषा का प्रश्न है वह समाज की विचार धारा तय करती है। हमारी मान्यता है कि शुद्ध हिन्दी का उपयोग ही हमारी रचनाओं की शक्ति है। व्यवसायिक क्षेत्र कभी हिन्दी का मार्ग तय नहीं कर सकता। जो लोग यह सोच रहे हैं कि वह हिन्दी के भाग्यविधाता हैं उन्हें यह भ्रम नहीं रखना चाहिये कि समाज उनकी हिन्दी को मान रहा है।

——————————————

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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धनवान समाज से हिन्दी भाषा के विकास की अपेक्षा न करें-14 सितम्बर पर हिन्दी दिवस पर विशेष लेख


      14 सितम्बर हिन्दी दिवस के अवसर पर ऐसा पहली बार हुआ है जब हिन्दी टीवी चैनल इस पर उत्सव मनाकर अपने विज्ञापन प्रसारण का समय पार लगा रहे हैं।  एक टीवी चैनल ने तो अपना मंच फिल्मी अंदाज में तैयार कर हिन्दी भाषा के आधार पर व्यवसायिक करने वाले लोगों को आमंत्रित किया।  उसमें तमाम विद्वान अपने तर्क दे रहे थे।  एक विद्वान ने स्वीकार किया कि हिन्दी भाषा का आधार किसान और मजदूर हैं।  हम जैसे मौलिक लेखक मानते हैं कि हिन्दी सामान्य जनमानस की चहेती भाषा है और विशिष्ट लोगों के राष्ट्रभाषा या मातृभाषा बचाने के प्रयास दिखावटी हैं।  इस चर्चा में बाज़ार या व्यावसायिक क्षेत्रों में प्रचलित हिन्दी पर चर्चा हुई।  कुछ विद्वानों का मानना था कि बाज़ार हिन्दी का स्वरूप बिगाड़ रहा है तो अन्य की राय थी ऐसा कुछ नहीं है और हिन्दी भाषियों को उदार होना चाहिये।

      हिन्दी दिवस पर इस तरह की चर्चायें होती रहती हैं पर पहली बार ऐसी चर्चा टीवी चैनल पर हुई।  इसमें समाचार पत्र पत्रिकाओं में शीर्षकों तथा विषय सामग्रंी के साथ  में अंग्रेजी शब्दों के उपयोग पर भी विचार हुआ।  इस तरह की प्रवृत्ति ठीक है या नहीं यह एक अलग विषय है पर इसका पाठकों पर जो प्रभाव हो रहा है उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। अक्सर लोग यह शिकायत करते हैं कि अंग्रेजी अखबार हिन्दी से अधिक महंगे हैं।  अगर हम इसके पीछे के कारण जाने तो समझ में आयेगा कि चूंकि लोग अखबारों को अंग्रेजी भाषा ज्ञान बनाये रखने के लिये पढ़ते हैं इसलिये उनकी प्रसार संख्या मांग से कम होती है।  मांग आपूर्ति के नियमानुसार  वह  महंगे दाम पर भी बिक जाते हैं। जबकि हिन्दी प्रकाशनों की संख्या अधिक है तो पाठक संभवत उस मात्रा में उपलब्ध नहीं है। एक समय हिन्दी समाचार पत्र पत्रिकायें लोकप्रिय थीं पर इसका कारण उनकी विषय सामग्री कम उसके अध्ययन से  हिन्दी भाषा को आत्मसात करने की प्रवृत्ति लोगों में अधिक थी।  लोग साहित्यक किताबों की बजाय समाचार पत्र पत्रिकाओं पर हिन्दी ज्ञान के लिये निर्भर रहना पंसद करे थे। अब अगर कोई व्यक्ति हिन्दी समाचार पत्र पत्रिकाओं के अध्ययन से हिन्दी भाषा आत्मसात करने की बात सोच भी नहीं सकता।  हिन्दी समाचार पत्र यह मानकर चल रहे हैं कि युवा वर्ग हिन्दी नहीं जानता इसलिये अपने विशिष्ट पृष्ठों में अंग्रेजी शब्दों का अनावश्यक  उपयोग करते हैं। हमें पता नहीं कि इसका उन्हें लाभ है या नहीं पर हम जैसे पाठक ऐसी सामग्री को पढ़ने में भारी असहजता अनुभव करते हैं।  हिन्दी समाचार पत्र पत्रिकाओं ने अपने पाठकों का मानस समझा नहीं जो कि अध्यात्म प्रवृत्ति का है। यही कारण है कि देश भर के प्रतिष्ठित धार्मिक संस्थाओं की पत्र पत्रिकायें आजकल लोगों के घरों में अधिक मिलती है और हिन्दी के व्यवसायिक प्रकाशनों को ग्राहक उसी तरह ढूंढने पर रहे हैं जैसे कि कपड़े वाला ढूंढता है। एक समय सामाजिक, राजनीतिक, महिला, बाल तथा मनोरंजन के विषयों वाली पत्रिकायें अक्सर लोगों के घर में मिल जाती थीं पर आजकल यह नहीं होता। कह सकते हैं कि इसके लिये आधुनिक संचार माध्यमों जिम्मेदार हैं पर सवाल उठता है कि आखिर अध्यात्मिक पत्र पत्रिकाओं पर यह नियम लागू क्यों नहीं होता? हिन्दी व्यवसायिक प्रकाशनों के प्रबंधकों को इसके लिये आत्म मंथन करना चाहिये कि इतना बड़ा जनसमूह होते हुए भी उनके प्रकाशनों से लोग क्यों मुंह मोड़ रहे हैं। कहीं यह भाषा के लिये आयी उनकी प्रतिबद्धता की कमी तो नहीं है?

      इतना ही नहीं यह प्रकाशन समूह देश में रचना के पठन पाठन तथा सृजन की नयी प्रवृत्तियों के संवाहक भी नहीं बन पाये और दूसरी भाषाओं के रचनाकारों तथा रचनाओं को हिन्दी में अनुवाद कर प्रस्तुत कर यह श्रेय तो लेते रहे हैं कि वह हिन्दी पाठक के लिये बेहतर विषय सामग्री प्रस्तुत की हैं पर आजादी के बाद एक भी लेखक का नाम इनके पास नहीं है जिसे उन्होंने अपने सहारे प्रतिष्ठा दिलाई हो।  क्या हिन्दी में बेहतर कहानियां नहीं लिखी जातीं या प्रभावी कविताओं की कमी है? यह सोच हिन्दी प्रकाशन समूहों के प्रबंधकों और संपादकों का हो सकता है पर यही उनके उस कम आत्मविश्वास का भी प्रमाण है जिसके कारण भारतीय जनमानस में हिन्दी प्रकाशनों की प्रतिष्ठा कम हुई है।

      आखिरी बात यह कि बाज़ार पर आक्षेप करना ठीक नहीं है। भाषा का संबंध भाव से और भाव का संबंध भूमि से होता है। भारत में हिन्दी ही सर्वोत्म भाषा है जो सहज चिंत्तन में सहायक होने के साथ ही उसके संवाद और उसके प्रेक्षण के लिये एक उचित माध्यम है। माने या माने पर इस सत्य से अलग जाकर हिन्दी के विकास पर बहस करना केवल औपचारिकत मात्र रह जाती है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

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आशिक जब कातिल बन जाते हैं-हिन्दी व्यंग्य काव्य रचनायें


मधुर कर्णप्रिय शब्द बोले

ऐसे मुख की तलाश जारी है

पर कोई बोलता नहीं है,

किसी से अपनी बात

खुलकर कह सकें

ऐसे कान की तलाश जारी है

पर कोई खोलता नहीं है,

कोई हमारे जज़्बात को समझे

ऐसे दिल की तलाश जारी है

पर शब्दों कोई तोलता नहीं है,

कहें दीपक बापू जिंदा इंसानों में

जागी शख्सियत की तलाश जारी है

मगर कोई डोलता नहीं है।

—————–

आशिकों के कातिल बन जाने की खबर रोज आती है,

टीवी पर विज्ञापनों के बीच सनसनी छा जाती है।

कहें दीपक बापू दिल कांच की तरह टूट कर नहीं बिखरते

अब भड़ास अब गोली की तरह चलकर आग बरसाती है।

——-

आशिक नाकाम होने पर अब मायूस गीत नहीं गाते है,

कहीं गोली दागते कहीं जाकर चाकू चलाते हैं।

कहें दीपक बापू इश्कबाज हो गये इंकलाबी

नाकाम आशिक कलम छोड़कर  हथियार चलाते हैं।

———-

आशिकों ने प्रेमपत्र लिखने के लिये कलम उठाना छोड़ दिया है,

एक हाथ का मोबाइल दूसरे का चाकू से नाता जोड़ दिया है,

कहें दीपक बापू इश्क पर क्या कविता और कहानी लिखें,

टीवी पर चलती खबरों ने उसे सनसनी की तरफ मोड़ दिया है।

————–

तदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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मन का सहारा ढूंढने जाते हैं लोग सांईं के पास-हिन्दी लेख


                 अभी हाल ही में एक धर्मगुरु ने शिरडी के सांई बाबा के भगवान न होने का घोषणा कर डाली जिस पर हमारे देश के व्यवसायिक प्रचार माध्यम बहस चलाकर अपना विज्ञापन का समय पास कर रहे हैं। यह बहस पुरानी है पर जब कोई विषय न हो तो हमारे देश के प्रचार माध्यम धर्म के पुराने विषयों को नये ढंग से प्रचारित करते हैं। यह बुरा भी नहीं है।  सांई बाबा को भगवान मानने वाले लोगों की कमी इस देश में नहीं है। कोई कहता है कि उनके बीस करोड़ भक्त हैं।  हम यहां भक्तों की संख्या से थोड़ा अचंभित है। दरअसल सांई बाबा के दरबार में हमारे यहां प्रचलित भगवान के विभिन्न स्वरूपों के भजन भी चलते है जिनके आकर्षण में भी लोग जाते हैं।  उनकी दरबार में जाने वाले सभी लोग उनके भक्त हों यह जरूरी नहीं हैं क्योंकि हमारे यहां अनेक लोग पर्यटन की वजह से भी मंदिरों में जाते हैं।  हमारा अनुभव तो यह भी कहता है कि अनेक  लोग अपने शहर के मंदिरों में नहीं जाते पर प्रसिद्ध मंदिरो पर अपनी आस्था जताने में गौरव अनुभव करते है।

                 अनेंक लोग  सांई बाबा के ंमंदिर में जाते हैं मगर वही वृंदावन के बांकेबिहारी, हरिद्वार में हर की पौड़ी, उज्जैन में महाकाल तथा  जम्मू की वैष्णोदेवी में भी जाते है। इसके बावजूद उन पर किसी एक स्वरूप के भक्त होने की छाप नहीं बनाई जा सकती।  भक्ति में भटकाव का आरोप भी नहीं लगाया जा सकता।  इनमें से अनेक यह भी मानते हैं कि सर्वशक्तिमान की निराकार, निष्काम तथा निर्मल भाव से भक्ति करने पर मन, बुद्धि और विचार शुद्ध होने से सांसरिक कार्य स्वतः ही सिद्ध होते है।  यह लोग किसी पर अपनी भक्ति में पाखंड का आरोप लगाना पसंद नहीं करते। निराकार के उपासक होने के बावजूद साकार रूप की आराधना अतार्किक नहीं मानी जा सकती।

                 भारत में लोगों के अंदर अध्यात्मिक विषय के प्रति रुझान स्वाभाविक रूप से रहता है।  सांसरिक विषय तथा उनसे जुड़े कार्य  स्वतः चलते हैं पर किसी को अगर सर्वशक्तिमान के एक स्वरूप की आराधना से लाभ हो जाये तो वह उसका दीवाना हो जाता है। इसका लाभ पेशेवर धार्मिक ठेकेदार उठाते हुए भगवान और भक्त के बीच में गुरु यानि मध्यस्थ बनकर अपनी उपस्थिति जताते है।

                 जैसे जैसे इस देश में परिवहन के आधुनिक वाहन की संख्या बढ़ रही है वैसे वैसे लोगों के अंदर पर्यटन की प्रवृत्ति की बढ़ी है।  अब तो सामान्य तथा धार्मिक पर्यटन स्थानों में अंतर ही नहीं रहा है।  इसके चलते बाज़ार के सौदागरों तथा उनके प्रचार प्रबंधकों ने लोगों की रुचि बनाये रखने के लिये नये नये प्रयोग किये है। इन्हीं प्रयोंगों की देन है जम्मू का वैष्णों मंदिर तथा संाई बाबा में मंदिरों की प्रसिद्धि।  आशा फिल्म में ‘माता ने बुलाया है’ तो अमर अकबर एंथोनी में सांई बाबा पर दिखाये गये गाने से इन दोनों मंदिरों को जो प्रसिद्ध मिली वह अलग से शोध का विषय है पर सच बात तो यह है कि इन दोनों मंदिरों के बारे में यह लेखक इससे पूर्व नहीं जानता था।  भले ही इन फिल्मों के गानों का उद्देश्य न रहा हो कि मंदिर प्रसिद्ध किये जायें पर इतना तय है कि उसके बाद इन स्थानों पर भीड़ बढ़ी।  इसका कारण यह है कि साकार भक्ति उपासकों के नये रूप के प्रति रुझान अधिक रहता है।  हमारे यहां मथुरा, उज्जैन, हरिद्वार, तिरुपति बालाजी, इलाहाबद, बनारस तथा  अनेंक प्रसिद्ध स्थान पौराणिक महत्व के हैं।  नयें स्थानों की प्रसिद्ध के बावजूद वहां भक्तों की भीड़ में कोई कमी नहीं आयी।  वैष्णो माता चूंकि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का ही भाग है इसलिये कोई उन पर आपत्ति नहीं करता पर सांई बाबा को लेकर कुछ धार्मिक गुरु अत्यंत परेशान रहते हैं।

                 सांई बाबा की पहचान अध्यात्मिक ज्ञान के प्रतीक के  रूप में नहीं वरन् सांसरिक विषयों में चमत्कारिक उपलब्धि दिलाने के रूप में बनाई गयी है। श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों को समझें तो अर्थार्थी और आर्ती भक्तों का जमावड़ा अधिक हो सकता है।  कुछ मात्रा में जिज्ञासु भी हो सकते हैं पर ज्ञानियों के लिये उनके स्वरूप में चिंत्तन के लिये कुछ नहीं है पर फिर भी इसका अर्थ कदापि नहीं है कि उनके भक्तों की भावना को ठेस पहुंचायी जाये। गीता ज्ञान की दृष्टि से चारों प्रकार के भक्तों की उपस्थिति को सहजता से स्वीकार करना चाहिये।

                 इतना जरूर देखा जा रहा है कि भारतीय धार्मिक कर्मकांडियों ने पेशेवराना ढंग से उनके नाम का उपयोग करने में सिद्धि प्राप्त कर ली है।  कभी भी सांई बाबा के मंदिर के बाहर नये वाहनों की पूजा होते देखी जा सकती है और सांई बाबा के सेवक लोहे लंगर से बने और बाद में कबाड़ हो जाने वाले सामान की उपयोगिता बढ़ाने क्रे लिये जंतर मंतर करते देखे जा सकते है।  संाई बाबा के मंदिरों की लोकप्रियता बढ़ने का एक कारण यह भी है कि हमारे परंपरागत मंदिरों में रूढता की प्रवृत्ति ने अनेक लोगों को विरक्त कर दिया है।  हम अनेक बार सुनते हैं कि अनेक मंदिरों में ऊंची जाति के लोगों को ही प्रवेश मिल पाता है।  भगवान शिव, ब्रह्मा तथा विष्णु जैसे आकर्षक तथा व्यापक स्वरूपों पर हमारा दृष्टिकोण संकीर्ण होता गया है।

                 जहां तक भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का विषय है उसका चमत्कारों से कोई संबंध नहीं है।  सांसरिक विषयों में किसी को कम तथा किसी को अधिक सफलता मिलती है।  अब यह भाग्य या कर्मफल के कारण हो सकता है पर जिनको मिल गया वह उसे चमत्कार मानता है तो जिसे नहीं मिला वह चमत्कार की आशा में इधर उधर फिरता है। समय आने पर सभी के काम सिद्ध होते हैं पर जब तक न हो आदमी का मन उसे भटकाता है।  अध्यात्मिक ज्ञानियों के लिये सांईबाबा की भक्ति का समाज में बढ़ता प्रचार चिंता का विषय नहीं हो सकता।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
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बोलने की आजादी का मतलब-हिन्दी व्यंग्य कविताये


मतलब नहीं समझते वह बोलने की आजादी का,

सभी लगे हैं कीर्तिमान बनाने में शब्दों की बर्बादी का।

कहें दीपक बापू शिक्षित विद्वान समाजों में एकता की

 कोशिश करने का जताते दावा,

बहुत जल्दी दिख जाता है उनका छलावा,

जब दौलत के बंटवारे में अपना हिस्सा मांगते

सामने चेहरा रखते अपने समाज की आबादी का।

————

पहले अपने इलाके के लोगों को समाजो में बांटते हैं,

फिर झंगड़ा करने वालों को अपनी महान छवि

बनाने के लिये कृत्रिम क्रोध में  जमकर डांटते हैं।

कहें दीपक बापू भद्र लोग उनके लिये भीड़ की भेड़ हैं

अपने एकता अभियान के लिये वह दबंगों को छांटते हैं।

—————

 

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

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