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यहां ठग कौन है-हास्य व्यंग्य


‘एक के तीन’, और ‘दो के छह’ की आवाज कहीं भी सुन लें तो हम भारतीयों के कान खड़े हो जाते हैं यह सोचकर कि कहीं यह सच तो नहीं है कि हमारा रुपया तिगुना हो जायेगा।’
भले ही कोई एक रुपये की तीन माचिस या दो रुपये की पेन की छह रिफिल बेचने के लिये आवाज क्यों नहीं लगा रहा हो पर हम उसकी तरफ देखना जरूर चाहेंगे भले ही बाद में निराशा हो। अगर कोई वाकई रुपये तिगुने की बात कर रहा हो तो………………….हर देखने वाले आदमी और औरत के मूंह में पानी जरूर आ जायेगा।
अगर सामान्य आदमी हुआ तो भी उस पर विश्वास करने का मन जरूर होगा। विचार करेंगे और और हो सकता है कि उसके बाद न करें। अगर उस सामान्य आदमी की ईमानदारी की सिफारिश कोई अपना मित्र या रिश्तेदार करे तो तब विश्वास करने की संभावना पचास से पचहत्तर और फिर सौ फीसदी हो जाती है। पुरुष हुआ तो एकाध प्रतिशत कम हो सकती है पर अगर महिला हुई तो सौ फीसदी अपना कदम उस ठगी की तरफ बढ़ा देती है जिसके बाद रोने के अलावा और कुछ नहीं रह जाता। आदमी द्वारा विश्वास करने की एकाध प्रतिशत संभावना इसलिये कम हो जाती है क्योंकि उसकी आंख में रोने के लिये गुंजायश कम होती है और अगर ठग जाने पर वह रोए तो लोग कहेंगे कि ‘कैसा मर्द है रोता है। अरे, ठग गया तो क्या? मर्द है फिर कमा लेना।’
औरत अगर ठग जाती है तो रोती है-उसे यह अधिकार प्रकृति से उपहार के रूप में मिला है। उसकी आंख में आंसुओं का खजाना होता है और रोने पर उसके साथ सहानुभूति जताने वाले भी उसे कम बिगड़ते जमाने को अधिक बुरा कहते हैं।
अगर ठगने वाला साधु हुआ तो? फिर तो पुरुष और स्त्रियों के लिये इस बात की बहुत कम ही संभावना है कि वह अपने को बचा पायेंगे। जिस व्यक्ति ने धर्म का प्रतीक बाना पहन लिया उसे सिद्ध मान लेना इस समाज की कमजोरी है और यही कारण है कि ठग इसी भेष में अधिक घूमा करते हैं।
सोना, चांदी, या रुपया कभी कोई तिगुना नहीं कर सकता यह सर्वमान्य तथ्य है और सर्वशक्तिमान से तो यह आशा करना भी बेकार है कि वह अपने किसी दलाल को ऐसी सिद्धि देगा कि वह माया को तिगुना कर देगा। सर्वशक्तिमान का माया पर बस नहीं है पर इसके बावजूद माया में भी ऐसी शक्ति नहीं कि वह अपने को तिगुना कर ले। माया की लोग निंदा करते हैं पर उसके भी उसूल हैं-वह असली सोना, चांदी और रुपये में बसती है और नकली से उसे भी नफरत है। माया को सर्वशक्तिमान से इतना डर नहीं लगता जितनी नकली माया से लगता है। सर्वशक्तिमान ने माया को नहीं बनाया पर फिर भी वह उसके बंदों के बनाये कानूनों के अनुसार ही रचे तत्वों में बसती है और जो उससे बाहर है उसमें वह नहीं जाती। मगर बंदों में भी कुछ ऐसे हैं जो नकली सोना, चांदी और रुपये बनाकर नकली माया खड़ी करते हैं। कहने का तात्पर्य है कि माया बहुत शक्तिशाली है पर इतनी नहीं कि वह अपने को तिगुना कर ले। अगर गले का हार एक तोले का है तो वह दो तोले का तभी होगा जब उसमें दूसरा सोना लगेगा। एक रुपया तभी दो होगा जब उसके साथ दूसरा असली जुड़ेगा। यह रुपया और सोना भी एक इंसान के द्वारा दूसरे को दिया जायेगा तभी बढ़ेगा। यह संभव नहीं है कि किसी बैंक में पड़ा रुपया किसी के घर बिना किसी लिये दिये पहुंच जाये।
मगर उस साधु ने लोगों को माता का चमत्कार बताया और रुपया और जेवर यह कहता हुआ लेता गया कि उसका वह तीन गुना कर देगा। लोग दौड़ पड़े। एक शहर से दूसरे शहर और फिर तीसरे और फिर चैथे………..इस तरह यह संख्या दस तक पहुंच गयी। लोग टेलीफोन के जरिये अपने परिचितों को संदेश भेजने लगे कि‘आओ भई, साथ में रुपया और जेवर लेकर आओ और तिगुना पाओ।’
साधु होने पर बिना पैसे खर्च किये अपना विज्ञापन हो जाना भी कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हम लोग दावा करते है कि अपने देश में अखबार और टीवी चैनल से भारी जागरुकता आ रही है मगर ऐसे समाचार इस दावे की पोल खोल देते हैं। वह साधु पकड़ा गया और अब रोती हुई औरतों की सूरतें देखकर यह लगता है कि आखिर किसने किसको ठगा है? वह कहती हैं कि साधु ने ठगा है।’
साधु कहता है कि ‘मैने तो लोगों से कहा तो वह विश्वास करते गये।’
जो ठगे गये वह कहते हैं कि ‘साधु ने ठगा है’। क्या उनकी बात मान लें। साधु से तो कानून निपटेगा पर उन लोगों से कौन निपटेगा जो स्वयं अपने को ठगते गये। अगर उन्होंने साधु को पैसा दिया तो क्या उन्होंने सोचा कि रिजर्व बैंक द्वारा बनाये गये नोट बकायदा नंबर डालकर सतर्कता से जारी किये जाते हैं। वह बिना किसी इंसानी हाथ के इधर से उधर नही जा सकते फिर उस साधु के पास वह कैसे आयेंगे। आ सकते हैं पर वह नकली हो सकते हैं।
अब ठगे गये लोग रो रहे हैं। हमें भी बहुत रोना आ रहा था पर वह इस बात पर नहीं कि साधु ने उनको ठगा बल्कि उन्होंने स्वयं को ठगा। इस देश में ठगों की संख्या कम नहीं है। यह देश हमेशा ठगने के लिये तैयार बैठा रहता है। पहले आंकड़ों का सट्टा लगाकर अपढ़ और मजदूर को ठगा जाता था अब खेलों और रियल्टी शो पर सट्टा लगाकर पढ़े लिखे लोगों को ठगा जा रहा है।
मजे की बात यह है कि अनेक बर्बाद लोग इस बात को मानते हैं कि आजकल सभी जगह ठगी है मगर जेब में पैसा आते ही उनका दिमाग फिर जाता है और चल पड़ते हैं ठगे जाने के लिये यह सोचकर कि शायद दाव लग जाये।
हम सब यह देखते हुए सोचते है कि कौन किसको ठग रहा है। कोई ठग किसी सामान्य आदमी के साथ ठगी कर रहा है या आदमी खुद अपने आपको उसके समक्ष प्रस्तुत कर स्वयं को ठग रहा है।
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दूसरा तस्सल-हिंदी लघुकथा


वह किसी मकान के लिये बन रही नींव के लिये गड्ढा खोद रहा था। उसके पास ही थोड़ी दूर स्थित मैदान में गरीब मजदूरों के उद्धारक और समाज कल्याणक का भाषण चल रहा था। उसी समय एक बुद्धिजीवी वहां से निकला और बोला-‘अरे, तुम यहां काम में लगे हो। चलो उधर तुम्हारे उद्धारक का भाषण चल रहा है। क्या बहरे हो? तुम्हें सुनाई नहीं देता।’
मजदूर खामोशी से उस बुद्धिजीवी को हैरानी से देखने लगा तो बुद्धिजीवी ने कहा-‘लगता है कि बहरे होने के साथ गूंगे भी हो। तब तो तुम्हें वहां जरूर चलना चाहिये।’
बुद्धिजीवी महोदय उसे इशारों में समझाने लगे तो वह मजदूर बोला-‘आप गलत समझ रहे हैं। मैं न तो बहरा हूं न गूंगा। मैं तो मजदूर हूं पेट से भूखा हूं। वह भाषण कर रहे हैं। जिनके पास कोई काम नहीं हैं या पेट भरे हुए हैं वह उनका भाषण सुन रहे हैं। मैं तो छोटा आदमी हूं। उद्धारक साहब तो बड़े आदमी हैं।
बुद्धिजीवी ने कहा-‘चलो! मुझे उन पर एक लेख लिखना है। तुम वहां चलोगे तो तुम्हारा औरा उनका फोटो निकाल कर छाप दूंगा। क्या जोरदार मसाला बनेगा? वह गरीबों और मजदूरों के मसीहा हैं। तुम यह फावड़ा तस्सल हाथ में पकड़े जब उनका भाषण सुनोगे तब तुम्हारा फोटो निकाल कर उसे प्रकाशित करूंगा। लोगों को पता लग जायेगा कि उद्धारक जी कितने महान हैं कि मजदूर लोग तक उनको प्यार करते हैं?’
मजदूर ने कहा-‘आप मुझे कुछ पैसा दें तो चलने को तैयार हूं। मेरी हाजिरी का नुक्सान होगा? उसकी भरपाई कौन करेगा? वह और आप तो बड़े आदमी है अपना काम निकालकर चले जायेंगे पर मेरा पेट कैसे भरेगा?
बुद्धिजीवी ने कहा-धत तेरे की! तुम गरीब और मजदूर इसलिये ही तरक्की नहीं कर पाते क्योंकि जो तुम्हारे लिये लड़ता है उसका साथ नहीं देते। बस हमेशा पैसे और रोटी की बात करते हो।’
मजदूर ने कहा-‘अगर आप मुझे सौ रुपये दें तो चलने को तैयार हूं।’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘फिर तुम्हें क्यों ले चलूं, मैं किसी एक्टर को नहीं ले आऊंगा। वह एक्टर मेकअप करके आयेगा और आधुनिक मजदूर की तरह लगेगा तो मेरे लेख के साथ लगे फोटो में रौनक भी आयेगी।’
बुद्धिजीवी वहां से चला गया और मजदूर अपने काम में लग गया। थोड़ी देर बाद वह बुद्धिजीवी उसी मजदूर के पास अपने साथ एक एक्टर को ले आया जो पेंट शर्ट पहने हुए था। उसने मजदूर से कहा-‘देखो कितना बढि़या एक्टर लाया हूं। इसका फोटो देखकर सभी सोचेंगे कि देखो मजदूर भी इस देश में कितने खुशहाल हैं। लाओ अपना तस्सल और फावड़ा दे दो तो वह इसके हाथ में रखकर फोटो खिंचवाना है।’
मजदूर ने पास खड़े ठेकेदार की तरफ इशारा किया और कहा-‘साहब, यह भी किराये से आते हैं। आप हमारे ठेकेदार साहब से बात कर लो।’

तब ठेकेदार भी उनके पास आया। वह बुद्धिजीवी से परिचित था। बुद्धिजीवी ने उससे कहा-‘यह कैसे मजदूर तुम अपने पास रखते हो। वहां फोटो खिंचवाने भी नहीं चल सकते और न अपना यह सामान थोड़ी देर के लिये दे सकते हैं। पैसा मांगते हैं।’
ठेकेदार ने हंसकर कहा-‘आप भी तो नहीं सोचते। जिस काम के लिये एक्टर हों उसके लिये असली मजदूर की क्या जरूरत है? रहा सामान का सवाल तो आप फावड़ा तस्सल ले जाईये, तब इसने जो मिट्टी निकाली है उसे दूसरे तस्सल से उठाकर फैंकता रहेगा।’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘भई, वाह आप जैसा आदमी होना चाहिये जो समाज सेवा करे।’
ठेकेदार ने हंसकर कहा-‘नही! ऐसी बात नहीं है। उद्धारक साहब के लिये भीड़ जुटाने का ठेका भी मैंने लिया है। वहां ऐसे मजदूर भेजे हैं जिनके लिये आज मेरे पास काम नहीं है। हां, आपने अच्छा याद दिलाया। अब उन लोगों को तस्सल, फावड़ा,गैंती और दूसरे साजोसामान के साथ ही भेजूंगा। उसके लिये कुछ किराया जरूर अधिक लूंगा पर आयोजक तैयार हो जायेंगे।’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘हां, फिर हमें किसी ऐसे मजदूर के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं है। हालांकि मैं भी अब सोच रहा हूं कि अपने साथ ऐसे कार्यक्रमों के लिये एक्टर भी जरूरी है जो मजदूरों की भीड़ में चमकदार लगे। जब सभी काम एक्टिंग से हो सकता है तो फिर असली की क्या जरूरत है?’
एक्टर, बुद्धिजीवी और ठेकेदार वहां से चले गये। मजदूर अपने होठों से बुदबुदाया-दूसरा तस्सल’।
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शब्द हमेशा अंतरिक्ष में लहराते-हिंदी कविता


हर शब्द अपना अर्थ लेकर ही
जुबान से बाहर आता
जो मनभावन हो तो
वक्ता बनता श्रोताओं का चहेता
नहीं तो खलनायक कहलाता
संस्कृत हो या हिंदी
या हो अंग्रेजी
भाव से शब्द पहचाना जाता है
ताव से अभद्र हो जाता

बोलते तो सभी है
तोल कर बोलें ऐसे लोगों की कमी है
डंडा लेकर सिर पर खड़ा हो
दाम लेकर खरीदने पर अड़ा हो
ऐसे सभी लोग साहब शब्द से पुकारे जाते ं
पर जो मजदूरी मांगें
चाकरी कर हो जायें जिनकी लाचार टांगें
‘अबे’ कर बुलाये जाते हैं
वातानुकूलित कमरों में बैठे तो हो जायें ‘सर‘
बहाता है जो पसीना उसका नहीं किसी पर असर
साहब के कटू शब्द करते हैं शासन
जो मजदूर प्यार से बोले
बैठने को भी नहीं देते लोग उसे आसन
शब्द का मोल समझे जों
बोलने वाले की औकात की औकात देखकर
उनके समझ में सच्चा अर्थ कभी नहीं आता

शब्द फिर भी अपनी अस्मिता नहीं खोते
चाहे जहां लिखें और बोले जायें
अपने अर्थ के साथ ही आते हैं
जुबान से बोलने के बाद वापस नहीं आते
पर सुनने और पढ़ने वाले
उस समय चाहे जैसा समझें
समय के अनुसार उनके अर्थ सबके सामने आते
ओ! बिना सोचे समझे बोलने और समझने वालों
शब्द ही हैं यहां अमर
बोलने और लिखने वाले
सुनने और पढ़ने वाले मिट जाते
पर शब्द अपने सच्चे अर्थों के साथ
हमेशा अंतरिक्ष में लहराता
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