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शब्द हमेशा अंतरिक्ष में लहराते-हिंदी कविता


हर शब्द अपना अर्थ लेकर ही
जुबान से बाहर आता
जो मनभावन हो तो
वक्ता बनता श्रोताओं का चहेता
नहीं तो खलनायक कहलाता
संस्कृत हो या हिंदी
या हो अंग्रेजी
भाव से शब्द पहचाना जाता है
ताव से अभद्र हो जाता

बोलते तो सभी है
तोल कर बोलें ऐसे लोगों की कमी है
डंडा लेकर सिर पर खड़ा हो
दाम लेकर खरीदने पर अड़ा हो
ऐसे सभी लोग साहब शब्द से पुकारे जाते ं
पर जो मजदूरी मांगें
चाकरी कर हो जायें जिनकी लाचार टांगें
‘अबे’ कर बुलाये जाते हैं
वातानुकूलित कमरों में बैठे तो हो जायें ‘सर‘
बहाता है जो पसीना उसका नहीं किसी पर असर
साहब के कटू शब्द करते हैं शासन
जो मजदूर प्यार से बोले
बैठने को भी नहीं देते लोग उसे आसन
शब्द का मोल समझे जों
बोलने वाले की औकात की औकात देखकर
उनके समझ में सच्चा अर्थ कभी नहीं आता

शब्द फिर भी अपनी अस्मिता नहीं खोते
चाहे जहां लिखें और बोले जायें
अपने अर्थ के साथ ही आते हैं
जुबान से बोलने के बाद वापस नहीं आते
पर सुनने और पढ़ने वाले
उस समय चाहे जैसा समझें
समय के अनुसार उनके अर्थ सबके सामने आते
ओ! बिना सोचे समझे बोलने और समझने वालों
शब्द ही हैं यहां अमर
बोलने और लिखने वाले
सुनने और पढ़ने वाले मिट जाते
पर शब्द अपने सच्चे अर्थों के साथ
हमेशा अंतरिक्ष में लहराता
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

यकीन और हिम्मत से डटे रहो


समझौता ग़मों से कर लो
दोस्ती नगमों से कर लो
महफ़िलों में जाकर
इज्जत की उम्मीद छोड़ दो
जहां सब सज-धज के आएं
वहां तुम्हें देखने की किसे फुर्सत है
सभी बोलें कम अपने लबादे
ज्यादा दिखाएँ
सोचें कुछ और
बोलें कुछ और
सुनकर अनुसना कर सकें तो
सबसे बतियाएं
अगर कोई अपने शब्दों से
घाव कर दे
तो उसका इलाज अपनी
तसल्ली और यकीन की
मरहमों से कर लो
कहैं दीपक बापू
अपनी शान दिखाने के चक्कर
तुम कभी न पडना
दूसरों की चमक में
अपने को अंधा न करना
जिनके चेहरे पर जितनी रोशनी है
उतना ही उनके मन में है अँधेरा
तुम अपने यकीन और हिम्मत के
साथ सबके सामने डटे रहो
किसी और में कुछ भी न ढूँढो
साथ अपने हमदमों को कर लो
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