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मनुस्मृति:एक दिन से अधिक ठहरने वाला अतिथि नहीं


  1. एक सज्जन व्यक्ति के घर से बैठने या विश्राम के लिए भूमि, तिनकों से बने आसन, जल तथा मृदु वचन कभी दूर नहीं रहते। यह सब आसानी से उपलब्ध रहते हैं। अत: अतिथि को यदि अन्न, फल-फूल और दूध आदि से सेवा करना संभव नहीं हो तो उसे सही स्थान पर आसन पर आदर सहित बैठाकर जल तथा मृदु वचनों से संतुष्ट करना चाहिऐ।
  2. एक रात गृहस्थ के घर ठहरने वाला व्यक्ति ही अतिथि कहलाता है क्योंकि उसके आने की कोई तिथि निश्चित नहीं होती। एक रात से अधिक ठहरने वाला अतिथि कहलाने का अधिकारी नहीं होता।
  3. यदि एक स्थान से दूसरे स्थान या नगर में रोजी-रोटी कमाने के उद्देश्य से जाकर कोई व्यक्ति बस जाता है तथा उसके गृह क्षेत्र का कोई दूसरा व्यक्ति उसके यहाँ ठहरता है या वह स्वयं अपने गृहक्षेत्र में जाकर ठहरता है तो उसे अतिथि नहीं माना जाता। इसी प्रकार मित्र, सहपाठी और यज्ञ आदि कराने वाला पुरोहित भी अतिथि नहीं कहलाता।
  4. जो मंद बुद्धि गृहस्थ उत्तम भोजन के लालच में दूसरे गाँव में जाकर दूसरे व्यक्ति के घर अतिथि बनकर रहता है वह मरने के बाद अन्न खिलाने वाले के घर पशु के रूप में उस भोजन का प्रतिफल चुकाता है।
  5. सूर्यास्त हो जाने के बाद असमय आने वाले मेहमान को भी घर से बिना भोजन कराए वापस भेजना अनुचित है। अतिथि समय पर आये या असमय पर उसे भोजन कराना ही गृहस्थ का धर्म है।
  6. जो खाद्य पदार्थ अतिथि को नहीं परोसे गए हों उन्हें गृहस्थ स्वयं न ग्रहण करे। अतिथि का भोजन आदि से आदर सत्कार करने से धन, यश, आयु एवं स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
  7. उत्तम, मध्यम एवं हीन स्तर के अतिथियों को उनकी अवस्था के अनुसार स्थान, विश्राम के लिए शय्या और अभिवादन प्रदान कर उनकी पूजा करना चाहिऐ।

मनु स्मृति:जिसके सामने प्रजा लुटे वह राजा मृतक समान


१.उस राजा को जीवित रहते हुए भी मृतक समान समझना चाहिए जिसके स्वयं या राज्य के अधिकारियों के सामने चीखती-चिल्लाती प्रजा डाकुओं द्वारा लूटी जाती है।
२.प्रजा का पालन करना ही राजा का धर्म होता है। जो इस धर्म का पालन करता है वाही राज्य सुखों को भोगने का धिकारी है।

३.यदि राजा रोग आदि या किसी अन्य कारण से राज्य के सभी विषयों का निरीक्षण करने में समर्थ न हो तो उसे अपनी जगह धर्मात्मा , बुद्धिमान, जितेन्द्रिय, सभी और श्रेष्ट व्यक्ति को मुख्य अमात्य(मंत्री) का पदभार सौंपना चाहिऐ।

४.मूर्ख, अनपढ़(जड़बुद्धि वाले व्यक्ति),गूंगे-बहरे आदि हीन भावना की ग्रंथि से पीड़ित होने के कारण, पक्षी स्वभाव से ही(तोते आदि पक्षी रटी-रटाई बोलने वाले) अभ्यस्त होने के कारण मन्त्र(मंत्रणा) को प्रकट कर देते हैं। कुछ स्त्रियाँ स्वभाववश (चंचल मन और बुद्धि के कारण) मंत्रणा को प्रकट कर सकती हैं। इसके अलावा अन्य व्यक्ति भी जिन पर राजा को अपनी मंत्रणा प्रकट करने का संदेह हो उन्हें मंत्रणा स्थल से हटा देना चाहिऐ।