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भृतहरि: रोजीरोटी कि खोज में जीवन व्यर्थ हो जाता है


हिंसाशून्यमयत्नलभ्यमश्यनं धात्रा मरुत्कल्पितं
व्यालानां पशवस्तृणांकुरभुजस्तुष्टाः स्थलीशायिनः
संसारार्णवलंधनक्षमध्यिां वृत्तिः कृता सां नृणां
तामन्वेषयतां प्रर्याति सततं सर्व समाप्ति गुणाः

हिंदी में भावार्थ- परमात्मा ने सांपों के भोजन के रूप में हवा को बनाया जिसे प्राप्त करने में उनकेा बगैर हिंसा और विशेष प्रयास किए बिना प्राप्त हो जाती है। पशु के भोजन के लिए घास का सृजन किया और सोने के लिए धरती को बिस्तर बना दिया परंतु जो मनुष्य अपनी बुद्धि और विवेक से मोक्ष प्राप्त कर सकता है उसकी रोजीरोटी ऐसी बनायी जिसकी खोज में उसके सारे गुण व्यर्थ चले जाते हैं।
पापान्निवारयति योजयते हिताय
गुह्मं निगूहति गुणान्प्रकटीकरोति।
आपद्गतं च न जहाति ददाति काले
सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः

हिन्दी में भावार्थ- अपने मित्र को अधर्म और पाप से बचाना, उसके हित में संलग्न रहते हुए उसके गुप्त रहस्य किसी अन्य व्यक्ति के सामने प्रकट न करना, विपत्ति काल में भी उसके साथ रहना और आवश्यकता पड़े तो उसकी तन, मन और धन से सहायता करना यही मित्रता का लक्षण है।

संक्षिप्त व्याख्या-अक्सर हम लोग कहते है कि अमुक हमारा मित्र है और यह दावा करते हैं कि समय आने पर वह हमारे काम आयेगा। आजकल यह दावा करना मिथ्या है। देखा जाये तो लोग अपने मित्रों पर इसी विश्वास के कारण संकट में आते हैं। सभी परिचित लोगों को मित्र मानने की प्रवृत्ति संकट का कारण बनती है। कई बार हम लोग अपने गुप्त रहस्य किसी को बिना जांचे-परखे मित्र मानकर बता देते हैं बाद में पता लगता है कि उसका वह रहस्य हजम नहीं हुए और सभी को बताता फिर रहा है। वर्तमान में युवा वर्ग को अपने मित्र ही अधिक भ्रम और अपराध के रास्ते पर ले जाते हैं।

आजकल सच्चे और खरे मित्र मिलना कठिन है इसलिये सोच समझकर ही लोगों को अपना मित्र मानना चाहिए। वैसे कहना तो पड़ता ही है कि‘अमुक हमारा मित्र है’ पर वह उस मित्रता की कसौटी पर वह खरा उतरता है कि नहीं यह भी देख लेना चाहिए। भले जुबान से कहते रहे पर अपने मन में किसी को मित्र मान लेने की बात बिना परखे नहीं धारण करना चाहिए।
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लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

माया और सत्य दोनों का खेल निराला है-आलेख


माया का खेल बहुत विचित्र है। तमाम तरह के विद्वानों के संदेश पढ़ने के बावजूद मुझे इस संबंध में एक बात कहीं भी पढ़ने को नहीं मिली जो मैं कहना चाहता हूं। मैं सोचता था कि अगर किसी विद्वान के संदर्भ देकर यह बात कहता तो शायद प्रभावी होती पर उस तरह का कथन नहीं मिला। जब कोई लेखक किसी किताब से पढ़कर लिखने का अभ्यस्त हो जाता है तब उसके सामने यही समस्या आती है कि अपने मन की बात कहने के लिए भी उसे किताब की जरूरत पढ़ती है। अगर वह नहीं मिलती तो उसे अपनी बात कहने के लिए किसी ऐसे मूड की आवश्यकता होती है जब वह उसे लिख सके।

कुछ दिनों पहले समाचार पत्रों में मुझे पढ़ने को मिला कि वैष्णो देवी के दर्शन पहले करने हों तो कुछ पैसे भुगतान कर किया जा सकता है। बाद में सामान्य भक्तों के विरोध के कारण यह निर्णय संभवतः अभी लागू नहीं हो पाया। वैसे यह कोई नई बात नहीं है कि किसी मंदिर में सर्वशक्तिमान के समक्ष प्रस्तुत होने के लिए लगी भक्तों की पंक्ति से अलग हटकर विशिष्ट भक्त के रूप में कुछ धन व्यय कर प्राथमिकता के आधार पर प्रवेश प्राप्त हो। कहीं यह सुविधा नियमों में शामिल की गयी है तो कहीं यह स्वाभाविक रूप से ऐसे होता है कि आभास भी नहीं होता। अर्थात भक्त में दो भेद हैं-एक सामान्य भक्त और दूसरा विशिष्ट भक्त। सामान्य भक्त इस बात को जानते हैं पर वह भी यह एक तरह से स्वीकार कर लेते हैं जिस पर भगवान की कृपा से माया अधिक है उसे प्रथम दर्शन का अधिकार प्राप्त है।

माया का खेल बहुत निराला है। सत्य का खेल उससे भी निराला है। माया इतना विस्तार रूप लेती है कि उसे अपना प्रभाव बनाये रखने के लिए चरम पर आकर उसे सत्य की बराबरी करने की आवश्यकता अनुभव होती है। मगर सत्य तो सत्य है उसका माया से कोई वास्ता नहीं पर माया को धारण करने वाला भी वही सत्य है। धारण करने वाला स्वयं नहीं दिखता क्योंकि वह बुनियाद के पत्थर की तरह होता है जो दिखता नहीं है तो पुजता भी नहीं है। ऊपर खड़ी दीवारों को चमकदार रूप इसलिये दिया जाता है कि इमारत के अस्तित्व का बोध उनसे ही होता है। मायावी लोग भी सत्य की आड़ में कुछ ऐसा ही खेल खेलते हैं। उनको चाहिए बस माया पर सत्य और धर्म की आड़ में यह खेल इस तरह होता है कि समाज में भक्ति के नाम भ्रम पालने वाले लोग उसे सहजता से लेते है। आदमी के पास माया है पर मन में शांति नहीं है ऐसे में माया ही उसे प्रेरित करती है उन जगहों पर जाने के लिए और फिर माया अपनी शक्ति दिखाकर अपने अस्तित्व की सार्थकता प्रमाणित करती है।

एक नहीं अनेक बार मेरे सामने ऐसे अवसर आते हैं जब मुझे हंसी के अलावा कुछ नहीं सूझता। मैं बचपन से ही अध्यात्मिक प्रवृत्ति का हूं और मंदिरों में जाता हूं। हां, मुझे वहां शंाति मिलती है पर फिर भी मेरी अंधविश्वासों और पाखंड में कोई यकीन नहीं नहीं। मंदिरों में शांति इसलिये मिलती है कि हम कुछ देर के लिए अपने तन और मन को इस दुनियां से अलग ले जाते हैं जिसे ध्यान का ही मैं एक स्वरूप मानता हूं। सत्संगों में भी जाने में मुझे संकोच नहीं है पर मैं किसी संत व्यक्ति विशेष में अपनी भावनाओं के साथ लिप्त नहीं होता।

मैं एक आश्रम में गया। वहां संत अपने दर्शन भक्तों के दे रहे थे। वहां भीड़ बहुत थी। मेरी पत्नी तो पंक्ति में लग गयी पर मैं बाहर ही खड़ा रह गया। हम दोनों भीड़ में ऐसे अवसरों अलग-अलग हो जाने के आदी हो चुके हैं। मैंने इधर-अधर निरीक्षण किया तो देखा कि कुछ लोग दीवार के दूसरी तरफ एक अन्य पंक्ति में खड़े हैं पर उनकी संख्या आधिकारिक पंक्ति से बहुत कम थी। वहां से कुछ लोग तमाम तरह के उपहार लेकर संत के दर्शन उनके निकट के सेवकों की अनुमति से सहजतापूर्वक करने जा रहे थे। कुछ लोग ऐसे भी थे जिनके हाथों में कोई उपहार नहीं था पर वह भी प्रवेश कर रहे थे जो शायद उन सेवको के लिये अन्यत्र लाभ पहुंचाने वाले होंगे। मेरे लिए यह सामान्य बात होती है क्योंकि बचपन से अनेक बार ऐसे भेदभाव देखता आया हूं।
कुछ देर बाद मेरा एक परिचित वहां आया और मेरा अभिवादन किया। मैंने बातचीत करते हुए उससे पूछा-‘तुमने संत जी के दर्शन कर लिए होंगे?

वह एकदम सीना तानकर बोला-‘और क्या? मैंने तो विशिष्ट भक्तों की पंक्ति में खड़े होकर उनके दर्शन किए। ऐसे सामान्य भक्तों की पंक्ति में मैं खड़ा होने वाला नहीं था।’
मैं हंस पड़ा। भक्ति में इस तरह से अहंकार की बात कहने वाला भी वह पहला व्यक्ति नहीं था-इस तरह की विशिष्ट अनेक लोग अनेक अवसरों पर दिखा जाते हैं। बस घटना का स्थान ही बदला हुुआ होता है। मैंने उसके व्यक्तित्व की झूठी प्रशंसा करने में भी कोई कमी नहीं की। इसमें भी मेरा अपना दर्शन चलता है कि ‘अगर मेरे शब्दों से कोई प्रसन्न होता है तो उसमें क्या हर्ज है उससे कोई लाभ तो नहीं उठा रहा जो मुझे मानसिक संताप होगा। किसी की झूठी प्रशंसा कर लाभ उठाना ही मुझे अखरता है।
यह माया का खेल है जो परमात्मा के दर्शन करने का सामथर््य दिखाती है। संत शिरोमणि रविदास कहते हैं कि ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ मगर माया है कि मन चंगा नहीं रहने देती वह तो गंगा के तट पर दौड़ लगवाती है ताकि उसके अस्त्तिव की अनुभूति मनुष्य मन में बनी रहे। मेरा स्पष्ट मानना है कि आप औंकार से निरंकार की तरफ जाना ही सत्य को जानने की प्रक्रिया है-जिसे साकार से निराकार की और जाने वाला मार्ग भी कहते है। इन दैहिक चक्षुओं के द्वारा मूर्तियों को देखकर सर्वशक्तिमान का स्वरूप अपने मन में स्थापित कर ध्यान करते हुए निरंकार की तरफ हृदय को केंद्रित करना चाहिए।

आप देश के जितने भी प्रसिद्ध मंदिरों को देखते हैं वह सभी सुंदर प्राकृतिक स्थानों पर स्थित हैं। ऐसे अनेक स्थान जो प्रकृति की दृष्टि से संपन्न हैं पर वहां कोई मंदिर नहीं है तो वह भी पर्यटकों को आनंद देते हैं। जहां मंदिर हैं वहां ऐसे लोग अधिक जाते हैं जो हृदय में पर्यटन का भाव लिये होते हैं पर अपने आपको ही भक्ति का भ्रम देने लगते हैं। ऐसे मेें जो लोग इन स्थानों की देख रेख करते हैं उनके दोनों हाथों में लड्डू होते हैं। वह एक तरह से व्यवसायी हो जाते हैं पर फिर संत और सेवक कहलाने का श्रेय उनको मिलता है। एक बात स्पष्ट है कि अध्यात्म और इस दिखावे की भक्ति में बहुत अंतर है। अध्यात्मिक भक्ति से आशय यह है कि वह आपके हृदय में स्थाई रूप से रहना चाहिए और आपको बाहर से किसी की प्रेरणा की आवश्यकता नहीं होती। जब बाह्य प्रेरणा से अपने अंतर्मन में भक्ति भाव पैदा होता है तो वह उसके परे हटते ही विस्मृत हो जाता है। यह आश्चर्य की बात है कि विश्व का सबसे स्वर्णिम अध्यात्म ज्ञान के सृजक संतों,ऋषियों, मुनियों और संतों के देश में सर्वाधिक भ्रमित लोग रहते हैं। इसे हम कह सकते हैं कि कांटों में ही गुलाब खिलता है और कमल को कीचड़ धारण करता है। भारतीय मनीषी शायद जीवन के रहस्यों को इसलिए भी जान पाये क्योंकि भ्रम और अंधविश्वासों के बीच जीने वालों की संख्या यहां प्रचुर मात्रा में है और वही उनके प्रेरक बनते रहे हैं। फिर दिया तले अंधेरा वाली बात नहीं भूलना चाहिए। यहां अध्यात्म-योग साधना, श्रीगीता का संदेश, कबीर, तुलसी, रहीम, चाणक्य, भृतहरि आदि मरीषियों रचनाएं-पूरे विश्व को चमत्कृत कर रहा है पर यहां अज्ञानता और अंधविश्वास भी उतना ही बढ़ता जा रहा है।

रामनवमी पर पिछले साल न पढा जा सका लेख अब प्रस्तुत



यह लेख मैने पिछले वर्ष रामनवमी पर कृतिदेव में लिखा था और इसका शीर्षक यूनिकोड में था। उस समय मेरा नारद पर कोई ब्लाग नहीं था पर वहां के सक्रिय ब्लागर -जिनका काम हिंदी के ब्लागरों को ढूंढना था- मेरे शीर्षक तो पढ़ पा रहे थे पर बाकी उनके पढ़ने में नहीं आ रहा था। मेरे बहुत सारे ऐसे लेखों पर बाद में अनेक ब्लागरों ने कहा था कि मैं उनको यूनिकोड में लाऊं पर बड़े लेख होने के कारण ऐसा नहीं कर सका। अब चूंकि कृतिदेव का यूनिकोड मिल गया है तो अपने ऐसे लेख प्रस्तुत कर रहा हूं।

सौम्यता, सहजता, सरलता और समभाव का प्रतीक हैं भगवान श्रीराम
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आज पूरे देश में रामनवमी का त्यौहार मनाया जा रहा है। राम हमारे देश के लोगों के हृदय के नायक है। यह स्वाभाविक ही है कि लोग राम का नाम सुनते ही प्रफुल्लित हो उठते हैं। राम की महिमा यह कि जिस रूप में उन्हें माना जाये उसी रूप में आपके हृदय में स्थित हो जाते है। राम उनके भी जो उनको माने और राम उनके भी जो उन्हें भजें और वह उनके भी हैं जो उन्हें अपने हृदय में धारण करें।
मैं बचपन से भगवान विष्णू की उपासना करता आया हू। स्वाभाविक रूप से भगवान श्री राम के प्रति भक्तिभाव है। इसका एक कारण यह भी रहा है कि मैं मूर्ति तो भगवान विष्णू की रखता हूं पाठ बाल्मीकी रामायण का करता हूं। कुल मिलाकर भगवान विष्णू ही मेरे हृदय में राम की तरह स्थित हैं। मतलब यह मेरे लिये भगवान राम ही भगवान विष्णू है। यह समभाव की प्रवृति मुझे भगवान राम के चरित्र से मिलती है।
भगवान राम के प्रति केवल भारत में ही बल्कि विश्व में भी उनकी अनुयायियों की भारी संख्या है। मतलब यह कि भगवान श्रीराम का चरित्र केवल देश की सीमाओं में नहीे सुना और सुनाया जाता है वरन् देश के बाहर भी उनके प्रति लोगों के मन में भारी श्रद्धा है। जब मै आज भारत के अंदर चल रहे हालातेों पर नजर डालता हूं तो लगता है लोग केवल नाम के लिये ही राम को जप रहे है। भगवान राम के चरित्र की व्याख्यायें बहुत लोग कर रहे है पर केवल लोगों में फौरी तौर पर भक्ति भाव जगाकर अपनी हित साधने तक ही उनकी कोशिश रहती है। मैं अक्सर जब परेशानी या तनाव में होता हूं तो उनका स्मरण करता हूं।
यकीन मानिए भगवान राम के मंदिर में जाकर कोई वस्तू या कार्यसिद्ध की मांग नहीं करता वरन् वह मेरे मन और बुद्धि में बने रहें इसीलिये उनके समक्ष नतमस्तक होता हूं। जब संकट में उन्हें याद करता हूं तो केवल इसीलिये कि मेरा घैर्य, आस्था और विश्वास बना रहे यही इच्छा मेरी होती है। थोड़ी देर बाद मुझे महसूस होता है कि वह शक्ति प्रदान कर रहे है।
भगवान श्रीराम का चरित्र कभी किसी अविश्वास और अकर्मणता का प्रेरक नहीं हो सकता। जो केवल इस उद्देश्य से भगवान राम को पूजते हैं कि उन पर कोई संकट न आये और उनके सारे कार्य सिद्ध हो जायें-वह राम का चरित्र न तो समझते है न उन्हें कभी अपने विश्वास को प्रमाणित करने का अवसर मिल पाता है।
भगवान श्री राम की कथा पढ़ना और सुनना अच्छी बात है पर उन्हें अपने हृदय में धारण कर ही जीवन में आनंद ले पाते है। ऐसे विरले ही होते है। भगवान राम के चरित्र में जो सौम्यता, सहजता, सहृदयता, समभाव और सदाशयता है वह विरले ही चरित्रों में मिल पाती है। यही कारण है कि भारत की सीमाओं के बाहर भी उनका चरित्र पढ़ा और सुना जाता है। अगर मनुष्य के रूप में की गयी उनकी लीलाओं का चर्चा की जाये तो वह कभी विचलित नहीं हुए। कैकयी द्वारा बनवास, सीताजी के हरण और रावण के साथ युद्ध में श्रीलक्ष्मण जी के बेहोश होने के समय उन्होंने जिस दृढ़ता का परिचय दिया वह विरलों में ही देखने को मिलती है। रावण के साथ युद्ध में एक ऐसा समय भी आया जब सभी राक्षसों को ऐसा लगा रहा था कि भगवान राम ही उनके साथ युद्ध कर रहे है। वह घबड़ा कर इधर उधर भाग रहे थे जहां जाते उन्हें राम देखते। मतलब यह कि राम केवल उनके ही नहीं है जो उनके पूजते बल्कि उनके भी है जो उन्हें नहीं पूजते-नहीं तो आखिर अपने शत्रूओं को दर्शन क्यों देते? यह उनके समभाव का प्रतीक है। क्या हम उन्हें मानने वाले ऐसा समभाव दिखा पाते है। कतई नहीं। यकीनन हमेें अब आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या केवल भगवान श्रीराम की मूर्ति लगाकर उनके प्रति दिखावे की आस्था प्रकट करना ही काफी है। हमें उनके पूर्ण स्वरूप का स्मरण कर उसे अपने मन और बुद्धि में स्थापित करना चाहिए। याद रहे मनुष्य की पहचान उसकी बुद्धि से है। अगर आप अपनी बुद्धि में अपने इष्ट को स्थापित करेंगे तो धीरे धीरे उन जैसे होते जायेंगे। एक विद्वान का मानना है कि मूर्ति पूजा का प्रत्यक्ष रूप से लाभ कुछ नहीं होता पर उसका यह फायदा जरूर होता है आदमी जब भगवान की पूजा करता है तो उसके हृदय में उनके गुणों का एक स्वरूप स्थापित होता है जो आगे चलकर उसका स्थायी हिस्सा बन जाता है। शर्त यही है वह आदमी उस समय किसी अन्य भाव का स्थान न दे।
इस दुनिया में हमेशा मूर्तिपूजा का विरोध करने वालों की संख्या ज्यादा रही है। दरअसल वह इससे होने वाले मनोवैज्ञानिक फायदों को नहीं जानते। प्रत्यक्ष रूप से तो इसका फायदा नही होता दिखता पर अप्रत्यक्ष रूप से जो व्यक्ति में शांति और दृढ़मा आती है उसको किसी पैमाने से मापना कठिन है। मुख्य बात है अपने अंदर भाव उत्पन्न करना। आखिर कोई भी व्यक्ति काम करता है तो उसके पीछे उसके विचार, संकल्प और निश्चयों के साथ ही चलता है। जब उनमें दोष है तो किसी सार्थक कार्य के संपन्न होने की आशा करना ही व्यर्थ है। अब लोग किसी और को तो नहीं अपने आपको धोखा देते है। मंदिरों में जाकर वह भगवान के सामने नतमस्तक तो होते है पर स्वरूप के अंतर्मन में ध्यान करने की कला में कितने दक्ष है यह तो वही जाने। अलबत्ता सबसे बड़ी बात राम की भक्ति के साथ उन्हें मन और बुद्धि में धारण भी जरूरी है। मूर्तियां तो उनका वह स्वरूप है जो आखों से ग्रहण करने के लिए स्थापित किया जाता है ताकि उसे हम अपने अंतर्मन में ले जा सके।
भगवान राम का चरित्र कभी न भुलाये जाने वाला चरित्र है। उनके प्रति अपार श्रद्धा के साथ उनके संदेशों पर चलने की जरूरत भी है। उन्होंने नैतिक आचरण, समभाव, सहजता और सरल दृष्टिकोण से जीवन जीने का जो तरीका प्रचारित किया उस पर चलने की जरूरत है। हमें समूह नहीं एक व्यक्ति के रूप में यह विचार करना चाहिए कि क्या हम उनके द्वारा निर्मित पथ पर चले रहे है या नहीं। दूसरा व्यक्ति क्या कर रहा है यह हमें नहीं सोचना चाहिए। भगवान श्रीराम को अपने हृदय में धारण करन चाहिए जिससे केवल न हम स्वयं बल्कि समाज को भी संकट से उबारने की शक्ति अर्जित कर सकें।

सौम्यता, सहजता, सरलता और समभाव का प्रतीक हैं भगवान श्रीराम


यह लेख मैने पिछले वर्ष रामनवमी पर कृतिदेव में लिखा था और इसका शीर्षक यूनिकोड में था। उस समय मेरा नारद पर कोई ब्लाग नहीं था पर वहां के सक्रिय ब्लागर -जिनका काम हिंदी के ब्लागरों को ढूंढना था- मेरे शीर्षक तो पढ़ पा रहे थे पर बाकी उनके पढ़ने में नहीं आ रहा था। मेरे बहुत सारे ऐसे लेखों पर बाद में अनेक ब्लागरों ने कहा था कि मैं उनको यूनिकोड में लाऊं पर बड़े लेख होने के कारण ऐसा नहीं कर सका। अब चूंकि कृतिदेव का यूनिकोड मिल गया है तो अपने ऐसे लेख प्रस्तुत कर रहा हूं।

आज पूरे देश में रामनवमी का त्यौहार मनाया जा रहा है। राम हमारे देश के लोगों के हृदय के नायक है। यह स्वाभाविक ही है कि लोग राम का नाम सुनते ही प्रफुल्लित हो उठते हैं। राम की महिमा यह कि जिस रूप में उन्हें माना जाये उसी रूप में आपके हृदय में स्थित हो जाते है। राम उनके भी जो उनको माने और राम उनके भी जो उन्हें भजें और वह उनके भी हैं जो उन्हें अपने हृदय में धारण करें।
मैं बचपन से भगवान विष्णू की उपासना करता आया हू। स्वाभाविक रूप से भगवान श्री राम के प्रति भक्तिभाव है। इसका एक कारण यह भी रहा है कि मैं मूर्ति तो भगवान विष्णू की रखता हूं पाठ बाल्मीकी रामायण का करता हूं। कुल मिलाकर भगवान विष्णू ही मेरे हृदय में राम की तरह स्थित हैं। मतलब यह मेरे लिये भगवान राम ही भगवान विष्णू है। यह समभाव की प्रवृति मुझे भगवान राम के चरित्र से मिलती है।
भगवान राम के प्रति केवल भारत में ही बल्कि विश्व में भी उनकी अनुयायियों की भारी संख्या है। मतलब यह कि भगवान श्रीराम का चरित्र केवल देश की सीमाओं में नहीे सुना और सुनाया जाता है वरन् देश के बाहर भी उनके प्रति लोगों के मन में भारी श्रद्धा है। जब मै आज भारत के अंदर चल रहे हालातेों पर नजर डालता हूं तो लगता है लोग केवल नाम के लिये ही राम को जप रहे है। भगवान राम के चरित्र की व्याख्यायें बहुत लोग कर रहे है पर केवल लोगों में फौरी तौर पर भक्ति भाव जगाकर अपनी हित साधने तक ही उनकी कोशिश रहती है। मैं अक्सर जब परेशानी या तनाव में होता हूं तो उनका स्मरण करता हूं।
यकीन मानिए भगवान राम के मंदिर में जाकर कोई वस्तू या कार्यसिद्ध की मांग नहीं करता वरन् वह मेरे मन और बुद्धि में बने रहें इसीलिये उनके समक्ष नतमस्तक होता हूं। जब संकट में उन्हें याद करता हूं तो केवल इसीलिये कि मेरा घैर्य, आस्था और विश्वास बना रहे यही इच्छा मेरी होती है। थोड़ी देर बाद मुझे महसूस होता है कि वह शक्ति प्रदान कर रहे है।
भगवान श्रीराम का चरित्र कभी किसी अविश्वास और अकर्मणता का प्रेरक नहीं हो सकता। जो केवल इस उद्देश्य से भगवान राम को पूजते हैं कि उन पर कोई संकट न आये और उनके सारे कार्य सिद्ध हो जायें-वह राम का चरित्र न तो समझते है न उन्हें कभी अपने विश्वास को प्रमाणित करने का अवसर मिल पाता है।
भगवान श्री राम की कथा पढ़ना और सुनना अच्छी बात है पर उन्हें अपने हृदय में धारण कर ही जीवन में आनंद ले पाते है। ऐसे विरले ही होते है। भगवान राम के चरित्र में जो सौम्यता, सहजता, सहृदयता, समभाव और सदाशयता है वह विरले ही चरित्रों में मिल पाती है। यही कारण है कि भारत की सीमाओं के बाहर भी उनका चरित्र पढ़ा और सुना जाता है। अगर मनुष्य के रूप में की गयी उनकी लीलाओं का चर्चा की जाये तो वह कभी विचलित नहीं हुए। कैकयी द्वारा बनवास, सीताजी के हरण और रावण के साथ युद्ध में श्रीलक्ष्मण जी के बेहोश होने के समय उन्होंने जिस दृढ़ता का परिचय दिया वह विरलों में ही देखने को मिलती है। रावण के साथ युद्ध में एक ऐसा समय भी आया जब सभी राक्षसों को ऐसा लगा रहा था कि भगवान राम ही उनके साथ युद्ध कर रहे है। वह घबड़ा कर इधर उधर भाग रहे थे जहां जाते उन्हें राम देखते। मतलब यह कि राम केवल उनके ही नहीं है जो उनके पूजते बल्कि उनके भी है जो उन्हें नहीं पूजते-नहीं तो आखिर अपने शत्रूओं को दर्शन क्यों देते? यह उनके समभाव का प्रतीक है। क्या हम उन्हें मानने वाले ऐसा समभाव दिखा पाते है। कतई नहीं। यकीनन हमेें अब आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या केवल भगवान श्रीराम की मूर्ति लगाकर उनके प्रति दिखावे की आस्था प्रकट करना ही काफी है। हमें उनके पूर्ण स्वरूप का स्मरण कर उसे अपने मन और बुद्धि में स्थापित करना चाहिए। याद रहे मनुष्य की पहचान उसकी बुद्धि से है। अगर आप अपनी बुद्धि में अपने इष्ट को स्थापित करेंगे तो धीरे धीरे उन जैसे होते जायेंगे। एक विद्वान का मानना है कि मूर्ति पूजा का प्रत्यक्ष रूप से लाभ कुछ नहीं होता पर उसका यह फायदा जरूर होता है आदमी जब भगवान की पूजा करता है तो उसके हृदय में उनके गुणों का एक स्वरूप स्थापित होता है जो आगे चलकर उसका स्थायी हिस्सा बन जाता है। शर्त यही है वह आदमी उस समय किसी अन्य भाव का स्थान न दे।
इस दुनिया में हमेशा मूर्तिपूजा का विरोध करने वालों की संख्या ज्यादा रही है। दरअसल वह इससे होने वाले मनोवैज्ञानिक फायदों को नहीं जानते। प्रत्यक्ष रूप से तो इसका फायदा नही होता दिखता पर अप्रत्यक्ष रूप से जो व्यक्ति में शांति और दृढ़मा आती है उसको किसी पैमाने से मापना कठिन है। मुख्य बात है अपने अंदर भाव उत्पन्न करना। आखिर कोई भी व्यक्ति काम करता है तो उसके पीछे उसके विचार, संकल्प और निश्चयों के साथ ही चलता है। जब उनमें दोष है तो किसी सार्थक कार्य के संपन्न होने की आशा करना ही व्यर्थ है। अब लोग किसी और को तो नहीं अपने आपको धोखा देते है। मंदिरों में जाकर वह भगवान के सामने नतमस्तक तो होते है पर स्वरूप के अंतर्मन में ध्यान करने की कला में कितने दक्ष है यह तो वही जाने। अलबत्ता सबसे बड़ी बात राम की भक्ति के साथ उन्हें मन और बुद्धि में धारण भी जरूरी है। मूर्तियां तो उनका वह स्वरूप है जो आखों से ग्रहण करने के लिए स्थापित किया जाता है ताकि उसे हम अपने अंतर्मन में ले जा सके।
भगवान राम का चरित्र कभी न भुलाये जाने वाला चरित्र है। उनके प्रति अपार श्रद्धा के साथ उनके संदेशों पर चलने की जरूरत भी है। उन्होंने नैतिक आचरण, समभाव, सहजता और सरल दृष्टिकोण से जीवन जीने का जो तरीका प्रचारित किया उस पर चलने की जरूरत है। हमें समूह नहीं एक व्यक्ति के रूप में यह विचार करना चाहिए कि क्या हम उनके द्वारा निर्मित पथ पर चले रहे है या नहीं। दूसरा व्यक्ति क्या कर रहा है यह हमें नहीं सोचना चाहिए। भगवान श्रीराम को अपने हृदय में धारण करन चाहिए जिससे केवल न हम स्वयं बल्कि समाज को भी संकट से उबारने की शक्ति अर्जित कर सकें।